शक्ति की परख


1-हमारी वास्तविक शक्ति हमारे भीतर निहित इच्छाशक्ति है

          मनुष्य की वास्तविक
शक्ति उसके भीतर निहित इच्छा-
शक्ति है।यदि कोई मनुष्य किसी कार्य
को संपन्न करने में       असफल होता है, तो
इसका कारण उसका दुर्भाग्य नहीं है बल्कि उसमें
संकल्प की निर्बलता निहित है। दृढ़ संकल्प में एक
ऐसी शक्ति छिपी रहती है, जो प्रतिकूल स्थितियों को
अनुकूल बना लेती है। संकल्प शक्ति ही मन को एकाग्र
कर विचारों को मस्तिष्क की ओर प्रेषित करती है। इसीलिए
हमें जैसा बनना हो, वैसे ही विचार पूर्ण आत्मविश्वास के साथ
अपने मन में उत्पन्न करने चाहिए। विचारों का असर शरीर के
स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
             विचार ही भूख का
अहसास कराते हैं और भोजन
करने के बाद उसकी संतुष्टि का
भी। इसलिए स्पष्ट है कि पूर्ण आ-
त्मविश्वास व दृढ़ संकल्प शक्ति से ही
व्यक्ति जीवन में सफल होता है और वही
जीवन में चरमोत्कर्ष की प्राप्ति भी करता है।
यदि जीवन में सफलता चाहिए, अपने लक्ष्य की
प्राप्ति चाहिए तो संकल्पवान ही बनना होगा। स्वामी
विवेकानंद कहा करते थे कि मनुष्य को रात्रि में सोने
से पूर्व और प्रात:काल उठने के पश्चात चारों दिशाओं
की ओर क्रमश:     मुंह करके प्रबल संकल्प शक्ति के
साथ संपूर्ण विश्व    की भलाई और शांति की कामना
करनी चाहिए। संकल्प शक्ति से संपन्न मनुष्य कभी
भी विषम   परिस्थितियों से घबराता नहीं है बल्कि वह
कठिनाइयों को   झेलते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहता है।
इससे प्रतिकूलताएं अनुकूल होती हैं। प्रगति संकल्पशक्ति
के बल पर ही निर्भर करती है।    यदि हम विचारों के महत्व
को भलीभांति समझ लें और पूर्ण आत्मविश्वास और संकल्प-
शक्ति के साथ विचारों को कार्यरूप में तब्दील करना शुरू कर
दें, तो हमारे जीवन    विकास के मार्ग स्वमेव खुल जायेंगे और
आनन्द की विचारधारा हमारे हृदय व परिवार में नवउत्साह का
सृजन करने लगेगी। फिर कार्य में हमें प्रसन्नता की अनुभूति
होगी।
                यह पूर्णतया सिद्ध
और सत्य है कि कर्मो के सहयोग
से ही जीवन में सफलता मिलती है।
जीवन में जब भी हमारी विचारधारा दृढ़
होती है, तो हमारे मुख पर आनंद की ऐसी
रेखाएं उभर आती हैं जो हमें दोगुने उत्साह के
साथ कार्य में संलग्न कर देती है। विचारों की
दृढ़ता आते ही परिस्थितियां भी अनुकूल हो
जाती हैं और समस्त कार्य सधने लगते हैं।
मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके भीतर
निहित इच्छाशक्ति है, जो उसे कार्य
करने की प्रेरणा देती है। जब तक
मनुष्य के मन में इच्छाशक्ति का
अभाव रहेगा, तब तक कोई भी
कार्य संपन्न नहीं होता।

2-चिंतन करना विकसित मस्तिष्क की सहज प्रक्रिया है

                चिंतन विकसित
मस्तिष्क की सहज प्रक्रिया है।
जहां चिंतन है वहीं विचार है, वैचा-
रिक दर्शन है। चिंतन एक प्रकार का मंथन
है। यदि चिंतन शुभ और गहन है,      तो मंथन
अमृतदायी है और यदि सतही है, तो विष उत्पादक
है। समुद्र मंथन से भी पहले प्राणाहार विष ही प्राप्त
हुआ था, कारण वह सतही मंथन था। जब सुरों-असरों
ने गंभीर होकर गहन मंथन किया, तो उन्हें अमरता
प्रदान करने वाला अमृत लाभ हुआ। चिंतन वही
शुभकारी होता है, जो अमृतदायी हो। अशुभ
चिंतन का यहां    विष    तो   बहुत है, पर
विषपायी कोई नहीं है। हमें विषपान से
बचने के लिए चिंतन को शुभ रखना ही
होगा।   उदाहरणार्थ सूर्य पूर्व में उगता है,
प्रकाश फैलाता है और सायं अस्त हो जाता
है और हमें अंधकार के महाकूप में डुबो जाता
है। यह बात सच नहींहै बल्कि हमारा दृष्टिभ्रम
है। सूर्य न तो उगता है और न अस्त होता है।
पृथ्वी ही उसकी परिक्रमा करती है।
पृथ्वी की यह
परिक्रमा और परिभ्रमण ही
हमें भ्रमित करता है और यही
भ्रम हमारे चिंतन को दूषित भी।
यह दूषित चिंतन डूबते सूर्य के सदृश
हमें भी अवसादों के अंधकार में डुबोता
रहता है। सूर्य और आत्मा, दोनों ही शा-
श्वत हैं। पृथ्वी और तन दोनों ही क्षरणशील,
नश्वर और मायाग्रस्त हैं, लेकिन हमारा गलत
या असंतुलित चिंतन इसके उलट सूर्य को गति-
शील और पृथ्वी को स्थिर मानता है। तभी तो वह
सूर्योदय और सूर्यास्त जैसे भ्रामक शब्द गढ़ता और
उन्हें दूसरों को भी स्वीकार कराने का यत्‍‌न करता है।
1सूर्य का उदाहरण सामने रख आत्मा की अक्षरता,
अजरता और अमरता का हम निरंतर शुभ चिंतन
करें, पृथ्वी की तरह शरीर को स्थिर मानकर स्वयं
को भ्रमित न करें। दूसरों को भुलावे में रखकर हम
भले ही किसी तथाकल्पित लाभ की बगिया मन में
उगा लें, किंतु स्वयं को भुलावे में रखना सजी संवरी
बगिया को उजाड़ना ही है। पात्र को आधा रिक्त समझने
वाला चिंतन कभी शुभ नहीं होता है। वह तनाव, अवसाद
और निराशाओं का जनक होता है। फूलों का मुरझाना, पत्तियों
का झड़ना, सूरज का डूबना, खालीपन को महसूस करना आदि
अशुभ चिंतन को त्यागकर हमें फूलों का खिलना, पत्तियों का
पल्लवित होना, सूरज का निकलना, पूर्णता का आनंद लेना
आदि के बारे में शुभ चिंतन करना चाहिए। यह शुभ चिंतन
ही श्रेष्ठ और शुभ्र होता है।

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