सुख-दुख हमारी सोच-1


         सुःख-दुख बहुत कुछ हमारी सोच
पर निर्भर करता है और कई बार सुख के
साधन ही हमारे दुःख का कारण बन जाते हैं।
एक आदमी अपनी पत्नी के साथ एक झोपडी में
रहता था,दिनभर मेहनत करके जो कमाता उससे
मजे से अपना जीवन यापन करता था दोनों सुखी थे,
उन्हैं न कोई लोभ या लालच था न कोई कामना थी, वह
एक सीधा-सच्चा श्रमिक था।उसी के पडोस में एक सेठ रहता
था,वह हमेशा परेशानी व चिन्ता में डूबा रहता था आनन्द की
अनुभूति उसने  कभी  नहीं की,एक दिन एक साधु ने  उसे  दुखी
देखकर उसे समझाया कि तुम्हारी यह धन दौलत ही तुम्हारी सारी
परेशानी और चिन्ता की जड है।इसने तुम्हारे स्तित्व पर अपना कव्जा
जमा रखा है,तुम्हारा चित्त हरसमय एक चीज से दूसरी चीज की तरफ
भटकता रहता है,जिससे तुम वेचैन रहते हो।संत ने पडोस के उस  श्रमिक
की ओर  इशारा  करते  हुये  कहा कि  इसे देखो  इसके  पास  कुछ भी नहीं है,
लेकिन देखो उसका मुख मणडल कैसा आनन्द से खिला है,उसका शरीर कितना
सुन्दर व सुडौल है तुम्हारे भाग्य में ऎसा सुख और आनन्द कहॉ है ।  उस धनी ने
विचार किया साधु के कथनों की परीक्षा ली जाय। दूसरे दिन साधु के    परामर्श पर
धनी ने उस निर्धन के यहॉ निन्यानब्बे रुपयेकी एक थैली फेंक दिये तो शॉम को देखा
कि उस निर्धन मजदूर के यहॉ चूल्हा तक नहीं जला,जबकि आज तक हमेशा ठीक समय
पर खाना बना करता था.दूसरे दिन सुबह ही साधु ने सेठ को अपने साथ लेकर श्रमिक के घर
पहुंचा और उस श्रमिक से रात को चूल्हा न जलने का कारण पूछा, उस निर्धन श्रमिक ने संत
सेलझूठ बोलना उचित न समझा और कहा कि कल से पहले मैं प्रतिदिन मैं जो पैसा कमाता था
उससे आटा,दाल, शब्जी, तेल,मशाला खरीदलाता था,मगर कल हमने इसलिए चूल्हा नहीं जलाया
कि मेरे घर कल एक छोटी सी थैली गिरी मिली उसमें पूरे निन्यानव्बे रुपये थे ,तो चोचा कि एक ही
रुपये की कमी है,कि यदि एक रुपया हो जाता तो पूरे सौ रुपये हो जायेंगे ,बस उसी एक रुपये की कमी
को पूरा करने के लिए हमने यह निश्चय किया कि हम एक दिन छोडकर खाना खायेंगे इसी कारण
हमें कल भूखा रहना पडा ।

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