परछाई-40


1-प्यार से हमें कोई गिला नही,
मगर प्यार हमें कभी मिला नही,
हमने तो की सिर्फ “दोस्ती” क्यूंकि,                                  
“दोस्तों” से ज्यादा प्यार करने वाला हमें मिला नही

2-  तेरी याद में आँख भर आई
तन्हाइयो से भारी यह जुदाई
तू न आया तेरी याद चली आई
इस दिल को बहाल करने थी आई…..,
आज तेरी कहानी फिर याद आई

3-आज फिर उनसे मिलने को दिल चाहता है,
पास बैठ कर बात करने को दिल चाहता है,
इतना हसीन था उनका आंसू पोछने का अंदाज़,
के आज फिर रोने को जी चाहता है !!

4-प्यार से हमें कोई गिला नही,
मगर प्यार हमें कभी मिला नही,
हमने तो की सिर्फ “दोस्ती” क्यूंकि,
“दोस्तों” से ज्यादा प्यार करने वाला हमें मिला नही !!

5-उनकी किस्मत का भी कैसा सितारा होगा,
जिनको मेरी तरह तकदीर ने मारा होगा,
किनारे पे बैठे लोग क्या जाने,
डूबने वाले ने किस किस को पुकारा होगा…..!!!!

6-कुछ सुन लो या कुछ सुना दो मुझको,
गुमसुम रहकर न यूँ सजा दो मुझको,
जान से भी प्यारी है तेरी ये मुस्कुराहट,
मुस्कुरा कर थोड़ा सा हँसा दो मुझको

7-खामोश मोहब्बत का एहसास है वो ,
मेरी ख्वाइश मेरे जज्बात हैं वो,
अक्सर ये ख्याल क्यूँ आता है दिल में
मेरी पहेली खोज और आखरी तलाश है .वो

8-कितनी मोहब्बत है हमसे ,
उन्होंने पूछा बड़े ही लाड़ से |
हमने भी दिल की बात कह दी ,
जितनी कबाड़ी को कबाड़ से

9-तुम्हें लगता होगा की बहुत दर्द देती है ज़िन्दगी
पर मुझे ये लगता है दर्द में ही छुपी है ज़िन्दगी
एहसास दर्द का जिस किसी शख्स को होने लगे
उसी ने जाना है कि खुशियों से भरी है ज़िन्दगी

10-इस अजनबी दुनिया में,अकेला एक ख्वाब हूँ,
सवालो से खफा,छोटा सा एक जवाब हूँ,
जो न समझ सके,उनके लिए ” कौन”,
जो समझ चुके,उनके लिए एक खुली किताब हूँ

11-इस अजनबी दुनिया में,अकेला एक ख्वाब हूँ,
सवालो से खफा,छोटा सा एक जवाब हूँ,
जो न समझ सके,उनके लिए ” कौन”,
जो समझ चुके,उनके लिए एक खुली किताब हूँ

12-सब डरते हैं, आज हवस के इस सहरा में बोले कौन..
इश्क तराजू तो है, लेकिन इस पे दिलों को तौले कौन,

13-सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया..
दिल की दुकानें बंद पडी है, पर ये दुकानें खोले कौन

14- बहुत दूर होकर भी मेरे करीब रहती हो,
नजरों से दूर हो पर दिल के करीब रहती हो।
इस बार खत में इतना लिख देना रानी जी,
क्या तुम भी मेरी तरह उदास रहती हो ।।

15- उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं

16-वह चाँद छुप गया मुझे अँधेरी रात सौंप कर,
दिल में आस व इंतजार के लम्हे सौंप कर,
एक सख्श था मुझसे बिन कहे बिछड़ गया,
आँखों को मेरी मौसम-ए-बरसात सौंप कर।

17-हमने सोचा की हम ही चाहते है उनको…
…. पर उनके चाहने वालो का तो काफिला निकला
दिल ने कहा की शिकायत करे खुदा से ..
…लेकिन वो खुदा भी उन्हें चाहने वाला ही निकला

17-हूं इतना वीर की पापड़ भी तोड़ सकता हूं,
जो गुस्सा आये तो कागज मरोड़ सकता हूं,
अपनी टांगो से जो जोर लगाया मैंने,
बस एक लात में पिल्ले को रुलाया मैने।

18 -मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया,
तुम क्यों उदास हो गए,
क्या याद आ गया?
कहने को ज़िन्दगी थी,
बहुत मुख़्तसर मगर,
कुछ यूँ बसर हुए के,
खुदा याद आ गया.
बरसे बिना ही जो,
घटा आगे निकल गई

