व्यक्ति का मन-28


1 – व्यक्ति का मन –
व्यक्ति का मन दीपक की लॉ समान होता है।
जो वासनाओं के कारण हवा के हल्के झोंक से डोलने
लगता है ।काम शक्ति यदि मनुष्य के नियत्रण में न हो
तो व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है,आशक्ति सर्वनाश का मूल है

2 -परमात्मा और धर्म- परमात्मा एक है, जबकि धर्म
एक बन्धन है परमात्मा धर्म से परे है, हमें धर्म सीमाबद्ध रखता
है,है,रोकता है, और परमात्मा से अलग करता है ।


हमें परमात्मा के दर्शन तभी होंगे जब हम स्वयं को शरीर
न समझकर एक आत्मा समझेंगे,क्योंकि शरीर काम,क्रोध,लोभ,
मोह से युक्त होता है, शरीर को शरीर चाहिए, जबकि आत्मा का
का सम्बन्ध परमात्मा से है, परमात्मा से आत्मा का जन्म होता है,
परमात्मा आत्मा का पिता है, अपने पिता से जो चाहे मिल जायेगा,
परमात्मा कहते हैं तुम मुझे तभी देख पाओगे जब तुम आत्मा बनोगे ।

3 -विद्वान-
विद्वान वे व्यक्ति हैं जो अपने ज्ञान के अनुसार आचरण करते हैं ।

4 – दूसरे की निन्दा न करें –
किसी दूसरे की निन्दा न करें,ईर्ष्यालु ही बुरे किस्म
का निन्दक हेाता हैं, वह दूसरों की निन्दा ङसलिए करता
है कि वह दूसरे लोगों या मित्रों की नजरों से गिर जायेगा,
और तब जो स्थान रिक्त होगा उस पर मुझे बिठा दिया जायेगा,
लेकिन ऐसा न आजतक हुआ है और न होगा । कोई भी मनुष्य निन्दा
से नहीं गिरता है बल्कि उसके पतन का कारण उसके हृास गुंण हैं ।

5 -अपनी शक्ति को बढायें-
एक बार 9ने 8 पर थप्पड मारा 8 ने सोचा बडा भाई है माफ
कर दिया,उसने 7 पर थप्पड मारा उसने भी बडा भाई समझकर 8
को माफ कर दिया उसी प्रकार 7 ने 6 पर 6 ने 5 पर 5 ने 4 पर 4
ने 3 पर 3 ने 2 पर 2 ने 1 पर थप्पड मारा लेकिन1 ने छोटा भाई समझकर
0 पर थप्पड नहीं मारा बल्कि अपने बगल में बिठा दिया, जिससे 1 की ताकत 10
गुनी हो, गय़ी फिर उसने अपने बडे भाई 9 को भी बगल में बिठा दिया फिर आठ को
भी बिठा दि जिससे उसकी शक्ति भठती गई ।

6 – महंपुरुषों के आदर्श –
अगर तुम्हारे साथ किसी ने बुरा किया तो मन में याद न
रखें,और किसी का तुमने भला किया तो उसे भी याद न रखें,
आपने कोई पुण्य कार्य किया उसका विज्ञापन न करें, दान गुप्त
होना चाहिए, अगर दांयॉ हाथ दान देता है तो बॉयें हाथ को पता न
चले दान और स्नान गुप्त हों ये हमारी संसंस्कृति के आदर्श हैं।

7 – परमात्मा की पुकार-
परमात्मा का कहना है कि यदि आप स्वयं को आत्मा
समझ लें और दूसरे को भी आत्मा समझें और कह दें कि
हे परमात्मा हमें मोक्ष दे दे तो उस आत्मा के अस्तित्व की
जिम्मेदारी में स्वयं लेता हूं ।

8-तनाव से मुक्ति –
जब कभी तनाव से कष्ट होता है, तो कोरा कागज
बनो ङसके लिए मन की बड-बड बन्द करनी होगी, जब
भी मन बड-बड करे जबाब देना सीखो, ताकि पूर्ण विराम आजाय।
मतलव यंत्र, निकालो मतलव मत निकालो ।

9 – सत्य रूपी परमेश्वर –
यदि आपको ऐसा आभास होने लगे कि पृथ्वी
में प्रलय हो रहा है और आकाश टूट रहा है, हम
नष्ट होने लग गये हैं, तो भी विश्वास पूर्वक यह मंत्र
जपना चाहिए कि सत्य नित्य है और परमेश्वर सत्य के
रूप में है, आत्मबल से सत्य रूपी परमेश्वर को अपनाना
चाहिए।

