बद्री-केदार की यात्रा-11


1-धार्मिक एवं पर्यटक केन्द्र –
चमोली में धार्मिक एवं पर्यटक केन्द्रों से भरा पडा है ।गर्मी का मौसम आते ही लोग अपनी प्लॉनिंग बनाना शरू कर लेते हैं ।बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट खुलने पर देश-विदेश के लोग इन स्थलों में आना प्रारम्भ कर लेते हैं।गर्मी के मौशम में अगर ऋशीकेश से ऊपर पहाडों में यात्रा पर चलने वाले वाहनों को देखते हैं तो 95 प्रतिशत वाहन चमोली में अवश्य प्रवेश करते हैं। फलस्वरूप यहॉ पर परिवहनऔर होटल व्यवसाय,अच्छी प्रगति पर है, वाहनों की संख्या बहुत अधिक बढ गई है और खासकर छोटे वाहन अधिक लोकप्रिय होते दिख रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार अकेले गोपेश्वर कर्णप्रयाग के बीच जो वाहन चलते है उनकी संख्या 3 सौ से अधिक है,इसी प्रकार हर जगह के मार्गों के लिए चलने वाले वाहनों की संख्या बहुत अधिक है,फिर भी यात्रा सीजन में वाहनों की मॉग बढने से वाहनों की कमी महसूस की जाती रही है। पिछले एक दो वर्षों में वाहनों की संख्या बढने से अब आम आदमी को अधिक परेशानी नहीं होती दिखती है ।

2-केदारनाथ की यात्रा–

अगर आप भी इन धार्मिक और पर्यटक स्थलों का भ्रमण करना चाहते हैं तो आपके मार्गदर्शन के लिए आपको बता दें कि-आप सबसे पहले केदारनाथ की यात्रा करें,शुभ यात्रा मानी जाती है। शाम को गौरीकुण्ड में ठहरें,सुबह तप्तकुण्ड में स्नान करें और लक्ष्मी मन्दिर में हाथ जोडकर पदयात्रा प्रारम्भ करें, बहुत सुन्दर दृश्य हैं रास्ते में 10 कि0मी चलना है,आप चाहे तो घोडे में बैठ सकते हैं,या डोली में,सारी व्यवस्था मिलेगी रास्ता बहुत सुन्दर मिलेगा,चलते वक्त बहुत रस दिखेगा,कई लोगों से मुलाकात हो जाती है,पराये अपने हो जाते हैं,रास्ते में पानी, आराम करने,खाने-पीने की सारी सुविधाएं मिलेंगी रास्ते में रामवाडा में कुछ आराम कर सकते हैं भोजन कर सकते हैं,फिर आगे बढे रास्ते का पता ही नहीं चलता कि कब पहुंचे।दूर से ही दिखने लगेगा आपको केदारनाथ ।बहुत ही रमणींक स्थल है, केदारनाथ,चारों और वर्फीली पहाडियॉ हैं,चाहें तो आप अगस्तमुनि से हवाई सेवा द्वारा भी केदारनाथ जा सकते हैं,पैदल चलने पर शाम को वहीं रहें,वहॉ रहने के लिए धर्मशाला,होटल गढवाल विकास निगम और पर्यटक निगम की सारी सुविधायें मिलेंगी । शाम को ही आप इधर-उधर भी देख-घूम लें,क्योंकि सुबह के आपकतो समय नहीं मिलेगा ।सुबह पूजा करने के बाद चल देंगे। भोजन करने के लिए 2 बजे तक आप गौरीकुण्ड पहुंच जायेंगे ।

