प्रेम से ह्दयचक्र का पोषण होता है-6


1-प्रार्थना करना भक्ति नहीं है-

                 प्रत्येक धर्म में प्रार्थनाएं हैं । पर एक बात
ध्यान में रखनी होगी कि आरोग्य या धन कमाने के लिए
प्रार्थना करना भक्ति नहीं है, यह तो कर्म है । किसी  भौतिक
लाभ के लिए प्रार्थना करना कर्म है,  जैसे  स्वर्ग  प्राप्त करने के लिए
या किसी अन्य  कार्य  के  लिए  जिसमें  ईश्वर  से  प्रेम क रना होता है, वह
भक्त होना चाहता है,उसे ऐसी प्रार्थना छोड देनी चाहिए।प्रार्थना तो दुकानदारी
हो गई,क्रय-विक्रय ।इस दुकानदारी की गठरी बॉधकर अलग रख देनी चाहिए,
फिर उस प्रदेश के द्वार में प्रवेश करना चाहिए। जिस वस्तु के लिए प्रार्थना
करनी थी विना प्रार्थऩा के पा सकते हो, तुम प्रत्येक वस्तु को पा सकते हो।
लेकिन यह तो भिखारियों का धर्म हो गया ।मूर्ख ही कहा जायेगा उन लोगों
को जो गंगा के किनारे बैठकर कुंवॉ खोदते हैं, या हीरों की खान में कॉच के
टुकडों की खोज करते हैं।आश्चर्य है ईश्वरके पास मॉगा भी तो आरोग्य,भोजन,
या कपडे काटुकडा। इस शरीर ने कभी न कभी मरना ही है तो फिर इसकी
आरोग्यता के लिए बार-बार प्रार्थना करने से क्या लाभ ?आरोग्य और धन
में रखा ही क्या है,मनुष्य अपने जीवन में थोडे से ही अंश का उपभोग कर
सकेगा ।हम संसार की सभी चीजें प्राप्त नहीं कर सकते तो क्यों हम उनकी
चिंता करें?जब कोई चीज आती है तो अच्छी बात,और जब कोई चीज जाती
है तो भी अच्छी बात ।हम तो ईश्वर से साक्षात्कार करने जा रहे हैं, भिखारी
के वेष में हम वहॉ प्रवेश नहीं कर पायेंगे,बाइविल में लिखा है कि ईशा मसीह
ने खरीदने और बेचने वालों को वहॉ से भगा दिया था,लेकिन फिर भी लोग
प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर मेरी तुच्छ विनती कि मुझे इसके बदले एक नईं
पोषाक दे दे ,मेरा सिर दर्द मिटा दे या मैं कल दो घण्टे प्रार्थना अधिक करूंगा।
इस मानसिक प्रवॉत्ति से ऊपर उठना होगा यदि मनुष्य ऐसी चीजों के लिए
प्रार्थना करे तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर है ही क्या रह गया ।।

2-सच्चा प्रेम आत्मा से उत्पन्न होता है न कि मन से-

           मूलतः अगर हम देखें तो सच्चा प्रेम एक गुंण है,
जो कि आत्मा से उत्पन्न होता है,न कि इन्द्रियों  या  मन से ।
इसलिए जब कोई किसी से प्रेम की बात करता है  तो  यह  जानना
चाहिए कि उसका प्रेम शरीर से है या आत्मा से।शरीरका आकर्षण भौतिक
या स्थूल होता है ।यह सेक्स की भावना ,आकर्षक राजकुमार के स्वप्न, मनुष्य
की कुशलता या बुद्धि की प्रशंसा,कलाकार की कला का प्रदर्शन से आ सकती है । शारीरिक
आकर्षण सच्चा प्रेम नहीं है,क्योंकि वह मन से उत्पन्न होता है । मन प्रेम नहीं करता है,वह
केवल इच्छा करता है ।लेकिन सामान्यतः सच्चे प्रेम की भावना को भ्रम से सेक्स और व्यक्तिगत
स्वार्थ समझ लिया जाता है, जबकि शुद्ध प्रेम निर्लिप्त होता है,वह आत्मा से उत्न्न होता है ।

