विवेक पूर्ण नेत्रों से आनन्द की अनुभूति करें-8


1-जहॉ धन बढता है -वहॉ बुद्धि पंगु हो जाती है

             धन की तरह विषय-वासना की इच्छा भी विषैली
होती है।वासनाएं निरंतर बढती हैं,कभी तृप्त नहीं होती हैं ।यह
भोग वासना पाश्चात्य सभ्यता की कलंक कालिमा है।कामी का विवेक
नष्ट हो जाता है।जहॉ धन और बढती विषय-वासनाएं हैं वहॉ तो बुद्धि पंगु
हो जाती है ।वासना भोग विलास प्रिय व्यक्ति के पास यदि रुपया है तो उसका
यह लोक नर्क बन जाता है ।जिस प्रकार दूध सॉप के विष को बढाने का कारण होता
है उसी प्रकार दुष्ट का धन उसकी दुष्टता को बढाता है।वासना के मद में अन्धा हुआ
व्यक्ति देखता हुआ भी अन्धा ही रहता है ।विषय-वासना तो प्रत्यक्ष विष के समान है ।

2-ऐश्वर्य युक्त ब्राह्मण, कल्याण से भ्रष्ट होता है-

                       यदि ब्राह्मण के पास धन का बडा संग्रह हो गया
है तो वह ब्राह्मण कल्याण से भ्रष्ट हो जाता है ।क्योंकि धन-सम्पत्ति
तो मोह में डालनी वाली होती है और यह मोह नरक में गिरा देता है,इलिए
कल्याण चाहने वाले पुरुष को अनर्थ के इन साधनों का परत्याग कर देना चाहिए ।
और जिसे धर्म के लिए भी धन-संग्रह की इच्छा होती है,उसके लिए भी उस इच्छा का
त्याग ही श्रेष्ठ है ,क्योंकि कीचड लगाकर धोने की अपेक्षा उसका दूर से स्पर्श न करना ही
अच्छा है ।धन के द्वारा जिस धर्म की उन्नति की बात की जाती है वह धर्म तो क्षयशील माना
जाना चाहिए ।दूसरे के लिए जो धनका परित्याग है,वही अक्षय धर्म है ।वही मोक्ष प्राप्त कराने
वाला है ।।

3-दूर की वस्तु में आकर्षण होता है-

                  संसार में दूरी में आकर्षण होता है।जो वस्तु हमारे
समीप होती है,और हम उसके मालिक हैं,जिसपर हमारा स्वामित्व
है हम उसके प्रति न दिलचस्पी लेते हैं,न उसकी सुन्दरता,महत्व,लाभ,
तथा उपयोगिता ही समझते हैं ।मानव जगत में यह अतृप्तता का कारण है ।
जो वस्तु हमारे पास होती है,हम उससे इतना अधिक परिचित हो जाते हैं कि उसकी
उपयोगिता हमारे लिए कुछ भी अर्थ नहीं रखती है।घर में जो व्यक्ति है उनसे हमारा
काम आसानी चलता है । हमारी मॉ-पिता भीई-बहिन निकट रहने से उनका महत्व
दृष्टिगोचर नहीं होता ।घर के बुजुर्ग लोगों का आदर-सत्कार सेवा आदि करने में
अपनी प्रतिष्ठा की हानि समझते हैं ,इसका कारण यही है कि हम प्राप्त का
अनादर करते हैं ।एक महॉजन रुपया उधार देता है,उसकी दृष्टि में मूलधन
का उतना अधिक महत्व नहीं है जितना कि सूद का है ।उसके पास रुपयों
की कमी नहीं है यदि वह चाहे तो अपने रुपयों से जीवन प्रयन्त सुखी
रह सकता है ,लेकिन उसका लोभ उसके मार्ग में वाधा उत्पन्न करता
है । वह सूद को वसूल करने के लिए जमीन आसमान सिर पर उठा
लेता है ।मुकदमेबाजी में फंसता है,वर्षों अदालत में खडा रहकर
समय व्यर्थ नष्ट करता है।यदि मुकदमें में सफल रहा तो कुर्की
द्वारा मूलधन सूद सहित प्राप्त हो जाता है। लेकिन जब कर्ज
लेने वाले का दिवाला निकल जाता है तो सूद के प्रलोभन में
मूलधन भी गंवा लेता है ।।

4-विवेक पूर्ण नेत्रों से आनंद की अनुभूति करें –

                यदि आप विवेकपूर्ण नेत्रों से देखें तो आपको विदित
होगा कि आपके गरीव घर में निर्धनता,प्रतिकूलता और संघर्ष के
वातावरण में प्रभु ने आनंद प्रदान करने वाली अनेक वस्तुएं प्रदान की
हैं ।अन्तर केवल यह है कि आपके स्थूल नेत्र उनके सौन्दर्य और उपयोगिता
का अवलोकन नहीं करते ।आपके पास कौन-कौन सी वस्तुएं हैं ?क्या आपके
पास उत्तम स्वास्थ्य है? यदि अच्छा स्वास्थ्य है तो आपको संसार की एक महान
विभूति प्राप्त है,जिसके सामने संसार का समस्त स्वर्ण,बेशकीमती मूंगे,मोती,हीरे,
जवाहिरात,दौलत इत्यादि फीके हैं ।अगर देखा जाय तो संसार का स्तित्व आपके स्वास्थ्य
पर निर्भर करता है ।आपको जो स्वास्थ्य रूपी सम्पदा प्राप्त है,उसका आदर कीजिए ।अपनी
पॉच इन्द्रियॉ –स्वाद,घ्राण,श्रवण,स्पर्श,दर्शन इत्यादि के अनेक आनन्दों का सुख लूट सकते हो।
विश्व में ऐसे सेकडों सुख एवं आनन्द हैं जिनका आधार स्वास्थ्य है,जो यह आपको प्राप्त है, जीवन
में आनन्द उटाना आपकी बुद्धि पर निर्भर करता है ।

