आस्था की प्रकृति-3


DSC00240

A-जय दुर्गा माता

1-कर्म जीवन का अंग है-

क-        इस जगत में कोई भी जीव हो चाहे
उनमें वह सन्यासी हो यागृहस्थी सबको अपने-
अपने क्षेत्र में परिश्रम करना होता है।कर्म को हमें
जीवन की साधना के रूप में स्वीकार कर लेना होता
है।धोखा या चालवाजी से कोई चीज प्राप्त नहीं हो सकती
है,इससे तो आदमी स्वयं को गढ्ढे में गिराने   के समान है।
वैसे कहा जाता है कि भगवान की कृपा सन्यासियों की अपेक्षा
गृहस्थियों पर अधिक रहती है। क्योंकि सन्यासी लोग तो भगवान
का नाम लेने के लिए ही घर छोडकर आये हैं,       यदि वे भगवान को
न पुकारें तो उनके लिए वह महॉ पाप माना जाता है।लेकिन निष्ठावान
गृहस्थी भक्त सिर पर भारी बोझ लादे हुये भी भगवान की कृपा याचना
करके उसके दर्शन कर सकते हैं ।
ख-         हमारे धार्मिक ग्रन्थों की
अवधारणॉ को हमें नहीं भूलना होगा कि
जीवन में कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता है,
और न नष्ट होता है। उसका प्रतिफल या कुफल
अवश्य मिलता है। इसीलिए जो भी सत्कर्म हो,जिस
अवस्था में हो करना चाहिए।और यदि पूर्व में कोई कुकर्म
किया हो तो इस पाप राशि से मुक्ति का उपाय भी यही मूल
धर्म के कार्य है ।
ग-         कर्मयोग के द्वारा चित्त
शुद्धि होती है,आत्म ज्ञान होता है।कर्म
तो सभी करते हैं मगर कर्मयोग की साधना
सभी नहीं करपाते हैं,क्योंकि कर्मों के बन्धन
में उन्हैं दुख का भोग करना होता हैं। भगवान श्री
कृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्म करना तुम्हारा अधिकार
है,कर्मफल नहीं।कर्मफल की आशा से कर्म करने वाले तो दीन,
दुर्वल और निम्न श्रेणी के लोग होते हैं । कर्म करो,किन्तु निस्वार्थ
भाव से करो,यही परमानन्द को प्राप्ति का मार्ग है ।
घ-         अधिकॉश लोगों की धारणॉ है
कि यदि निष्काम होकर कर्म किया जाय
तो फिर कर्म के प्रति आकर्षण और प्रेरणॉ कैसे
उत्पन्न होगी,किसी भी काम को मन लगाकर कैसे
किया जाय,यदि खुद को फायदा न हो तो मैं कर्म करने
क्यों जाऊं?यह भावना सही नहीं है।अगर सुख के लिए ही
लोग कर्म करते हैं,तो सुख मिलता कितना है? पहली बात
तो यही है कि अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को सुखों से वंचित
और उन्हैं दुखी करना होता है। और इससे जो भी सुख मिलता है
वह अस्थाई होता है। स्थाई सुख के लिए तो निस्वार्थ कर्म आवश्यक
है। हमारे महॉन पुरुषों की यही अवधारणॉ है ।
ड.-     ईश्वर के दर्शन सबके भाग्य
में इसी जन्म में नहीं होता है बल्कि
कुछ लोग जन्म जन्मॉतर से उन्हैं पाने
के लिए कठोर तपस्या,साधन भजन करते
चले आरहे हैं,और पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार,
और साधना के प्रभाव से इस जन्म की अनुकूल
साधना से बचे हुये कार्य को सहज ही पूरा कर
देते हैं। और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो
जाते हैं ।
च-            सत्कर्मों का फल अक्षय
माना जाता है,जितना संचय उसका
किया जाय,भविष्य में,इस जन्म में,
या अगले जन्म में अवश्य मिलता है।
विपत्ति,घात-प्रतिघात,भयप्रलोभन,या
अन्धकार या निराशा के समय समय यह
फल काम आता है।सत्कर्मों की संचित सम्पति
स्थाई मानी जाती है । यह देखा गया है कि सत्कर्मों
को पैदा करने में दुख,रक्षा करने में दुख,नष्ट होने में
दुख व कष्ट होता है । इसलिए सत्कर्मों के संचय का
प्रतिफल हमें सुख के रूप में प्राप्त होता है ।

