आध्यात्मिक जीवन का सार-15


1-आंनंद की खोज-

    सारी खोज के पीछे आनंद की प्यास हमें घसीटे चली जा रही है,
किसी अज्ञात की ओर,सारी खोजों में ढूंडते-ढूंडते जब हम हार जाते हैं
और कुछ नहीं मिलता है तो हम धर्म की ओर मुडते हैं तब भी उसे बाहर
ही खोजते हैं।कारण यह कि जो हम स्वयं हैं, उसे खोजते हैं ।अपने से हम भागते
हैं,हर समय अपने से भागते हैं,इसलिए कि अपने से परिचित नहीं हैं,अपने सौदर्य से,
अपने वैभव से,अपने ज्ञान से और अपने प्रेम से अपरिचित हैं और आनंद की खोज में बाहर
की ओर दौडते हैं लेकिन आनंद तो बाहर नहीं है,यह तो अंदर है,आप में है,आप तो स्वयं आनंद
स्वरूप हैं ।।

2-नास्तिक और आस्थावान के विचार-

      हमारा प्रश्न है कि ईश्वर क्या है?नास्तिक कहते हैं कि ईश्वर नहीं है,
लेकिन आस्थावान दृढता से कहते हैं कि ईश्वर है,भले ही उसने देखा नहीं है।
इनमें कौन सच है, मुख्य बात तो यह है कि नास्तिक किस आधार पर कहता है
कि परमात्मा नहीं है,किस आधार पर अपनी मान्यता को सिद्ध कर रहे हैं ।क्या कभी
उसने ध्यान,चिंतन,औरमनन किया है ?कितने वर्ष तक उसने अपनी अन्तरात्मा कीखोज
की ?और खोज में साधना की है?जिसके आधार पर वे ऐसा कहते हैं ।और दूसरी ओर जो
लोग परमात्मा में विश्वास रखते हैं वे तो अपने भीतर मन और बुद्धि से परे अवचेतन से कुछ
महसूस करते हैं कि इसके पीछे कोई सिद्धॉत है जो जो ब्रह्मॉण्ड के कार्यों को सुचारु रूप से चलाता है।
जीवित या चेतन शक्ति जो ब्रह्मॉण्ड चला रही है परमात्मा है ।।

3-महान चेतना हमारी उत्पत्ति से पहले मौजूद थी-

     हमें विनम्रता पूर्वक स्वीकार करना चाहिए कि ऐसी महान चेतना हमारी
उत्पत्ति से पहले से  मौजूद थी । हम तो उसके बारे में जान सकते हैं जो हमारे
बाद उत्पन्न हुई,उन घटनाओं के बारे में हम नहीं जान सकते जो हमारे पैदा होने से
युगों पहले घटित हुई थी।फिर भी हम उपलब्ध ज्ञान के द्वारा अनुमान लगा सकते हैं,किसी
नतीजे पर नहीं पहुंच सकते हैं क्योंकि खोजों के आधार पर देखा गया है कि लोग अलग-अलग
निष्कर्षों पर जहुचे ।और सच क्या है फिर इसपर विवाद शुरू होने लगा । इस आधार पर निश्चित
आकृति देना सम्भव नहीं है कि हम उसे कोई नाम दें,बस उसे हम परम चेतना का सिद्धान्त या सर्व-
शक्तिमान कह सकते है ।परम चेतना का सिद्धान्त ही सबकी उत्पत्ति का सिद्धान्त है,यही जीवन का
सूत्र है।उस महान चेतना का गुण बल,शक्ति,या ताकत है,जो अपनी तेजस्विता में अपनी इच्छा तथा
अपने कार्यों के नुसार बढती-घटती रहती है ।