3-त्रिजुगीनारायण की यात्रा–

आप थके होंगे मगर आपको श़ाम के समय का सदुपयोग करना है,वहॉ से 5 कि.मी.त्रिजुगी नारायण है,आध्यात्मिक आस्था का केन्द्र है ।अगर आपको कालीमठ भी जाना है तो हाल्ट के लिए गुप्तकाशी चले जॉय अन्यथा गौरीकुण्ड में ही ठहरे,क्योंकि अगले दिन सुबह यहॉ से बस लगती है बद्रीनाथ के लिए, और भीड इतनी अधिक होती है कि शॉम को ही आपको टिकट लेना होगा। वैसे आपका अपना वाहन हो तो बहुत अच्छा है मगर कठिनाई यह होगी कि यदि वर्षात शुरू हो गई और रोड ब्लॉक होने पर आपको बहुत परेशानी होगी ।यदि आपको रास्ते में में पडने वाले स्थलों को भी देखना है तो आप बसेरे के लिए गुप्तकाशी आ जॉय ।अगले दिन सुबह पहले कालीमठ जॉय थोडा हटकर है, छोटे वाहन जाते है, यह भी आस्था का केन्द्र है । इसी घाटी में मदमहेश्वर का मन्दिर भी है ,वहॉ जाने के लिए आपको योजना बनानी होगी क्योंकि 2या3 जिन का समय चाहिए यहॉ खासकर बंगाली लोग जाते हैं बहुत पुराना मन्दिर है,प्राकृतिक छटा की धनी इस घाटी में लोग जाना नहीं भूलते । लेकिन आप इस समय लौटकर आयें और भोजन करके चलें चोप्ता ।और यदि आपको सीधे बद्रीनाथ जाना है तो गौरीकुण्ड से गोपेश्वर से होते हुए शामको आप बद्रीनाथ पहुंच जायेंगे,वैसे गुप्तकाशी से बसें या छोटे वाहन चलते हैं ।

4-चोप्ता की यात्रा-

अगर आप चोप्ता पहुंचते हैं तो थोडा रुकें चाय पीते हैं, तो पिएं फिर अपनी योजना बनाएं क्योंकि वहॉ पर पर्यटक और धार्मिक दोनों स्थान हैं । अच्छा होता आप उस दिन वहीं ठहरें शाम के समय घूमने निकलें खुला क्षेत्र है,जगह-जगह टूरिस्ट मिलेंगे हो सकता है विदेशी अधिक मिलेंगे,पर्यटक निगम,जडीबूटी संस्थान,पन्तनगर शोधसंस्थान के केन्द्र होंगे,साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य जो विखरा मिलेगा, जिसमें ऊंचे देवदार,सुराही के वृक्ष और उनके बीच खुला बुग्याल,सामने मनमोहक बर्फीली पहाडियॉ । शाम को वहीं हाल्ट करें, ठहरने के लिए होटल हैं,छोटे बडे ।

