मनुष्य ईश्वर के प्रति भ्रमित है


                      प्रसिद्ध दार्शनिक
रूशो के साहित्य को पढने में आनन्द
आता है, क्योंकि उनका दर्शन वैज्ञानिक
तथ्यों पर पर आधारित होता है,लेख में
उनके द्वारा लिखा गया था कि ईश्वर के
सम्बन्ध में मनुष्य भ्रमित होता जा रहा है
जीवन में एक अनुभव हर एक को होता है कि
जैसे कोई जन्म से ही बीमार पैदा हो तो उसे
स्वास्थ्य का कभी कोई पता नहीं चलता। जैसे
कोई जन्म से ही अंधा पैदा हो, तो जगत में
कहीं प्रकाश भी है, इसका उसे कोई पता नहीं
चलता। ऐसे ही हम एक अदभुत अनुभव से
जन्म के साथ ही जैसे वंचित हो गए हैं।
धीरे-धीरे मनुष्य-जाति को यह खयाल भी
भूलता गया है कि वैसा कोई अनुभव है भी।
उस अनुभव को इंगित करने वाले सब शब्द
झूठे और थोथे मालूम पड़ने लगे हैं। ईश्वर शब्द
थोथा दिखाई देने लगा है,मनुष्य के जीवन से सारा
संबंध जैसे परमात्मा का समाप्त हो गया!
               इस दुर्भाग्य के कारण
मनुष्य किस भांति जी रहा है, किस
चिंता में, दुख में, पीड़ा में, परेशानी में,
उसका भी हमें कोई अनुभव नहीं हो रहा है।
और जब भी यह बात उठती है कि ईश्वर से
मनुष्य का संबंध क्यों टूट गया है? पशु-पक्षी
ही ज्यादा आनंदित मालूम होते हैं। पौधों पर
खिलने वाले फूल भी आदमी की आंखों से
ज्यादा प्रफुल्लित मालूम होते हैं। आकाश
में उगे हुए चांद तारे भी, समुद्र की लहरें
भी, हवाओं के झोंके भी आदमी से ज्यादा
आनंदि्त मालूम होते हैं।
             आदमी को क्या हो
गया है? अकेला आदमी भर इस
जगत में रुग्ण, बीमार मालूम पड़ता
है। लेकिन अगर हम पूछें कि ऐसा क्यों
हो गया है? ईश्वर से संबंध क्यों टूट गया
है? तो जिन्हें हम धार्मिक कहते हैं, वे कहेंगे-
नास्तिकों के कारण, वैज्ञानिकों के कारण,भौतिकवाद
के कारण, पश्चिम की शिक्षा के कारण ईश्वर से
मनुष्य का संबंध टूट गया है। ये बातें एकदम ही
झूठीहैं।किसी नास्तिक की कोई सामर्थ्य नहीं कि
मनुष्य का संबंध परमात्मा से तोड़ सके। यह
वैसा ही है-और किसी भौतिकवादी की यह
सामर्थ्य नहीं कि मनुष्य के जीवन से
अध्यात्म को अलग कर दे। किसी
पश्चिम की कोई शक्ति नहीं कि
उस दीये को बुझा सके, जिसे हम
धर्म कहते हैं। यह वैसा ही है जैसे
मेरे घर में अंधेरा हो और आप मुझसे
पूछें आकर कि दीये का क्या हुआ?

       मैं कहता हूं, दीया
तो मैंने जलाया, लेकिन
अंधेरा आ गया और उसने
दीये को बुझा दिया! तो आप
हंसेंगे और कहेंगे, अंधेरे की क्या
शक्ति है कि प्रकाश को बुझा दे!
अंधेरे ने आज तक कभी किसी प्रकाश
को नहीं बुझाया। मिट्टी के एक छोटे से
दीये में भी उतनी ताकत है कि सारे जगत
का अंधकार मिलकर भी उसे नहीं बुझा सकता।

क्या अंधेरे की ताकत उजाले की  ताकत से अधिक है

       हां, दीया बुझ जाता
है तो अंधेरा जरूर आ जाता
है। अंधेरे के आने से दीया नहीं
बुझता; दीया बुझ जाता है,तो अंधेरा
आ जाता है। नास्तिकता के कारण धर्म
का दीया नहीं बुझाया बल्कि धर्म का दीया
बुझ गया इसलिए नास्तिकता आ गई है।
भौतिकवाद के कारण अध्यात्म नहीं बुझ
गया है; अध्यात्म बुझा है, इसलिए
भौतिकवाद है। फिर किसके कारण?
क्योंकि जब कोई यह कहता है कि
नास्तिकता, भौतिकवाद ये धर्म को
मिटा रहे हैं, वह तो पता नहीं है उसे
कि वह धर्म को कमजोर और नास्तिकता
को मजबूत कह रहा है।