4-मनुष्य की झूठी धारणॉ-

     जो मनुष्य कोई कार्य करता है तो वह अज्ञानता में यह सोचता है कि सारा
कार्य वह स्वयं कर रहा है,परन्तु वह केवल निर्जीव कार्य ही कर सकता है।केवल
प्रकृति ही सजीव कार्य कर सकती है।यह धारणॉ मनुष्य की झूठी है कि वह सब करता
है इससे उसका ईगो(अहंकार) मजबूत होता है,उसका यह अहंकार गुब्बारे की तरह फूलने
लगता है ।यह अहंकार मनुष्य के मस्तिष्क के बायें भाग में होता है अहंकार का यह गुब्बारा
फूलते जाता है और एक अवस्था आती है जब और फूलने की जगह नहीं होती है,परिणाम स्वरूप
विपरीत दिशा की ओर उसका आकार बढने लगता है,ऐसा व्यक्ति अपनी संवेदनशीलता खो देते हैं।
भौतिक लाभ के लिए स्वार्थी बन जाते हैं,दूसरों पर अपना अधिकार जमाने लगते हैं।उसका व्यक्तित्व
कुटिल,रूखा और आक्रामक बन जाता है।अपने अहंकार में अंधा होकर उसकी स्थिति मूर्खों की जैसी हो
जाती है।।

5-अत्यन्त भाउक होना नाडीतंत्र की कमजोरी का फल है-

     जब नाडी तंत्र कमजोर होती है तो हम किसी भी बात पर भाउक हो जाते हैं।
इससे हर्ष और विषाद के बीच एक नाटकीय द्वंद बना रहता है ।इससे वे आलसी,
नकारात्मक,तामसी,और अपने आप से पीढित रहते हैं।बायें ओर की यह चन्द्रनाडी
मस्तिष्क के दायें भाग पर प्रतिअहंकार के रूप में अधिक दबाव डालती है,तो मनुष्य
पागलपन,पाक्षाघात तथा वृद्धावस्था को प्राप्त होता है और जो लोग अत्यधिक भाउक
होते हैं वे सन्तुलन खो देते हैं।परिणाम स्वरूप उसका प्रतिअहंकार दाहिने मस्तिष्क के
ऊपर फूल जाता है,और जब यह अधिक बढ जाता है तब बायें ओर स्थित अहंकार को
दबाता है,ताकि सूर्यनाडी को राहत मिले।इस प्रकार वह असंतुलन की स्थिति में रहता है ।।

6-सुख-दुख-

  हमेशा सुख-दुख में सम रहो।
न सुख में अपने को भूलो,नदुःख
की चपेट में एकदम टूटो ।सुख-दुख
दोनों को प्रभु की इच्छा मानकर आनन्द
से स्वीकार करो।दुःख को भी पर्भु का आशीर्वाद मानो ।।

7-ईश्वर को महसूस करना-

      हर व्यक्ति को ईश्वर अलग-अलग तरह से महसूस होता है,
इसलिए किसी एक व्यक्ति के ईश्वर साक्षात्कार का अनुभव दूसरे
से नहीं मिल सकता है।इसलिए हर व्यक्ति को ईश्वर पाने का अपना
अलग ही रास्ता बनाना होता है।वहॉ तक पहुंचने के लिए कोई बना बनाया
रास्ता नहीं है

8-कपटी और धोखेबाज आध्यात्मिक गुरु से बचें-

   अधिकॉश आध्यात्मिक संगठन नशीली औषधि के समान हैं।वे साधकों को
फुसलाते हैंऔर अपने जाल में फंसाते हैं।वे धूर्त कपटी और धोखेबाज हैं।उनसे
होने वाले खतरे तब दिखाई देते हैं जब देर हो चुकी होती है।हर वस्तु जो अनित्य
(क्षणिक) हैं वह सत्य नहीं हो सकती,और सभी शक्तियॉ मनुष्य को सत्य के मार्ग
पर नहीं ले जाती । वॉणी –सिद्धि दृष्टि शक्ति,नक्षत्रीय गडना,प्रकाश की धारियॉ,प्रेत-
शक्ति के वाहन का कार्य़,भविष्यवॉणी करना,मृत आत्माओं से सम्पर्ख करना,और हठ
योग आदि सभी सम्भव है,परन्तु वे हमें सत्य तक नहीं पहुंचा सकते ।वे हमें क्षणिक शक्ति
देते हैं,तथा हमारे अहंकार को हवा देते हैं कि हम कोई विशेष व्यक्ति हैं।परन्तु ये सब शक्तियॉ
शीघ्र ही क्षीण हो जाती हैं और बीमारी,तखलीफ,और उदासीनता पैदा करती हैं।वे प्रेत-बाधा को स्पष्ट
रूप से आमंत्रित करती है ।वे धोखा या भ्रम पैदा करते हैं ।और हमसे पैसा ऐंठने के चक्कर में रहते हैं।
वे हमारी आत्मा को नष्ट करने पर तुले हैं और आत्मा का परमात्मा से मिलने का अवसर समाप्त हो जाता
है ।।