5-तुंगनाथ की यात्रा-

सुबह उठकर चलें तुंगनाथ की ओर जी हॉ चढाई है जंगल से होकर चलना है, घबडायें नहीं कठिनाई तो होगी ही मनर आप स्वर्ग की और बढ रहे हैं रहे हैं,निश्चित तौर पर स्वर्ग है ।एशिया में सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित मन्दिर,काफी भीड होगी चलते समय,रास्ते से ही आपको बुग्याल मिल जायेगा अर्थात अधिक ऊंचाई पर मिलने वाली महीन घास । रास्ते में अमूल्य जडी बूटी मिलेगी कडो,अतीस आदि फिर दिखाई देगा तुंगनाथ वहॉ भी होटल हैं, खाने पीने की पूरी व्यवस्था है,शुद्ध दूध मिलेगा,होटल छोटे पुराने मकान,देखकर अपने पुराने समय के घर की याद आ सकता है आपको के। बातकरके एक कमरे में अपना सामान रख दें और ताला लगा दें अब मन्दिर में जॉय आगर सावन- भादो के महीने की बात है तो मन्दिर में जाने से पहले सामने झरने होंगे स्नान कर लें,ध्यान रखें यहॉ जून के महीने में भी ठंड रहती है ।मन्दिर में जाकर पूजा कर लें बाहर कई मन्दिर हैं छोचे-छोटे देखें । वापस कमरेमें आकर भोजन करें ।फिर आप अपनी योजना बना सकते हैं ।यदि आप थके नहीं हैं,क्योंकि आपको शाम का ठहराव चोप्ता में करना है,वापस भी जाना है,समय को देख लें ।अगर 1 भी बज रहा हो तो काफी समय है ।आप चन्द्रशिला जाने की योजना बना सकते हैं,वहॉ से 3 की.मी. दूर ऊंचाई पर वहॉकोई मन्दिर नहीं है,बस सिर्फ दुनियॉ दिखती है प्रकृति का अजूबा आनन्द मिलता है मानो आप एव्रेस्ट पर पहुंच गये हों,सचमुच स्वर्ग का आनन्द मिलता है,बहुत ऊंचाई पर है, वहॉ फौज की टुकडी भी रहती है,आप जाते हैं तो वे स्वागत करेंगे आपका ।चन्दर्रशिला गगन चुम्बी चोटी चारों ओर मानो सारी दुनियॉ दिख रही हो ।अपने यादगार में लोग पत्थरों पर कुछ लिख देते हैं,मैं हर एक दो साल में यहॉ जाना नहीं भूलता ।कुछ देर देखें, परखें, टहलॆं, आराम करें और फिर वापस लौटें । तुंगनाथ में चाय पियें फिर अपना सामान है तो लेकर चलें चोप्ता, शाम को अच्छी नींद आयेगी । क्रमशः आगे बताया जायेगा।चोप्ता से सुबह चलें, यदि अपना वाहन है तो ठीक है वरना लोकल वाहन मिलेंगे अथवा गुप्तकाशी या गौरीकुण्ड से आने वाले वाहन में बैठें ,घने जंगल से मार्ग, आगे बढने पर खुले तप्पडों में बाहरी लोगों के टेण्ट लगे दिखेंगे खाना बना रहे होंगे,उनके बच्चे खेल रहे होंगे कोई टहल रहे होंगे जोर-जोर से हंस रहे होंगे या कुछ बोल रहे होंगे 5 कि.मी की दूरी पर मिलेगा धोती धार वहॉ पर एक होटल मिलेगा आगे फिर आरक्षित जंगल बहुत घना जंगल,बहुत ऊंचे पेड दिखाई देंगे सुनसान,जंगल में जंगली जानवर भी दिखाई देगा ।इसी जोगल में मिलेगा राष्टीय कस्तूरा मृग विहार पार्क वहॉ पर रुकें और पार्क में इन मृगों को देखें,निहारें ,यही पर एक मचान बना है जिसमें जाकर यह नजारा देखा जा सकता है ।20 कि.मी की दूरी पर मिलेगा आपको उत्तराखण्ड जडी-बूटी निदेशालय चाहें तो आप रुकें देखें ।यहॉ पर जडी- बूटियों से दवाई बनाने के लिए मशीनें लगी हैं तथा शोध कार्य और जडी-बूटियों का उत्पादन होता है ।यहॉ पर उत्तराखण्ड जडू-बूटी निदेशक का कार्यालय है । फिर आगे बढे अब आपको खुली चौरस घाटी दिखेगी,मण्डल घाटी ।

