शिक्षा का पात्र-10


1-समूह में शक्ति होती है

                हम देखते हैं कि एक तिनका छोटा सा,
कमजोर होता है,बलहीन होता है जिसे पानी आसानी
से बहा ले जाता है,लेकिन जब ढेर सारे तिनके एकत्रित
हो जाते हैं तो छप्पर का रूप धारण कर लेते है । फिर उनके
द्वारा भारी वर्षा से भी बचाव किया जा सकता है ।इसी प्रकार
जब किसी परिवार या राज्य के लोग अलग-अलग बिखरे होते हैं
तो उनकी शक्ति कुछ भी नहीं रहती है,लेकिन जब सभी लोग मिल
जाते हैं तो उनका समूह अपने से भी अधिक शक्तिशाली शत्रु को पराजित
कर लेता है । अतः योग्य मनुष्यों को संगठित होकर रहना चाहिए ।जैसे हमारे
देश में जब मुगलों का शासन था, जिसमें हिन्दुओं का जीना मुश्किल हो गया था,
तो शिवाजी ने दुर्वल हो चुके हिन्दुओं को संगठित किया और मुगल साम्राज्य को समाप्त
कर दिन्दू धर्म का पुनुरुत्थान किया । इसी प्रकार जब देश में अंग्रेजों का शासन था और अहिंसा
की दुर्वल नीति के कारण देश का सर्वनाश हो रहा था तो उस समय –नेताजी सुभाषचन्द बोस ने
भारतीय लोगों को संगठित करके भारतीय स्वतंत्रता सेना (आजाद हिंद फौज ) की स्थापना की और
अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया ।।

2-गुंणवान मनुष्य को समाज से जुडकर रहना चाहिए

               कहते हैं यदि मूल्यवान हीरा है तो वह सोने में
जडे रहने की इच्छा रखता है, क्योंकि-अकेला हीरा तो तिजोरी
में बन्द होकर रखा जायेगा ।जबकि सोने में जडने से हीरा मनुष्यों
द्वारा धारण किया जायेगा । इसी प्रकार कोई मनुष्य अधिक गुंणवान हो
लेकिन वह पूर्णतः अकेला हो तो उसके गुंण भी किसी काम के नहीं हैं, क्योंकि
अकेले होने पर वह अपने गुणों का लाभ किसको पहुंचायेगा ?किसी को भी नहीं ।
वह गुंणवान मनुष्य परिवार या समाज के साथ रहता है तो अपने गुंणों से अन्य लोगों
को भी लाभान्वित करेगा ।इसलिए कहते हैं गुंणवान मनुष्य को अकेला नहीं रहना चाहिए,
परिवार,समाज से जुडकर रहना चाहिए ।अर्थात प्रत्येक मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनना चाहिए
और अपने परिवार-समाज से जुडकर रहना चाहिए ।।

3-शिक्षा उसी को दी जाय जो उसके योग्य हो-

              शिक्षा केवल उसी को दी जानी चाहिए जो उसे
ग्रहण करने योग्य हो अर्थात जो उस शिक्षा को मनोयोगपूर्वक
ग्रहण करे और उस शिक्षा का मर्म समक्षकर उसके अनुरूप आचरण
करे।यदि दी जा रही शिक्षा से वह चिडचिडाने लगे और आपसे रुष्ट होने
लगे तो इस प्रकार की शिक्षा देने से कोई लाभ नहीं है ।इसी प्रकार पतिता
स्त्री को अपने साथ रखने से समाज में आपको अपयश ही प्राप्त होगा ।इसी
प्रकार सदैव दुखी बने रहने वाले मनुष्यों साथ व्यवहार बनाने से भी आपका उत्साह
नष्ट हो जायेगा और आपकी एकाग्रता भंग हो जायेगी जिससे आप सदैव उदास रहेंगे ।
एक बार तेज वारिष हो रही थी एक पक्षी उस समय पेड पर अपने घोंसले में सुरक्षित बैठी
थी।तभी एक बन्दर भीगता हुआ पेड पर पहुंच गया सामने पक्षी ने बन्दर को शिक्षा देकर कहा
हे बन्दर अगर तुम भी मेरी तरह पहले ही से कोई घर बना लेते तो तुम्हें वारिष में इस तरह
नहीं भीगना पडता ।भीगा हुआ बन्दर पहले ही खिसियाया हुआ था,उसे गुस्सा आया और उसने
उस पक्षी का घोंसला तोड दिया–इससे पक्षी भी वारिष में भीगने लगी ।इसी घटना पर एक दोहा
है कि-सीख बाको दीजिए,जाको सीख सुहाय।सीख न दीजो वानरा,जो घर पक्षी का जाय।।

