मनुष्य के विवेक की उपयोगिता


 

            भारतीय संस्कृति
का मूलाधार अनुभूतियां हैं।
इस संस्कृति ने सिद्धांत का निरू-
पण किया, परंतु सिर्फ इतने तक ही
अपने को सीमित नहीं रखा। ज्ञान को
अनुभूत किया यानी सिद्धांत को व्यावहारिक
जीवन में उतारा। यही कारण है कि भारतीय सं-
स्कृति आज तक जीवंत है। जिसकी कथनी और
करनी में अंतर नहीं होता, वही समाज में आदर के
योग्य बनता है।

                    इसलिए कहा गया है
कि गुणवान की हमेशा पूजा होती
है। इन दिनों मानवीय मूल्यों का ह्रास
हो रहा है। नैतिकता चरमरा रही है और
इंसानियत की नींव कमजोर पड़ती जा रही
है। चारों ओर भौतिकतावादी मूल्य छा गए हैं।
यही वजह है कि विविध प्रकार की विकृतियों से
मानव, समाज और राष्ट्र आक्त्रांत हो गया है।

                 भारतीय संस्कृति में
एकता, सत्य, उदारता, अन्याय
के खिलाफ संघर्ष, साहस, सच्चरित्रता,
निस्पृहता, सहानुभूति, संवेदना और सम-
न्वयवादी दृष्टिकोण निहित हैं। इन्हीं सद्गुणों
के आधार पर मनुष्य, मनुष्य बना रह सकता
है और राष्ट्र विश्व के समक्ष आदर्श उपस्थित कर
सकता है।

            कोई भी आदमी
फरिश्ता नहीं होता। विशेष-
ताओं के साथ कमियों की संभाव-
नाओं को नकारा नहीं जा सकता।
आचार्य श्रीमहाप्रज्ञ ने कहा है कि जब
व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पाता, तब
हजारों-हजार समस्याएं पैदा होती चली जाती
हैं। इनका कहीं अंत नहीं होता। गरीबी की समस्या
हो, मकान और कपड़े की समस्या हो या अन्याय व
उत्पीड़न, ये सब गौण समस्याएं हैं। ये पत्तों की समस्याएं
हैं, जड़ की नहीं। पतझड़ आता है, सारे पत्ते झड़ जाते हैं।
वसंत आता है और सारे पत्ते आ जाते हैं, वृक्ष हरा-भरा हो
जाता है। यह मूल समस्या नहीं है। मूल समस्या यह है कि
व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पा रहा है। उसके पीछे ये
पांच कारण काम कर रहे हैं- मिथ्या दृष्टिकोण, असंयम,
प्रमाद, कषाय और चंचलता। जैन दर्शन के अनुसार यही
पांच मूल समस्याएं हैं। यही वास्तव में दुखों का कारण हैं
और दुखों का चक्र भी। जब तक दुख के इस चक्र को नहीं
तोड़ा जाएगा, तब तक जो सामाजिक, मानसिक और आर्थिक
समस्याएं हैं, उनका सही समाधान नहीं हो पाएगा। समय-सापेक्ष
जीवन मूल्यों को आचरण में लाने के लिए हमें दायित्व और कर्तव्य
की सीमाओं को समझना होगा। इसके लिए हमें विवेक जाग्रत करना
होगा।

 

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