6-अनुसूया मंदिर की यात्रा-

माता अनुसूया की यात्रा करना न भूलें, मण्डल से ही उत्तर दिशा की ओर अलग रास्ते से होकर चलना है,बहुत प्राचीन मन्दिर, कब बना, वहॉ के लोगों को भी मालूम नहीं,घने जंगल के बीच में । कहते हैं अत्रमुनि यही रहते थे,उनकी पत्नी अनुसूया यह कुटिया आज मन्दिर के रूप में है। हर वर्ष वे लोग जिनके बच्चे नहीं होते हैं यहॉ मन्नत मॉगने आते हैं । दिसम्बर माह में रात्रि का एक मेला लगता है यहॉ उस दिन वे लोग रात्रि के समय मन्दिर के प्रॉगण में तपस्या में बैठते है,माता अनुसूया उन्हैं दर्शन देती है,और उनकी मनोकामना पूरी होती है।इस मन्दिर से आगे 3 की0मी0 दूर अत्रमुनि गुफा में जाना न भूलें, जी हॉ अत्रमुनि जी इस गुफा में तपस्या करते थे ।अमृत गंगा के किनारे ।मुनि जी इस नदी में सुबह स्नान करते थे और दिनभर इसगुफा में ध्यान धारण में बैठकर शाम को अपनी गाय के लिए घास निकालकर वापस अपनी कुटिया में लौटते थे ।आज भी पशुपालक उस घास को छॉटकर ले जाते हैं,एक से इस घास के बारे में पूछा तो जबाव मिला कि,पशुओं को इस घास को खिलाने से पशु अधिक दूध देते और कभी वीमार नहीं होते है । रात्रि के मेले में रात्रि जागरण के लिए कई व्यवस्थाएं की गई होती है,पाण्डाल बना होता है,कलाकार आमंत्रित होते हैं, क्योंकि ठंडा छेत्र है इसलिए जगह-जगह आग जलाने की व्यवस्था होत है । सुबह उजाला होने से पूर्व जब हम अत्रमुनि आश्रम की ओर गये तो रास्ते में कई गुफाओं में महात्माओं की ध्वनि जलाई दिखाई दी ।आगे बडे तो हलकी चढाई मिली ,अच्छी सडक बनी थी ।कुछ आगे बढकर देखा तो,सामने बहुत ऊंचा झरना,सडक वहीं पर खत्म हो गई थी । अब कहॉ जाना है,सोचने लगे,साफ उजाला नहीं हुआ था,एक आदमी नीचे नदी के किनारे की ओर जाते दिखाई दिया, हमने उससे पूछा जी, इधर रास्ता कहॉ है,उसने ऊपर की ओर इशारा करके कहा जहॉ भयंकर चट्टान थी,उधर से जाओ और जो झरना गिर रहा है उसके बीच से आगे रास्ता हैऔर कहते हुये नीचे चला गया,हम दोनों एक दूसरे के ऊपर देखते हुय़े,विचार करने लगे कि कही ये भूत तो नहीं है,जो हमें वहॉ जाने के लिए कह रहा है,उस सूखी खडी चट्टान पर । इसी बीच एक पौडी के निवासी नव दम्पत्ति वहॉ पर पहुंचे हमने उनसे यही बात पूछी तो उन्होंने कहा चलो हमारे साथ,हम खुश हुये उनके साथ चलने लगे,क्योंकि ये लोग पहले भी आये थे यहॉ ।आगे बढे उस चट्टान पर केवल पॉव रखने मात्र के लिए सीढी, घास पकडकर ऊपर चढने लगे, एक जगह पर सामने ऊपर से एक संगल लटका है उसे पकडकर ऊपर चढे फिर कुछ सीधा रास्ता,फिर रास्ता बन्द,अरे अब कहॉ जॉय,सामने अन्दर की ओर एक गुफा वे लोग उसमे घुस गये,अरे यह क्या?हमारे बस की बात नहीं है चलो वापस,पीछे मुडे और वापस लौटने लगे लेकिन पीछे इतनी लम्बी लाइन लग गई संकरे मार्ग में कि कैसे जॉय?तबतक पीछे से आवाज सुनाई भाई साहब डरो नही आप वापस क्यों चले गये,पहली वार मैं भी ऐसी ही गई थी वापस,कहती हुई वह गुफा में चली गई,और उसका पति गुफा के दूसरे किनारे पर खडा हो गया कि डरो नहीं, मैं हूं न यहॉ पर,हम भी गुफा में एक-एक कर चले गये,,एक बार में एक आदमी जा सकता था गुफा में,मैं गुफा में गया तो मेरे साथी ने पीछे से मेरा पकड लिया कि कहीं मैं छूट न जाऊं ।कैसे जाना है गुफा में, लेटकर अर्थात सिर को गुफा में डालकर घुटनों और कुहनों के सहारे आगे चलना है,बहुत संकरा है,लेकिन कहा जाता है कि कितना ही कोई मोटा क्यों न हो चला जाता है,आगे दूसरे छोर पर खतरनाक है,एक अंग्रेज वहीं से नीचे गिर गया था,पताही नहीं चला कि कहॉ गिरा नीचे ।उठे देखा निरंकार चट्टान और बाहर झरने का पानी गिर रहा है,आगे देखा सुन्दर रास्ता 4फुट चौडा,अरे वाह आनन्द आ गया,अचानक मुंह से निकला,आगे बढे पीछे लम्बी लाइन लग चुकी थी, कुछ आगे बढे तो एक गुफा मन्दिर जहॉ पर एक पण्डित पूजा में व्यस्त हैं,पण्डित जी से पूछा तो जबाव मिला यहीं पर अत्रमुनि तपस्या करते थे, जो लोग पहली बार आते हैं डरते हैं मगर यहॉ पर पहुंचकर खुश हो जाते हैं,सामने जो हरी घास है, उस घास को मुनि जी काटकर ले जाते थे । हाथ जोडकर आगे बढे एक गुफा में एक महात्मा तपस्या में लीन बैठे हैं ।महसूस किया कि प्राचीनकाल में ऐसी ही तपस्या करते होंगे महात्मा लोग ।आगे बढे बाहर बहुत बडा झरना गिर रहा है और अन्दर चट्टान पर सुन्दर रास्ता बना है,सम्भवतः बीच में कोमल चट्टान होने और क्षय से धीरे-धीरे यह रास्ता बन गया हो ।आगे बढे और दूसरे छोर से नीचे जाने के लिए रास्ता है,फिर नदी पार करके उसी रास्तेमें पहुंच जाते हैं ।उसके बाद वापस अनुसूया मन्दिर पहुंचे ।अब अनुसूया मन्दिर से वापस मण्डल के लिए प्रस्थान करें,अधिकतम् 2 घण्टे लगेंगे अनुसूया गेट पहुंचने के लिए । वहॉ से वाहन से 20 कि0मी0 दूर गोपेश्वर के लिए चलें । गोपेश्वर में भोजन करें, वहॉ पर गोपनाथ का मन्दिर है उसे देखना न भूलें मन्दिर के बगल में एक कल्पवृक्ष है,सामने एक एतिहासिक त्रिशूल है,गुप्तकाल की बनी है जिसपर कि आज भी जंक नहीं नगा है ।उसके बाद बद्रीनाथ वाली बस में बैठें या छोटे वाहन में बैठें,चमोली से होकर चलना है ।

