मोह के समान कोई शत्रु नहीं है-10


1-मोह के समान कोई शत्रु नहीं है-

            हम अपने सम्बंधियों के प्रति अत्यधिक प्रेम भाव रखने से
हम उनके दोषों को देख पाने में  असमर्थ  रहते हैं  और  इस मोह के कारण
हानि भी उठाते हैं।माता अगर मोह के अधीन होकर अपनी सन्तान के अवगुंणों
को न देखे और उसे दण्डित न करे तो वह संतान पूर्णतः अयोग्य बन जायेगी ।।

 

2-दुष्ट लोगों के अंग-अंग में विष होता है-

             सॉप के दॉतों में विष होता है,मक्खी के सिर में विष होता है,
विच्छू के पूंछ में विष होता है- इन प्रॉणियों के तो केवल एक अंग में ही विष
होता है।लेकिन दुष्ट मनुष्य के तो सभी अंगों में विष होता है और वह अन्य लोगों
को सदा हानि पहुंचाने की चेष्टा करता है।अतः दुर्जन मनुष्य से सदैव दूर ही रहना चाहिए ।।

 

3-मैं नाम की कोई वस्तु है ही नहीं-

                         मैं कौन हूं,इसका भली भॉति विचार करने पर दिखाई देता है
कि मैं नाम की कोई वस्तु है ही नहीं-ठीक उस प्याज के समान जिसके छिलकों को
एक-एक करके निकाल दिया जॉय तो अंत में तुम्हैं कुछ भी नहीं मिलेगा । यह मनुष्य
शरीर भी उसी प्रकार का है,पंच्चतत्वों में विलय के बाद इस शरीर का कोई रूप शेष नहीं
रहता । उस अवस्था में मनुष्य को अपने अहं का अस्तित्व ही नही मिलता और उसे ढूंडने
वाला ही कहॉ रह जाता ? उस अवस्था में उसे अपने शुद्ध बोध में ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप का
जो अनुभव होता है,उसका वर्णन कौन कर सकता है ।

4-मूर्ख लोगों में ज्ञान का अभाव होता है-

                  बहुत से मूर्ख लोग इस प्रकार के होते हैं कि जिन्हैं किसी
भी विषय में कोई जानकारी नहीं होती है लेकिन फिर भी वह प्रत्येक वस्तु
में –कमी और मीन-मेख निकालते रहते हैं ।इस प्रकार के लोग केवल अपने
समय और ऊर्जा को ही नष्ट करते हैं क्योंकि इस प्रकार की निन्दा करने से
न तो स्वयं उनके कोई लाभ होता है और न ही उस वस्तु का कुछ विगडता है ।।

 

5-दुष्ट लोगों से मित्रता न करें-

             दुष्ट और अयोग्य व्यक्तियों से कभी भी मित्रता नहीं करनी
चाहिए लेकिन किन्हीं कारणों से ऐसे लोगों से मित्रता हो भी जाय तो भी
उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए ।लेकिन यदि आपका कोई योग्य और घनिष्ठ
मित्र है तो उसपर भी आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए ।यदि घनिष्ठ मित्र
से आपने अपने विषय में समस्त वातें बता दी और वह आपसे रुष्ट हो गया तो, आपके
विरोधियों को आपके विषय में सभी जानकारियॉ देकर आपको हानि पहुंचा सकता है ।और यदि
रुष्ट न भी हुआ तब भी धन आदि के लालच में आपके विरोधियों से मिल सकता है ।।

 

6-धन का सदुपयोग करें-

            मधुमक्खियॉ अत्यधिक परिश्रम करके अपने छते में शहद
एकत्र करती हैं ।लेकिन उस मधु का न तो उपभोग करती है और न किसी
को दान करती है ।और जब उसका छता बडा हो जाता है तो अन्य प्रॉणी जैसे भालू,
मनुष्य आदि उन छतों कोतोडकर मधु को निकाल देते हैं । तब उन मधुमक्खियों को बहुत
दुख होता है कि हमारा सारा परिश्रम बेकार हो गया ।इसी प्रकार कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो
कि दिन-रात परिश्रम करके अपार धन एकत्रित करते हैं लेकिन उस धन को न तो वे स्वयं अपने
उपभोग में खर्च करते हैं और न उसका प्रयोग देश-धर्म के हित के कार्य में व्यय करते हैं अतः
उसका समस्त धन व्यर्थ हो जाता है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जो भी धन प्राप्त
करता है,उससे स्वयं के सुख के साधन एकत्रित करें और देश-धर्म के हित के लिए भी कार्य करें ।।