10 – श्रृष्ठि –
ङस श्रृ्ष्ठि को हम सत्य समझते हैं, ङसीलिए हमारा
मन नाना प्रकार की चिन्ताओं व वासनाओं का शिकार हो
जाता है, यह श्रृष्ठि क्षणिक है,मिथ्या है ङस प्रकार का ज्ञान हो
जाने पर इस श्रृष्ठि का कोई आकर्षण नहीं रहता है ,श्रृष्ठि के मूल
कारणों के स्वरूपों का मन में सुदृढ हो जाने पर चाहे वह दिखे या न
दिखे वही सत्य है ।

11 – सत्य-
ईश्वर का नाम सत्य है,सत्य ही ईश्वर है,नाम सत्य है,
जहॉ सूर्य है वहॉ प्रकाश है,जहॉ सत्य है वहॉ ज्ञान है ।देंखें
या न देखें पढें या न पढें यदि ङसप्रकार की शंका पैदा होती है
तो सत्य से पूछ लेना चाहिए ।

11 – जवानी-
जवानी जोश है,बल है,दया है, साहस है, आत्मविश्वास है,
गौरव है और सवकुछ जो जीवन में पवित्र उज्वल और पूर्ण बना
देता है जवानी का नशा घमण्ड है,निर्दयता है ,स्वार्थ है, शेखी है,
विषयवासना है, कटुता है और ह सबकुछ जो जीवन को पशुता विकार
और पतन की ओर ले जाता है, अब यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि
हम किस पक्ष के मार्ग को उचित समझते है ।

12 -जीवन-
उस पुष्प को तो देखो,सूर्य की किरणों ने उसे छुआ तो
वह खिल गया,कितना सुन्दर था वह,पर एक ही घंटे में
देखते-देखते वह मुरझा गया और झुक गया, अब वह गिर
जायेगा, ओह यह जीवन भी ऐसा ही है ।

13-मन- मन ही मनुष्य को स्वर्ग या नरक में बिठा देता है,
स्वर्ग या नरक में जाने की कुंजी भगवान ने हमारे हाथ में दे रखी है।

14-पररमात्मा का आशीर्वाद –
पारस पत्थर से स्पर्श करने पर
लोहा एक बार जब सोना बन जाता है तब चाहे उसे जमीन में गाढ
दें, अथवा कबाड में फेंक दें, वह सोना ही रहता है, फिर लोहा नहीं
बनता, सी प्रकार सर्वशक्तिमान परमात्मा के चरण स्पर्श से जिसका
हृदय अक बार पवित्र हो जाता है उसका फिर कोई कुछ नहीं बिगाड
सकता है चाहे वह संसार के कोलाहल में रहे अथवा जंगल में
एकान्तवास करे।

15-कामना –
दुनियॉ में जितने भी मजे विखरे हैं उसमें तुम्हारा हिस्सा हो
सकता है जिसे तुम अपनी पहुंच से परे मान बैठे हो गी के फल
को दोनों हाथों से दबाकर निचोडो, रस की निर्झरी तुम्हारे बहाये भी
बह सकती है ।

16-कवि- जिसे संसार में दुख कहा जाता है वहॉ कवि के
लिए सुख है ,धन,ऐशवर्य,रुप,और बल विद्या बुद्धि से विभूतियॉ
संसार को चाहे कितना ही मोहित कर ले कवि के लिए जरा भी आकर्षण
नहीं है उसको प्रमोद और आकर्षण की वस्तु तो बुझी हुई आशायें और मिटी
हुई स्मृतियॉ तथा टुटे हुये ह्रदय के..

17-छोटी-छोटी बातों पर न उलझें-
बात उलझाकर बढाने से एक दूसरे को देखकर एक दुसरे की
गलती ही सामने आती है, जिससे दोनों हमेशा उलक्षे रहते हैं।
ज्ञान- ङस पृथ्वी पर ज्ञान से बडा कोई सुख नहीं है, ज्ञान का
अर्थ है आत्मज्ञान-ध्यान और स्वयं का बोध ।

18-वन्दन-
समय के साथ प्रणाम करने के तरीके भी बदलते जा रहे हैं,
लेकिन एक विद्यार्थी जबतक अपने गुरु के समक्ष झुककर प्रणाम
नहीं करता है तबतक वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है,क्योंकि हानि,
लाभ,जस, अपयस मनुष्य के हाथ में लहीं है,वह उपर वाले के हाथ में है।

