गंगा के अविरल प्रवाह पर रोक के कुछ प्रश्न-12


बाबा तेजेश्वरानन्द महॉराज द्वारा गंगा बचाओ अभियान के संदेशों के
प्रति उनसे पूछे गये कुछ प्रश्न, जिनका उत्तर बाबा जी देने में असमर्थ
थे और अपने परम्परागत प्रवचनों से बात टालते रहे-

1-बाबा जी गंगा व उसकी सहायक नदियॉ सदावाही नदियॉ है,
पहाड से लेकर बंगाल तक इसे जीवन दायी नदी माना जाता है।
हर वर्ग को इस नदी से लाभ है। विभिन्न प्रकार के व्यवसाइयों,
कारखानों और सबसे अधिक लाभ किसानों को है। हजारों छोटी-बडी
नहरें निकलकर खेतों की सिंचाई होती है, क्या आपको नहीं लगता कि
गंगा मैया का यह एक वरदान है? अगर है तो क्या पहाडों में विध्युत पावर
हाउसों से इस नदी के पानी से विजली पैदा होती है तो, यह वरदान नहीं होगा ?
(क्योंकि विजली उत्पादन करने के लिए पहाड सबसे अधिक उपयुक्त स्थान हैं) ।
अगर गंगा नदी के मोड से किसी पावर हाउस में विजली उत्पादन के लिए पानी पहुंचता
है तो, उस पावर हाउस के लिए यह पानी,भागीरथ के द्वारा हिमालय से गंगा की धारा को
लाने के बराबर नहीं होगा? इस विचार को आप किस भाव से देखते हैं ?

2-बाबा तेजेश्वरानन्द महॉराज जी, आप एक संत हैं,गुरु हैं, जो समाज
में मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आपको हमने न्यायाधीश बना दिया
है-कि गंगा नदी के मोड में परिवर्तन करके अगर विजली तैयार होती है तो,जो
कि अपने देश की सबसे बडी आवश्यकता है तो यह गंगा मैया की महिमा नहीं होगी ?
इससे गंगा का महत्व और अधिक नहीं बढ जायेगा? क्या यह तर्क कि गंगा के बहाव में
अवरोध नहीं होने देंगे उपयुक्त तर्क है?

3-बाबा जी देश भक्त की पहचान है ,जो देश के लिए सब कुछ समर्पित
कर दे। आप जानते हैं कि जोशीमठ में जमीन के नीचे से होकर सुरंग बन
रही है। तपोवन से हेलंग के लिए। जोकि जोशीमठ के लिए खतरा हो सकता है,
प्रारम्भ में विरोध तो हुआ, मगर इससे देश को लाभ था, इसलिए अब किसी को
कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन परेशानी उन लोगों को हो रही है जो देश को खुशहाल
देखना नहीं चाहते हैं! आप इसमें क्या कहना चाहेंगे कि देश भक्त कौन है?

4-बाबा जी क्या धार्मिक आस्था के नाम पर देश के विकास को अवरुद्ध
करना उचित है? यही हमारा धर्म है, जिसकी हमारे संत महात्मा व्याख्या
करते हैं? समय का मॉग यह नहीं है कि परम्परागत मान्यताओं को वैज्ञानिक
दृष्टि से देख-परखकर ही स्वीकार करना चाहिए ? इसमें आपकी क्या सोच है?

