सहज योग -महॉ योग-4


1 सहजयोग में आकर समर्पित एवं ईमानदार होना पडेगा

आपके ह्दय में यदि सहजयोग के लिए
प्रेम नहीं है तो आपके ह्दय में अपनी मॉ
के प्रति प्रेम नहीं है,इसका अर्थ है आप अन्दर
से गडबडियॉ करते हैं,व्यर्थ की जीजों के प्रति भागते
हैं,आप किसी अन्य क्षेत्र में चले जॉय।सहजयोग में न आंय,
यहॉ तो आपको समर्पित एवं ईमानदार होना पडेगा।किसी भीप्रकार
की बेइमानी आप कर रहे हैं तो आपकी पोल खुल जायेगी,आपको उचित
दण्ड मिलेगा, सहज योग आपको दंडित करे या न करे आदि शक्ति के द्वारा
आपको दंडित कियाजायेगा। दण्ड देने के तरीके में पहला तरीका अलक्ष्मी है। अर्थात
जब आपको दण्ड मिलता है तो आप दिवालिये हों जायेंगे, आपके पास धन बिल्कुल नहीं
रहेगा । आपको जेल जाना पड सकता है। अगर भ्रष्टाचार सहज योग में प्रवेश करता है तो
भ्रष्टाचारी एकदम से खोज लिए जायेंगे और दण्डित होंगे इनको तो खुद उनकी कुण्डलिनी ही
दंडित करेगी ।सहज योग में तो हम यह प्रमाणित करने के लिए आये हैं कि हम पूर्ण हैं ।
हमें पूर्व संस्कारों के अनुसार नहीं चलना है बल्कि हम नयें साम्राज्य में पहुंच चुके हैं इसका
हमें आनंद लेना चाहिए। आप संसार की दल-दल में न फंसें जहॉ कि बहुत से लोग खो गये
हैं।

2-मानवीय चेतना को उन्नत बनाइये

अगर आपने आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है
तो उसके बाद भी उन्नत अवस्था प्राप्त करने के लिए
आपको बहुत लम्बी यात्रा करनी पडेगी, लेकिन आप बीच
में ही अटक जाते हैं।जब आप चैतन्य लहरियॉ प्राप्त क हैं तब
क्या करते हैं?लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया होती है कुछ लोग
इन लहरियों का मूल्य नहीं समझते हैं। अगर हम आत्म साक्षात्कारी
हो गये तो लोगों को आत्म साक्षात्कार दे सकते हैं। और यदि आत्म साक्षात्कार
प्राप्त होने पर आपको अहंकार होने लगता है तो आप असफल हो जायेंगे और आपको
फिर वहीं वापस आना होगा जहॉ से शुरू किया था।

3 -सहजयोग के प्रति आपके आचरण कैसे हो

रुपये पैसों के के मामले में सहजयोग के
प्रति आपके कैसे आचरण हों यह महत्वपूर्ण
बात है,यह आपकी उन्नति में समस्या उत्पन्न
कर सकती है क्योंकि उसमे नाभिचक्र खराब हो जाती
है,और यदि नाभि चक्र खराब हो गई तो यह खराबी सारे
भव सागर पर व्याप्त हो जाती है,और अगर भवसागर खराब
हो गया तो एकादश रुद्र की संहारक शक्तियॉ जो भवसागर मे हैं,
पकडी जाती हैं ,फिर चेतना खो बैठोगे। इसलिए आपको सतर्क रहना
होगा । आपको मालूम है कि सहस्रार में ब्रह्मरन्ध्र एक एसे बिन्दु पर जहॉ
ह्दयचक्र है जिसका आपके ह्दय से सीधा सम्बन्ध है ,अगर आप सहजयोग को
ह्दय से न करके वाह्य रूप में ही करेंगे तो आप बहुत ऊंचे नहीं उठ सकते हो इसमें
आपको पूर्ण ह्दय देना होगा।कुछ लोग आते हैं और पीछे बुडबुडाते रहते हैं कि यह होना
चाहिए वह होना चाहिए एसे लोगों को ईसा मसीह बुडबुडानी वाली जीवात्मायें कहते हैं वे
लोग बहुत दुख उठाते हैं।क्योंकि वे दोहरा छल करते हैं जोकि बहुत खतरनाक है,यह एक
विश्वासघात कहलाता है जिसका दण्ड तो मिलना ही मिलना है।

4-साक्षी भाव(नाटक )जीवन में अन्तस के दर्शन करें

साक्षी भाव का अर्थ हैं इस जीवन को नाटक के रूप
मे देखें।आपको स्वीकार करना होगा कि आप जो भी हैं
ठीक हैं,स्वयं की तुलना दूसरे से न करें।यदि आप वाह्य चीजों
से प्रतिक्रिया करना बन्द कर देते हैं तो आपके अन्तस में प्रतिक्रिया
होगी और फिर इसमें अन्तर्दर्शन आरम्भ होगा। ये शक्ति आपको अपने
अन्दर विकसित करनी चाहिए। किसी बाहरी चीज के प्रति आप प्रतिक्रिया
करने लगे तो उसे रोक लें, सभी प्रकार की प्रतिक्रियायें समाप्त कर दें।तो फिर
आप स्वयं को बहुत शक्तिशाली पायेंगे,क्योंकि आप में न तो आकॉक्षायें होंगी,और
न ही कोई विशेष लगाव। कुछ भी नहीं ,साक्षी रूप से आप नाटक देख रहे हैं ।यह
अत्यन्त दिलचस्प है कि आप हर चीज के पीछे विनोद एवं मूर्खता को देख सेकेंगे।
आप देखेंगे कि किस प्रकार लोग उग्र हैं,आप उनपर हंसेंगे,बिना परेशान हुये बिना
उत्तेजना के ।यदि आपको मानवीय बनना है तो प्रतिक्रिया न करें इससे आप
निश्चित रूप से उन्नत होंगे ।

Advertisements