19 – आनन्द और मोह –
आनन्द के आने पर मोह समाप्त हो जाता है,मोह अन्धेरा है
और आनन्द सूरज है, आनन्द ही मोह को दूर कर सकता है
।जैसे 20 पैसे के चने बेचने वाले की 1 लाख की लाटरी खुलने
पर वह चना बेचना बन्द कर देगा, क्योंकि उसके पास आनन्द
आ गया,तुलसीदास जी ने राम को आनन्द रुपी सायंकालीन सूर्य
कहा है ।

20-सुख-
आशा और निराशा से मुक्त होकर बुद्धि को स्थिर
किया जा सकता है जिससे सुख की प्राप्ति होती है ।

21 – महॉपुरुष-
ज्ञान के द्वारा बुद्धि को स्थिर किया जा सकता है,जिससे
ङन्द्रियॉ उसके बस में हो जाय,महॉपुरुष किसी भी परिस्थिति
में विचलित नहीं होते हैं क्योंकि उन्हैं यह ज्ञान होता है कि भगवान
उनके साथ हैं ।

22-नास्तिक-
नास्तिक वह है जिसे स्वयं पर भरोशा नहीं है,हमारा धर्म
कहता हैं कि जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखता है, वह नास्तिक
है और आधुनिक धर्म कहता है कि नास्तिक वह है जिसे स्वयं पर
विश्वास न हो कि तू कुछ कर सकता हौ ।

23-दृढता –
दृढता पुरुष के सभी गुणों का राजा है यह एक प्रवल शक्ति है,
वीरता का प्रधान अंग है, ङसे कदापि हाथ से जाने न दें, तुम्हारी
परीक्षायें होंगी, तुम्हें लगातार निराशाओं का सामना करना पडेगा,ऐसी
दशा में दृढता के अतिरिक्त कोई विश्वासपात्र पथप्रदर्शक आपको नहां मिलेगा,
दृढता यदि सफल न भी हो सके तो संसार में अपना नाम छोड जाता है। यदि आप
दृढता से कार्य करते जायें…

24-जियो और जीने दो-
जियो और जीने योग्य जीवन जियो, ऐसी जिन्दगी बनाओ जिन्हैं
आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके, विश्व में अपने पदचिन्ह छोडकर
जाओ, जिन्हैं देखकर कोई अभागी संतति अपना मार्ग ढूंड सके ।

25-ज्ञान –
जलते दीपक से ही दीपक जलता है बुझे दीपक से दीपक नहीं
जला करता और जिस दीपक में तेल ही नहीं वह क्या जलेगा, ङसलिए
पहले मन रुपी दिये में ज्ञान का तेल डालो फिर देखोगे कि जलते दिये की
लॉ लगने मात्र से दीपमाला जगमगाकर उठेगी ।

2-आत्मा और परमात्मा –
कुछ लोग आत्मा में परमात्मा का निवास मानते हैं, अगर
ऐसा होता तो हम सर्व शक्तिमान और जन्म मरण से मुक्त
होते। परमात्मा एक है और आत्मायें कई हैं, परमात्मा से आत्मा
का जन्म होता है-आत्मायें कई प्रकार की होती हैं जैसे त्मा,देवात्मा,
महात्मा, पुण्यात्मा,आदि । सामान्य मनुष्य में आत्मा होती है। जिसकी
क्वालिटी अन्य आत्माओं से उच्च होती है ।आत्मा का जन्म परम परमात्मा
के द्वारा होता है ।

27 -परमात्मा और धर्म- परमात्मा एक है, जबकि धर्म
एक बन्धन है परमात्मा धर्म से परे है, हमें धर्म सीमाबद्ध रखता
है,है,रोकता है, और परमात्मा से अलग करता है ।

28 -हंसी आना- जब हमें अपने
अज्ञानता का ज्ञान होता है तो हंसी आती है, यह शुद्ध हंसी है, ङससे
बुद्धि के ताले खुल जाते हैं, होंठों की हंसी हास्य की हंसी होती है और
मन की हंसी ईश्वर की हंसी होती है।हंसना और हंसाना एक कला है
जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।मुख खोलकर सभी हंसते है
मगर दिल खोलकर हंसना चाहिए,लेकिन ध्यान रहे कि
हमारी हंसी से किसी को कष्ट न हो ।

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