मनुष्य बौद्धिक प्राणी होने के साथ-साथ सामाजिक प्राणी भी है


 

                      मनुष्य बौद्धिक प्राणी
होने के साथ-साथ सामाजिक प्राणी भी
है। इसीलिए स्वभावत: मनुष्य प्रत्यक्ष या
परोक्ष रूप से अंत:क्रिया करता है। पारस्परिक
क्रियाएं, जिनका संबंध भावना, संवेग, इच्छा आदि
से न होकर विशुद्ध विवेक से होता है और ये क्रियाएं
प्रत्यक्ष या परोक्ष, तत्काल या तदोपरांत, अच्छे या बुरे
रूप में व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं, जिन्हें आचरण
कहा जाता है।

                            अगर आपके आचरण से
किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक,
भावनात्मक या अन्य किसी तरह से नुकसान नहीं
पहुंचता, तो उसे अच्छा आचरण और जिस आचरण से
किसी व्यक्ति का अकारण नुकसान होता है, तो उसे बुरा
आचरण कहा जाता है।

                      मनुष्य की सामाजिकता
यानी अन्य लोगों के साथ संबंध बनाकर
रहने की प्राकृतिक और स्वाभाविक बाध्यता
मानवीय आचरण के लिए एक अपरिहार्य मांग
करती है। वह मांग है-आचरण का नैतिक मूल्यांकन।
इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य आंतरिक और स्वैच्छिक
रूप से इस प्रकार का आचरण करे, जो सामाजिक कल्याण के
अनुकूल हो। यदि ध्यान से देखा जाए तो समाज में आचरण संबंधी
मूल्यों को प्रतिस्थापित करने में कुछ ही लोग या वर्ग होते हैं, जैसे
शिक्षक, राजनेता, धार्मिक गुरु, सिनेमा के नायक और नायिकाएं आदि।
इस वर्ग को हम संवेदनशील समूह कह सकते हैं।

                           प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से
सामान्य लोग इनका अनुसरण करने लगते
हैं। इस वर्ग को अपना उत्तरदायित्व समझना
चाहिए, तभी समाज का कल्याण हो सकता है।
इस वर्ग के द्वारा किए गए गलत कार्यो की भर्तसना
की जानी चाहिए और अच्छे कार्यो की प्रशंसा भी आवश्यक
है। संवेदनशील समूह के द्वारा किए गए अवमूल्यात्मक आचरण
व चरित्र को अक्षम्य माना जाए, तभी समाज से बुरे आचरण का
लोप संभव होगा। इसके अलावा आचरण को सुधारने में धार्मिक
पुस्तकों या सत्साहित्य का भी अमूल्य योगदान है। यदि आप ‘गीता
में भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों पर पांच फीसदी भी अमल करते हैं तो
आपके जीवन में सकारात्मक सोच के साथ सदाचरण की भी शुरुआत होने
लगती है। वस्तुत: विभिन्न धर्मों के विविध धर्मग्रंथ हमें सदाचरण पर
चलने का ही संदेश देते हैं। सदाचरण से जीवन में सुख, शांति और
आनंद का अहसास किया जा सकता है।

 

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