स्वयं पर विश्वास रखें-10


1-अपने मन पर विश्वास न करें-

                       हमें हमेशा सजग रहना होगा ।
अपने मन पर विश्वास न करें ।क्योंकि पाप सूक्ष्म
भाव में कभी धर्म का रूप धारण कर,कभी दया के रूप
में, कभी मित्र के रूप में तुम्हैं भुलाकर तुम्हैं वश में करने
की चेष्ठा करेगा। भुलावे में पडकर परास्त हो जाओगे, समझ
भी नहीं सकोगे । और जब समझ में आयेगा,तब शायद लौटना
ही असम्भव हो जाय।

2-प्रेम में इन्द्रियों व देह का सम्बन्ध नहीं होता-

                        ज्ञानी लोग प्रेम से मुक्त होते हैं।
वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रेम नहीं करते, और
न वे दूसरों को व्यक्तिगत रूप से अपने प्रति प्रेम करना,
और अपने में आसक्त होना देना चाहते हैं। इसीलिए वे किसी
के प्रति माया-मोह में नहीं फंसने देना चाहते हैं। वे तो अपनी आत्मा
और भगवान को सभी में देखते हैं,अतः सभी जीवों पर उनका प्यार और
स्नेह समान होता है। उनके प्रेम में, देह और इन्द्रियों का कोई सम्बन्ध नहीं
होता। कामान्ध नहीं। ज्ञानी तो प्रकृत प्रेमी होता है और प्रकृत प्रेमी ही ज्ञानी होता है ।

3- मन को वश में करना सबसे कठिन काम है-

                              कहा जाता है कि इस संसार में मन
को वश में करने जैसा कठिन काम और नहीं है । भगवान
रामचन्द्र ने हनुमान से कहा था, कि-चाहे सातों समुद्र कोई तैरकर
पार कर सके,वायु को अवशोषित कर ले सके,पहाडों को उठाकर अपना
खेल दिखा सके,पर इस चंचल मन को वश में करना,उसकी अपेक्षा अधिक
कठिन है। लेकिन इतना होने पर भी भयभीत होने का या निराश होने का कोई
कारण नहीं है । वीर साधक तो दृढ संकल्प के साथ भगवान पर निर्भर होकर यदि
प्रॉणपण से चेष्ठा तथा साधना करें,तो उनकी कृपा से वह असाध्य साधन कर सकता है।

4-कर्म ही बन्धन के कारण हैं-

                      अगर देखें तो समस्त कर्म ही बन्धन
के कारण होते हैं।     चाहे सुख हो या दुख,दोनों ही बन्धन
हैं ।अगर इन दोनों से पार न गये, तो मुक्ति का लाभ सम्भव
नहीं है।कर्म तो केवल उन्हीं के लिए बन्धन का कारण नहीं होता जो
निस्वार्थ परहित के लिए कार्य करते हैं। क्योंकि वे किसी फल की आकॉक्षा
ही नहीं रखते,और न अपने नाम के यश, यास्वार्थ-साधन के लिए भी काम
नहीं करते। उनके ह्दय में तो प्रेम का संचार होता है,वे तो प्रॉणि मात्र में ईश्वर
दर्शन करके ,उनकी सेवा समझकर कर्म करते रहते हैं। और मन में नये संस्कार के
बीज का सृजन भी नहीं होता। इसलिए वे पुनः जन्म-मरण से मुक्त हो जाते हैं ।

5-सुख भोग में नहीं त्याग में है-

                       जिसने जिन्दगी को जीकर देखा है,
अगर उनसे इस सम्बन्ध में पूछे तो उत्तर मिलता है,
भोगों में सुख नहीं है बल्कि त्याग में सुख है। जो सद्विवेक
से भोग भोगकर उनसे शिक्षा ग्रहण करता है,विषय-भोगों को
परिणॉम में दुःखदाई जानकर ,स्वेच्छापूर्वक समस्त त्याग करता
है,तो वही परम सुखी है,वही अमृत का अधिकारी होता है।स्वामी
विवेकानन्द जी ने तो त्याग को योगों का प्रॉण माना है।

6-ज्ञानयोग कठिन त्याग है

                       त्यागों में सबसे कठिन त्याग ज्ञानयोग को
माना जाता है,क्योंकि इसमें पहले से ही धॉरणॉ करनी होती है
कि समस्त संसार और उसके साथ का सम्बन्ध मिथ्या है,माया है ।
समस्त जीवन स्वप्न के समान है।इस मार्ग को नेति कहते हैं–मैं यह
नहीं वह नहीं,मैं देह-मन-इन्द्रिय कुछ नहीं। मुझे सुख नहीं,दुःख नहीं,मेरा
जन्म नहीं,मरण नहीं,वन्धन नहीं,मुक्ति नहीं,मैं तो नित्य चैतन्मयस्वरूप पूर्ण
ब्रह्म परमात्मा हगूं। इसलिए वे समस्त वाह्य विषयों को त्याग कर,अपने स्वरूप
के ध्यान में ही मग्न रहते हैं।

