तत्व ज्ञान-14


1-संस्कार –
पूर्वजन्मों की प्रतिक्रिया जो पुनः उदय की सम्भावना के रूप में होती है,संस्कार कहते हैं।ये तीन तरह के दिखते हैं-एक तो जन्मजात होते हैं- पूर्वजन्मों के संस्कार जो वसीयत में मिल जाते हैं। दूसरा अर्जित संस्कार-इस जन्म में प्रत्यक्ष कर्मों द्वारा अर्जित होने वाले। तीसरा-आरोपित संस्कार- समाज,वातावरण,समुदाय,शिक्षा,शास्त्र या राष्ट के परिवेश द्वारा जो व्यक्ति पर आरोपित या थोपे गये होते हैं। इन संस्कारों में परिवर्तन हो सकता है। हमारे शास्त्रों में इनसे मुक्ति के लिए निर्विकल्प समाधि आवश्यक है,जिसमें इस चित्त पर उन संस्कारों को नष्ट करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर स्वयं में बुरे संस्कारों को नष्ट करने के लिए यदि उपाय अपनाना हो तो निर्विकल्प समाधि को अपनाकर प्रयास कर लेना चाहिए।

2-मन और मस्तिष्क-
अगर देखें तो मन सूक्ष्म है,मस्तिष्क स्थूल है। मन तो पंच घटकों से भी सूक्ष्म है, मस्तिष्क तो इनका संयोजन है। मन मस्तिष्क पर नियंत्रण रखता है,जबकि मस्तिष्क इन्द्रियों पर नियंत्रण रखता है। मन से मस्तिष्क का संचालन होता है,जबकि मस्तिष्क उसका यंत्र है। मन सचेतकर्ता होता है, मस्तिष्क तो एक विषय है। फिर यदि आगे देखें तो मृत्यु के बाद मन नष्ट नहीं होता है,जबकि मस्तिष्क नष्ट हो जाता है।

3-शरीर क्या है-
शरीर के निर्माण के सम्बन्ध में गूढ चिंतन के तथ्य है। अगर हम आध्यात्म के रूप में देखें तो हमारे वैदों में इस शरीर की रचना के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि-यह शरीर चौबीस मुख्य घटकों से बना होता है। मूल प्रकृति,बुद्धि,अहंकार और पॉच तन्मात्राएं ये आठ प्रकार की तो प्रकृति है तथा पॉच महॉभूत,पॉच ज्ञानेद्रियॉ,पॉच कर्मेंद्रियॉ और सोलहवॉ मन। इनमें पच्चीसवॉ तत्व आत्मा अर्थात पुरुष है।अगर इस शरीर के तीन प्रकार हैं- स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर। स्थूल शरीर के मुख्य घटकों में-पॉच भूत गिनाये गये हैं(पृथ्वी,जल,अग्नि,वायुआकाश)मन और मन तथा आत्मा इसके मुख्य घटक वताये गये हैं। सूक्ष्म शरीर पॉच भूतों का एक समुदाय है-जिसमें पॉच ज्ञानेद्रियॉ,पॉच कर्मेंद्रियॉ,पॉच प्रॉण,मन और बुद्धि इस सत्रह कलाओं का समुदाय है। कारण शरीर-इसमें स्थूल और सूक्ष्म शरीर का कारण (बीज रूप) है यही बीज विकसित होकर सूक्ष्म और स्थूल शरीर की रचना करता है।