5-बाबा जी हमने सुना है, पढा है, कि सन्त मात्माओं की सबसे बडी
विशेषता यही है कि, किसी भी बात पर भी वे शॉत भाव से विचार व्यक्त
करते हैं। लेकिन आपको तो गुस्सा आ गया? बाबा जी ये जितने भी प्रश्न हैं
मेरे नहीं हैं ?बार-बार ये प्रश्न हमारे सामने आये तो इन्हैं मैं आपके सामने रख
रहा हूं।

6-बाबा तेजेश्वरानन्द जी इतिहास गवाह है कि अधिक आस्था या कट्टरता
कह सकते हैं,भी उस समाज के लिए हानिकारक होता है। इससे समाज में
विघटन की स्थिति उत्पन्न होती है । इतिहास का पन्ना साक्षी है। यूरोप में
ईसाई अपने धार्मिक गुरु पोप के प्रति समर्पित थे, और पोप परम्परागत नीति
के समर्थक थे,आधुनिकता के विरोधी थे। जिससे अन्य वर्गों की तुलना में ईसाई
समाज बहुत पिछड गया था,इसी बीच जब पोप के साम्राज्य पर आक्रमण हुआ तो,
पोप कुछ नहीं कर सका और पराजित का सामना करना पडा।यह देखकर ईसाई समाज
अपने धार्मिक गुरु पोप की शक्ति पर संदेह के कारण, एक बडा वर्ग पोप के विचारों से
नाराज होकर अलग हो गया जो कि प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ । फिर इस
वर्ग ने आधुनिकीकरण को स्वीकार कर,कम ही समय में दुनियॉ में अपना स्थान बना दिया।
क्या अपने देश में गंगा की आस्था के स्वरूप के नाम पर इसी तरह का मतभेद नहीं है?समाज
में मतभेद नहीं है? क्योंकि गंगा की महिमा के गुण-गान के प्रवचन इसलिए निरर्थक है कि हर
हिन्दू में गंगा के प्रति आस्था कूट- कूट कर भरी है । लेकिन आधुनिकीकरण भी समय की पहली
मॉग है, जिसे आज का समाज हर हालत में प्राप्त करना चाहता है, इस स्थिति में गंगा माता के
प्रति परम्परागत धारणॉ बदलने की आवश्यकता नहीं है? अगर सन्त समाज वर्ग आधुनिक विचारधारा
को मानने को तैयार नहीं है, और अपनी उसी रटन मनवाने पर लगा है तो यह उपयुक्त होगा? आज हर
व्यक्ति बुद्धिजीवी है, अपने व्यापक दृष्टिकोंण से उनके लिए घिसे-पिटे प्रवचन निरर्थक हैं। इसे आप किस
रूप में देखते हैं ?

7-बाबा तेजेश्वरानन्द महॉराज जी क्या आप उत्तराखण्ड में किसी बन्द पडी नदी
परियोजना को देखने गये? अगर नहीं गये तो हम आपको बताते हैं कि-इन परियोजनाओं
पर अरबों रुपया खर्च हो गया है और यदि खुले स्टोर में देखें तो करोणों रुपये के संयंत्र, जंग
खाकर नष्ट हो रहे हैं। इन परियोजनाओं पर जो खर्चा हुआ ये किसका रुHया है? देश की जनता का,
हमारा जो हमने टैक्स के द्वारा जमा किया ।इसका दर्द किसको होगा? यह देखने का कार्य सरकार का
है, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र की जडें खोखली हो चुकी हैं। क्योंकि जब कोई भी परियोजना शुरू होती
है उसके गुंण-दोषों के आधार पर ही प्रारम्भ की जाती है,और जब परियोजना शुरू हो गई तो कोई भी ताकत
इन्हैं बन्द नहीं करा सकती, क्योंकि सरकारें प्रभुत्व सम्पन्न होती है,। आप इस भाव को किस दृष्टि में देखना
चाहेंगे?