2-     कच्चे मन का स्वभाव-

क-     कच्चा मन एक महॉमायावी
के समान होता है।यह हमें कब,किस
तरह से कुमार्ग में ले जाकर मायावी जाल
में फंसा देगा,यह समझ पाना कठिन है। कच्चे
मन की पहचान है- देह और इन्द्रियों के सुखों को
ढूडते रहना,स्त्री,पुत्र,परिवार को अपना समझकर उसकी
माया में मोहग्रस्त होना, धन-जन,यश-प्रतिष्ठा और प्रभुत्व
को जीवन की एकमात्र कामयाब वस्तु को समझना। इस स्थिति
में वह सुख चाहने की लालसा में उसे पग-पग धक्का खाकर और
दुख पाकर भी चैतन्य का लाभ नहीं होता है।चारों ओर लोग मरते
हैं लेकिन कच्चे मन वाला मनुष्य यह कभी नहीं सोचता कि मुझे
भी कब किस क्षण सबकुछ छोडकर चले जाना पडेगा।बस वह यही
सोचता है कि कैसे धोखा देकर,चालाकी से,या किसी भी उपाय से
अपना काम बन जाय,चाहे उससे दूसरे को नुकसान पहुंचे या दुख
मिले इसकी उसे कोई परवाह नहीं होती है।अपना सुख ही उसका
सर्वस्व संसार होता है ।
ख-        अगर मन को हम एक फल
के रूप में देखें तो उपयुक्त होगा,कि जब
वह कच्चा होता है तो उसमें खट्टापन,कसैला
और बेस्वाद होता है     और जिसे खाने पर रोग
उत्पन्न करता है,लेकिन पक जाने पर अच्छा स्वाद
और उपकारी होता है, मन की दशा भी इसी प्रकार की
मानी जाती है।
ग-         कच्चे मन से किया गया कार्य
चाहे वह देश या जगत के कल्याण के लिए
किया जाता हो उनका उद्देश्य महान होते हुये भी
उनके द्वारा संसार का हित के बजाय अहित ही देखा
गया है। अपने आदर्शों में वे अधिक समय तक अटूट रूप
से नहीं टिक पाते हैं। नाम यश प्रतिष्ठा और दूसरों पर प्रभुत्व
करने की लालसा उनकी बलवती हो जाती है। शीघ्र उनपर हिंसा,
द्वेष,संकीर्णता और स्वार्थपरता का भूत सवार हो जाता है,जिससे
उनके सारे कार्य विफल हो जाते हैं। वे अपने भीतर के विष को समाज
में फैलाकर जन मानस को कलुषित कर देते हैं। यहॉ तक कि वे धर्म के
प्रति अविश्वास और अश्रद्धा के भाव भी पैदा करते हैं।
घ-          अगर देखें तो सभी कुछ मन
का खेल है,मन के ऊपर ही सब नर्भर है।
मन में बन्धन है,मन ही मुक्ति है। कहते हैं
जैसी मति वैसी गति। यदि कठोर तपस्या करके
भी कोई अपने अन्तःनिहित वासना के वशीभूत होकर
विषयसुख और नाम यज्ञ के प्रति आकृष्ट हो तो उसका
सारी तपस्या भस्म हो जाती है,लेकिन जो लोग ईश्वर के
शरणॉगत हो जाते हैं तो वे इस दुख से बच जाते हैं।

3-ईश्वर में आस्था का स्वभाव-

क-            यह देखा जाता है कि
हम बात-बात में भगवान की मर्जी
कहकर ईश्वर की दुहाई देते रहते हैं,यह
तो सार शून्य है,सिर्फ आवाज मात्र है,जैसे
कि छोटे-छोटे बालक बालिका कहते रहते हैं,
भगवान कसम,राम दुहाई आदि,जैसे अंग्रेजी में
कहते हैं Thank God या My God लेकिन इन शब्दों
का प्रयोग वहीं कर सकता है जिसे ईश्वर का पूरा ज्ञान
हो,जिसने ईश्वर को आत्मसमर्पण कर दिया हो,जिसे पक्का
ज्ञान है। ये शब्द आत्मा की आवाज है जो उसकी आत्मा से
निकलकर सत्य की परख के लिए प्रयुक्त होते हैं। लेकिन आज
एक परम्परा बन गई है कि ईश्वर के सम्बन्ध में कोई ज्ञान नहीं
है,और आत्म समर्पण भी नहीं है लेकिन इन शब्दों का प्रयोग करते हैं,
ताकि शीघ्र विश्वास दिलाया जा सकें ।
ख-          हमारे वेद कहते हैं कि जो पूर्ण
है वह चिरकाल में भी सदा पूर्ण ही रहता है,
इसमें क्षय नहीं होता। पूर्ण से पूर्ण का विनिमय
करने पर ही हम पूर्णता के प्राप्त कर सकते हैं। वह
परमात्मा स्वयं में पूर्ण है,इसे प्राप्त करने के लिए इस
शरीर का सम्पूर्ण सामर्थ्य और मन ,प्राण,अन्तःकरण को
समर्पित करना होता है तभी हमें पूर्णता की प्राप्ति हो सकती
है।
ग-     इस दुनियॉ में उस परमात्मा
को प्राप्त करने की सामर्थ्य हर एक में
अलग-अलग होती है, उनमें कुछ लोग शरीर
से बहुत दुर्वल होते हैं या जिन्दगी भर रोगग्रस्त
होते हैं,जोकि उस साधना को सम्पन्न करने में असमर्थ
होते हैं।इसका मतलव वे लोग तूफान के समय समुद्र में पडी
छोटी नाव के समान पछाड खाते हुये पडे रहेंगे ?क्या वे कीडे
मकोडों की तरह पिसते रहेंगे ?नहीं ईश्वर केराजस्व में यह कभी
नहीं हो सकता।यदि उनके मन मेंअटूट श्रद्धा भक्ति और प्रेम है तो
उन लोगों की ह्दय विदारक आवाज उस प्रभू कानों में अवश्य पहुंचती
है।चाहे उनके आस पास की परिस्थितियॉ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न
हो। इस लिए इस जीवन में सिर्फ उस परमात्मा से प्रेम करें,उसकी अपार
कृपा तभी प्राप्त हो सकती है।वे लोग इसी जीवन में शॉति के अधिकारी होते
हैं,और अन्त में परम पद का लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।
Advertisements