            उसे पता नहीं कि
वह धर्म के पक्ष में नहीं बोल
रहा है; वह धर्म के विपक्ष में बोल
रहा है। वह यह स्वीकार कर रहा है
कि अंधेरे की ताकत ज्यादा बड़ी हैं,
उजाले की ताकतों से। और अगर
अंधेरे की ताकत बड़ी है और
प्रकाश को बुझा सकती है, तो
स्मरण रखना, फिर प्रकाश के जलने
की दुनिया में कभी कोई संभावना नहीं
है। क्योंकि अंधेरा हमेशा बुझा देगा; आप
जलाइए और अंधेरा बुझा देगा।

          अगर नास्तिकता धर्म
को मिटा सकती है, तो धर्म के
जन्म की अब कोई संभावना नहीं है।

आइने का एक सच

            एक पागल आदमी
था। वह अपने को बहुत ही सुंदर
समझता था। जैसा कि सभी पागल
समझते हैं, वैसा वह समझता था कि
पृथ्वी पर उस जैसा सुंदर और कोई भी
नहीं है। यही पागलपन के लक्षण हैं। लेकिन
वह आईने के सामने जाने से डरता था। और
जब कभी कोई उसके सामने आईना ले आता
तो तत्क्षण आईने को फोड़ देता था।

          लोग पूछते, क्यों?
तो वह कहता कि मैं इतना
सुंदर हूं और आईना कुछ
ऐसी गड़बड़ करता है कि
आईना मुझे कुरूप बना देता
है! आईना मुझे कुरूप बनाने की
कोशिश करता है! मैं किसी आईने
को बरदाश्त नहीं करूंगा, मैं सब आईने
तोड़ दूंगा! मैं सुंदर हूं, और आईने मुझे
कुरूप करते हैं! वह कभी आईने में न
देखता। लोग आईना ले आते तो
तत्क्षण तोड़ देता!
                 मनुष्य भी उस
पागल की तरह व्यवहार करता
रहा है। नहीं सोचता कि आईना
वही दिखाता है? जो मेरी तस्वीर है।
आईना वही बताता है? जो मैं हूं।

             आईने का कोई
प्रयोजन भी नहीं कि मुझे
कुरूप करे। आईने को कोई
मेरा पता भी नहीं। मैं जैसा
हूं, आईना वैसा बता देता है।
लेकिन बजाय यह देखने के कि
मैं कुरूप हूं, आईने को तोड़ने में
लग जाता हूं!

            संसार को छोड़कर
भाग जाने वाले लोग आईने
को तोड़ने वाले लोग हैं। अगर
संसार दुखद मालूम पड़ता है? तो
स्मरण रखना कि संसार एक दर्पण
से ज्यादा नहीं। वही दिखायी पड़ता है?
जो हम हैं।

जीवन को नष्ट करते लोग
         वास्तविोकता यह है
कि जीवन सदा से अस्वीकृत
रहा है! जीवन की श्रद्धा और सम्मान
के लिए न तो कभी कोई पुकार दी है? न
कभी कोई आह्वान किया गया है। जीवन को
छोड़ देने, जीवन से पलायन करने, जीवन
को तोड़ देने और नष्ट कर देने की
बहुत-बहुत चेष्टाएं जरूर की गयी हैं।

              या तो वे लोग पृथ्वी
पर प्रभावी रहे हैं, जिन्होंने दूसरों
के जीवन को नष्ट करने की कोशिश
की –राजनीतिज्ञ, सेनापति, युद्धखोर।
या वे लोग जो दूसरों का जीवन नष्ट करने
में नहीं लगे हैं, तो वे दूसरी प्रक्रिया में लग
गये हैं, वे अपने ही जीवन को नष्ट करने
का प्रयास करते रहे हैं–तथाकथित धार्मिक,
तथाकथित साधु-संन्यासी।
             दो प्रकार की हिंसा
चलती रही है। या तो दूसरे का
जीवन नष्ट करो या अपना जीवन
नष्ट करो। या तो दूसरों को समाप्त
करो या स्वयं को समाप्करो। जीवन की
दोनों ही अर्थों में हत्या होती रही है।

              जीवन का परिपूर्ण
सम्मान आज तक भी मनुष्य
के मन में प्रतिष्ठित नहीं हो पाया।
स्वभावतः जब मैं कहूं कि जीवन ही
देवता है? जीवन ही प्रभु है तो अनेक
प्रश्न उठ आने स्वाभाविक हैं। जीवन
जंजीर नहीं है और जीवन से भिन्न
कोई मोक्ष नहीं है।

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