कुदरत के नियमों से सामज्जस्य-1


 

              आज के युग में जबकि विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है,
वैज्ञानिक आविष्कारों से यह सम्भव हो गया है कि कुदरत की दी हुई
चीजों का उपयोग हम अपने आवश्यकताओं के हिसाब से कर लेते हैं।
अगर धूप में चलना पड रहा है तो छाता बनाया गया है,वर्षा नही होती है
तो कृत्रिम वर्षा सम्भव है, बॉध बन गयेहैं,आदमी को ईश्वर ने दो पॉव चलने
के लिए दिये हैं, लेकिन मानव ने चलने के लिए कितने साधन बना दिये है! ओजोन
की परत को रिपेयर किया जाने लगा है। लेकिन यह भी सत्य है कि,कुदरत पर नियंत्रण
की भी एक सीमा है,वरना विनाशकारी परिणॉम भुगतने होते हैं।प्रकृति पर नियंत्रण की कोशिष
में अगर हिमालय का वर्फ पिघल जाता है तो परिणॉम सभी जानते हैं  क्या  होगा।  प्रलय की जो
बात कही गई है,यह भी सत्य है, कि कुदरत पर नियंत्रण की सीमॉ बहुत अधिक बढ   चुकी होगी।
हॉ यह बात  भी  सही है  कि कुदरत को कोई बना नहीं सकता है,  और न उसे  नष्ट  कर सकता है,
इसके नियम स्वयं उसने बनाये हैं। मानव द्वारा उसको अपने सुविधा के अनुसार उपयोग में लाने
का प्रयास किया जाता रहा है।    यदि गंगा नदी को नहर द्वारा उसकी दिशा बदल दी गई है,  मगर
उसे रोक नहीं सकते हैं। बॉध बनाने से उस जल को एक सीमा तक ही रोका  जा सकता है।   कुदरत
ने बच्चे को नंगा  जन्म दिया,   कपडे तो हमने ही पहनाये!   लेकिन वे भी लोग हैं -जैन मुनि,  जोकि
कुदरत की दी हुई चीज में छेड खानी नहीं करते हैं।  जिस तरह  से किसी व्यवस्था  को चलाने के  लिए
नियम बने होते हैं उसी प्रकार इस कुदरत  के  भी  अपने नियम है,उसी ढंग से उसके  कार्यों का  संचालन
होता है।दिन-रात होते हैं,अलग-अलग ऋतुएं आती हैं,कभी गर्मी तो कभी ठंड।आलीशान मकान या  मंहगी
गाडी भी हमने बनाये हैं,इस प्रकृति में छेडखानी करके।इनके उपयोग की भी एक सीमा है। हमें भी इस कुदरत
ने बनाया है, और कुदरत के नियमानुसार हमें इस शरीर की मेहनत से अपना जीविकोपार्जन करना है। लेकिन
अगर हम इस शरीर के लिए सुविधा सम्पन्न आलीशान स्थान उपलव्ध कराते हैं,जिसमें इस शरीर को जरा भी
कष्ट न हो, इसमें हमें देखना होगा कहीं यह कुदरत की मर्जी के विरुद्ध तो नहीं है, अन्यथा  हम अपंग हो जायेंगे,
हमारा शरीर विकृत हो सकता है,हम कम उम्र में बुड्ढे हो सकते हैं,रोग ग्रस्त हो सकते हैं।मैं अपनी बात जानता हूं,
प्रतिदिन 3की.मी.पैदल उतराई से चलकर अपनी ड्यूटी पर जाता हूं,रास्ते में जंगल और गॉव पडता है,रास्ते में ही
आंवले और आम के पेड हैं, जिनसे स्वतः पके हुये फल गिरे हुये मिलते हैं,उठाकर बैग में रख देता हूं, गॉव  के  कई
लोगों से मुलाकात हो जाती है, जाते-जाते पसीना आ जाता है, फिर सभी लोगों को बैग के फलों  को  बॉट  लेता  हूं,
सबलोग खुश हो जाते हैं,मुझे इस बात का अहसास होता है कि यह कार्य प्रकृति के नियमों के अनुकूल है।  लेकिन
वापस घर लोटते समय गेट से ही गाडी से जाता हूं,क्योंकि चढाई में अधिक कठिनाई, समय  की  वर्वादी से  बचाव,
और फिर आने- जाने के साधन भी तो बने हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज के हिसाव से भी तो  चलना है।
अर्थात साधन और कुदरत के नियमों में सामज्जस्य स्थापित करके चलने से  अच्छा जीवन यापन हो  सकता  है।

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