जीवन की बात-1


बातों की परछाइयॉ,
आज भी बदल रही हैं,
रची है देव ने लीला राम की,
रचा महॉभारत पॉडवों का।

कलयुग के अध्याय में,
अच्छा है जुडे अध्याय,
अपने नाम का,
बात क्या है,
आखिर पूछता हूं,
अपने कशमकश दिल से।

रूह की आवाज है,
दिल की पुकार है,
परछाइयों की ओट,
से बात है इक कीचड की,
हॉ कीचड में एक कमल की ।

फेंके हैं शिला मैंने,
देह में लगे हैं धब्वे,
चेहरे पे धव्वे हैं अभिशाप के,
धव्वे हैं अभाग्य के,
और हैं गन्दगी के ।

बस कीचड में एक रूह है,
देखें तो कीचड ही कीचड है,
कीचड से प्रेम किया है,
समझकर प्रिय फूल कमल का है,
खुदा ने नयन खोलकर,
मेरे रूह कमल का दिखा दिया है।

शुक्र गुजार हूं,
दैव का मैं,
आज मेरे रथ की,
लाज बचाई शपथ लिये,
रथ साथ चलूंगा,
कीचड का परित्याग करूंगा।

लक्ष्य अभेदी का प्रण,
इक दिन जीवन लक्ष्य,
अरु करवट दृढ संकल्प,
लिये चलूगा,
रथ पूर्ण जीवन की कामना है ।

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