5-वस्तुओं के सम्बन्ध में अपनी रुचि सरल बना लें,दुखी नहों-

                 यदि आपके पास बहुमूल्य कीमती वस्त्र,आभूषण,
सुसज्जित मकान इत्यादि नहीं है तो  दुखी  होने  की आवश्यकता
नहीं है।जैस् वस्त्र हैं,     आपके पास जो भी हैं,   उन्हीं को स्वच्छ निर्मल
रखकर सादगी से अपनी विशेषताएं प्रदर्शित कर सकते हैं ।वस्त्रों के सम्बन्ध
में अपनी रुचि सरल बना लीजिए,  इस बात के लिए दुखी न हों । यह देखा गया
है कि जो व्यक्ति अधिक श्रृंगार में निमग्न रहते हैं,वे प्रायः मिथ्याभिमानी, छिछोरे,
अल्पबुद्धि के होते हैं । कपडों के मायाजाल में झूठा सौन्दर्य लाने की चेष्ठा करते हैं ।आपके
पास जो भी अच्छा या बुरा है ,उसी का सदुपयोग करना प्रारम्भ कर दीजिए।    अपने साधारण
वस्त्रों को अच्छी तरह स्वच्छ कीजिए,यदि बाल काटने के पैसे नहीं हैं तो उन्हीं को धोकर ठीक तरह
संवार लीजिए ।खद्दर के सस्ते,स्वच्छ और चलाऊ वस्त्रों में व्यक्ति बडा आकर्षक प्रतीत होता है। बस
आवश्यकता है शिष्ठाचार की । प्रायः स्त्रियॉ दुकानों पर नईं-नईं साडियॉ,नयें-नयें डिजायनों के आभूषण
देखकर  अतृप्त   एवं अशॉत रहती हैं ,   घर में कलह उत्पन्न हो जाता है ,   पति के पास आर्थिक संकट
उत्पन्न हो जाता है,     वह वेचारा इन सबके लिए ऋण लेने के लिए बाध्य होता है ।   यह बडी मूर्खता
है ।फैशन जिस गति से परिवर्तित हो रहा    है अगर हर वर्ष इनका पुनर्निर्माण किया जाय तो असली
सोना क्या खाक बचेगा ?    प्राप्त का समुचित आदर करना सीखें ।     अपनी साधारण सी वस्तु है,
उन्हीं की सहायता से अपनी प्रतिभा,योग्यता और विशेषता को प्रदर्शित कीजिए तो सहज ही
सुखःशॉति जीवन व्यतीत कर सकते हैं ।।

6-कानों को पौष्टिक भोजन देना न भूलें-

           हम पेट को तो भोजन देते हैं,पर कान को भोजन
देना भूल जाते हैं,      इस बात का हमें अहसास ही नहीं होता है ।
अगर पेट भूखा रहता है तो शरीर क्षीण हो जाता है,लेकिन अगर कान
भूखे रहेंगे तो हमारी बुद्धि मन्द हो जायेगी ।इसलिए यदि श्रेष्ठ पुरुषों के
अभिवचन सुनने का अवसर मिलता है तो अन्य कार्यों को छोडकर वहॉ पहुंच
जाओ,क्योंकि उनके वचन तुम्हें वह वस्तु देंगे जो रुपये-पैसों की अपेक्षा हजारों
गुना मूल्यवान होती है । जो लोग जीभ से अच्छा खाना खाने में तो कुशल होते हैं,
पर कानों से सदुपदेश सुनने का आनंद नहीं जानते,उन्हैं तो बहरा ही कहना चाहिए।ऐसे
लोगों का जीना और मर जाना तो एक ही समान है ।।

7-हर उपदेश शक्ति का ज्योति पिंण्ड है-

            प्रत्येक उपदेश का एक ठोस प्रेरक विचार होता है । जैसे
कोयले के एक छोटे से कण में    विध्वंशकारी    शकितु भरी हुई होती है,
उसी प्रकार प्रत्येक उपदेश शक्ति का एक जीता जागता ज्योति पिण्ड है।उससे
हमें नयॉ प्रकाश और नवीन प्रेरणॉ मिलती है ।महॉपुरुषों की अमृत वॉणी,कवीर,
रहीम,गुरु नानक,तुलसी,मीरावाई,सूरदास आदि महॉपुरुषों के वचन दोहों और गीतों
में महॉन जीवन सिद्धॉत कूट कूट कर भरे हैं ,आज ये अमर तत्ववेत्ता हमारे बीच नहीं
हैं ,उनका पार्थिव शरीर विलुप्त हो चुका है, पर अपने उपदेशों के रूप में वे जीवन-सार छोड
गये हैं,जो कि हमारे पथ प्रदर्शन में सहायक होतो हैं ।।

8-अनुभव में वृद्धि की गति धीमी होती है-

           जैसे-जैसे मनुष्य की उम्र बढती है उनका अनुभव भी
बढता जाता है मगर यह गति बहुत धीमी होती है ।कडुवे मीठे घूंट
पीकर हम आगे बढते हैं यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें
तो अधिक लम्बे समय में जीवन के सार को पा सकेंगे ।इसलिए हम विद्वानों
के अनुभवों को पढते हैं और अपने अनुभवों से परख कर,तौलकर अपने जीवन में
ढालते हैं ।उन्होंने जिन अचत्छी आदतों को सराहा है .उन्हैं विकसित करें ।सदुपदेश हमारे
लिए प्रकाश के जीते-जागते स्तम्भ हैं ।।

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