महॉशक्ति की अभिव्यक्ति-6


1-योगियों का कर्म योग-

       विभिन्न व्यक्तियों में हम जो विभिन्न प्रकार के मन देखते हैं,
उनमें वही मन सबसे ऊंचा होता है,जिसे समाधि अवस्था प्राप्त हुई है।
औषधि,तपस्या या मंत्रो के वल से शक्ति प्राप्त कर लेते हैं अनकी वासनाएं
तो बनी रहती हैं,पर जो व्यक्ति योग के द्वारा समाधि प्राप्त कर लेता है,केवल
वही वासनाओं से मुक्त होता है। इस प्रकार का योगी पूर्णता प्राप्त कर लेता है,फिर
वासना उनको स्पर्श नहीं कर सकती। वे केवल कर्म किये जाते हैं,दूसरों के हित के लिए,
लेकिन उसके फल की चाह नहीं रखते। लेकिन साधारण मनुष्यों के लिए जिन्हैं यह अवस्था
प्राप्त नहीं हुई है,उनके कर्म पाप-पुण्य से मिश्रित होते हैं।

2-महॉ शक्ति की अभिव्यक्ति-

     इस प्रकृति में महॉशक्ति देखी जाती है,लेकिन स्वप्रकाश नहीं है,
वह अपने स्वभाव से चैतन्यरूप नहीं है,केवल आत्मा ही स्वप्रकाश है,
उसके प्रकाश से ही प्रत्येक वस्तु प्रकाशित होती है। यदि चित्त का स्वप्रकाश
होता तो वह एक साथ ही अपना तथा अपने विषय का अनुभव कर पाता। लेकिन
ऐसा नहीं होता। चित्त जब किसी विषय वस्तु में तल्लीन रहता है,तो यह अपने सम्बन्ध
में कोई भी चिन्तन नहीं कर सकता। इसलिए मन प्रकाश नहीं है, केवल आत्मा ही स्वप्रकाश है।

3-योगाभ्यास से विवेकशक्ति में वृद्धि होती है-

    योगाभ्यास से विवेक शक्ति बढने से हमें शुद्धता प्राप्त होती है। हमारे
आंखों के सामने का आवरण हट जाता है,तब हम जान लेते हैं कि प्रकृति
एक यौगिक पदार्थ है, और उसके सारे दृश्य केवल साक्षी स्वरूप हैं। फिर हमें
इस बात का भी ज्ञान होता है कि प्रकृति ईश्वर नहीं है। इस प्रकृति के सारे नियम,
सारे संयोग ह्दय के राजा आत्मा को दिखाने के लिए हैं ।दीर्घकाल तक अभ्यास के फलस्वरूप
विवेक का जन्म होता है,फलस्वरूप हमारा भय चला जाता है,और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

4-ज्ञान की उपयोगिता

     पहली बात है कि ज्ञान स्वयं ज्ञान प्राप्ति का सर्वोच्च पुरुस्कार है।
यह हमारे सारे दुखों का हरण करने करने वाला है। जब मनुष्य अपने
मन का विश्लेषण करते-करते ऐसी एक वस्तु से साक्षात्कार कर लेता है, तो
उसको फिर दुःख नहीं रहता, उसका सारा विषाद गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण
वासना ही तो समस्त दुखों का मूल है। मनुष्य समझ जाता है कि मृत्यु किसी काल में है
ही नहीं, तो फिर उसे मृत्यु से मुक्ति मिल जाती है, अपने को पूर्ण समझने से वासनाएं नहीं
रहतीं। फिर कोई दुःख नहीं रहता। उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है ।

5-एकाग्रता से ज्ञान की प्राप्ति-

          अगर ज्ञान प्राप्त करना है तो एकमात्र उपाय है एकाग्रशक्ति का प्रयोग
करना। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जाकर अपने मन की समस्त शक्तियों को
केन्द्रित कर, वस्तुओं का विश्लेषण करता है,उनपर प्रयोग करता, और फिर उनका
रहस्य जान लेता है। खगोलशास्त्री अपने मन की समस्त शक्तियों को एकत्र कर दूरवीन के
भीतर से आकाश में प्रयोग करता है,और फिर सूर्य व तारों के रहस्यों का पता लगता है। हम
किसी वस्तु में मन का जितना निवेश करते हैं उतना ही हम उस विशय में अदिक जान सकते हैं ।
यदि प्रकृति के द्वार को खटखटाने और उसपर आघात करने का ज्ञान प्राप्त हो जाय तो प्रकृति अपना
रहस्य स्वतः खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता, एकाग्रता से ही आती है। मानव मन की
शक्ति की कोई सीमा नहीं है,वह जितना एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर केन्द्रित
होती है, यही एक रहस्य है ।

6-जीवन में सोते ही रहना-

     कलयुग है,निद्रा से उठकर बैठना
ही द्वापर है,और उठकर खडा हो जाना
त्रेता युग है और चल पडना सतयुग है।इसलिए
जीवन में चलते रहो-चलते रहो ।

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