4-इन्द्रियॉ क्या हैं-
इन्द्रियॉ मन का वाहन कहलाती हैं.इन्द्रियों के माध्ययम से ही मन कार्य करता है,तनमात्राओं को ग्रहण कर अपने को अभिव्यक्त भी करता है।इन इन्द्रियों का वास्तविक स्थान मन ही है, इन्द्रियॉ तो केवल द्वार हैं। ये इनद्रियॉ दस हैं-पॉच ज्ञानेद्रियॉ और पॉच कर्मेंद्रियॉ। ज्ञानेन्द्रियों में- कान,त्वचा,नेत्र,जिह्वा और नासिका। इन ज्ञानेनद्रियों का कार्य है- इस सृष्ठि की रचना के जो पॉच भूत- आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी जिनके कि पॉच गुंण है- शव्द,स्पर्श,रूप,रस,और गन्ध। तो इन्हीं गुणों के ज्ञान के लिए इन ज्ञानेंद्रियों का विकास हुआ है। जैसे शव्द ज्ञान के लिए कान,स्पर्श ज्ञान के लिए त्वचा,रूप ज्ञान के लिए नेत्र,रस के ज्ञान के लिए जिह्वा,तथा गन्ध के ज्ञान के लिए नासिका का विकास हुआ है। इनके विना तो सृष्टि का ज्ञान असम्भव है। इसी प्रकार कर्मेंन्द्रियों के कार्य को देखें तो- कर्मेंद्रियॉ पॉच है-वाक,हस्त,पॉव,गुदा और उपस्थ अर्थात लिंग। रजोगुणी शक्ति से इनका विकास होता है।और इन्हीं के माध्यम से मन सभी प्रकार के कर्म करता है।ज्ञानेद्रियों द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता है,उसे ये क्रियान्वित करते हैं। जैसे बोलने का कार्य वॉणी करती है,ग्रहण करने का कार्य हाथ करते हैं,चलने का कार्य पॉव करते हैं,मल विसर्जन का कार्य गुदा करती है। और आनन्द की अनुभूति भी इसी से होती है।

5-वृत्तियॉ क्या हैं-
हमारे चित्त में कुछ स्थाई भाव होते हैं,जिन्हैं वृत्तियॉ कहा जाता है। और इनका सम्बन्ध संस्कारों से होता है,जिनका कि बीज मन होता है,लेकिन इनका प्रकाश उपकेन्द्रों में होता है। ये वृत्तियॉ पचास बताई गई हैं-मूलाधार चक्र में-4 स्वाधिष्ठान चक्र में-6 मणिपुर चक्र में-10 अनाहत चक्र में-14 विशुद्धि चक्र में-16 तथा आज्ञा चक्र में-2 वृत्तियॉ होती हैं,जिन्हैं कि योग शास्त्र में कमलदल कहा जाता है।परा और अपरा वृत्तियॉ आज्ञा चक्र में रहती हैं।

6-शरीर के कोष-
इस शरीर में पॉच कोष बताये गये हैं,यह शरीर पॉच कोषों से बना है-अन्नमय,प्रॉणमय,मनोमय,विज्ञानमय,और आनन्दमय। इन कोषों के अलग-अलग कार्य हैं और ये सभी कोष मिलकर शरीर की गतिविधियों का संचालन करते हैं। यह मन में एक व्यष्टि परत है। अगर इनके कार्य को देखें तो-अन्नमय कोष एक स्थूल शरीर है जो अन्न के रसों से उत्पन्न होकर उसी अन्न से बढता है और उसी में समाप्त हो जाता है। दूसरा प्रॉणमय कोष-इसकी शक्ति से शरीर का संचालन होता है।यह पॉच कर्मेंद्रियों का संचालन करता है।यह प्रॉणशक्ति ही क्रियाशक्ति है। तीसरा-मनोमय कोष-जो सोचने,विचारने,चिंतन करने,योजना वनाने तथा निर्मॉण करने का कर्य करता है।यह पॉच ज्ञानेन्द्रियों का भी संचालन करता है जिनसे कि हमें विषयों का ज्ञान होता है।ज्ञानशक्ति का विकास भी होता है।यह मन भी आत्मा का एक उपकरण है जो आत्मशक्ति से कार्य करता है। चौथा-विज्ञानमय कोष-जो कि बुद्धि का कोष है।सही व गलत,उचित और अनुचित,का निर्मॉण करता है। और पॉचवॉ-आनन्दमय कोष-इस कोष के कारण मनुष्य को सुख और आनन्द की अनुभूति होती है।यह अति सूक्ष्म है और आत्मा के सबसे निकट है,जो प्रकृत्ति तत्वों से निर्मित है। यह तो प्रिय,मोद,प्रमोद वृत्ति वाला है। अगर देखें तो अन्नमय कोष को आसन और आहार से सबल बनाया जा सकता है।प्राणॉयाम से प्रॉणकोष सबल बनता है।प्रत्याहार से मनोमय और धारणॉ से विज्ञानमय, ध्यान से आनन्दमय कोष सबल बनाया जा सकता है।

