भिखारियों की तरह न भटकें


 

1- भिखारियों की तरह न भटकें-

                 आज का जीवन
भिखारियों की तरह भटकने
का जैसा बन गया है।अपनी
आस्था को स्थिर रखें,जीवन
में श्रद्धा को स्थान दें,अपनी
निष्ठा को मजबूत करें।भिखा-
रियों की तरह मत भटकिये।
भिखारी तो सदा भिखारी ही
रहता है वह कभी बादशाह नहीं
बन सकता।उसकी मनोवृति तो
भिखारी की ही बनी रहती है।
भटकने वालों के हाथ कभी
कुछ नहीं लग सकता।वे कभी
शॉति को प्राप्त नहीं कर सकते।
भिखारियों के हाथ कभी खजाने नहीं
लगते।वे कभी सच्ची सम्पदा को प्राप्त
नहीं कर सकते, वे दैवीय सम्पदा के अधिकारी
नहीं हो पाते।बस उसके हाथ तो केवल आसुरी सम्पदा
ही लगती है।और हम तो एक पवित्र आत्मा हैं,सबकुछ
हमारे पास है,उसे पहचानें,भटकने की आवश्यकता नहीं
होगी ।

2-मनुष्य के शरीर में आत्मा की पहचान-

                  मनुष्य जो कुछ
भी दूसरों में देखता है,उसकी
वह केवल अपनी ही परछाई है।
लेकिन जब वह आत्मवत् हो जाता
है,तब वह अपना सम्बन्ध मनुष्य
की आत्मा से रखता हैं और उसी
से बात करता है ।ऐसे वार्तालाप
में बडी गहराई होती है,जिससे
मनुष्य को पूर्ण सन्तोष,और
अमर-प्रेम का आनंद देती है।
मनुष्य के शरीर में आत्मा की
पहचान करने का ज्ञान। प्राचीन
संस्कृति में दबा पडा है।विवाह एक
आत्मीय मिलाप है क्योंकि आत्मा जाने
विना विवाह केवल एक सामाजिक रीति
का ठेका बनकर रह जाता है ।

3-सहज योग में ध्यान धारण कैसे क्रियान्वित होता है?

               सहजयोग-
(सह+ज=हमारे साथ
जन्मा हुआ)जिसमें हमारी
आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्ड-
लिनीजागृत होती है,कुण्डलिनी तथा
सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,
जो कि हमारे अन्दर जन्मसे ही विद्य-
मान हैं।ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक,
भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को निय-
न्त्रित करते हैं । इन सभी चक्रों में अपनी-
अपनी विशेषताहोती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं।
कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता
को योग कहते हैं।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण
तथा अपने अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार
(Self Realization)कहते हैं ।आत्म साक्षात्कार
के बाद परिवर्तन स्वतः आ जाता है।वर्तमान तनावपूर्ण
तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना
सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय
जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायमकरने में सक्षम होते हैं ।

4-विद्यार्थियों को ध्यान धारण से लाभ-

1-शॉत एवं एकाग्र चित्त –

(Silent and Concentrated Attention)
(स्वाधिष्ठा चक्र से)

2-स्मरण शक्ति तथा सृजनशीलता में वृद्धि-
(Increased Memory and Creativity)
(स्वाधिष्ठान तथा मूलाधार चक्र द्वारा )

3-बडों के प्रति आदर तथा सम्मान-
(Respect towards Elders)
(स्वतः जागृति, नाभि चक्र द्वारा)

4-स्व अनुशासन,परिपक्व और
जिम्मेदारी पूर्ण आचरण –
(Self Discipline)
(आज्ञा चक्र द्वारा)

5-आई क्यू के स्तर में वृद्धि-
(Increased IQ, )
(सहस्रार चक्र द्वारा)

6-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोंण-
(Positive Attitude)
( बॉयॉ पक्ष, इडा नाडी)

7-आत्म विश्वास में वृद्धि-
(Self Confidence) (ह्दय चक्र)

5-शिक्षकों तथा जन सामान्य को लाभः-

1- सबके प्रति प्रेम एवं करुंणॉमय आचरण
(उदार ह्दयचक्र के कारण प्रेम एवं
आनंद का भाव)

2-सहन शीलता और धैर्य में वृद्धि
(प्रकाशित आज्ञाचक्र – क्षमा शक्ति का उदय)

3-अध्यापकों में विद्यार्थियों के उत्थान के लिए
रुचि रखना (सबके प्रति संतुलित एवं समान व्यवहार)

 

6-हमारे शरीर में कुण्डलिनी महॉनतम् शक्ति है

        जिसने कुण्डलिनी
का उत्थान कर दिया उस
साधक का शरीर तेजोमय हो
उठता है।इसके कारण शरीर के
दोष एवं अवॉच्छित चर्वी समाप्त
हो जाती है।अचानक साधक का शरीर
अत्यन्त संतुलित एवं आकर्षक दिखाई
देने लगता है।आंखें चमकदार और पुतलियॉ
तेजोमय दिखाई देती हैं। संत ज्ञानेश्वर जी ने
कहा है कि सुषुम्ना में उठती हुई कुण्डलिनी
द्वारा बाहर छिडका गया जल अमृत का
रूप धारण करके उस प्राणवायु की रक्षा
करताहै जो “उठती हैं,अन्दर तथा बाहर
शीतलता का अनुभव प्रदान करती है” ।।

7-निर्विचारिता का आनन्द-

                     जब आप निर्विचारिता
में होते हैं तो आप परमात्मा की श्रृष्ठि
का पूरा आनंद लेने लगते हैं,बीच में कोई
वाधा नहीं रहती है ।विचार आना हमारे और
सृजनकर्ता के बीच की बाधा है।हर काम करते
वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं,और निर्विचार
होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण
ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने
लगता ङै ।।

 

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