आतुरता से बचें-9


1 – मन के अनवरत सत्य-असत्य के युद्ध पर विजय प्राप्त करें –

मनुष्य का मन दो प्रकार की भावनाओं
का स्थल है, अच्छी और बुरी भावनायें,यह
भी आश्चर्य की बात है कि मन तो एक है मगर
उसमें शुभ-अशुभ दोनों वर्ग की भावनायें रहती हैं,
इन दोनों भावनाओं में निरन्तर संघर्ष चलता रहता
है, एक भावना के जन्म के साथ दूसरी भावना
का भी जन्म हो जाता है, फिर दोनों में
संघर्ष जारी होने लगता है,अच्छे से
अच्छे व्यक्ति…

2 – जैसा भोजन करोगे वैसा विचार बनेगा –

     इस तथ्य में गहरी सत्यता है
कि जैसा अन्न वैसा मन, अर्थात
हम जैसा खाते हैं वैसा ही मन बनता
है, क्योंकि उस खाये हुये से रुघिर बनता
है, और उस रुघिर में उसी प्रकार के गुंण
होते हैं ।प्राकृतिक भोजन उपयुक्त भोजन
माना जाता है ,ङससे मृदुलता,सरलता,
सहानुभूति, आदि के भाव उत्पन्न
होते हैं,जैसे पशु जगत में देखें
-बैल,भैंस,घोडे, गधे हाथी
ङनका भोजन प्राकृतिक  है।

3 – आध्यात्म से सकारात्मक सोच उत्पन्न होती है –

जिस आध्यात्म ने आदमी को
भिकारी बना दिया, वह आध्यात्म
नहीं है, जीवन में जब आप विगडना
प्रारम्भ होते हैं तो देखोगे कि सेकडों लोग
आपके गिरने में सहयोग करेंगे-जैसे -आप
शराब पीना प्रारम्भ करते हैं तो आपके सेकडों
मित्र बन जायेंगे और आपको वर्वाद कर देंगे,
यदि आप जुआ खेलना शुरू करते हैं तो
जुआरियों की एक भीड आपके साथ हो
जायेगी। आध्यात्म वह है जो आ…

4 – जो जैसा होता है उसे सब वैसा ही दिखाई देता हैं-

       हमें सबसे पहले स्वयं को देखना होगा,
अपने अंतरंग देखना है।बाहर नहीं,स्वयं को
परखना और मूल्यॉकन करना है, दुनियॉ में तो
एक से एक विद्वान हैं ।ङस पृथ्वी पर सूरज बडा
खूबसूरत है अविरल गति से वहने वाली नदियॉ,
ऊचे पर्वत कश्मीर की वादियॉ खूबसूरत है,लेकिन
आपकी आंखों की रोशनी ङससे भी अधिक
खूबसूरत है, यदि आंख का यह तिल बुझ
जाय तो ये सब काले हो जाते हैं ।

5 – हर वक्त अपने मन की जॉच पडताल करते रहना चाहिए –

      जब हमारे मन में बुरे भाव आते है,
पाप के  भाव  हों  जैसे ईर्ष्र्या- द्वेष  आदि
तो समझना चाहिए कि हमारे मन में शैतान
या पिशाच नृत्य कर रहे हैं और यदि मन में
श्रेष्ठ विचार हों तो समझना चाहिए कि कृष्ण
का राश हो रहा है । श्रेष्ठ विचार भगवान है,
यदि हमारे दिमाग में श्रेष्ठ विचार हों तो
समझना चाहिए कि वहॉ भगवान
विद्यमान है, हम और बगवान
एक हो गये ।

6 – विश्वव्यापी प्राण एक है,सबमें अपनेपन का दर्शन करें-

      प्राणिमात्र में एक ही प्रकार की आत्मा
निवास करती है, सभी लोग ङस ब्रह्माणड
में व्याप्त प्राण तत्व को प्राप्त कर जीवित हैं,
सब एक ही नाव के सवारी हैं, सब एक ही नदी
की लहरें हैं, एक ही जलाशय के बुलबुले हैं,सब
एक ही माला के दाने हैं सबका ईश्वर एक ही है,
तो फिर अपना पराया क्यों, एक ही चैतन्य
तत्व प्राणिमात्र में समाया हुआ है,एक दूसरे
में अपनेपन का अहसास होना चाहिए ।

7 – परमात्मा को खुशामद पसन्द नहीं है –

      परमात्मा को खुशामद बिल्कुल पसन्द नहीं है।
पूजा- पाठ से ईश्वर प्रशन्न नहीं होता, यह तो एक
आध्यात्मिक व्यायामहै,जिससे आत्मबल बढता है,
सतोगुँण की मात्रा में वृद्धि होती है,  ध्यान,प्रार्थना,
कीर्तन,जप मनोवैज्ञानिक क्रियायें हैं जिनके द्वारा
मनोभूमि में चिपके हुये कुसंस्कार छूटते हैं औ
सुसंस्करों की स्थापना होती है,ईश्वर के नाम
पर दान करने से ।

8- अपने शरीर में प्रॉण शक्ति की पूर्ति करें –

हमारे आध्यात्म में यह पूरा ब्रह्मॉणड
प्रॉण तत्व से भरा है, जिससे पृथ्वी पर
जड-चेतन पदार्थों की संरचना निर्धारित होती
है, तथा संचालन होता है , जिसमें मनुष्य भी
सम्मिलित है, हम कभी-कभी अपने प्राणों की
क्षीणता का अनुव करते हैं,जिसके फलस्वरूप
हमारे अन्दर उत्साह तथा साहस का अभाव
न हो पा रही हो,तो स्वाभाविक है कि
आवश्यकताओं के दबा…

9 -आतुरता से बचें –

     आतुरता मनुष्य की वह दशा है,
जब वह अधैर्ययुक्त जलदीबाजी की
स्थिति में रहता है,उसे चैन नहीं रहता
है, अचेतन में स्थित यह अनेक मानसिक
रोगों के रूपों में प्रकट होता है,किसी भी प्रकार
का अधैर्य एक समय बाद उसके व्यवहार का
अंग बन जाता है, तो मनोरोग का स्वरूप ले
लेता है, ऐसे व्यक्ति अपने हर काम को
निर्धारित समय से पहले करना चाहते
हैं,इससे कार्य में तृटि रहती है ।

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