19 -एक मॉ को अपने बेटे को आदमी बनाने में 20
साल लगते हैं और ..एक लडकी उसे सिर्फ 20 मिनट
में …बेवकूफ बना देती है

20-जूझ कर कठिनाईयों से,
कर सुलह परछाईयों से,
एक दीपक रातभर जलता रहा,
रोशनी की आस पर टूटी नहीं ,
आस्था की डोर भी छूटी नहीं,
आत्मा में डूब करके,
चेतना अभिभूत करके,
साधना के मंत्र को जपता रहा,
एक दीपक रातभर जलता रहा।

21-तेरे खयालों की रोशनी रही पास हमेशा,
ज़िदगी मेरी फिर भी रही उदास हमेशा,
ये अलग बात थी कि वो न सुन पाया,
तुझको आवाज़ देती रही मेरी हर सांस हमेशा,
पतझड़ में भी हंसने की कोशिश कर ले,
मिलता नहीं किसी को भी मधुमास हमेशा,
बेइमानों के ही हक़ में होते रहे फ़ैसले,
वो चलते रहे हैं चाल कुछ खास हमेशा,
न पूछ क्यूं रिश्तों के जाल में उलझकर,
दम तोड़ती रही मेरी हर ‘आस’ हमेशा।

22-आज की जिन्दगी में व्यक्ति जब
एक-दूसरे को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ने
की होड़ में संवेदनाओं को खोता चला जा रहा है,
रिश्तों और एहसासों से दूर, संपन्नता में क्षणिक सुख
खोजने के प्रयास में लगा रहता है, ऐसी स्थिति में जहां प्यार
बैंक-बैलेंस और स्थायित्व देखकर किया जाता है, वहां सच्ची मोहब्बत,
पहली नजर का प्यार और प्यार में पागलपन जैसी बातें बेमानी लगती हैं परंतु प्रेम शाश्वत है।

23-प्रेम सोच-समझकर की जाने वाली चीज नहीं है।
कोई कितना भी सोचे, यदि उसे सच्चा प्रेम हो गया तो उसके
लिए दुनिया की हर चीज गौण हो जाती है। प्रेम की अनुभूति विलक्षण है।
प्यार कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। इसका एहसास तो तब होता है,
जब मन सदैव किसी का सामीप्य चाहने लगता है। उसकी मुस्कुराहट पर खिल उठता है।
उसके दर्द से तड़पने लगता है। उस पर सर्वस्व समर्पित करना चाहता है, बिना किसी प्रतिदान की आशा के।

24-जयशंकर प्रसाद ने कहा है कि
चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से
सरल हृदय की वस्तु है।’ सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता,
बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता
भी उसे कम नहीं कर सकती। वास्तव में प्रेम के पथ में प्रेमी और प्रिय दो
नहीं, एक हुआ करते हैं। एक की खुशी दूसरे की आँखों में छलकती है और किसी
के दुःख से किसी की आँख भर आती है।

25-आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘प्रेम
एक संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को
करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास
बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि
नहीं होती।’ प्रेम एक तपस्या है, जिसमें मिलने की खुशी, बिछड़ने का दुःख,
प्रेम का उन्माद, विरह का ताप सबकुछ सहना होता है। प्रेम की पराकाष्ठा का एहसास
तो तब होता है, जब वह किसी से दूर हो जाता है।

26-खलील जिब्रान के अनुसार- ‘प्रेम अपनी
गहराई को वियोग की घड़ियां आ पहुँचने तक स्वयं नहीं
जानता।’ प्रेम विरह की पीड़ा को वही अनुभव कर सकता है,
जिसने इसे भोगा है। इस पीड़ा का एहसास भी सुखद होता है। दूरी
का दर्द मीठा होता है। वो कसक उठती है मन में कि बयान नहीं किया
जा सकता। दूरी प्रेम को बढ़ाती है और पुनर्मिलन का वह सुख देती है, जो
अद्वितीय होता है।

27-प्यार के इस भाव को इस रूप को केवल
महसूस किया जा सकता है। इसकी अभिव्यक्ति कर पाना
संभव नहीं है। बिछोह का दुःख मिलने न मिलने की आशा-आशंका
में जो समय व्यतीत होता है, वह जीवन का अमूल्य अंश होता है। उस
तड़प का अपना एक आनंद है।