7- चेतनाशक्ति-

अगर देखें तो चेतनशक्ति की चार अवस्थाएं हैं-जाग्रत,स्वप्न,सुषुप्ति,एवं तुरीय। इनमें जाग्रत अवस्था-जब स्थूल इन्द्रियॉ स्थूल विषयों का ज्ञान करती हैं तो इसे चेरन अवस्था कहते हैं।इस संसार का अनुभव इसी अवस्था में होता है। स्वप्नावस्था-जाग्रत अवस्था में जो कुछ देखा और सुना गया है ुसकी सूक्ष्म वासना से निद्राकाल में जो जगत दिखाई देता है,वही स्वपअनावस्था है।इसमें मन सक्रिय रहकर विभिन्न विषयों का अनुभव मात्र है। सुषुप्ति अवस्था –गहन निद्रा में जो सुख की अनुभूति होती है वही सुषुप्तावस्था है।इसमें जाग्रत अवस्था में ज्ञान इन्द्रियों के माध्यम से होता है। स्वप्नावस्था में यह ज्ञान मन से उसकी वासना वासनानुसार होता है जबकि सुषुप्तावस्था में मन भी सुप्त हो जाता है। जिसमें चेतन का ही अनुभव होता है। इसमें चेतना को अपने कारण शरीर का अभिमान रहता है।इसमें ज्ञान का कारण स्वयं आत्मा होती है।

8-तुरीय अवस्था क्या है-
यह ध्यान योग की अन्तिम अवस्था है, जिसमें कि आत्मा स्वयं प्रकाशित हो जाती है।इस अवस्था में आत्मा का ही अनुभव तथा आत्मा और ब्रह्म की एकता का बोध होता है।यही अद्वैत अवस्था कहलाती है। द्वैत भाव से अहंकार दिखता है जिसमें हम स्वयं को ईश्वर से भिन्न समझते हैं। और जब यह अहंकार गिर जाता है, तब अद्वैत की स्थिति बनती है। तो तुरीय स्थिति यही अद्वैत अवस्था होती है।

9-ईश्वर के दर्शन-
ईश्वर के दर्शन तो सविकल्प समाधि में होता है, निर्विकल्प समाधि में तो उसका रूप ही विलीन हो जाता है।अर्जुन को सविकल्प समाधि में ही विराट रूप का दर्शन हुआ था। अर्थात ईश्वर को क्रिया योग से प्राप्त किया जा सकता है।यह क्रिया योग पुरुषार्थ से सिद्ध होता है,लेकिन ब्रह्म की अनुभूति कर्म से नहीं अकर्म से होती है।ईश्वर का कार्य –माया रूप होने से अपने रजोगुंण रूप से जन्म देता है, जिसे-ब्रह्मां कहा जाता है। लेकिन तत्व रूप में वह पालन कर्ता है, जिसे विष्णु कहते हैं, और तमःप्रधान रूप में वह प्रलयकर्ता है,जिसे मगेश कहा जाता है। इसलिए ईश्वर जगत् की उत्पत्ति,स्थिति तथा प्रलय का कारण है। लेकिन कार्य तो प्रकृति का ही है।

10-जन्म-मृत्यु के तथ्य-
हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार मनुष्य को कोई भी ज्ञान और अनुभव प्राप्त होता है तो वह नष्ट नहीं होता है,बल्कि संस्कार के रूप में चित्त में विद्यमान रहता है,जो कि अगले नये जन्म में प्रेरणॉ का कार्य करता है। किसी व्यक्ति की किसी विशेष कार्य में रुचि इन्हीं संस्कारों के कारण होती है। जब हमारे सामने यह प्रश्न आता है कि क्या मनुष्य हर बार नए रूप में जन्म ले्ता है ? इस सम्बन्ध में हमारे शास्त्र कहते हैं कि वह पुराने रूप का नयॉ संस्करण है,जो अपने पूर्व जन्मों की सभी इच्छाओं,वासनाओं,आशाओं,आकॉक्षाओं आदि को लेकर जन्म लेता है,केवल शरीर नयॉ होता है। और यदि प्रश्न उठता है कि क्या मृत्यु पर विजय पाना सम्भव है? तो यही उल्लेख है कि-मृत्यु केवल शरीर की होती है,चेतन आत्मा की नहीं। जो निर्मित है वह नष्ट तो होगा ही इसलिए शरीर की कोई मृत्यु नहीं होती। वह तो फिर निर्मित हो जायेगा। जब प्रश्न होता है कि-मृत्यु के बाद क्या होता है? तो उत्तर होगा-मृत्यु के बाद भौतिक शरीर तो नष्ट हो जाता है,लेकिन मन अपने संस्कारों के साथ जीवित रहकर विस्तृत आकाश में विद्यमान रहता है और उपयुक्त नईं देह की प्रतीक्षा करता है।लेकिन आध्यात्मिक मृत्यु में संस्कार शेष नहीं रहते, इसलिए वह समष्टि मन में समाहित हो जाता है।मन की रजोगुणी शक्ति ही उसे नईं देह धारण करने को बाध्य करती है।