9-गुरु या समुदाय का चयन कैसे करें-

  अगर हम किसी समुदाय
मेंशामिल होना चाहते हैं या
गुरु का चयन करते हैं तो निम्न
प्रश्न पूछ लेना चाहिए ।

1-क्या किसी समय पैसा लिया जाता है।क्योंकि सत्य को खरीदा नहीं जाता ।।
2-क्या गुरु द्कानदार के समान दबाव तो नहीं डालता है ।
3-क्या हम स्वयं उनकी पद्धति का लाभ उटा सकते हैं,झूठे आश्वासनों पर संतुष्ट नहों ।
4-क्या वे अपने अनुयायियों को अजीव किस्म के पहनावे के लिए कहते हैं,क्योंकि सत्य इनमें नहीं है ।
5-क्या यह संतुलित मार्ग है ।
6-क्या उनके संगठन के सदस्यों का गुरु पर विश्वास है ।
7-क्या वहॉ सदस्य को स्वतंत्रता है कि जब चाहे छोड सकता है ।
8-क्या कोई ऐसा तरीका है,जिससे उनकी तकनीक की जॉच की जा सके ।इन प्रश्नों के
उत्तरों से संतुष्ट होने पर ही किसी गुरु या समुदाय का चयन करना चाहिए ।

10-उतार और चढाव जीवन की अपनी समस्या है-

     जीवन की अपनी समस्या है उसमें उतार-चढाव हैं जैसे दुःख-दर्द का चक्र हमारे
साथ चलता है ।लेकिन हम दुखी हो जॉय और लगातार हमारे साथ चलता रहेगा ऐसा
नहीं है।हमेंदुर्भाग्य की गलत धारणॉ में नहीं पडना चाहिए,सकारात्मकता सेहमें अपनी गलत-
फहमी को दूर करना होगा ।जब काले बादल छाये हों तो हमें प्रकाश की चमकीली रेखाओं की ओर
देखना चाहिए।और जब हम कीचड में हैं तो हमें कमल की ओर देखना चाहिए,जो उस कीचड में खिलते
हैं।आवास्तव में जीवन ईश्वर का एक उपहार है-आइये हम एक दूसरे का हाथ पकड कर इस मार्ग पर बढें
जिससे चौराहों के इशारों को नहीं चूकेंगे।अंधे लोग गूंगे की आंखों से देख सकेंगे और बहरे लोग अंधों के कान
से सुन सकेंगे।अपने जीवन उपहार को बॉटने से जीवन यात्रा छोटी पड जायेग