4-मृत्यु स्वरूप बातें-

        अगर पत्नी कडवी बोलती है और दुश्चरित्र है
तो उसका पति एक तो अपमान और लज्जा के बोझ
से वैसे ही दुर्दशा को प्राप्त होता है ,   ऊपर से उसे यह भी
भय बना रहता है कि कहीं वह स्त्री अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति
के लिए उसे विष न दे दे । इस प्रकार उसका जीवन सदैव आशंकाओं
से घिरा रहता है ।ठीक इसी प्रकार स्वार्थी मित्र भी हानिप्रद होता है क्योंकि
ऐसे मित्र केवल नाम मात्र के लिए ही मित्र होता है और केवल अपने स्वार्थों
की पूर्ति और अपने हितों की रक्षा के लिए ही मित्रता करता है ।यदि आपके कुछ
भी बोलने पर शीघ्र प्रत्युत्तर देने वाला नौकर आदि कोई भी हो आपको हानि पहुंचा
सकता है,जरा सी बात पर चिढकर आपको नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर सकता है,
अगर घर में सर्प रखा जाता है तो उस घर में भी मृत्यु का भय रहता है ।इसलिए इन
परिस्थितियों में मनुष्य को सावधान रहना चाहिए ।तभी वह अपने जीवन की रक्षा करने
में पूर्णतःसमर्थ हो सकेगा ।।

5- संकोच किस प्रकार का हो-

                मर्यादा का पालन करते हुये संकोच उपयुक्त है
मगर आवश्यकतानुसार संकोच को त्याग देना चाहिए,स्पष्ट
बात करनी चाहिए ।    अगर  भोजन  करते  समय भरपेट आहार
करना चाहिए क्योंकि अधिक संकोच करने से भूखा रहना पड सकता
है।लेन-देन करते समय उसकी लिखा-पढी पक्की होनी चाहिए क्योंकि
संकोच करने से धन की हानि हो सकती है । जीवन में संकोच की एक
सीमा है वरना दुख या हानि हो सकती है ।

6-आचरण के विना ज्ञान व्यर्थ,अज्ञान से मनुष्य नष्ट हो जाता है-

              जब कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है और
उसका व्यवहार में आचरण नहीं करता है तो वह ज्ञान
व्यर्थ है जैसे किसी घर में बहुत सारे चूहे हो गये थे जो कि
उनके सामान को कुतरकर हानि पहुंचाते थे चूहों के इस उत्पात
से बचने के लिए उस घर का स्वामी एक किताव लाया ,जिसमें चूहे
मारने के उपाय लिखे थे उसने पुस्तक को अच्छी तरह से पढा और रख
लिया लेकिन अगले दिन उसने देखा कि चूहों ने उस पुस्तक को ही कुतर कर
नष्ट कर दिया अर्थात केवल पुस्तक में चूहे मारने के उपाय पढने से (ज्ञान प्राप्ति
करने) से कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि उन उपायों पर अमल करना भी आवश्यक है।
इसी प्रकार जो मनुष्य किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त नहीं करता है तो उस अज्ञानता
के कारण वह कोई भी कार्य सही प्रकार से नहीं कर पाता है जिससे वह बार-बार हानि
उठाता है-इस प्रकार से वह मनुष्य पूर्णतः नष्ट हो जाता है ।