7-रुद्रनाथ की यात्रा-

पद यात्रा का शौक रखने वालों के लिए एक जानकारी देना चाहूंगा कि रुद्रनाथ हिमालय क्षेत्र में महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटक स्थल है। सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित यह एक गुफा मन्दिर है, गोपेश्वर से15 कि0मी0 दूर सीधे खडी चढाई से हिमालय में स्थित है,शीत काल में रुद्रनाथ की मूर्ति डोली से गोपेश्वर में आ जाती है और गर्मी प्रारम्भ होने बद्रीनाथ की तरह कपाट खुलते हैं ।गोपेश्वर से एक दिन जाना और एक दिन आना पैदल,प्रारम्भ से ही,जंगल मिलेगा और उसके बुग्याल बाग बुग्याल।जाते समय खडी चढाई और आते समय उतराई ।रास्ते में अबकोई दिक्कत नहीं होगी होटल खुल गये हैं,रास्ता ठीक है,रास्ते में भोजपत्र का जंगल मिलेगा. यहॉ जडी -बूटियों का भण्डार है,महंगी-महंगी जडू बूटियॉ यहॉ पाई जाती है,मासी के फूल जिनको देवताओं के लिए सबसे अच्छी धूप मानी जाती है, रास्तेमें ही मिल जाती है, इन्हैं निकालने वाले भी चारों ओर आपको लोग मिल सकते हैं ।सुबह चलने पर 3या4 बजे आप रुद्रनाथ पहुंच जायेंगे,वहॉ ठहरने केलिए धर्मशाला है अब होटल भी खुल चुका है मन्दिर समिति आपकी सारी व्यवस्था कर देगी ।मन्दिर में हाथ जोडें फिर टहलने जॉय देखें इधर-उधर चारों ओर प्रकृति की विखरी छटा का आनन्द लें,ध्यान रखें यहॉ बहुत ठंडा है,कपडे पूरे ले जॉय । यहॉ की यात्रा खासकर बंगाली लोग करते हैं,क्योंकि यहॉ आने पर हर प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है । शाम को पूजा करें पण्डित जी आपको पहले ही सलाह दे देंगे,,प्रातः उठकर हाथ मुंह धोकर आरती में सम्मिलित हों फिर प्रस्थान करें और 3-4 बजे तक आप गोपेश्वर पहुंच जायेंगे ।फिर अपने गन्तव्य की ओर जॉय ।शूभ यात्रा ।।

