परसिपर संवाद की परम्परा भारतीय संस्कृति का अंग है


 

                सम्यक संवाद की भारत
में एक दीर्घ परंपरा रही है। जबसे अस-
हिष्णुता हमारे समाज में घर करने लगी है
और उदारता की भावना क्षीण होने लगी है,
तब से हमारा समाज संवाद से संवादहीनता की
ओर बढ़ने लगा है। आज समाज की अनेक सम-
स्याओं का समाधान संवाद में निहित है। हत्या व
आत्महत्या आदि अपराधों से बचा जा सकता है,
बशर्ते हम परस्पर संवाद की भावना का विकास करें।

              आज के वैश्रि्वक
महानगरीय जीवन में किसी के
पास दूसरे के लिए     समय नहीं है।
सभी अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त
हैं। अन्य समस्त कार्यो के संपादन के लिए
समय है, परंतु स्वस्थ संवाद की स्थापना के
लिए समयाभाव की स्थिति है। माता-पिता के
पास अपने बच्चों से बात करने तक का समय
नहीं है। समाज के हर वर्ग में परस्पर बातचीत
की प्रक्रिया सिकुड़ गई है। ऐसे में हम न केवल
अपने सुख को बांटने से वंचित रह जाते हैं, बल्कि
अपना दुख भी नहीं बांट पाते।

            सुख बांटने के लिए
कोई न भी मिले तो भी कोई
विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु
दुख बांटने के लिए यदि कोई न
मिले तो जीवन हताशा व अवसाद-
ग्रस्तता की ओर बढ़ता है, जो आगे
चलकर आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध
का कारण बन सकता है। स्वस्थ संवाद
भ्रमों और संदेहों का निवारण करता है और
जीवन को सही दिशा की ओर ले जाता है।
संवाद के अभाव से वैचारिक संकीर्णता घर
करती जा रही है।

              बढ़ती वैचारिक संकीर्णता
और जड़ता परस्पर लड़ाई-    झगड़े का
कारण है। संवाद का स्तर गिरने से समाज
में अशांति का वातावरण बनता है। प्रत्येक व्यक्ति
एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। यही
संदेह आगे चलकर भयंकर विनाश और त्रसदी का कारण
बनता है। सामाजिक और पारिवारिक जीवन में विभिन्न
व्यक्तियों में परस्पर मतभेद और मनमुटाव एक स्वाभाविक
प्रक्रिया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क
में भिन्न-भिन्न विचार होते हैं, परंतु यही मतभेद और मनमुटाव
परस्पर संवाद के अभाव के चलते कब बड़ी दरार में परिवर्तित
होकर अपूर्णनीय क्षति का कारण बनता है, इसका पता ही
नहीं चलता। संबंध बिखर रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं।
व्यक्ति का जीवन एकाकी और अवसादग्रस्त बनकर
नर्क में परिवर्तित हो रहा है। चारों तरफ बेतहाशा
दौड़ है, जिसमें कहीं विराम नहीं दिखाई पड़ता।

 

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