8-बाबा जी समाज ने सन्त समाज गणों को भारतीय सभ्यता और संस्कृति की
रक्षा का कार्य सौंपा है, लेकिन आज यह वर्ग राजनीति और उद्योग में कूद पडा है,
और भारतीय संस्कृति की रक्षा का कार्य भी पकडके रखा है, आपको नहीं लगता कि आज
की राजनीति में भ्रष्ट लोग आते हैं, और उद्योग, जिनसे पैसा आता है, में कालाबाजारी होती है,
क्या सन्त समाज अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है ? जो काम समाज ने उन्हैं सौंपा था उनके दायित्व
का निर्वहन वे सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं? इसमें उदाहरण देने की आवश्यता नहीं होगी। प्राचीन काल के
सन्त योग-तपस्या से ईश्वरीय शक्ति प्राप्त कर,लोगों को खुशहाली का वरदान देते थे,और गुरु की पदवी से
सम्मानित होते थे। लेकिन आज के सन्त-महात्मा स्वयं तो आधुनिकीकरण की होड में आगे बढते जा रहे हैं,
और समाज को वही परम्परागत शिक्षा पर अडिग रहने की बात करते हैं। बाबा जी बुरा न माने ,सुना है कि
महात्मा को कभी-भी गुस्सा नहीं आता है,यही सन्त की असली पहचान है, क्योंकि सत्य कभी-कभी अति
कडुवा होता भी है,लेकिन तथ्य स्वयं में चिल्लाकर सत्य का बखान करते है। आप इस सम्बन्ध में क्या
कहेंगे।

‎9-बाबा तेजेश्वरानन्द महॉराज जी शुभ सन्ध्या,आपका कहना है कि उत्तराखण्ड में
बडी-बडी कम्पनियॉ खुली लूट कर रहे हैं- इस सम्बन्ध में यह जानकारी होनी जरूरी
है कि 1-इन परियोजनाओं का संचालन छोटी कम्पनियों के द्वारा सम्भव नहीं है,क्योंकि
इनके पास साधन व पैसा अधिक होता है।

2-अगर देश में ऐसी बडी कम्पनियॉ न होती तो देश का विकास सम्भव नहीं है।
विकसित देशों के विकास का कारण ही यही है।3–जबसे देश में उजारीकरण और
वैशवीकरण की नीति बनी तबसे सारी परियोजनाओं का संचालन इन्हीं कम्पनियों द्वारा
होने लगा है,क्योंकि इससे सरकार को भी बहुत अधिक लाभ होता है,4-जहॉ तक लूट का
प्रश्न है यह तो एक आदर्श बन गया है जिसे भ्रष्टाचार भी कहते हैं,इसलिए सिर्फ बडी कम्पनियों
से लूट का प्रश्न अज्ञानता है। इस धारणॉ को बदलने की आवश्यकता है।5- अगर आप किसी परियोजना
क्षेत्र में जाकर देखें तो स्थानीय लोग इसलिए खुश हैं कि उनकी योग्यता के आधार पर रोजगार पहले उन्ही
को मिलता है। और क्षतिपूर्ति का मुआवजा सरकारी दर से कई अधिक गुना मिल जाता है। विष्णुप्रयाग में तो
कम्पनी ने गॉव को एक इण्टरकालेज और कई सुविधाएं दी हैं।6-इन बडी कम्पनियों द्वारा कार्य शीघ्र हो जाता है,
आपको मालूम होगा कि विष्णुप्रयाग परियोजना का संचालन पहले करकार कर रही थी,दशको तक कुछ नहीं हो पाया
लेकिन जब जे.पी कम्पनी को परियोजना हस्तॉतरित हुई तो कुछ वर्षों में ही कार्य पूर्ण हो गया।

10-बाबा जी आपके संदेश में जो फोटो दिखती है वह शंकाराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जोशीमठ की जैसी है।
लेकिन नाम बाबा तेजेश्वरानन्द महॉराज है ।क्या यह हमारा भ्रम तो नहीं है ?

11-बाबा जी आपने यह स्वीकार किया है कि बाबा लोग अनपढ गंवार होते हैं, लेकिन वे मानव हितकारी
होते हैं ।मगर आपको नहीं लगता कि अनपढ गंवार की सोचने की क्षमता संकीर्ण होती है।

12-बाबा जी आपने कहा कि बाबा लोग अनपढ और गंवार होते हैं, तो क्या हम यह समझें कि बाबाओं
को हमारी बात समझ में नहीं आयेगी ।

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