8-कल्पेश्वर की यात्रा-

पीपलकोटी से होकर आप जब हेलंग पहुंचें तो वहॉ से आपको बांयें ओर एक दूसरे मार्ग से होकर 10 कि.मी दूर उर्गम जॉय,फिर वहॉ से 5 कि.मी. आगे कल्पनाथ बहुत सुन्दर जगह है, रमणीक ,खासकर बंगाली लोग यहॉ आते हैं,यहॉ की प्राकृतिक छटा देखने लायक है, उसके बाद उसी दिन वापस लौटे और शाम को हाल्ट जोशीमठ करें ।यहॉ पर हर प्रकार की सुविधा आपको मिलेगी,जिस प्रकार का होटल चाहिए मिलेगा ।फिर अपना प्लान बनायें अगले दिन का ।यहॉ से 3 स्थानों मेंआपको जाना है पहले कहॉ जाना है यह निश्चित कर लेना है । नीति घाटी का क्षेत्र,यहॉ धार्मिक स्थल नहीं हैं केवल पर्यटक स्थल हैं,चीन का बार्डर क्षेत्र इसके लिए उप जिलाधिकारी जोशीमठ से पास बनाना होगा,वरना आप आगे नहीं जा सकेंगे।यह घाटी दर्शनीय, प्राकृतिक छटा के लिए प्रसिद्ध है,एक दिन गये और अगले दिन वापस लौटे ।अगले दिन 9 या10 बजे आप लौट आयेंगे उसी दिन शाम के समय औली जाना है,कैसे जॉय रोपवे या बस जैसा भी उपयुक्त लगे,जॉय पूछकर जानकारी करें घूमें देखें और ठहरने के लिए शाम को जोशीमठ लौट आयें ।

