हम जीवित क्यों हैं-1


                      हमारे सामने बार-बार एक प्रश्न
सामवने आता है कि आखिर हम जी क्यों रहे हैं? एक
प्रश्नवाचक मार्क हमारे सामने लग जाता है । आप क्यों जी
रहे हैं ? इस जिन्दगी को आप खीच क्यों रहे हैं ?     कल इससे कुछ
नहीं मिला,!आज भी नहीं मिला! फिर कल क्या मिल जायेगा ?हम चाहते
क्या हैं ?हम चाहते हैं आनंद !तो मिला ? कभी-कभी नहीं मिलता !हम चाहते
हैं शॉति !,कभी मिला ? नहीं ! बल्कि जितनी शॉति चाहते हैं  उतनी ही  अशॉति
सघन होती जाती है। और जितना आनंद खोजते हैं जिन्दगी में  उतना ही  तनाव,
उतनी ही चिन्ता बढती चली जाती है।पूरी जिन्दगी दुख का एक ढेर हो जाता है। और
हम उस दुख के ढेर पर ढेर बढाते चले जाते हैं । खोजते हैं आनन्द !  मिलता  है  दुःख।
इसका अर्थ हुआ हमारी खोज में कोई बुनियादी भूल हो रही है।असाधारण भूल कह सकते
हैं हम। जाते हैं आकाश की तरफ और पहुंच जाते हैं पाताल ।  हम  जाते  हैं  स्वर्ग  की  ओर,
लेकिन पहुंच जाते हैं नरक । जलाते हैं दिये लेकिन जलता है अन्धेरा। यह हमारी पूरी जिन्दगी
है । आदमी जो खोजता है वह नहीं मिलता है । सिकन्दर  बहुत  दुखी  रहा  होगा  क्योंकि  उस
जमाने में वह पूरी दुनियॉ को जीतने को निकला था ,  क्योंकि  जो  दुखी  नहीं है  वह  किसी  को
जीतने ही नहीं निकलेगा । जो आनन्दित है वह जीत गया,उसने अपने को जीत लिया । अब किसी
और को उसे जीतने की जरूरत नहीं रही। और जो अपने ही को नहीं  जीत  सका  वह  इस  कमी को
पूरा करने के लिए दूसरों को जीतने के लिए निकल पडता है । वे दूसरों को दबाकर अपनी हीनता को
पूरा करने निकल पडते हैं । और बडे मजे की बात तो यह है कि यह देखा गया है कि-जो बहुत दीन
होते हैं वे धन खोजने निकलते हैं।जो लोग हारे हुये होते हैं वे जीतने निकलते हैं । जिनके पास कुछ भी
नहीं होता है वे सब मॉगने निकल पडते हैं । इसी लिए स्वभाव से सिकन्दर भी दुखी आदमी रहा होगा जो
सारी दुनियॉ को जीतने निकला था । ।

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