स्वाभिमान से सकारात्मक का जन्म होता है


 

            कहते हैं कि जीवन
में नाम, मान, शान, शोहरत
आदि सब कुछ चला जाए तो कोई
बात नहीं, परंतु यदि चरित्र पर दाग
लग जाए तो मानो जीवन खत्म हो जाता
है। हम सभी जीवन भर अपनी चारित्रिक रक्षा
के लिए जूझते रहते हैं ताकि जब इस दुनिया
से जाने का वक्त आए तो हम बेदाग होकर जाएं।

                     ठीक ऐसा ही सम्मान
के बारे में कहा जा सकता है। दुनिया
में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सम्मान
की इच्छा न रखता हो। हम सभी चाहते हैं
कि हमें सदैव सभी लोगों द्वारा सम्मान प्राप्त
हो, परंतु ज्यादातर लोग सम्मान देना नहीं चाहते,
वे सिर्फ लेना चाहते हैं। कोई भी बेआबरू या अपमानित
होकर जीना पसंद नहीं करता। जब दूसरे हमारी आलोचना
करते हैं और हमारी पीठ के पीछे यदि हमारी आलोचना
करते हैं, तब हम नाराज होकर या क्रोधित होकर उन्हें
प्रतिक्त्रिया देते हैं।    इस स्थिति में हम जैसे उन्हें स्वयं
के लिए यह सिद्ध कर बताते हैं कि हमारा आत्मसम्मान
इतना कमजोर है,   जो किसी के भी पत्थर मारने से टूट
जाएगा। इस दुर्बलता  का मुख्य कारण है हमारे आत्म-
सम्मान की कमजोर बुनियाद। हम बड़ी आसानी से यह
भूल जाते हैं कि हमारे इर्द-गिर्द जो भी लोग हैं, उन सभी
की हमारे प्रति अलग-अलग राय होती है, जिसके बारे में हम
कभी पता भी कर नहीं पाते, क्योंकि हम किसी के मन में क्या
चल रहा है, यह सुन नहीं सकते हैं।

              मान लीजिए यदि हम
किसी का मन पढ़ भी लें तो क्या
उनको अपनी स्वतंत्र राय रखने का
अधिकार नहीं है? बिल्कुल है। इसलिए
समझदार व्यक्ति वह है, जो दूसरों की
राय की फिक्र करने के बजाय अपने आत्म-
सम्मान की ऊंचाई पर स्थिर रहकर, निंदा को
महिमा और अपमान को स्व-अभिमान में परिवर्तित
करे। इसलिए जब हमें अपने आप की पहचान हो जाती
है, तब हमें दूसरों की राय पर निर्भर होने की कोई भी
आवश्यकता नहीं रहती है। स्वमान और आत्म-सम्मान
में बहुत गहरा रिश्ता है। इनमें से किसी एक के बिना
दूसरा संभव नहीं है। हम सभी को बचपन से ही दूसरों
को सम्मान देने का पाठ पढ़ाया गया है, परंतु क्या आज
तक किसी ने हमें यह सिखाया कि हम अपने आपको कैसे
सम्मान दें? शायद नहीं। आज हमारे संबंधों में सामंजस्य नहीं
रहा और हम संघर्ष से सदा जूझते रहते हैं। स्वमान की कमी
के कारण हमारे जीवन में बेसुरापन और नकारात्मकता आ गई
है।

 

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