विपत्ति के समय मनुष्य की सबसे बड़ी योग्यता उसका धैर्य है


 

        जो मनुष्य धार्मिक
है या धर्मपथ पर है, उसमें
क्या-क्या लक्षण होंगे? इस
सवाल का जवाब एक संस्कृत
श्लोक में आए शब्दों में निहित है।
इन शब्दों के अर्थो में ही धर्म की
वास्तविक परिभाषा निहित है।

         इस क्रम में पहला
शब्द ‘धृति’ है। इस शब्द के
कई अर्थ हैं, लेकिन इसका प्रमु-
ख अर्थ है धैर्य। मनुष्य के लिए किसी
भी अवस्था में विचलित होना उचित नहीं
है। विपत्ति के समय सबसे बड़ी योग्यता
है-धैर्य। इसके बाद-क्षमा। क्षमा क्या है?
किसी के प्रति प्रतिशोधमूलक मनोभाव
न रखना ही क्षमा है। अगर मैं धार्मिक
हूं तो मेरे लिए क्षमा करना ही उचित
होगा।

         ‘दम’ शब्द का
अर्थ है आत्म-शासन।
संस्कृत शब्द ‘शम’ और
‘दम’ लगभग समपर्यायवाची हैं।
‘दमन’ हुआ स्वयं को शासित करना
और शमन हुआ दूसरों पर शासन करना।
धार्मिक व्यक्ति को अवश्य ही ‘दमन’ मनोभाव
का होना चाहिए। इसके बाद हुआ-अस्तेय। यम-
नियम में ‘अस्तेय’ शब्द शामिल है। अस्तेय शब्द
का अर्थ है-चोरी नहीं करना। चोरी दो प्रकार की
है-बाहर की चोरी और भीतर की चोरी। भीतर की
चोरी से आशय मन ही मन चोरी करने का भाव
लाने से है। इसलिए ‘अस्तेय’ का अर्थ है-किसी
प्रकार की चोरी न करना। ‘शौचम् का अर्थ है-
शुद्ध रहना। असल में शौच का एक आशय है-
मन को शुद्ध रखना। मन को स्वच्छ रखने
का क्या उपाय है? प्रथम और एकमात्र उपाय
सत्कर्मो में मन को व्यस्त करना है। इंद्रियनि-
ग्रह के द्वारा क्या होता है? इंद्रियनिग्रह कर
मनुष्य किसी कार्य में पूरे मनोयोग से अपनी
ऊर्जा को केंद्रित कर सकता है। ‘धी’ का अर्थ
है मेधा, बुद्धि। किसी ने हजारों-हजार किताबें
पढ़ी हैं, परंतु वह सभी को याद नही रख स-
केगा। अधिकांश को भूल जाएगा, यह स्वाभा-
विक है। मनुष्य की स्मृति अधिक दिनों तक
कायम नहीं रह सकती है। साधना के द्वारा
मनुष्य को इसे जगाना पड़ता है।

                शब्द का वास्तविक
अर्थ है धुव्रास्मृति। विद्या यानी
जो ज्ञान मनुष्य को परमार्थ की
ओर ले जाता है उसे ही विद्या क-
हते हैं। जो ज्ञान मनुष्य को अकल्या-
णकारी कार्यो को करने के लिए प्रेरित
करता है उसे कहा जाता है-‘अविद्या’।
‘सत्यम’ यानी लोगों के हित की भावना
लेकर मनुष्य जो भी सोचेगा या बोलेगा वही
सत्य है। इस क्रम में धर्म का अंतिम लक्षण है
अक्रोध यानी क्रोध न करना।

 

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