3-प्रेम से ह्दयचक्र का पोषण होता है–

                एक सशक्त ह्ददय-चक्र स्वस्थ व्यक्तित्व का
आधार है।प्रेम से पोषण पाकर ह्दयचक्र सुख प्रदान करता है।
जैसे एक डाक्टर की आत्मीयता और प्रेम उसके इलाज की क्षमता
में वृद्धि करता है ।  आत्मीय और प्रिय होना भी मर्ज का इलाज है । ऐसे
व्यक्तित्व की चैतन्य लहरें दूसरे व्यक्तियों को उसी प्रकार आकर्षित करती
है,जैसे मधुमक्खी फूलों में स्थित मधु  की  ओर  आकर्षित  होती है ।   प्रेम से ही
करुणॉ का जन्म होता है,जिससे हम पिघल जाते हैं ।और विना सोचे-विचारे मानवता
की सहायता के लिए निकल पडते हैं । उस समय नैतिक-विवशता या मानसिक निर्णय
नहीं अपितु एक सहज कार्य होता है ।ह्दय दूसरों के दुखों को देखकर पसीज जाता है,क्योंकि
वह दूसरों की परछाई है । श्री माता जी अक्सर कहती हैं कि दूसरा व्यक्ति है ही कौन,जब मन
की सीमित क्षमता परमेश्वर को जानने के लिए असीम हो जाती है ? यदि आप सुर्य और उसका
प्रकाश है,यदि आप चन्द्रमा और उसका प्रकाश हैं,तो फिर एक से दो भेद ही कहॉ ? केवल जहॉ
अलगाव है वहॉ अलगाव के कारण लगाव महसूस करते हैं । इसलिए आप उससे चिपक जाते हैं।
जब मन अपने स्तित्व को भूल जाता है,तब वह सीमित मन असीम आत्मा में बदल जाता है।
श्री माता जी के जीवन में तो ऐसी घटनाएं घटती हैं कि दूसरों की पीडा उनके शरीर में महसूस
होती है ।और माता जी का शरीर इतना करुणॉमय है कि वह दूसरों के दुखों को अपने में खीच
लेती हैं ।और वीमार व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है ।।

4-अपने प्रति वफादार रहो-

               शेक्सपियर ने कहा था कि अपने प्रकि वफादार बनो ।
जब कोई परमात्मा के प्रति निष्ठावान होता है  तब  उसके अन्दर के
सद्गुण चमकते हैं । ,सत् ही पवित्र है,  और उसकी  पवित्रता ही  सबसे
बडी शक्ति है ।वह गुरुत्वाकर्षण है जो अपनी ओर लोगों को आकर्षित करती है।
यह वही बल है जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।यह वही बल है,जो समान
गुणयुक्त,कल्याणकारी और ईमानदार व्यक्तियों को आकर्षित करता है । इस संसार में
ईमानदारी से व्यवहार करने से ही आनंद और संतोष प्राप्त होता है ।

5-स्वयं में रचनात्मकता को विकसित करें-

                  हमें स्वयं में सभी तरह के रचनात्मकता
को विकसित करने के लिए  उसके  दरवाजे  खोलने होंगे
।आज लोगों में अप्रत्याशित ऊर्जा है,लेकिन उन्हैं रचनात्मक
कार्यों की की दिशा में मोडने की प्रेरणॉ नहीं दी जा  रही  है। वह
मूल रहित है,किसी आधार के विना,परमात्मा के सम्पर्क के बिना
दिशाहीन है, इसलिए वह छितराकर नष्ट होती जा रही है ।रचनात्मकता
में यदि उसमें परमात्मा का प्रेम परावर्तित न हो तो वह स्वयं घातक है । वह
तो उस वीमार वृक्ष के समान है जो जीवित तो है पर उसमें फल नहीं लगते हैं।
चित्रकला का अर्थ केवल रंगों को उतारना ही नहीं है बल्कि उससे अधिक कुछ और
भी है,जो कि जीवन का पोषण करता है । इसलिए रचनात्मकता में परमात्मा का प्रेम
जीवन का लक्ष्य होना चाहिए ।

6-कलाकार को परमात्मा का आशीर्वाद-

                          हर मनुष्य कलाकार हैं, और यदि कलाकार
आत्मज्ञानी है तो उसकी कला में परमात्मा के प्रेम की सर्वव्यापी
शक्ति परावर्तित होती है ।जब कलाकार की कला और कैनवस आपस
में एकाकार हो जाते हैं तब अज्ञात चेतना के कार्य  का  सूत्रपात  होता है ।
उस सहजता में ,आत्मा की अभिव्यक्ति स्वयं होती है । तब  मनुष्य रूपी
यंत्र(कलाकार) में परमात्मा का आशीर्वाद उतर आता है,इस प्रकार की अनुपम
कृति एक यादगार बन जाती है ।जो एक अनोखी कलाकृति,आनंद की वस्तु और
हमेशा के लिए सौन्दर्य का प्रतीक हो जाती है,प्रेरणॉ और चैतन्य का स्रोत वन जाती है।
जैसे सिस्टीन चैपल में माइकेल ऐंजलो की चित्रकारी या मोजार्ट का संगीत,इस प्रकार की
कला मनुष्य की आत्मा में हलचल पैदा कर देती है और विकास के लिए ऊपर उठने की
सीढियॉ बन जाती हैं ।

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