9-बद्रीनाथ की यात्रा-

जोशीमठ में भी कई मन्दिर हैं, लोगों से पूछकर देखनें जायें ।अगले दिन सुबह बद्रीनाथ के लिए चलें अगर सुबह 5 बजे चलते हैं तो 10-11 बजे तक आप बद्रीनाथ पहुंच जायेंगे,जाते ही पहले ठहरने के लिए व्यवस्था करें ।बद्रीनाथ में होटल,धर्मशाला,भरे पडे हैं,जितने भी पहुंचे सबकी व्यवस्था हो जाती है धर्मशालों की तो भरमार है,होटल बहुत अच्छे और सामान्य भी है आप अपने हिसाब से देख लें ।ठहरने की व्यवस्था हो जाने पर आप सीधे नहाने के लिए तप्त कुण्ड में लचे जॉय ।नहाने के बाद मन्दिर के प्रॉगण में जाकर हाथ जोडें और अपने कमरे में लौटें ।भोजन कर लें,फिर आराम करलें,अपना प्लान बना लें कि आपको बद्रीनाथ में कितने दिन रहना है ।कमसे कम दो दिन तो आपको रुकना ही होगा ।दिन में आराम करने के बाद शाम को बद्रीनाथ घूमें टहलते टहलते मॉणॉ 3 की.मी. दूर है,पैदल ही जॉय,यह गॉव भारत का आखिरी गॉव है,इसी गॉव में व्यास मुनि की गुफा है,गणेश गुफा है ,जरूर जॉय और पंडित जी से इनके ऐतिहासिक महत्व के बारे में अवश्य पूछें ।उसके वाद नीचे अलकनन्दा पर पुल है, उसे पार करके नदी के दूसरे छोर से टहलते हुये जॉय तो आपको आगे बद्रीनाथ का मन्दिर मिलेगा ।शाम का समय हो चुका होगा आरती का समय हो गया आप उसमें अवश्य सम्मिलित हों, आरती के वाद आप लौटें अपने कमरे में भोजन कर ले और सो जॉय ।अगले दिन आपको सुबह 4 बजे उठना है,ध्यान रखें कोई भी महीना हो बहुत ठंडा रहता है इसलिए पूरे कपडे ले जॉय ।सुबह उठकर नहाने के लिए जॉय 4 बजे । क्योंकि नहाने के बाद आपको सुबह की आरती में सम्मिलित होना है,आगर सितम्बर-अक्टूवर में आप यात्रा कर रहे हैं तो भीड कम हो जाती है,और आपको आराम से मन्दिर के अन्दर ही आरती करने का मौका मिलेगा,अन्यथा दूर से ही खडे होकर देखना होगा । आप नहायें और पूजा की थाली खरीद लें और इन्तजार करें कपाट खुलने का,सभी लोग आपकी तरह थाली लिए इन्तजार में होंगे ।अब कपाट खुल चुका होगा अगर अधिक भीड है तो आप जहॉ पर भी हैं आरती की थाली वहॉ तक पहुंच जायेगी,आपकी थाली वहॉ पहुंचाने की व्यवस्था हो जायेगी,इसके बाद एक बार आपको मन्दिर में दर्शन के लिए फिर जाना होगा,जब भी मौका मिले इसके लिए आपको फिर एक थाली लेनी होगी और लाइन में खडा होना होगा, जून-जौलाय के माह में लाइन बहुत लम्बी होगी अगर अक्टूवर माह की बात है तो फिर कोई लाइन नहीं । सुबह की आरती के बाद आप वापस लौटें अपने कमरें में और फिर आगे का प्लान बनायें ।आपको अभी दो जगह जाना है एक तो मॉणॉ घाटी वार्डर क्षेत्र की ओर और दूसरा वसुधारा की ओर यह प्लान आपको जोशीमठ में ही बनाना होगा,क्योंकि मॉणॉ घाटी चीन का वार्डर है,वहॉ जाने के लिए पास चाहिए जोशीमठ से यह बनता है,तभी जा पायेंगे आप वहॉ ।चीन वार्डर से कुछ पहले तक रोड बन चुकी है ।आपको बता दें कि इस बार्डर क्षेत्र की यात्रा सरकार की योजना के तहत हर वर्ष कर्मचारियों के ग्रुप द्वारा की जाती है,जिससे वार्डर पर कुछ दिनों तक चहल-पहल बढ जाती है, चीन के लोगों को अपने नेचर से अवगत कराना होता है, इसलिए निडर स्वभाव में परस्पर हंसते मुस्कराते स्वभाव में रहना होता है । वरना इस क्षेत्र में या तो फौजी होते हैं बकरी वाले होते हैं अर्थात यह क्षेत्र बकरियों की उत्तम घास के लिए प्रसिद्ध है,और पहले ही से अपनी बकरियों को गर्मियों में बडे झुण्ड में इन क्षेत्रों में लाते हैं लेकिन इन्हैं भी वहॉ रहने जाने के लिए पास बनाना होता है, फिर उन्हैं फौज का संरक्षण भी मिल जाता है ।ये बकरियॉ पूरे उत्तराखण्ड के क्षेत्रों से आते हैं । आपको यह भी बता दें कि मॉणॉ घाटी के दर्रे से पहले तिब्बत के लिए व्यापार होता था, मॉणॉ में जो भोटिया जाति के लोग हैं,उनका सम्बन्ध चाहे व्यापारिक हो यावावाहिक,तिव्वत से होता था,लेकिन चीन द्वारा तिव्वत पर कव्जा करने के बाद वार्डर शील हो गया,और इन्हैं निचली घाटियों में बसाया गया,अब ये लोग गर्मियों में इन गॉवों में और गर्मियों में चमोली के निचली घाटियों में चले जाते हैं,उनका मुख्य व्यवसाय आज भी व्यापार है।

10-मॉणॉ घाटी की यात्रा—

अगर आप मॉणॉ घाटी की यात्रा करते हैं तो सुबह उठकर बस में या छोटे वाहन में बैठें, जहॉ तक वाहन जाता है जॉय उसके बाद स्थिति देखें,अगर पैदल जाने की योजना बनती है तो और भी अच्छा आनन्द आयेगा,इस घाटी की विशेषता गगनचुम्बी चोटियॉ जिनमें वर्फ और रूखे चट्टान घाटियों में पेडों के झुरमुट पैदल चलने में 3 दिन का रास्ता चलने पर तब वार्डर मुलेगा वार्डर के उस पार पठारी समतल क्षेत्र और इधर पहाडी भाग,एकदम वार्डर के नजदीक चीन द्वारा बनी पक्की सडक है लेकिन आप जायें तो 3-4 कि.मी पहले आपको रोक देंग,आपका पास वहीं तक का बना होगा । इस हिसाब से अपनी यात्रा निर्धारित करें ।फिर वापस लौटें बद्रीनाथ ।

