मनुष्य का जीवन एक रहस्य है


                         जीव का उत्पन्न
होना और जीव की उत्पत्ति के
कारण जानना एक बड़ा ही रह-
स्यमय आध्यात्मिक विज्ञान है। यह
ऐसा विज्ञान है जिसे अनादिकाल से
लोग समझने का प्रयत्‍‌न करते रहे हैं।
जितना इस रहस्य को जानने का प्रयत्‍‌न
किया जाता है उतना ही इसका रहस्य और
गहन अंधकार की तरह रहस्यमय बन जाता
है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह इतना बड़ा विज्ञान
है कि हमारी छोटी बुद्धि उसे समझ नहीं पाती।
हमसे अगर कहा जाए कि वह हवा, प्रकाश,
यहां तक कि समुद्र की परिभाषा करे तो
वह भ्रम में पड़ जाएगा।

                    उसी प्रकार मनुष्य
का जीव की उत्पत्ति के संबंध में
जानने का प्रयास उतना ही असंभव
होता है, क्योंकि हमारे शास्त्रों में जीव
और ब्रह्म की जो कल्पना है वह अनुभव
पर आधारित है। उसे प्रमाणित करने के लिए
हमें अनुभव की उसी स्थिति से गुजरना पड़ेगा,
क्योंकि अनुभव को प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

                    मनुष्य के जीवन
में जो कुछ घटित हो रहा है उसे
प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
जीव कहां से आता है      और कहां
चला जाता है, कैसे काम करता है,
इस सबको प्रमाणित करना कठिन है।
एक महात्मा मंदिर में ध्यान कर रहे थे
और शाम हो गई। उसी समय एक बच्चा
मंदिर में आया, एक दीपक रखा, माचिस
जलाई, दीपक जलने लगा। जब बच्चा वहां
से जाने लगा तो महात्मा ने बच्चे से पूछा- बेटे,
यह दीपक कैसे जला? प्रकाश कहां से आ गया?
यह सुन बच्चे ने महात्मा से कहा-आप महात्मा हो
गए, इतना भी नहीं जानते! यह कहकर उसने दीपक
पर फूंक मार दी। दीपक बुझ गया। बच्चे ने कहा प्रकाश
जहां से आया था, वहीं चला गया। ऐसा हमारे जीवन में
प्राय: होता रहता है, लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर
जानने के लिए हम कभी गंभीर नहीं होते, क
भी उत्सुक नहीं होते। इसलिए अनादिकाल से
जीव और जीवन के संबंध में प्रश्न तो अवश्य
उठते रहे हैं, लेकिन इन प्रश्नों को हम और
अनेक प्रश्नों में उलझा देते हैं।

                         दरअसल, मनुष्य
स्वयं किसी प्रश्न का उत्तर खोजना
नहीं चाहता। इसलिए वह दूसरों से प्रश्न
पूछता है। भगवान बुद्ध ने कभी किसी से
प्रश्न नहीं पूछा, उन्होंने स्वयं उत्तर खोजा।
हमारे देश में आज भी अनेक संत हैं जो स्वयं
प्रश्नों का उत्तर खोजते हैं, क्योंकि जिस व्यक्ति को
प्रश्न उठाना आता है वही उसका उत्तर भी खोज सकता
है।

 

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