28-प्यार और दर्द में गहरा रिश्ता है। जिस
दिल में दर्द ना हो, वहाँ प्यार का एहसास भी नहीं होता।
किसी के दूर जाने पर जो खालीपन लगता है, जो टीस दिल में
उठती है, वही तो प्यार का दर्द है। इसी दर्द के कारण प्रेमी हृदय कितनी ही
कृतियों की रचना करता है।

29-प्रेम को लेकर जो साहित्य रचा गया है,
उसमें देखा जा सकता है कि जहाँ विरह का उल्लेख होता है,
वह साहित्य मन को छू लेता है। उसकी भाषा स्वतः ही मीठी हो जाती है,
काव्यात्मक हो जाती है। मर्मस्पर्शी होकर सीधे दिल पर लगती है।

30-प्रेम में नकारात्मक सोच के लिए कोई जगह
नहीं होती। जो लोग प्यार में असफल होकर अपने प्रिय
को नुकसान पहुंचाने का कार्य करते हैं, वे सच्चा प्यार नहीं करते।
प्रेम सकारण भी नहीं होता। प्रेम तो हो जाने वाली चीज है।

31-किसी के खयालों में खोकर खुद को भुला देना,
उसके सभी दर्द अपना लेना, स्वयं को समर्पित कर देना,
उसकी जुदाई में दिल में एक मीठी चुभन महसूस करना, हर
पल उसका सामीप्य चाहना, उसकी खुशियों में खुश होना, उसके
आंसुओं को अपनी आंखों में ले लेना, हां यही तो प्यार है। इसे महसूस
करो और खो जाओ उस सुनहरी अनोखी दुनिया में, जहां सिर्फ सुकून है

32-पीछे खडे रहते हो,
इसलिए हंसते हुए मुख को,
मैं डेखता हूं बार-बार मुडकर,
बार बार गाता मैं-खौफ नहीं खाता कभी,
जन्म और मृत्यु मेरे पैरों पर लोटते हैं ।

33-जीवन में कर्तव्य कठोर है,
सुखों के पंख लग गये हैं,
मंजिल दूर धुंधली सी झिलमिलाती है,
फिर भी अंधकार को चीरते हुए बढ जाओ,
अपनी पूरी शक्ति ऐर सामर्थ्य के साथ ।।

34-जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है ,
आपके इरादों का इम्तिहान अभी बाकी है ,
अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीं ,
आगे अभी सारा आसमान बाकी है ……

35-ओ मेरे पुष्प बच्चो,
कष्ट तुम्हारे अब,
मुझसे सहन होते नहीं,
आओ,डुबो दें तुम्हें,
आनन्द सागर में,
डुबो दो अपने स्तित्व को,
एक महान स्तित्व में,
जो आत्मा के बाह्य दल पुंज में,
मुस्करा रहा,
सदा तुम्हैं छोडने के लिए,
रहस्यमय ढंग से छुपा हुआ।

36-गम है पर
तुमसे हमे कोई
गिला नही है

तुम्हारे सिवा
खुशी का सबब तो
मिला नही है

तुम्हारे बिना
जिंदगी मे कोई भी
मजा नही है

दर्द है मेरा
तुम्हारे लिए कोई
सजा नही है

फूला तो है
ये ख्वाबों का चमन
फला नही है

कुछ तो हुआ
जो जीवन के लिए
भला नही है

मेरी तरह
मेरा नसीब भी तो
नादां नही है

दूर है हम
पर यकीन मानो
जुदा नही हैं

मेरी खामोशी
मेरी मजबूरी है
अदा नही है

खामोश तो हैं
पर यकीन मानो
खफा नही हैं…

37-जिंदगी में कभी कोई आये न रब्बा
आये जो कोई तो फिर जाए न रब्बा
देने अगर हो जो मुझे बाद में आंसू
तो पहले कोई हंसाये न रब्बा ….

38-जाते जाते कोई मेरी खुशियों को ले गया
सुनी सुनी अंखियों को गम कोई दे गया
आस जो लगाई हैं आँख भर आयी है
इतना भी कोई सताए न रब्बा …

39-अपनी सहज अवस्था में मस्त
किसी मलंग से रहते हैं
सुनने-सुनाने के गिलों से परे
पूजित होने के आग्रहों से दूर
सिलसिले खार औ प्यार के ,
खौफ , दर्द , मनुहार के …..
मौन हो सब सहते हैं

40नीर की पीर समझ,
नींव हो दायित्व निभाएं,
दरोदीवार में चुप से चिन जाएँ,
अपने होने को कभी न जताएं,
बे-आसरों को आसरा दे जाते हैं,
जाने लोग इन्हें पत्थर क्यूँ कहते हैं।

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