 

7-धन और ज्ञान दोनों का मेल असंभव है-

             मनुष्य अपने जीवन में कितना ही परिक्षम करले लेकिन धन और
ज्ञान दोनों को बहुत अधिक मात्रा में प्राप्त कर ले यह सम्भव नहीं है। इस संसार
में कोई भी ऐसा नहीं है जिसको धन और ज्ञान दोनों एक साथ प्राप्त हो गये हों ।सच
तो यह है कि धनवान लोग विद्वान नहीं होते हैं ।इसी प्रकार विद्वान लोग बहुत अधिक
धनवान नहीं होते।इसलिए यदि आपको अधिक धन कमाना हो तो आपको उसी क्षेत्र में प्रयास
करना चाहिए और बहुत अधिक ज्ञान प्राप्त करने की आशा छोड देनी चाहिए।और यदि आपको
अधिक मात्रा में ज्ञान प्राप्त करना हो तो आपको उसी क्षेत्र में प्रयास करना चाहिए और बुत अधिक
धन प्राप्त करने की आशा छोड देनी चाहिए ।

 

8-स्त्री-पुरुष का भेद-भाव छोड दें-

        यदि आप पूर्ण योगी होना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको
स्त्री पुरुष का भेद भाव छोड देना होगा ।आत्मा का कोई लिंग नहीं
होता है-उसमें न स्त्री है ,न पुरुष ह,तब क्यों स्त्री –पुरुष के भेद-ज्ञान
द्वारा अपने आपको कलुषित करें? यह अच्छी तरह समझना होगा कि ये
भाव हमें छोड देना चाहिए ।।

 

9-रोना बन्द करें-

             मेरे दोस्त, तुम रोते क्यों हो?तुम्हारे लिए तो न जन्म है
न मरण,क्यों रोते हो ? तुम्हें रोग शोक कुछ भी नहीं है,तुम तो अनंत
आकाश के समान हो ।उस पर नाना प्रकार के मेघ आते हैं और कुछ देर खेलकर
न जाने कहॉ अन्तर्निहित हो जाते हैं,पर वह आकाश जैसा पहले नीला था,वैसा ही नीला
रह जाता है ।संसार की बुराई की बात मन में न लाओ,रोओ कि जगत में अब भी तुम बुराई
देखने को मजबूर हो,रोओ कि अब भी तुम सर्वत्र पाप देखने को बाध्य हो और यदि तुम जगत
का उपकार करनाचाहते हो,तो जगत का दोषारोपण करना छोड दो ।उसे और भी दुर्वल मत करो।
आखिर ये सब पाप,दुख आदि क्या है ?ये तो दुर्वलता के ही फल हैं।इस प्रकार की शिक्षा से
संसार दिन प्रति दिन दुर्वल होता जा रहा है।

 

10-घर का मालिक अंधेरे कमरे में है-

                  वह सर्वशक्तिमान उस अंधेरे कमरे में सो रहा है वही तो हमारे
घर का मालिक है।उसे ढूंडने के लिए कोई अंधेरे कमरे में टटोलता फिरता है।वह
खाट छूता है और कहता है,नहीं यह वह नहीं है। वह दरवाजा छूता है और कहता है,
नहीं,यह भी नहीं है।वह दरवाजा छूता है और कहता है,नहीं यह वह नहीं है।वेदॉत में इस
प्रकृति को नेति कहते हैं ।अंत में उसका हाथ मालिक पर पड जाता है और वह एकदम कह
उठता है,यह है ।अब उसे मालिक के अस्तित्व का ज्ञान हो गया है।उसने उसे पा लिया है,परन्तु
अभी भी वह उसे घनिष्ठ रूप से नहीं जान पाया है ।

 

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