11-संसार का स्वर्ग क्या है-

     हमारे शास्त्र कहते हैं कि सत् से सुख उपजता है । यदि आप जीवन के
उच्चतम् लाभों को प्राप्त करना चाहते हैं तो वह बाह्य जगत में नहीं बल्कि
अन्तर्जगत में प्राप्त होगा ।स्वर्ग,मुक्ति तथा परम पद की कुंजी आपके हाथ में है।
आप चाहे तो आत्म निर्माण द्वारा इन तत्वों को प्राप्त कर सकते हैं।संसार का स्वर्ग
समस्त दुष्ट भावनाओं –काम,क्रोध,मोह,इच्छा,तृ।णा इत्यादि से दूर रहना है ।जो व्यक्ति
इन वासनाओं का दास है वह नरक की यातनायें भुगत रहा है ।संसारकी वस्तुओं से मनुष्य को
कोई स्थाई सुख प्राप्त नहीं होता।हर क्षण दूसरी वस्तु की ओर मन भागता है।एक इच्छा के बाद
हजार नईं इच्छायें जन्म लेती हैं।जिससे मस्तिष्क में निर्बलता, चिडचिडापन, अनिद्रा, उद्वेग,अरुचि,
भ्रम,व्याकुलता, आदि दुष्ट भावनायें उत्पन्न होती हैं।इसलिए इस अहितकर मार्ग को त्यागकर सत्मार्ग
की ओर चलना है-स्वर्ग की ओर यात्रा प्रारम्भ करना है।जब ह्दय से अपवित्र, अशुभ वासनायें नष्ट हो
जायेंगी और उनके स्थान पर शुभ संकल्पों का निर्माण होने लगेगा,तभी मनुष्य को वासनाशुद्धि प्राप्त होगी।
इसी को मुक्ति पद समझना चाहिए,फिर विशुद्धि जीवन की तीव्रता से प्रगति प्रारम्भ हो जाती है ।।

12-मनुष्य का मन एक मार्गी है-

       मन एक मंदिर है मनोवैज्ञानिकों के मत के अनुसार मनुष्य का मन
एक मार्गी है,अर्थात उसमें एक समय में एक ही विचार रहता है,कई विचार
एक साथ नहीं आते हैं यदि दया का विचार चल रहा है तो क्रोध का विचार नहीं
चल सकता,यदि प्रेम,सहानुभूति,करुणॉ की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है, तो हिंसा,वैमनस्य,
आवेस के आसुरी विचार नहीं रह सकते।हमारे मन में रहने वाला अच्छा विचार एक प्रकार का
ऐसा कवच है जो हिंसा,पाप,क्रोध,वासना,स्वार्थ या अन्याय के अनिष्ठ विचारों से हमारी रक्षा कर
सकता है ।मन का सात्विक वातावरण ही हमारा वह कवच है जो दूषित विचारधारा या अमंगलकारी
वासनाओं से हमारी रक्षा करता है ।इसलिए अमंगल विचारों को रोकने के लिए मंगल विचारों का प्रयोग
किया जा सकता है । जैसे क्रोध भाव को शॉत करने के लिए शॉति,द्वेष भावना को रोकने के लिए प्रीति
भवना का प्रयोग किया जा कता है,अर्थातमन में अनिष्ठ विचार प्रवाहित हो रहे हों तो इन्हैं रोकने के लिए
विपरूत सद्गुंण और धर्म वाली भावना मन में प्रवाहित कर मानस प्रदेश को धो डालना चाहिए।अनिष्ठ विचार
का प्रवाह स्वतः बदल जायेगा ।इस नियम का पालन करें तो आप अपने जीवन में परिवर्तन कर सकते हैं ।

13-पाप कर्म एक वृक्ष के समान है-

         पाप तो एक वृक्ष के समान है,उसका बीज लोभ है ,मोह उसकी जड है,
असत्य उसका तना है और माया उसकी शखाओं का विस्तार है,दम्भ और कुटिलता
उसके पत्ते,कुबुद्धि फूल हैं और नृशंसता उसकी गंध और अज्ञान फल हैं ।और छल,पाखण्ड,
चोरी,ईर्ष्या,क्रूरता,कूटनीति,पापाचार से युक्त प्राणी उस वृक्ष के पक्षी हैं,जो कि माया रूपी शखाओं
पर बसेरा करते हैं ।अज्ञान उस वृक्ष का फल है और अधर्म उस फल का रस है ,तृष्णा रूपी जल से
उस वृक्ष को सींचने पर वह वृक्ष बढता है। जो मनुष्य उस वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर संतुष्ट रहता है,
उसके पके हुये फलों को खाता है वह ऊपर से कितना ही प्रशन्न क्यों न हो,वास्तव में पतन की ओर जाता है।
इसलिए लोभ को त्याग देना चाहिए, धन की चिंता तो कभी न करें । कितने ही विद्वान हैं जो मूर्खों के मार्ग पर
चलते हैं दिन-रात मोह में डूबे रहते हैं ,निरंतर इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि किस प्रकार मुझे अच्छी स्त्री मिले,धन-
दौलत मिले ।चाहें वे किसी भी गुफा में चले जॉय उस पाप कर्म को छुपाने का प्रयास करें मगर पाप ऐसा कुटिल है कि
वह स्वयं पुकार-पुकार कर अपना ढोल पीटता है। आपके पैरों के नीचे उगी घास इस बात का साक्षी देगी,आपके इर्द-गिर्द
खडे पेड मुंह खोलकर आपके विरुद्ध कहेंगे,उस पापकर्म को देखने के लिए सहस्रों नेत्र,सहस्रों कान अनगिनत हाथ हैं वे दिन-
रात आपकी विभिन्न लीलायें निहारा करते है।पाप की सजा अवश्य मिलेगी ईश्वर दुष्कर्म की सजा देने में किसी को रियायत
नहीं करता है ।।

