डिप्रेशन का मुकाबला करें


                     26वर्षीया अति
महत्वाकांक्षी आकांक्षा देशमुख
नई दिल्ली स्थित एक स्थापित कंपनी
में कार्यरत थीं। उनका कॅरियर ‘उड़ान’ पर
था। एग्जीटिव के पद पर उनका प्रमोशनहोने
ही वाला था कि इसी बीच उनके पिता की एक
सड़क हादसे में मौत हो गयी। उनकी मां अक्सर
बीमार रहा करती थी। परिवार में एक छोटा भाई था,
जो हाईस्कूल परीक्षा की तैयारी कर था।

                ऐसे प्रतिकूल हालात
ने आकांक्षा को दिल-ओ-दिमाग
से तोड़ दिया। वह उदास रहने लगीं,
मानो खुशी ने उनसे नाता तोड़ लिया
हो। लगातार नकारात्मक विचारों से घिरे
रहना और छोटी-छोटी बातों को लेकर
चिड़चिड़ा जाना उनकी आदर में शुमार हो
गया था। इस प्रकार वह जॉब करने की
स्थिति में नहीं रहीं। एक लंबी छुंट्टी लेकर
वह घर बैठ गयींऔर अपनी बदकिस्मतीऔर
कॅरियर की बर्बादी पर पछताया करतीं। आकांक्षा
की गिरती हुई मानसिक व शारीरिक स्थिति को
देखकर उनकी सहेली नेहा उन्हें मेरे पास लायी। मैंने
उनकी समस्या सुनीं।

            उनकी बातों को सुनने
के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच
गया कि वह अवसाद (डिप्रेशन) से
ग्रस्त है। उन्हें एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दी
गयीं और काउंसलिंग भी की गयी। आज
वह स्वस्थ हैं और हालात से तालमेल बिठाते
हुए उनकी जिंदगी एक बार फिर पटरी पर आ
चुकी है।”

                यह कहना है, अपोलो
हॉस्पिटल, नई दिल्ली के वरिष्ठ
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अचल भगत
का। उनके अनुसार डिप्रेशन को समझने
के लिए हमें इस रोग के बुनियादी स्वरूप
को समझना जरूरी है। जैसे कुछ समय के लिए
होने वाली तनावपूर्ण स्थिति को हम डिप्रेशन नहीं
कह सकते।

               विशेष विपरीत

परिस्थितियों में सभी लोगों
को दुख या तनाव महसूस होता
है, लेकिन डिप्रेशन ऐसा मनोरोग
है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति लगातार
काफी समय तक अत्यधिक उदासी
और नकारात्मक विचारों से घिरा रहता
है। वह शारीरिक रूप से भी शिथिल महसूस
करता है।

 

                   इस रोग के कई
कारण हैं। विपरीत स्थितियों
के साथ तालमेल स्थापित करने
में लगातार कई दिनों तक विफल
रहना तो एक कारण है। इसके अलावा
अन्य कारणों में आनुवांशिक कारण से
भी व्यक्ति में सेरोटोनिन की कमी हो
सकती है। इसी तरह महिलाओं में
गर्भावस्था के दौरान प्रोजेस्ट्रॉन
नामक हार्मोन की मात्रा बढ़
जाती है, लेकिन गर्भावस्था
के बाद प्रोजेस्ट्रान नामक
हार्मोन कम होने लगता है।
इस स्थिति में 100 में से 20
महिलाएं अवसाद (डिप्रेशन)से
ग्रस्त हो सकती हैं। गर्भावस्था के
दौरान इस स्थिति को ‘मैटरनल ब्लूज’
कहते हैं।

 

            नई दिल्ली स्थित
तुलसी हेल्थ केयर के वरिष्ठ
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. गौरव गुप्ता
के अनुसार डिप्रेशन के लक्षणों को
तीन भागों में विभाजित कर सकते है..

1. जैविक (बॉयोलॉजिकल)

               जैसे नींद का न आना या
अत्यधिक आना, भूख न लगना,
शरीर में थकान व दर्द महसूस होना।
इसके अलावा कामेच्छा में कमी महसूस
करना और बात-बात पर गुस्सा आना।

2. कॉग्निटिव सिम्पटम:
विचारों में नकारात्मक सोच
की बदली छा जाना, स्वयं को
हालात के सामने असमर्थ महसूस
करना।

3. समाज से अलग-
थलग: व्यक्ति सामाजिक
गतिविधियों में भाग लेने से
कतराता है। वह अपने व्यवसाय
संबंधी दायित्वों का निर्वाह करने में
असमर्थ महसूस करता है।

               इन दिनों उम्रदराज और
वयस्क व्यक्तियों के अलावा युवा
वर्ग भी डिप्रेशन की गिरफ्त में तेजी
से आ रहा है। डॉ. अचल भगत के
अनुसार इसका कारण यह है
कि युवकों को अपने कॅरियर
में स्थापित होने के लिए कड़ी
प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़
रहा है। इसके अलावा वह कम वक्त
में कामयाबियों की सीढि़यां तेजी से
चढ़ना चाहते हैं। उनमें धैर्य नहीं होता
और जब वे अपने जीवन व कॅरियर से
संबंधित पहले से ही तयशुदा लक्ष्यों (टार्गेट्स)
को पूरा नहीं कर पाते, तब उनके दिलोदिमाग
में हताशा व कुंठा घर कर जाती है। यही कारण
है कि युवावर्ग में डिप्रेशन की शिकायतें बढ़ती
जा रही हैं। सकारात्मक सोच व अपनी कार्यक्ष-
मता के अनुसार व्यावहारिक लक्ष्यों को निर्धारित
करने से इस समस्या का समाधान संभव है।

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