जैसा देखोगे वैसा बनोगे-परम ज्ञान लक्ष्य बनायें-1


चेतना का स्भाव है कि वह जो भी

जानती है उसी का रूप ले लेती है।उसी का आकार

ले लेती है। जब आप गुलाब का फूल देखते हो तो

आपकी चेतना गुलाब का फूल बन जाती है ।गुलाब

का फूल तो बाहर है,इस समय उसे तो आप देख ही

नहीं सकते हो,आप बाहर गये ही कहॉ,आपके भीतर

गुलाब का फूल आकृति ले लेता है। इसलिए सुन्दर

देखो,तो आप सुन्दर हो जाते हो ।असुन्दर देखो तो

आप असुन्दर हो जाते हो ।बुरे को देखो तो बुरे हो

जाते हो ।शुभ को देखो तो शुभ हो जाते हो।अगर

आप संत के पास बैठें हैं तो आपके भीतर संतत्व

आकार ले लेगा । और यदि दुष्ट के पास बैठे हो तो

दुष्टत्व आकार ले लेगा । यदि आप हत्यारे के पास

बैठे,तो आपके भीतर हत्या के विचार उठने लगेंगे।

और आपको कई बार इस बात का अहसास भी होता

है लेकिन आप ठीक-ठीक विमर्श नही कर पाते हो ।

किसी आदमी के पास जाने पर बुरे विचार उठते हैं

और किसी आदमी के पास जाने पर शुभ विचार

उत्पन्न होते हैं।किसी के पास बैठने पर परम शॉति

का अनुभव होता है और किसी के पास बैठने पर

अशॉति अनुभव होती है ।किसी से बचने का मन

करता है तो किसी से आलिगन का मन करता है।

अर्थात बाहर आप जो भी देखते हैं आपके भीतर

उसकी आकृति बन जाती है,इसी के रूप में आप

ढल जाते हो ।लेकिन जैसे-जैसे आप परम ज्ञान

प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाते हो वैसे ही आप

स्व के आकार में मग्न होते जाते हो,आप किसी

के आकार में नहीं ढल सकते हो न तो गुलाब का

फूल और न हत्यारे का रूप। सब उधार था ।अब

आप निराकर हो,कोई आकार आपको नहीं दिखेगा

यही परम ज्ञान का चंत्कार है ।

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