भगवान तो हमेशा भाव के भूखे रहते हैं


 

               जीवन में हमें जो कुछ
मिला है, वस्तुत: वह हमारे कर्मो
का फल होता है, परंतु जब हम उसे
प्रभु का दिया हुआ प्रसाद मानकर ग्रहण
करते हैं तो बात कुछ और होती है। हमारा हर
कर्म पूजा बन जाता है। यही बात भोजन के संदर्भ
में भी लागू हो सकती है। कोई चीज जब हम खाने से
पहले भगवान को चढ़ाकर यानी अर्पित करके खाते
हैं तो वह भोजन भी प्रसाद बन जाता है।

                    इसलिए जो भगवान के
भक्त होते हैं वे भोजन से पहले कहते
हैं-हे प्रभु, तुम्हारी दी हुई वस्तु पहले मैं तुम्हें
समर्पित करता हूं। और भला वे ऐसा क्यों न करें,
क्योंकि हमें यह जो मानव शरीर मिला है वह उसका
दिया हुआ ही तो है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं
कहते हैं कि कोई भक्त यदि प्रेमपूर्वक मुझे फल-फूल,
अन्न, जल आदि अर्पित करता है तो उसे मैं प्रेमपूर्वक
सगुण रूप में प्रकट होकर ग्रहण करता हूं। भक्त की
यदि भावना सच्ची हो, श्रद्धा और आस्था प्रबल हो तो
भगवान उसके भोजन को अवश्य ग्रहण करते हैं। जैसे
उन्होंने शबरी के बेर खाए, सुदामा के तंदुल (चावल) खाए,
विदुरानी का साग खाया। प्रभु की कृपा महान है। उसकी कृपा
से जो कुछ भी अन्न-जल हमें प्राप्त होता है, उसे प्रभु का प्रसाद
मानकर प्रभु को अर्पित करना, कृतज्ञता प्रकट करने के साथ
एक मानवीय गुण भी है।

             कुछ लोग यह प्रश्न भी
करते हैं कि जब भगवान चढ़ाया
हुआ प्रसाद खाते हैं तो घटता क्यों नहीं?
उनका कथन भी सत्य है। जिस प्रकार फूलों पर
भौंरा बैठता है और फूल की सुगंध से तृप्त हो जाता
है, किंतु फूल का वजन नहीं घटता उसी प्रकार प्रभु को
चढ़ाया प्रसाद अमृत होता है। प्रभु व्यंजन की सुगंध और
भक्त के प्रेम से तृप्त हो जाते हैं। वे भाव के भूखे हैं, भोजन के
नहीं। जैसे एक मां बच्चे को कुछ खाने को दे और बच्चा उसे
तोतली भाषा में सिर्फ पूछ भर दे तो मां उसे सीने से लगा लेती है।
इसी प्रकार भगवान भी तृप्त होते हैं, प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा
बरसाते हैं। यह मानव शरीर भी उसकी अनंत कृपा से प्रसाद स्वरूप
मिला है। हमें ईश्वर की इस कृपा को कभी नहीं भूलना चाहिए। जब
हम इसकी सार्थकता को समझेंगें, तभी जीवन धन्य होगा।

 

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