आध्यात्मवाद और सुखः-दुःख-10


1 – आध्यात्मवाद और सुखः-दुःख-

       जिस प्रकार दृश्य शरीर सम्बन्धी समस्याओं
को सुलझाले  के  लिए  सुविस्तृत  विज्ञान  है,  उसी
प्रकार  अदृश्य  शरीर  की  गुत्थियों  को  समझने  और
सुलझाने के लिए जो शास्त्र है, उसे आध्यात्मवाद कहते हैं।
हमारे बुद्धिमान पूर्वजों ने चिरकालीन शोध के आधार पर
यह निष्कर्ष निकाला है कि बाहरी परिस्थितियों से
सुख-दुख या उन्नति अवन्नति नही आते बल्कि
उनका मूल कारण हमारा मन है ।

2 – आत्म दृष्टि- परमात्मा की विराट सत्ता को देखना-

    उस व्यक्ति के समान है जो जन्म
से अन्धा  है,  वह  यही  सोचता  है  कि
विश्व में सर्वत्र ङसी प्रकार का अन्धकार है,
लेकिन अगर किसी विशेष उपकरणों से उसकी
आंखें ठीक कर दी जाय तो विश्व के क्रिया कलापों
को देखर वह सोचता है कि ङतने दिनों तक मैं
कहॉ भटक रहा था आज मुझे ङस संसार
का दर्शन हुआ । ठीक उसी प्रकार
आत्मदृष्टि भी है ।

3 – पवित्र दृष्टि से आंखों का तेज बढता है –

सुरमे से आंखों में तेज नहीं आता बल्कि
पवित्र दृष्टि से आंखों में वह तेज आता है
कि कोई आंखें मिला नहीं सकता,शिवाजी की
तलवार में तेज उनकी दृष्टि से ही आया था,गान्धारी
ने पर पुरुष को देखा ही नहीं उसकी आंखों में तेज आया
जिसने दुर्योधन को बज्र जैसा बना दिया,अर्जुन के
गाण्डीव ने महॉभारत में तहलका मचा दिया
था। यदि आपके अन्दर यह तेज आ जाय
तो आप भी एक अदाहरण बन जॉय ।

4 – हाथ फैलाना आध्यात्म नहीं है –

       दूसरों को दोष देने के बजाय अपने
को  देखें  यदि  अपने  को  नहीं सु धारोगे
तो दूसरे लोंगों के सामने  हाथ  फैलाओगे,
कभी सन्तोषी मॉं के तो कभी साईं बाबा के
सामने हाथ फैलाओगे यह आध्यात्मिकता नहीं है
उन्नति के द्वार तो हमारे अन्दर बन्द पडे हैं।
अपनी ओर देखो ,अपनी पात्रता को देखो,
वह तुम्हारी हर धडकन के साथ हैं
।आध्यात्म का मकसद ङस
दीवार को तोडना है ।

5 – भगवान उसी की रक्षा करता है जो स्वयं अपनी रक्षा करता है –

  भगवान अच्छे के लिए कृपालु है, बुरे के
लिए क्रूर और निष्ठुर भी है, सरकार अच्छे
विद्यार्थी के लिए वजीफा देती है लेकिन यदि
विद्यार्थी दीन हैं गरीब हैं मगर बुद्धू हैं तो वजीफा
नहीं मिलेगा,यदि आप दीन हैं, दरिद्र हैं,पापी हैं तो
बने रहिेए आपके लिए कोई सहायता नहीं है। कोई देवता,
सन्तोषी माता या साईं बाबा आपका उद्धार नहीं करेगा।
जब आप अपने लिए कुछ करने के ल्ए पसीना
बहायेंगे तभी ईश्वर आपके प्रति खुश रहेगा ।

6 -महॉपुरुष कभी बडा आदमी नहीं बनता-

    महॉपुरुष कभी बडा आदमी नहीं बनता
और बडा आदमी महॉपुरुष नहीं हो सकता है
।चाणक्य ने एक लडके को पकड कहा था कि हम
तुम्हें सम्राट बनायेंगे, तुंम्हें सिर्फ खडा रहना है,तुम्हारे
कन्धे पर बन्दूक रखकर चलानी है, लडके ने कहा आप
स्वयं सम्राट क्यों नहीं बन जाते हो स्वयं ही
बन्दूक क्यों नहीं चलाते हों , चाणक्य ने
कहा महॉपुरुष बडा आदमी नही बन
सकता जितने भी बडे आदमी बने
हैं वे कोई भी महॉपुरुष नहीं थे ।

7 – एक समय मे केवल एक ही कार्य करें-

एक समय में कई कार्य करने से शक्तियॉ
बंट  जाती  हैं  और  एक  भी  काम  ठीक  तरह  से
नहीं हो पाता हैं, काम कुछ और मन कहीं और चित्त
की अस्थिरता,एवं चंचलता सद्गुणों को निरर्थक बना देता हैं,
कुशल से कुशल कारीगर जब अस्थिर चित्त से काम करता है
तो बनने वाली चीज निम्न दर्जे की होगी ।ङसलिए एक
समय में एक ही काम करें । एकाग्र चित्त से कार्य
करें तों चमत्कारिक परिवर्तन होगा ।

8 – मनुष्य अनन्त महॉशक्तियों का भण्डार है-

     मनुष्य जन्म के समय परमात्मा मनुष्य शरीर
में आत्मा को अथाह शक्ति के साथ सृजित करता है।
ङसीलिए यह मनुष्य महॉशक्तियों का भण्डार है, जितना
बल उसके अन्दर मौजूद है उसका लाखवें भाग का प्रयोग वह
अभी तक नहीं कर पाया है,इस छिपे हुये भण्डार में अतुल रत्न
राशि छिपी पडी है, जो कोई जितना उसमें से निकाल लेता है
वह उतना ही धनी बन जाता है ।

9 – स्वभाव से स्वर्ग और नरक बन जाता है –

      दार्शनिक ङमर्शन कहते थे कि यदि मुझे नरक
में रहना  पडे  तो  में अपने  उत्तम  स्वभाव  से  वहॉ
भी स्वर्ग बना दूंगा ।अर्थात जिनकी मनोभावनायें,विचारधारायें,
मान्यतायें, उच्चकोटि की सात्विक होती हैं हैं उनके लिए सर्वत्र
स्वर्ग ही स्वर्ग है, उसके चारों ओर आनन्द और
प्रेम उमडा हुआ दिखाई देता है,किन्तु जिसका
दृष्टिकोण निकृष्ट है, नीति अच्छी
नहीं है , भावनायें अच्छी नहीं हैं
उनके लिए तो यह जीवन नर्क है ।

10 – संसार में अधिकॉश दुख काल्पनिक होते हैं-

           संसार में जितने भी दुख हैं उनमें से तीन
चोथाई दुःख मनुष्य अपनी कल्पना शक्ति के सहारे
उन्हैं गढकर तैयार करते हैं,और उन्हीं से डर-डर कर खुद
दुखी होता रहता है, वह चाहे तो अपनी कल्पनाशक्ति को
परिमार्जित कर अपने दृषटिकोण को शुद्ध करके ङन
काल्पनिक दुखों के जंजाल से आसानी से
छुटकारा पा सकता है ।

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