अच्छाई और बुराई एक कसौटी है


 

1-दुनियॉ में अच्छा क्या है बुरा क्या है-

              दुनियॉ में क्या
अच्छा है और क्या बुरा है
यह आप पर नहीं समाज पर
निर्भर करता है।अच्छी बातें नहीं
बल्कि अच्छे काम करो। दुनियॉ में
तो अच्छाई और बुराई दोनों हैं,बस यही
तुम्हारी कसौटी है,जो बाहर से बुरा दिखता
है वह तो भीतर सेअच्छा हो सकता है,बाहर
की अच्छाई तो नफरत का पात्र है।

2-दूसरों पर प्रभाव डालने वाले उदास रहते हैं—-

                जो लोग दूसरों पर
अपना प्रभाव डालना चाहते हैं,
यह देखा गया है वे लोगअधिक
उदास रहते हैं। वे चेतनया अचेतन
में दूसरों पर प्रभाव डालने पर उनके
हाथ केवल उदासी ही लगती है।प्लास्टिक
के फूलों से मनमोहक खुसबू नहीं आ सकती
है।जब वह दूसरों के साथ रौब से व्यवहार करता
है तो वह उन लोगों की मिठास का आनंद नहीं ले
सकता है।अधिक से अधिक वह एक सामाजिक तितली
के समान बनकर रह जाता है ।

3–अपने प्रति वफादार रहो-

                    सैक्सपियर ने कहा
था कि अपने प्रति वफादार बनो।
ईश्वर उसी की रक्षा करता जो स्वयं
अपनी रक्षा करता है।जब कोई परमात्मा
के प्रति निष्ठावान होता है तब उसके अन्दर
के सद्गुंण चमनने लगते हैं।सत् ही पवित्र है,
और उसकी पवित्रता ही सबसे बडी शक्ति है।
वह एक गुरुत्वाकर्षण है जो लोगों को अपनी
ओर आकर्षित करती है।यह वही बल है जो
समान गुंणयुक्त कल्यांणकारी और ईमानदार
व्यक्तियों को आकर्षित करता है ।संसार मं
ईमानदारी से व्यवहार करने से आनंद और
संतोष प्राप्त होता है ।

4–आत्मज्ञानी कलाकार की परख-

                  यदि एक कलाकार
आत्मज्ञानी है तो उसकी कला
में,परमात्मा के प्रेम की सर्वव्यापी
शक्ति,परावर्तित होती है,और अज्ञात
चेतना का सूत्रपात होता है।परमात्मा का
आशीर्वा उतर आता है,ऐसी अनुपम कृति
एक यादगार बन जाती है। एक अनोखी
कलाकृति आनंद की वस्तु और हमेशा
के लिए सौन्दर्य का प्रतीक हो जाती है।
वह हमेशा के लिए प्रेरणॉ और चैतन्य
का स्रोत बन जाती है,जैसे माइकिल
ऐंजिलो की चित्रकारी,या मोजार्ट का
संगीत ऐसी कला मनुष्य की आत्मा में
हल-चल पैदा कर देती है,और विकास की
सीढियॉ ऊपर उठने लगती हैं ।।

5-भव सागर में बाधा होने से मति भ्रम हो जाता है-

                   कभी-कभी हम मतिभ्रम
और कल्पना की उडानें,दोनों से ग्रसित
हो जाते हैं,इसका कारण भव सागर में
खलबली मचने से होता है।भव सागर में
जो बाधा बनती है उससे एक ऐसा भ्रम
का परदा पडता है कि,सत्य को ढक लेता
है। और जब-तक गुरु के द्वारा भव सागर
की सफाई नहीं होती,तब तक साधक भ्रम
के समुद्र में डूबा रहता है ।भव सागर हमारे
गुरु का परिचायक है ।जब यह जाग जाता है
तब हम गुरु बन जाते हैं, अर्थात जिससे हम
दैवी शक्ति से गुरुत्व का अधिकार प्राप्त करते हैं,
जिसमें वह प्रकट होती है और हम दूसरों की कुंण्डलिनी
जागृत कर सकते हैं ।

6-मनुष्य के शरीर में आत्मा की पहचान-

                मनुष्य जो कुछ भी
दूसरों में देखता है,उसकी वह
केवल अपनी ही परछाई है।लेकिन
जब वह आत्मवत् हो जाता है, तब
वह अपना सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा
से रखता हैं और उसी से बात करता है।
ऐसे वार्तालाप में बडी गहराई होती है,जिससे
मनुष्य को पूर्ण सन्तोष,और अमर-प्रेम का
आनंद देती है ।मनुष्य के शरीर में आत्मा
की पहचान करने का ज्ञान। प्राचीन संस्कृति
में दबा पडा है।विवाह एक आत्मीय मिलाप है
क्योंकि आत्मा जाने विना विवाह केवल एक
सामाजिक रीति का ठेका बनकर रह जाता है ।

 

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