14-आत्मोन्नति की ओर बढें-

     आत्मोन्नति का अर्थ है अपने दैनिक जीवन में नित्यप्रति घटने वाली सुख-दुख
हर्ष विषाद की  भावनाओं से  उपर  उठें अर्थात इनके वश में आने के स्थान पर अपनी
आत्मिक दृढता,साहस और संयम द्वारा इनपर राज्य करें मनोविकारों को मजूती से अपने
वश में रखना,उनसे अविचलित रहना,स्वयं उपनी इच्छानुसार उन्हैं ढालना,क्रोध के समय प्रशन्न
रहना यह आत्मोन्नत व्यक्ति ही कर सकता है ।आत्मोन्नति की यात्रा तो लम्बी है ,इसकी भिन्न-भिन्न
स्थितियॉ तथा अवस्थायें हैं ।मनोविकार उसे खूब नाच नचाते हैं।कभी वह हंसता है कभी आंसू बहाता है,कभी
वह अपने ऐश्वर्य में पागल हो जाता है, तो कभी वह अपने धन-जन की की हानि से इतना उद्विग्न हो जाता है
कि उसे अपना आगा-पीछा ही कुछ नहीं सूझता ।आत्मोन्नति का अर्थ है पशुत्व से मनुष्य कू ओर आना है। पशुत्व
का अर्थ है अपने मनोविकारों पर तनिक भी शासन न कर पाना,जो जैसा मनोविकार आया,उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर
दिया।काम,भूख,प्यास आदि वासनायें उत्पन्न हुईं कि तुरन्त उसकी पूर्ति कर ली गयी, पशुत्व है ।और जब इन वासनाओं
पर संयम आना प्रारम्भ होता है और मानवता के उच्चतम् गुंण प्रेम,सहानुभूति,करुणॉ,सहायता संगठन,सहयोग,समष्टि के लिए
व्यक्तित्व का त्याग इत्यादि भावनाओं का उदय होता है,तब मनुष्य मनुष्यत्व के स्तर पर निवास करता है ।धीरे-धीरे उसका और
भी विकास होता है और वह सॉसारिक बन्धनों से छूटकर आत्मा जैसे ईश्वरीय तत्व की प्राप्ति में अग्रसर हो जाता है ।उसे अब प्रतीत
होने लगता है कि विश्व में जो कुछ भी है ,उसका स्वामी परमात्मा है,सब में प्रभु का निवास है,इसलिए वह त्यागपूर्ण भोग करता है,
और जिसको यह दृष्टि प्राप्त हो गई वह धन्य है ।

15-भगवान कृष्ण ने नरक के तीन द्वार बताये-

       भगवान कृष्ण ने गीता में नरक के तीन द्वार बताये –काम,
क्रोध,और लोभ ।आत्म सल्याण चाहने वालो इन तीनों से सावधान
रहें अन्यथा वह नरक में पहुंच जायेगा हे मनुष्य तू उन्नति की ओर बढ,
कोई ऐसा कार्य न कर जिससे तू नीचे गिरे तथा तुझे दुख या संताप हो।

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