जीवन का आदर्श-1


                         जी हॉ ङस महॉ मंत्र का प्रयोग
करके देखें, विश्व  में  आज  व्याप्त  वैचेनी,  पीडा,
छीना- झपटी,और युद्धों की जैसी स्थिति को ङस नीति
से समाप्त किया जा सकता है । सतयुग में  ङसी  नीति
का प्रयोग होता था,जिससे मानव सुखी था ।  ङतिहास की
धटनाओं में कई उदाहरण हैं -जैसे रामायण युग में कैकई ने
जब ङस नीति का उलंघन किया था और,  मैं लूंगा आपको न
दूंगा ,नीति को अपनाई थी तो सारी अयोध्या नगरी  नरक धाम
बन गयी थी, राम को चौदह वर्ष का वनवास और  भरत को राज
गद्दी ।दशरथ ने प्राण त्याग दिये। लेकिन  जब  भरत ने , मुझे नहीं
चाहिए आप लीजिए, की नीति अपनाई तो, धटना क्रम बदलकर दूसरे
ही दृष्य उपस्थित हो गये, भरत ने राज-पाट को लात मारकर  भाई के
चरणों में लिपटकर बच्चों की तरह रोने लगे, और बोले भाई मुझे  राज्य
नहीं चाहिए,यह राजपाट मेरे लिए नहीं है, ङसे आप ले लीजिए,श्री राम ने
कहा भरत भाई मेरे लिए तो वनवास ही श्रेष्ठ है,राज्य का सुख तुम भोगो।
इधर सीता जी ने भी कहा कि नाथ यह राज्य भवन मुझे नहीं चाहिए ,मैं तो
आपके साथ रहूंगी ।सुमित्रा ने लक्ष्मण को निर्देश दिया, कि हे पुत्र अगर सीता
जी श्री राम चन्द्र जी के साथ वन जा रहीं हैं तो, उनकी सेवा के लिए तुम भी वन
में जाओ । आज के युग में ङस नीति की  नितान्त  आवश्यकता  है,  ङस  नीति से
त्याग ,दूसरों की सुख- सुविधा,उन्नति का अधिक ध्यान रखकर मानवता की रक्षा और
विकास हो सकता है ।

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