मनुष्य आशक्ति व विरक्ति के मध्य झूलता है


                                    राग और द्वेष से असंपृक्त
हो जाना अनासक्ति है। मनुष्य आदतन आसक्ति
और विरक्ति के मध्य झूलता है। या तो वह किसी
चीज की ओर आकर्षित होता है या   विकर्षित, परंतु
वह यह नहीं जानता कि इन दोनों से      बड़ी बात है कि
कर्तव्य कर्म करते समय निष्पृह भाव में चले जाना। यही
अनासक्त भाव है। विरक्ति वास्तव में आसक्ति का दूसरा
हिस्सा है।        आज जिस वस्तु के प्रति आसक्ति है, कल उससे
विरक्ति हो सकती है। अनासक्ति इन दोनों से ऊपर है। अनासक्ति
की भावदशा में चीजें हमें न बुलाती हैं और न भगाती हैं। हम दोनों
के मध्य अनासक्त खड़े हो जाते हैं।

                          बुद्ध ने इसे ‘उपेक्षा’ कहा है।
न कोई राग है और न विराग। भोगवाद और
वैराग्यवाद दोनों अतियां हैं। भोग में वैराग्य का
भाव ही निष्काम कर्म है। भोजन तो करना ही है।
जरूरत है भोजन में त्याग का भाव। भोजन में स्वाद
की तलाश करना बुरा है। अनासक्त साधक सांसारिक
घटनाओं का केवल साक्षी है- तटस्थ द्रष्टा है। वह एक
गवाह की तरह जिंदगी में विचरता है। उसके भीतर न चिंता
है, न दुख है और न ही द्वंद्व की तरंगें। अनासक्त कर्मयोगी
के जीवन में जो तरंगें उठती हैं, वे स्वभाव से मंगलकारी होती
हैं। कर्मयोगी ‘कर्तव्य कर्म’ करते हुए आसक्ति और विरक्ति के
बीच से बेदाग निकल जाता है।1 जीवन से भागना नहीं है, जीवन
में जागना है। जो जीवन से भागता है वह स्वयं अपने लिए समस्या
बन जाता है। कोल्हू के बैल की तरह भागने वाला कभी मंजिल तक
नहीं पहुंचता। भागने से कोई सकारात्मक क्त्रांति नहीं हो सकती।

                                जागते केवल वे हैं, जो जीवन
को सत्कर्म से संवारते हैं। आसक्ति में जीने वाले
व्यक्ति के भीतर विरक्ति के ख्याल आते रहते हैं।
जिंदगी ध्रुवीय है। विद्युत की तरह वह ‘पॉजिटिव है
और निगेटिव’ भी। अंधेरा है, तो उजाला भी है। जन्म
है तो मृत्यु भी है। कहने का आशय यह है कि जो लोग
विरक्त होने का प्रदर्शन करते हैं, उनके जीवन में आसक्ति
के दौरे पड़ते रहते हैं। ध्यान रहे कि जिस हिस्से को हम दबाते
हैं, वह हम पर हमला करता रहता है। अनासक्ति स्वभाव से ‘नॉन
पोलर’ है- अध्रुवीय है। ध्रुवीय जगत के बाहर स्थित होना ही अनासक्त
योग है। अनासक्त होते ही कर्मयोगी अद्वैत में प्रवेश कर जाता है, क्योंकि
वह ‘नॉन पोलर है।

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