शरीर में प्राणवायु की पहचान कैसे करें


 

             प्राणवायु से ही हमारा
शरीर स्वस्थ रहता है, लेकिन
मनुष्य जब बीमार पड़ जाता है,
तब प्राणवायु का प्रवाह शरीर में
कम होने लगता है। इस कारण
शरीर कमजोर हो जाता है, उत्साह
में कमी आ जाती है, थकान महसूस
होने लगती है, आलस्य बढ़ जाता है,
जीवन से मोह कम हो जाता है और कुछ
भी अच्छा नहीं लगता।

              दूसरी ओर शरीर में
अगर प्राणवायु की विपुलता
है तो चेहरा लावण्यपूर्ण हो जाता
है, मन प्रसन्न रहता है, उत्साह बना
रहता है। किसी भी काम को करने में
मन लगता है। वह गीत गाता है, किसी
से प्रेम करता है, मुस्कराता है, खेलता है
और नाचने लगता है। इसका अर्थ है, उसके
शरीर में प्राणवायु का निरंतर प्रवाह चल रहा
है। इसी से प्राणवायु की पहचान होती है।

            अब विज्ञान के आईने
में इस प्राणवायु या प्राणशक्ति
के संबंध में चर्चा की जाए। पहली
बात तो यह है कि विज्ञान के पास
प्राण को पहचानने का कोई यंत्र नहीं
है। विज्ञान केवल पदार्थ का अध्ययन
करता है। पदार्थ के अतिरिक्त वह कहीं
झांक भी नहीं सकता। इसलिए विज्ञान के
शिखर पुरुष आइंस्टीन को कहना पड़ा था
कि धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान
के बिना धर्म अंधा है, लेकिन मेरा मानना है कि
विज्ञान जब धर्म को समझने में पूरी तरह असमर्थ
है तो उसके बिना धर्म लंगड़ा कैसे हो सकता है।
विज्ञान तो संभावना में जी रहा है। वह जो आज
कह रहा है, कल उसकी बात कट जाएगी।

              मशहूर विचारक
ऑसपेन्सकी कहते हैं कि
साधारण गणित के अनुसार दो
और दो चार होता है। चार में से अगर
चार घटा दिया जाए, तो शून्य बचता है,
लेकिन एक महागणित भी होता है जिसमें
पूर्ण से पूर्ण को घटा दिया जाए, तब भी पूर्ण
ही बचता है। यह गणित विज्ञान को समझ में
नहीं आता। प्राण को अगर समझना हो तो के-
वल अध्यात्म से ही समझा जा सकता है, क्योंकि
उसके पास अनुभव है। विज्ञान के आंकड़ों से प्राण
को नहीं समझा जा सकता। यह केवल अनुभव से
समझा जा सकता है। सच पूछा जाए तो प्राण ऊर्जा
को समझने की शक्ति विज्ञान में नहीं है। इसलिए जो
प्राण को समझना चाहते हैं, उन्हें इसका उत्तर अध्यात्म
से ही मिलेगा। प्राण ब्रह्मंाड का स्पंदन है। यह ब्रह्मांड
ग्रहों व नक्षत्रों के माध्यम से सांस लेता है और मनुष्य भी
अपनी सांसों के माध्यम से इस ब्रह्मंाड से जुड़ा है। प्राण के
कारण ही जीव को प्राणी कहा जाता है।

 

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