7-प्रसंग के अनुसार बात,सामर्थ्य से साहस,शक्ति से क्रोध करें-

            जो मनुष्य प्रसंग के अनुसार बात करना जानता है तो
वह सभी परिस्थितियों में अपने अनुकूल वातावरण का निर्माण
कर लेता है और वह अपने हितों को पूरा कर लेता है ।और जो मनुष्य
अपने सामर्थ्य के णनुसार साहस करना जानता है वह तो परिस्थितियों पर
विजय प्राप्त करके उन्नति करता है और उसके लाभों तथा सम्पत्ति में भी वृद्धि
होती है । इसी प्रकार जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है,
वह तो अयोग्य लोगों को दण्ड का भय दिखाकर अपने कार्यों को सिद्ध कर लेता है और
वह सम्मान प्राप्त कर लेता है

8-सज्जन मनुष्यों के लक्षण-

            सज्जन और परोपकारी मनुष्यों के उपयुक्त
लक्षण निम्न हैं-अपने मन को साफ रखना उसमें कोई
भी विकार न रखना, मीठा तथा उचित बोलना,इन्द्रियों पर
संयम रखना, भोग-विलास से बचना, सभी के प्रति दया-भाव
रखना, उन तरीकों से धन का अर्जन करना जिससे समाज और
देश को हानि न हो, और कमाये गये धन का उचित ढंग से समायोजन
करना ताकि उससे देश का हित हो सके ।।

9-सच्चे महात्मा की पहचान-

           जो लोग सबका हित चाहने वाले होते हैं,उनका
स्वभाव और आचरण अत्यन्त विचित्र होता है। वे लोग
अपनी सम्पदा का संचय करना नहीं चाहते हैं लेकिन यदि
किसी प्रकार से उनको सम्पदा प्रप्त हो जाय तो उसको पूरे
समाज के हित के लिए ही व्यय करने लगते हैं ।अर्थात सच्चा
महात्मा वही है जो कि अपनी सम्पदा का प्रयोग केवल अपने लाभ

10-आदिशक्ति माता जी श्री निर्मला देवी का आध्यात्म-

            अपने जीवन में अपने हिन्दू धर्म के अनुसार
देवी-देवताओं की उपासना में मैं हमेशा भ्रमित रहता था,
ईश्वर को तलासने के लिए कभी इस मंदिर में सभी उस मंदिर
में भटकता रहा,लेकिन कुछ वर्षों पूर्व जब माता जी के आध्यात्म के
सम्पर्क में आया तो ईश्वर के प्रति विचारधारा ही बदल गई । इस आध्यात्म
में सबसे बडी बात यह है कि हमें किसी गुरु के शरण में जाने की आवश्यकता नहीं
हैं,हम अपने गुरु स्वयं अपने आप हैं।जबकि सभी उपदेश देने वाले कहते हैं कि बिना
गुरु के ईश्वर प्राप्त हो ही नहीं सकता । दूसरी बात माता जी ने कहा कि ईश्वर को रुपये
पैसों की भाषा समझ में नहीं आती है आप इस कार्य में कोई खर्चा न करें ।तीसरी बात माता
जी ने कहा बाहर जितने भी देवता हैं वे सभी हमारे शरीर में अलग-अलग तत्वों के रूप में
विद्यमान हैं,इसलिए हमें बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं है,हमें तो इन्हैं अपने शरीर के
अन्दर ही प्रशन्न करना है । अपने शरीर के अन्दर सात चक्र हैं, कुण्डलिनी मूलाधार में
बैठी होती है,अगर हमारे सातों चक्र जागृत अवस्था में हैं तो कुण्डलिनी हर चक्र से होकर
अन्त में सहस्रार का भेदन कर सदा शिव में मिल जाती है, यह परम चैतन्य प्राप्ति
की स्थिति है । इस स्थिति में शरीर को अथाह आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है जोकि
किसी लक्ष्य की प्राप्ति में सक्षम मानी जाती है ।इस धरती पर जितनी भी
शक्तियॉ या देवता हैं उनमें मॉ का स्थान प्रथम है,उसी मॉ की आस्था में
मैं विश्वास करता हूं ।यहॉ पर जो लिखा गया है उन्हीं के संरक्षण में
लिखा जाता है,यह आपके लिए है ।

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