7-आत्म विश्वास बढायें-

                          हमें आत्मा विश्वास वढाने के प्रति सजग
होना होगा,इसके लिए इस बात का विश्वास करना होगा कि
मैं आत्मा हूं। मुझे कोई न तलवार से काट सकता है न वरछी से
भेद सकता,न आग जला सकती है और न हवा सुखा सकती है।मैं तो
सर्वशक्तिमान हू,सर्वज्ञ हूं। हमेशा इन आशाप्रद वाक्यों का उच्चारण करें।
ये न कहें कि हम दुर्वल हैं। हम क्या नहीं कर सकते हैं! हमसे सबकुछ हो
सकता है! हम सबके भीतर एक ही हिमालय आत्मा है। इसपर हमें विश्वास
करना होगा। उपनिषद में उल्लिखित कि मेरी इच्छा है कि तुम लोगों के भीतर
इसी श्रद्धा का अभिर्भाव हो,तुममे से हर व्यक्ति खडा होकर संकेत मात्र से संसार
को हिला देने वाला प्रतिभासम्पन्न महॉपुरुष हो,ईश्वरीत तुल्य हो।णैं तुम लोगों को
ऐसा देखना चाहता हूं । फिर देखना ऐसी ही शक्ति प्राप्त होगी।

8-स्वयं में शक्ति का संचार करें-

                              हमें इस बात को ध्यान में ऱखना होगा
कि,हमारे जीवन में उच्च आदर्श और उत्कृष्ठ व्यावहारिकता
का सुन्दर सामज्जस्य हो। जीवन का अर्थ प्रेम है,इसलिए प्रेम ही
जीवन है,यही जीवन का एकमात्र नियम है। और स्वार्थपरता मृत्यु के
समान है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि -प्रवल कर्मयोग-ह्दय में
अमित साहस,और अपरिमित शक्ति के संचार से सब लोग जाग उठेंगे, नहीं
तो जिस अन्धकार में हो,उसी में रहोगे ।

9-सेवा और त्याग की भावना रखे-

                            हमें ईश्वर ने जन्म दिया है,इसलिए
हमारा दायित्व है कि हम हर एक को ईस्वर के ही  समान
देखें। हम किसी की सहायता नहीं कर सकते हैं, हमें तो केवल
सेवा का अधिकार है। यदि आप भी भाग्यवान हैं तो   प्रभु की सेवा
करें,यदि किसी की सेवा कर सकते हो तो,तुम धन्य हो जाओगे ।अपने
ही को बहुत बडा न समझें। तुम धन्य हो कि तुम्हैं सेवा करने का अधिकार
मिला है और दूसरों को नहीं मिला। ईश्वर पूजा के भाव से सेवा करो। दरिद्र
व्यक्तियों में हमें भगवान को देखना होगा। अपनी ही मुक्ति के लिए उनके
निकट जाकर हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। अनेक दुखी और कंगाल प्रॉणी
हमारी मुक्ति के माध्य हैं ।

10-सर्वशक्तिमान बनो-

                      तुम्हें सर्वशक्तिमान बनना होगा,इसके
लिए अपने       अन्दर झॉककर देखो और महशूस करो कि-
क्या तुम मनुष्य जाति से प्रेम करते हो ?    क्या ये सब गरीव,
दुखी,दुर्वल ईश्वर नहीं हैं ? ईश्वर की पूजा पहले क्यों नहीं   करते ?
नदी के तट पर कुंवा खोदना क्यों जाते हो ? प्रेम की असाध्य शक्ति पर
विश्वास करो ! झूठ जगमगाहट वाले नाम-यश की परवाह कौन करते हो ?
क्या तुम्हारे पास प्रेम है ? तो फिर तुम सर्व शक्तिमान हो !क्या तुम सम्पूर्ण
निस्वार्थ हो ? यदि हो तो फिर तुम्हें कौन रोक सकता है ! चरित्र की  तो  सर्वत्र
विजय होती है। ईर्ष्या और अहं भाव को दूर कर दो !संगठित होकर दूसरों के लिए
कार्य करना सीखो! हमारे देश में तो सबसे बडी आवश्यकता यही तो है। धीरज रखो
और जीवनभर विश्वासपात्र बनो !आपस में लडो नहीं । स्वयं में ईमानदारी,भक्ति और
विश्वास का संचार करें तो कभी भी असफल न होंगें। भेदभाव मिटा दो। फिर-चाहे आप
रण में हों या वन में,चाहे पर्वत के शिखर पर -तुम्हारे लिए कोई भय नहीं रहेगा। जबतक
तुम यह न जान लो कि वह हितकर है,तबतक अपने मन का भेद न खोलो ।     शत्रु के प्रति
भी प्रिय और कल्याणकारी शव्दों का व्यवहार करो ।फिर देखोगे कि आप सर्वशक्तिमान होंगे ।

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