धर्म तत्व से मनुष्य की पहचान-7


1-धर्म तत्व से मनुष्य की पहचानः-

धर्म ही एक ऎसा तत्व है जो मनुष्य को
पशु से अधिक विलक्षण सिद्ध करता है यदि
मनुष्य में ईश्वर और धर्म की भावना न रहे
तो मनुष्य पशु ही है,वह जडत्व में अपने खाने
-पीने तथा शान से जीने को ही जीवन को मानकर
अपना मानव जीवन निरर्थक कर देता है ।बस धर्म
की भावना ही उसे जीवन में अपने भगवान के दर्शन
की प्रेरणा देकर उनके हित और सेवा में लगने की ओर
प्रवृत्त करती है।

2- आप स्वयं शक्तिमान होः-

यदि आप अपने जीवन में अतीत की घटनाओं
को याद करो तो देखोगे कि आप सदैव व्यर्थ ही
दूसरों से सहायता पाने की चेष्ठा करते रहे ,लेकिन
कभी पा न सके ,जो कुछ आपने सहायता पाई है वह
तो अपने अन्दर से ही थी ।यह कभी न कहें कि मैं नहीं
कर सकता,इसलिए कि आप अनन्त स्वरूप हो आपकी जो
इच्छा होगी वही कर सकते हो, आप तो शक्तिमान हैं ।

3-व्यक्ति से नहीं उसके जीवन से घृणा करेंः-

जीवन में अनुकूलता और प्रतिकूलता में एक
समान जीना ही त्याग है,व्यक्ति सुन्दर नहीं
होता उसका जीवन सुन्दर होता है ।व्यक्ति से
घृणा न करते हुये उसके दुष्कर्म से घृणा करो,
क्योंकि व्यक्ति मूल रूप से अच्छा ही है। उससे
घृणा करके हम खुद दुखी हो जायेंगे ।इन्सान
ही इन्सान के काम आता है,अगर इन्सान दूसरे
इन्सान की मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा ।

4-शक्ति जीवन और कमजोरी उसकी मृत्यु हैः-

यह एक सच्चाई है कि मानव
की शक्ति ही उसका जीवन है,
और उसकी कमजोरी ही उसकी
मृत्यु है। शक्ति परम सुख और
जीवन अजर- अमर है । कमजोरी
तो कभी न हटने वाला बोझ और
यंत्रणा है, और कमजोरी मत्यु है ।

5-क्षमा से भार मुक्त हो जाते हैंः-

क्षमा भूतकाल को भूल जाने से आती
है। जो हो गया जो बीत गया उसे भूल
जाओ,वर्तमान में तुम खडे हो। सहजयोग
में योग्यता पाने के लिए आपको अपने
भूतकाल से मुक्त होना पडेगा।अपराध स्वीकार
करने की आवश्यकता नहीं है-क्षमा होनी चाहिए,
यदि आपने क्षमा कर दिया तो आप भार मुक्त हो
जायेंगे।और जो क्षमा नहीं कर सकता वह सहजयोगी
नहीं हो सकता।यदि क्षमा करना नहीं सीखोगे तो क्षमाशील
नहीं आयेगी,जिससे एक दिन हमारे अन्दर ज्यादा नष्ट
करने की शक्ति आयेगी और हम ही अपने लोगों को नष्ट करेंगे।

6-क्षमा करने से आज्ञा चक्र ठीक हो जाता हैः-

आपको यह बात समझनी होगी कि
आप अन्य लोगों से ऊपर उठ चुके हो,
क्षमा वही कर सकता है जो बडा होता है,
छोटा आदमी क्या क्षमा करेगा,बडी तबियत
के लोग क्षमा करते हैं, उनकी क्षमाशीलता
बहुत जवर्दस्त होती है । यदि किसी ने गलती
कर दी तो उसे माफ कर दीजिए,यदि कल हम
गलती करते हैं तो कौन हमको सजा देगा,किसी की
गलती पर हमें तो उसे सजा देने का अधिकार ही नहीं
है,बस आप क्षमा कर दें सबको। आपका आक्षा चक्र ठीक
हो जायेगा।

