कोरोनरी आर्टरी डिजीज दिल की खामोश दुश्मन


               56वार्षीय चंद्र प्रकाश सिंह
हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत से पिछले
कई सालों से ग्रस्त थे। इस कारण वह
एक स्थानीय डॉक्टर के परामर्श से नि-
यमित रूप से दवा ले रहे थे। पिछले एक
साल से वह बेटे की नौकरी और विवाह
योग्य बेटी की शादी को लेकर कुछ ज्यादा
ही तनावग्रस्त रहने लगे थे। इसी बीच लिपिड
प्रोफाइल नामक जांच से पता चला कि उनका को-
लेस्ट्रॉल भी बढ़ा हुआ है।

                    एक महत्वपूर्ण कार्य
के सिलसिले में उन्हें दिल्ली आना
पड़ा। उसी दौरान उन्हें सीने में भारीपन,
तेज दर्द और बेचैनी महसूस हुई। उनके
साथ चल रहे शख्स ने समझदारी का
परिचय दिया और वह शीघ्र ही समय
रहते रोगी को लेकर मेरे पास आया।
चेक अॅप करने और जांचों के बाद
पता चला कि रोगी को दिल का दौरा
पड़ चुका है। बहरहाल समय पर समुचित
चिकित्सा मिलने के कारण मिस्टर सिंह की
जान बच गयी और वह फिर से सामान्य जीवन
जी रहे हैं। लेकिन हर शख्स मिस्टर सिंह की तरह
भाग्यशाली नहीं होता, जिसे हार्ट अटैक होने के बाद
शीघ्र ही समुचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध होती हो।”

             यह कहना है फोर्टिस-
एस्का‌र्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई
दिल्ली के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ
का। उनके अनुसार हृदय में तीन प्रमुख
हृदय-धमनियां (कोरोनेरी आर्टरीज) होती
हैं। दिल के बाएं भाग में दो प्रमुख धमनियां
और दाहिने में एक धमनी होती है। इन धमनि-
यों का कार्य हृदय की मांशपेशियों को ऑक्सीज-
नयुक्त रक्त पहुंचाना है। उम्र बढ़ने पर इन धमनियों
में अवरोध (ब्लॉकेज) उत्पन्न होने लगता है।

              यह अवरोध धमनियों
में कोलेस्ट्रॉल के संचित होने से
होता है। इस कारण कोरोनरी आर्टरीज
में रुकावट पैदा होती है। जब यह रुकावट
70 फीसदी से ज्यादा हो जाती है, तब पीड़ित
व्यक्ति के लिए समस्या पैदा हो जाती है। इस
स्थिति को मेडिकल भाषा में कोरोनरी आर्टरी
डिजीज (सीएडी) कहते हैं। सीएडी के कारण दिल
का दौरा(हार्ट अटैक) पड़ सकता है।

                  कोरोनरी आर्टरी में
अवरोध (ब्लॉकेज) होने पर रक्त
के थक्के (ब्लड क्लॉट्स) जमने से
रक्त का प्रवाह पूरी तरह अवरुद्ध हो
जाए, तब हार्ट अटैक की स्थिति उत्पन्न
हो सकती है। मुंबई में जुहू स्थित क्रिटीकेयर
हॉस्पिटल के हदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जी.पी.रत्ना
पारखी के अनुसार कुछ जांचों के बाद ही सीएडी
का पता चलता है। ये जांचें हैं

a-           इलेक्ट्रो कार्डियो ग्राफी
(ईसीजी)। -ट्रेड मिल टेस्ट(टीएमटी)।

b-इको कार्डियोग्राफी (हार्ट का अल्ट्रासाउंड)।

c-                कभी-कभी थेलियम टेस्ट
या रेडियो न्यूक्लॉइड टेस्ट कराया जाता है।

d-        उपर्युक्त परीक्षणों के
बाद एंजियोग्राफी तब करते हैं,
जब डॉक्टर को यह शक हो कि
अमुक शख्स सीएडी से ग्रस्त हो
सकता है। परीक्षणों के सामान्य रहने
पर रोगी की एंजियोग्राफी नहींकी जाती।
गुड़गांव स्थित मेदांत दि मेडिसिटी के वरिष्ठ
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आर.कासनीवाल के
अनुसार इलाज शुरू करने से पहले परीक्षणों
के आधार पर यह जाना जाता है कि तीन प्रमुख
धमनियों में कितने प्रतिशत तक अवरोध(ब्लॉकेज)
है।

               अगर तीनों धमनियों में
70 प्रतिशत से कम ब्लॉकेज है, तब
दवाओं (मेडिकेशन)से ही सीएडी पीड़ित
को राहत मिल जाती है। इसी तरह अगर
किसी एक धमनी में 70 फीसदी से ज्यादा
ब्लॉकेज है, तो रोगी का इलाज एंजियोप्लास्टी
तकनीक से किया जाता है। अगर इन तीनों ही
धमनियों में 70 प्रतिशत से ज्यादा ब्लॉकेज हो, तब
रोगमुक्त होने के लिए बाइपास सर्जरी ही बेहतर विकल्प
है।