पुस्तकों से सतर्कता से निर्णय लो-1


पुस्तकों से निर्णय लेने से पहले गतिशील बनो-

              होता क्या है कि लोग
पुस्तक पढते हैं,और फिर जीवन
के बारे में निर्णय लेते हैं,जबकि यह
उपयुक्त नहीं है हमें पहले जीवन में
गतिशील बनना होगा और फिर फिरे
पुस्तकों के बारे में कोई निर्णय लेना
चाहिए।लेकिन लोग आज शास्त्रों से सीख
रहे हैं,जिससे वह महान शास्त्र बिना खुले
रह जाता है। और शास्त्रों के द्वारा वे लोग
केवल विचार पाते हैं। एक बार एक आदमी
अपनी पत्नी से तलाक के सम्बन्ध में वकील
से मिलने गया। वकील ने उस आदमी से पूछा
कि तुम्हारे पास तलाक देने का आधार क्या है?
तो उस आदमी ने कहा कि मेरी पत्नी को भोजन
की मेज पर बैठने की आदत अच्छी नहीं है जिससे
अपना स्वाभिमान नष्ट हो गया है। वकील ने कहा कि
यह तो बुरी बात है, मगर आपका विवाह हुये कितने साल
हुये हैं।उस आदमी का उत्तर था आठ वर्ष।वकील ने कहा आप
अपने पत्नी के तौर तरीकों को आठ वर्षों तक सहते रहे, तो मेरी
समझ में यह नहीं आ रहा है कि अब आप उसको तलाक क्यों देना
चाहते हैं? उस आदमी कहना था कि मैं पहले स्वयं नहीं जानता था,मैं
आज सुबह ही शिष्टाचार की एक पुस्तक खरीदकर लाया हूं,और मैंने
उसमें शिष्ठाचार की बातें सीखी हैं,इसलिए मैं अपनी बीबी से तलाक
चाहता हूं। यही स्थिति आज के जीवन में दिखती है कि पहले पुस्तक
पढते हैं और फिर जीवन के बारे में निर्णय लेते हैं।अगर तुम पहले
पुस्तकों के तर्कपूर्ण जाल में में उलझ जाते हो तो फिर तुम जीवन
को जानने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकोगे। इसलिए अधिक सहज
और स्वाभाविक बनने का प्रयास करो! परमात्मां के बारे में सबकुछ
भूल जाओ! उस परमात्मां के साथ रहो जो तुम्हैं पहले से ही घेरे हुये
है।जरा कोयल के कूकते स्वर देखो,वह प्रार्थना कर रही है।पक्षियॉ चह
चहाते हुई प्रार्थना कर रहे हैं, जरा उन वृक्षों की ओर देखो वे कितने
प्रार्थनापूर्ण हैं।पूरा स्तित्व ही प्रार्थना में मग्न है,लेकिन तुम तो अपनी
खोपडी में परमात्मां के बारे में विचार कर रहे हो कि वह है अथवा नहीं
है!
 

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