11-वसुधारा की यात्रा-

यदि आप बद्रीनाथ आये हैं तो वसुधारा की यात्रा अवश्य करें ।स्वर्गारोणी की यात्रा इस समय नहीं हो पायेगी क्योंकि आप थक गये हैं ।यदि आपको वहॉ की यात्रा करनी हो तो इसके लिए भी प्रमिशन की आवश्यकता होगी उपजिलाधिकारी जोशीमठ से, और एक वार में केवल स्वर्गारोहिणी की ही यात्रा आप कर सकेंगे,क्योंकि वहॉ जाने के लिए 5या 6 दिन चाहिए केवल जून में ही जा पायेंगे आप । इसलिए इस समय आप सुबह उठें तप्त कुण्ड में नहाएं सुबह की आरत में भाग लें और नाशता कर मॉणॉ जॉय पैदल या छोटे वाहन में ।मॉणॉ से बॉयें और पौदल आपको चलना है, एक बात तो ध्यान में रखना होगा कि आप इस मार्ग पर धीरे चल पायेंगे,आक्सीजन की कमी होने पर सॉस फूल सकता है,या थकान अधिक लग सकती है,या नशॉ जैसा महसूस होता है,इसलिए भी कि जडी बूटियों का क्षेत्र है,कुछ आगे बढने पर सरस्वती नदी पर भीम पुल मिलेगा वहीं पर सरस्वती का मन्दिर हैं, हाथ जोड लें,देखें, परखें, भीम पुल के सम्बन्ध में एक बोर्ड पर लिखा गया है ।आगे बढें समाने खेतों में माता मूर्ति का मन्दिर है,यहॉ के लोगों का अपना इस्ट देव, आगे बढे कुछ चढाई आयेगी थकान लगेगे आप निश्चिंत इधर-उधर के दृष्यों का आनन्द लें,गगनचुम्बी चोटियॉ,ग्लेशियर खिसकने से एकत्रित हुये बडे-बडे पत्थरों के ढेर,आगे बढत जॉय,भले ही वसुधारा सामने दिखता है मगर समय अधिक लग सकता है,5 कि.मी.दूर मॉणॉ से बस आप अब पहुंच गये है सामने दिखने लगा है झरना अगर आप जुलाई अगस्त में जाते हैं तो झरमें अधिक पानी मिलेगा बाकी मौसम में कम पानी हो सकता है।बहुत ऊंचा झरना,नीचे पानी की बूंदें जमीन में नहीं गिर पाती,बल्कि हवा में ही इधर-उधर विखर जाती है,झरने का टॉप देखें तो देखतेही बनता है। कहा जाता है कि इस झरने का पानी सभी के नसीव में नहीं होता है । आप इससे आगे सामने उस घाची तक भी जा सकते हैं जहॉ से स्वर्गारोहिणी की घाटी शुरू होती है लेकिन आप थक चुके हैं ।कुछ देर आराम करें,डरें नहीं क्योंकि पहाडियॉ डरावनी जैसी दिखेंग कि अभी कोई पत्थर गिरेगा,खडी नंगी चट्टानें होगी, आप स्वयं को तृप्त जैसा महसूस करेंगे,और आपकी इच्छा वापस लौटने की होगी,फिर आप वापस बद्रीनाथ को लौटेंगे ।1 बजे तक आप वापस लौट जायेंगे सीधे मन्दिर में जॉय और दर्शन के लिए कतार में खडे हो जॉय पूजाकी एक थाली भी रख लें 21 या 51 रु.. वाली फिर आप अन्दर प्रलेश करेंगे और बद्रीनाथ जी के दर्शन करेंगे, थाली खाली करके और उसमें प्रासाद रखकर पंडित जी थाली आपको वापस लौटा देंगे आप उस थाली को दुकानदार को वापस लौटायेंगे और भोजन करके अपने कमरे में आराम करने के लिए लौटेंगे । अगले दिन अपने गन्तव्य की और प्रस्थान करेंगे ।

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