7-अहं (मूर्खतापूर्ण बातें) से मुक्ति पायेंः-

अहं का अर्थ है स्वयं अपने से प्रेम
करना अर्थात झूठी महानता।छोटी-छोटी
बातों के लिए नाराज हो जाते हैं।आप
स्वयं को महान मान बैठते हैं। आपको
देखना होगा कि किस प्रकार उसमें अहं
कार्यरत है यही तो पतन का कारण है।इसके
लिए आपको यह करना है कि जब आप स्वयं
में अहं देखने लगते हैं तो इस पर हंसें और सोचें
कि मुझमें क्या कमी है। अहं एक बन्धन नहीं है
क्योंकि बन्धन तो बाहर से आता है जबकि अहं
आन्तरिक है,किसी भी चीज से यह आ सकता है।अहं
को ठीक करने के लिए हमें उसका साक्षी होना है कि सिर्फ
इस स्थिति को नाटक के रूप में महशूस करें।साक्षी अवस्था
में यह देखना है कि किस प्रकार ये हमें अच्छे मार्ग पर चलने
से रोकता है। जब अहं भाव बढने लगे तो स्वयं से कहें कि
श्रीमान जी आप यह कार्य नहीं कर रहे हैं,ये कार्य आप नहीं कर रहे
हैं यह बात आप स्वयं सुझाते रहेंगे तो आपमें अहं नहीं बैठेगा ।

8-अहंकार एक दीर्घकाय समस्या हैः-

अहंकार जीवन भर चलने वाली समस्या है।
और परमात्मा ने खासकर मनुष्य को अहंकार
का वरदान दिया है, इसलिए ये अहंकार मारने
से नहीं मरता बल्कि सहजयोग में ये तो स्वयं
अपने आप छूट जाता है। इसका समाधान
दूसरों को क्षमा करना है, आपको क्षमा करना
सीखना है, प्रातःकाल से संध्या तक क्षमा प्रार्थी
बनें रहें, अपने दोनों कानों को खींचकर कहें कि
हे परमात्मा हमें क्षमा करें, प्रातः काल से सायं-
काल तक असका स्मरण करते रहें। अहं को
जीतने के लिए भाषा शैली में परिवर्तन करना होगा।

9-कर्म-काण्डों से अहंकार बढता हैंः-

उपवास रखने, जप,तप करने,हवन करने
आदि से अहंकार बडता है, क्योंकि अग्नि
दायें ओर है।हम जो भी कर्म काण्ड करते
हैं उससे अहंकार बढता है,इसका इलाज ईसा
मसीह ने बताया कि आप सबसे प्रेम करें,
अपने दुश्मनों से भी प्रेम करें प्यार के अलावा
और कोई इलाज नहीं है-यह परम चैतन्य का प्यार
है।यह अहंकार तो हमारा शत्रु है,जिसका सृजन स्वयं
हमने किया है,पहला कार्य जो अहं करता है कि वह
दूसरे को मूर्ख बनाना चाहता है। अनियंत्रित अहंकार
परमात्मा को चुनौती देना है।ये अहं उस स्थान पर है जिसे
पार करके आपको सहस्रार में जाना है,आपमें तो एक हजार
शक्तियॉ हैं परन्तु अहंकार के कारण आप उनका प्रयोग नहीं कर
पाते हैं।इस अहं में तो कोई विवेक नहीं होता, यह तो सिर्फ हमारे
मार्ग की बाधा है।माता जी कहती हैं कि अहं के कारण आप विघटित
हो जाते हैं ।आप अकेले पड जायेंगे ।अपने अहं की कार्य शैली को देखते
रहें।अहं से लडाई नहीं करनी है,बल्कि समर्पण करो यहीं एक मात्र उपाय है
अहं को दूर करने का ।

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