सुख दुख में समष्टि दृष्टि होना सफल व सार्थक जीवन की पहचान है


 

      सफल और सार्थक जीवन
के लिए सुख और दुख में हमारी
समदृष्टि का होना जरूरी है। आप
अपने स्वामी खुद हैं। इसलिए जिस
तरह जीवन को बनाना चाहेंगे, बना
सकते हैं, केवल दृढ़ संकल्प, एकाग्रता,
सच्ची लगन हो तो ऊंचे से ऊंचा लक्ष्य
पाने में कोई समस्या नहीं होती।

                 न्याय और सत्य के
स्वयं पक्षधर बनें तो कोई ताकत
आपको महानता के मार्ग में बाधक
नहीं बना सकती है।   पैसा समय की
महत्वपूर्ण आवश्यकता है, किंतु उसके
इतने भी दीवाने नहीं बनें    कि घर की
और स्वयं की सुख-  शांति तक में दरारें
पड़ जाएं और बाद में    आप अपने घर में
अकेले पड़ जाएं। अनासक्ति भाव से कमाएं
और जरूरी खर्च करने में कभी संकोच भी मत
करें। मितव्ययी बनें, कंजूस नहीं। पैसा और नाम
कमाना ही जीवन का लक्ष्य न हो। आपको जो मिलना
है वह मेहनत, कार्य के प्रति ईमानदारी और प्रभु इच्छा
से मिलना सुनिश्चित है फिर किस बात की हाय-तौबा।

              समय आने पर ही काम
होते हैं, किंतु समय की प्रतीक्षा में
टकटकी लगाए रहने वाला भी-‘कारवां
गुजर गया गुबार देखते रहे’ की स्थिति
में दुखी होता है। इसलिए समय से पहले
किसान को भी फसल की तैयारी करनी ही
पड़ती है, तभी वह फसल की सही कीमत
और आनंद प्राप्त कर पाता है। कर्मठ बनने
वाला कभी भी घाटे में नहीं रहता। जो मिलना
है, वह तो मिलता ही है, उससे श्रेष्ठ कार्य उसकी
प्रतिष्ठा बढ़ाकर आगे के भविष्य को भी संवार देते हैं।
युधिष्ठिर जब भीष्म पितामह के अंतिम क्षणों में सफलता
का रहस्य पूछते हैं तो वह कहते हैं-‘   अपनी असफलताओं
से अपने को अपमानित अनुभव नहीं करना चाहिए। सफलता
को सदैव अपने करीब ही समडों। उसे (अपने लक्ष्य के लिए)
तलाशें और प्राप्त करने के लिए सतत् लगे रहें।   ‘ कोई भी
व्यक्ति मन, वचन व कर्म से एक है तो वह सदैव    मस्त रह
सकता है। उसे कभी आडंबर, शो-बाजी का मुखौटा ओढ़ना नहीं
पड़ता। त्याग, तप, तपस्या (साधना) के बगैर आदमी अपने
क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर नहीं पहुंच सकता है। सत्य के लिए
मितभाषी बनें, संतभाषी बनें। व्यसनों से दूर रहकर संयमित,
सादा जीवन, मौसम के अनुरूप आहार-विहार होना, स्वस्थ
शरीर में स्वस्थ मन का होना आवश्यक है। व्यभिचार, चोरी,
ठगी, झूठ और जालसाजी से बचने वाला ही सदैव प्रसन्न रह
सकता है।

                    अपने आदर्श को
ताक में रखने वाला अवसरवादी
व्यक्ति उदास चेहरे को लेकर भटकता
रहता है। सुख के पीछे भागने की इच्छा
जब समाप्त हो जाती है तो वह जीवन में
स्थायी आनंद की स्थिति का कारण बनती है

 

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