11-सच्चिदानन्द क्या है?-
सद्, चित, आनन्द। ईश्वर सत् है, जो सदा से है, वह सदा रहेगा। उसका रूप परिवर्तन नहीं होता। सदा एक ही रूप में रहता है।साथ ही वह चैतन्यस्वरूप और आनंदस्वरूप भी है । इसलिए उसे सच्चिदानन्द कहा गया है। यदि सच्चिदानन्द सत् है तो फिर असत् क्या है? यह सम्पूर्ण प्रकृति असत् है जिसका कि रूप निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। यह सम्पूर्ण जगत प्रकृति निर्मित होने के कारण असत् ही है।शंकराचार्य ने इस जगत को मिथ्या कहा है-इसलिए कि यह है तो असत्, लेकिन सत् जैसा भासित होता है। इसलिए इसे मिथ्या कहा गया है। अज्ञानता के काऱण हम असत् को सत् मान लेते हैं। हम उस समय ईश्वरीय चेतना का अनुभव करते हैं जब हम मौन स्थिति में होते हैं।मन का चिन्तन समाप्त होने पर ईश्वर का अनुभव होता है.

12-प्रॉणशक्ति का संचय-
पंच घटकों पर दबाव पडने से अन्तर्गामी और बहिर्गामी शक्तियॉ प्रकट होती है।इन्हीं शक्तियों को प्राण कहते हैं। अन्तर्गामी शक्ति से प्रॉण का सृजन होता है और बहिर्गामी शक्ति के प्रबल होने पर जड-स्फोट होता है जिसमें पदार्थ छिन्न-भिन्न होकर अपने से सम्बन्धित घटकों में लीन हो जाता है,यह स्फोट तत्कालिक और क्रमिक होता है।

13-प्रलय की संकल्पना- किसी विशेष ग्रह या उपग्रह में यह हो सकता है।जड स्फोट से किस,भी ग्रह उपग्रह का ताप किसी अन्य ग्रह या उपग्रह या जीवन्त वस्तु में संचालित हो सकता है।यदि सूर्य का ताप नष्ट हो जाय तो उस सौरमण्डल में प्रलय सम्भव है।चूकि हर पिंड में ऊर्जा की मात्रा भिन्न होती है जिनका क्षरण भिन्न-भिन्न अवधि में होता है,और एक के क्षरण से दूसरे को ऊर्जा मिलती है,इसलिए निर्मॉण और विध्वंश की क्रिया निरन्तर जारी रहती है,लेकिन एक साथ सम्पूर्ण ब्रह्मॉड में प्रलय सम्भव नहीं है।

14- प्रॉण वायु-
प्रॉणवायु दो प्रकार की होती है वाह्य और आंतरिक। वाह्य प्रॉण वायु को पॉच भागों में बॉटा गया है-नाग,कूर्म,कृंकर,देवदत्त,और धनंजय। 1-नाग वायु का कार्य विस्तार करना है।2- कूर्म वायु का कार्य-संकोच करना।3- कृंकर वायु का कार्य जम्हाई लेना।4- देवदत्त वायु का कार्य भूख और प्यास लगाना।5-और धनंजय वायु का कार्य है-निद्रा लाना और ऊंघना। आन्तरिक प्रॉण वायु पॉच प्रकार की मानी गई है-उदान,प्रॉण,समान,अपान,और व्यान।-1-उदान वायु कण्ठ में,जिसका कार्य वॉणीं है।2-प्राण वायु कण्ठ व नाभि के मध्य में,कार्य स्वॉस लेना व छोडना है। 3-अपान वायु-नाभि केन्द्र में जिसका कार्य मलमूत्र विसर्जन करना।4-समान वायु-नाभि केन्द्र में,जिसका कार्य प्रॉण और अपान के मध्य सन्तुलन रखना है।5-व्यानु वायु-सम्पूर्ण देह में व्याप्त,जिसका कार्य रक्त संचालन करना है।

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