भगवान की देन


1-भगवान आपको देना चाहता है –

    यदि आपके ऊपर भगवान की कृपा होती है और भगवान
आपको कुछ देना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको सद्बुद्धि
देंगे,इससे आपको सबकुछ मिल जायेगा। यदि भगवान आप
पर नाराज होते हैं और आपको दण्ड देना चाहते हैं या आपसे
कुछ छीनना चाहते हैं तो आपकी बुद्धि हर लेंगे जिससे आपका
पतन हो जाय। इसलिए ध्यान रहे भगवान को कभी भी नाराज
न करें ।

2-दूसरों पर प्रभाव डालने वाले उदास रहते हैं-

        जो लोग दूसरों पर अपना प्रभाव डालना
चाहते हैं,यह देखा गया है वे लोग अधिक उदास
रहते हैं।वे चेतन या अचेतन में दूसरों पर प्रभाव डालने
पर उनके हाथ केवल उदासी ही लगती है ।प्लास्टिक के फूलों
से मनमोहक खुसबू नहीं आ सकती है ।जब वह दूसरों के साथ
रौब से व्यवहार करता है तो वह उन लोगों की मिठास का आनंद
नहीं ले सकता है ।अधिक से अधिक वह एक सामाजिक तितली के
समान बनकर रह जाता है ।

3-अपने प्रति वफादार रहो-

     सैक्सपियर ने कहा था कि अपने प्रति वफादार बनो।
ईश्वर उसी की रक्षा करता जो स्वयं अपनी रक्षा करता है ।
जब कोई परमात्मा के प्रति निष्ठावान होता है तब उसके अन्दर
के सद्गुंण चमनने लगते हैं ।सत् ही पवित्र है,और उसकी पवित्रता ही
सबसे बडी शक्ति है ।वह एक गुरुत्वाकर्षण है जो लोगों को अपनी ओर
आकर्षित करती है ।यह वही बल है जो समान गुंणयुक्त कल्यांणकारी और
ईमानदार व्यक्तियों को आकर्षित करता है ।संसार में ईमानदारी से व्यवहार
करने से आनंद और संतोष प्राप्त होता है ।

4-आत्मज्ञानी कलाकार की परख-

          यदि एक कलाकार आत्मज्ञानी है तो उसकी कला
में,परमात्मा के प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति,परावर्तित होती है,
और अज्ञात चेतना का सूत्रपात होता है ।परमात्मा का आशीर्वाद
उतर आता है,ऐसी अनुपम कृति एक यादगार बन जाती है ।एक
अनोखी कलाकृति आनंद की वस्तु और हमेशा के लिए सौन्दर्य का
प्रतीक हो जाती है ।वह हमेशा के लिए प्रेरणॉ और चैतन्य का स्रोत बन
है,जैसे माइकिल ऐंजिलो की चित्रकारी,या मोजार्ट का संगीत ऐसी कला मनुष्य
की आत्मा में हल-चल पैदा कर देती है,और विकास की सीढियॉ ऊपर उठने
लगती हैं ।।

5-भव सागर में बाधा होने से मति भ्रम हो जाता है-

      कभी-कभी हम मतिभ्रम और कल्पना की उडानें,
दोनों से ग्रसित हो जाते हैं,इसका कारण भव सागर में
खलबली मचने से होता है ।भव सागर में जो बाधा बनती है
उससे एक ऐसा भ्रम का परदा पडता है कि,सत्य को ढक लेता है।
और जब-तक गुरु के द्वारा भव सागर की सफाई नहीं होती,तब तक
साधक भ्रम के समुद्र में डूबा रहता है ।भव सागर हमारे गुरु का परिचायक
है ।जब यह जाग जाता है तब हम गुरु बन जाते हैं ,अर्थात जिससे हम दैवी
शक्ति से गुरुत्व का अधिकार प्राप्त करते हैं,जिसमें वह प्रकट होती है और हम
दूसरों की कुंण्डलिनी जागृत कर सकते हैं ।

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