जीवन चलने का नाम-10


1-जीवन चलने का नाम –

सबकुछ भाग्य के हाथ में है ,अगर सॉस रुकती है तो उसे
मौत कहते हैं ,गति रुकती है तो भी मौत कहते हैं ,हवा रुकती
है यह मौत है,रुकना सदा मौत है जीवन नाम चलने का है ।

2 – सत्कर्म –

सत्कर्म के सम्बन्ध में हमारे शास्त्र चाहे कितने ही उपदेश दें,
उन शास्त्रों का मूल्य उतना नहीं है,जितना कि अपने द्वारा उठाये
गये कदमो का है, और ङस बात की फिक्र मत करना कि रास्ता बहुत
लम्बा है, क्योंकि लम्बे से लम्बे रास्ते भी एक-एक कदम उठाकर पूरे हो
जाते हैं ।

3 – क्रोध से बचें –

क्रोध एक प्रकार का धुवॉ होता है, जिससे व्यक्ति राक्षश बन
जाता है यह तलवार है, सब अनर्थों की जड है,हिंसा को जन्म देता
है,यह आग है जो आदमी को जला देता है क्रोध अन्धा होता है, अविवेक
होता है, आप अपनी रक्षा करना चाहते हैं हैं तो क्रोध से बचें वरन् वह क्रोध
तुम्हैं खा जायेगा । किसी व्यक्ति द्वारा गलत कार्य करने पर उसे लगता है कि
उसे प्रोफिट हो रहा है लेकिन वह यह नहीं जानता है कि उसने ईश्वर के नियमों को
तोडा है, वह अपनी अन्तरात्मा की आवाज से बच नहीं सकता, कुदरत के पास हजार
तरीके हैं दण्ड के ।

4 – द्वेष भावना –

मानव में दबा हुआ विद्वेष उसकी छाती के भीतर सर्प के समान फुफकार
करता है वह कब अपने ही को घायल कर दे कोई नहीं कह सकता ।ङसलिए
कभी भी किसी के प्रति द्वेष भाना नहीं रखनी चाहिए ।

5 – पुरुषार्थ –

किसी भंवर में फंस जाना मानवीय दुर्वलता है, लेकिन भंवर का
अनुमान किनारे पर बैठकर न लगाङये जल में डुबकी लगाकर देखिए।

6 – दर्द-

लोगों ने चॉद का हंसना देखा है, और बादल का
बरसना भी देखा है, मगर जाडे की कॉपती अंधेरी रात
में, घास के पत्तों पर,चुपचाप ठिठुरकर बैठी हुई ओस की
कुछ निरीह बूदों का दर्द कौन समझे ।

7 – भूख-

अन्न मनुष्य के खाने के लिए है, ङसलिए अन्न की
कीमत पैसा नहीं मनुष्य की भूख है,व्यक्ति का स्वार्थ
समाज की भूख को नहीं खा सकता मनुष्य के जन्मसिद्ध
अधिकारों का अपहरण नहीं कर सकता है।

8 – विदेशी भाषा का प्रयोग- जो लोग अपनों के बीच-

विदेशी भाषा का प्रयोग करते हैं, भले ही वे लोग विद्वता
रखते हों, लेकिन अपनों में पराये हेा जाते हैं और दूरी बढती
जाती हैं, अपनों के बीच विदेशी भाषा का प्रयोग करके विद्वता
का परिचय नहीं देना चाहिए।

9 – विद्यार्थी सफलता उस पहाडीजीवन में सफलता- –

की चोटी पर होती है जहॉ जाने के लिए कोई रास्ता नहीं होता है,
हमें वहॉ पहुंचने के लिए स्वयं रास्ता बनाना होता है, रास्ता बनाने
में कोई हमारी मदद नहीं करता, हमें स्वयं साधन जुटाकर रास्ता बनाना
होता है, चट्टान बहुत कठोर है,थकान होगी, पसीना आयेगा अगर बीच से
ही हम थक हारकर वापस लौट जाते हैं तो सफलता कहॉ से प्राप्त होगी, और
यदि आगे बढते..

10 – मनुष्य जीवन में प्रेम के रूप-

बच्चा अपनी मॉ से प्रेम करता है फिर खिलौनों से प्रेम करता है
थोडा बडा होने पर पुस्तकों से प्रेम होता है फिर नौकरी से प्रेम,पत्नी
से प्रेम फिर ङस शरीर से प्रेम,लेकिन जिस देश में हम रहते हैं उस देश
से तो सदैव उससे अधिक प्रेम होना आवश्यक है ।

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