राजा और रानी की नईं कहानी


             कहानियां बहुत पढी और
सुनी हैं। कुछ सच्ची होती हैं तो कुछ
काल्पनिक। कुछ बन जाती हैं तो कुछ
बुनी हुई होती हैं। कहानियां राजा और रानी
की हों तो बहुत पसंद की जाती हैं। बचपन में
सुना करते थे, एक राजा था-एक रानी, दोनों मिल
गए खत्म कहानी।

            एक कहानी जो बनी
नहीं, बल्कि बुनी हुई है शब्दों के
ताने-बाने से। हमारी इस कहानी में
राजा भी है और रानी भी। यहां राजा-रानी
पहले तो मिल गए मगर अंत में मिलेंगे नहीं।
इसका कारण यह है कि हमारी कहानी का राजा
किसी और रानी का है। हमारी रानी भी किसी और
राजा की रानी है..!
..

         अरे यहां तो कहानी
शुरू होने से पहले ही खत्म हो
गई? लेकिन नहीं, जब इसे बुनना
शुरू किया है तो अभी से खत्म कैसे
कर सकते हैं। कुछ तो सोचना होगा राजा-
रानी की इस कहानी को आगे बढाने के बारे में..।
..तो चलिए शुरू करते हैं। हमारी कहानी की नायिका
है वेदिका..! आज उसकी चूडियां कुछ ज्यादा खनक
रही हैं और पायल भी ज्यादा छनक रही है। मगर ये
अपने पिया के लिए नहीं खनक रहीं, बस यूं ही आज
बहुत खुश है वेदिका ..! दौड कर सीढियां चढ रही है।
छत पर पूनम का चांद खिला है। मगर उसे तो अपनी
खिडकी से चांद देखना अच्छा लगता है। खिडकी वाला चां
द ही उसका है, छत वाला चांद तो पूरी दुनिया का है। कमरे में
जाकर देखा, राघव सो गया है। थोडी मायूस हो गई वेदिका। उसे
बुरा लगता था कि वह रात में कमरे में आए तो पति सोता मिले।
यही तो समय होता है, जब वह बात करने की फुर्सत पाती है,
लेकिन अकसर ऐसा होता है कि जब वह काम निपटा कर
कमरे में आती है, राघव सो जाता है। वह कुछ देर कुर्सी
पर बैठ कर खिडकी से झांकता चांद निहारती रही।
फिर उसकी नजर कमरे में सो रहे राघव पर पडी।
वेदिका का मन किया, झुक कर राघव का माथा
चूम ले, हाथ भी बढाया, लेकिन रुक गई।
संयुक्त परिवार में वेदिका सबसे बडी बहू है।
राघव के दो छोटे भाई हैं। सभी अपने-अपने
परिवारों सहित साथ ही रहते हैं। मां-बाबा भी
अभी ज्यादा बुजुर्ग नहीं हैं। बहुत बडा घर है यह,
तीसरी मंजिल पर वेदिका का कमरा है। साथ में एक
छोटी सी रसोई है। रात को या सुबह जल्दी चाय-कॉफी
बनानी हो तो नीचे नहीं जाना पडता। बडी बहू होने के
नाते उसे घरेलू कार्य तो कम ही करने पडते हैं, लेकिन
उसकी जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा हैं। पिछले बाईस बरसों से
उसकी आदत है कि बच्चों को एक नजर देख कर, हर
कमरे में झांकती, सबसे बात करती, किसी बच्चे की
समस्या सुलझाती हुई.. अंत में अपने कमरे में जाती
है। उसे अपने बच्चों के साथ ही दूसरे बच्चों का भी
खयाल है। राघव की आदत है बिस्तर में जाते ही
नींद के आगोश में गुम हो जाता है। वेदिका ऐसा
नहीं कर पाती, वह बिस्तर पर लेट कर सारे
दिन का लेखा-जोखा करके सोती है।
लेकिन आज वेदिका का मन उडान
भर रहा था। वह धीरे से उठ कर
खिडकी के पास आ गई। अभी
शहर जाग ही रहा था। लाइटें कुछ
ज्यादा चमक रही थीं। शादियों का
मौसम था, लिहाजा तेज संगीत के
स्वर हवा के साथ कमरे तक पहुंच
जा रहे हैं।

           उसकी नजर फिर
से चांद पर टिक गई। उसे चांद
में प्रभाकर का चेहरा नजर आने
लगा। अचानक एक गाने के बोल
उसके कानों पर आकर टकराए। एक
बार खिडकी बंद करने को हुई, मगर यह
गाना उसे बहुत पसंद है। यूं भी आजकल न
जाने क्यों ऐसा होता है कि हर गाना ही उसे
भा जाता है। उसे लगता है मानो हर गीत उसी
पर बना है। ..बस यहीं से हमारी कहानी की
नायिका यानी वेदिका का अंतद्र्वद्व शुरू
होता है। भजन सुनने की इस उम्र में नए
जमाने के गानों पर शर्माती, उन्हें गुनगु-
नाती वेदिका तो जैसे उम्र को ही भूल बैठी
है। सच कहें तो उसका मन आजकल एक
ही नाम गुनगुनाता है, वह है प्रभाकर का..।

         अब आप पूछेंगे राजा-
रानी के बीच यह प्रभाकर कहां
से आ गया! यही तो ट्विस्ट है। वेदिका
इतनी व्यस्त रहती है घर के काम-काज
में, संयुक्त परिवार में उसे भला फुर्सत कैसे
मिलती होगी जो वह किसी दूसरे राजा से
दिल लगा बैठी? फिर वह मिली कैसे होगी
प्रभाकर से? क्या प्रभाकर उसका कोई
पुराना..? जरूर ये सारे सवाल आपके
दिल में उठ रहे होंगे।

             जी नहीं..! अब कहीं
जाने की क्या जरूरत है, जब एक
चोर दरवाजा घर में ही घुस आया है।
हम बात कर रहे हैं इस हाइटेक जमाने
के कंप्यूटर-इंटरनेट की!

                नई-नई टेक्नोलॉजी
सीखने का बहुत शौक है वेदिका को।
बच्चों से ही कंप्यूटर चलाना सीख लिया।
एक दिन बच्चों ने ही फेसबुक पर अकाउंट
बना दिया। वेदिका तो चकित ही रह गई। क्या
दुनिया है यह भी! परी-लोक इसी को तो कहते हैं।
बस यहीं मिला प्रभाकर उसे। न जाने कब प्रभाकर
को मित्र से मीत समझने लगी वह। आज खुश भी
इसलिए है कि पहली बार प्रभाकर से बात की है..।

                    ड्रेसिंग टेबल पर
रखे मोबाइल से मेसेज टोन सुनते
ही वह लपकी। प्रभाकर का ही संदेश
था। एक गालिबाना शेर लिखा था और
अंत में कई स्माइलीज के साथ गुडनाइट।
तो यही था वेदिका की खुशी का राज? पिछले
एक साल से प्रभाकर से चैटिंग हो रही है। आज
फोन पर बात भी हो गई और लीजिए अब तो मेसेज
भी आ गया। नाइट-सूट पहन कर बिस्तर पर आ
गई वेदिका। लेकिन नींद भला कहां आनी थी।
राघव को निहारने लगी और सोचने लगी कि
जो कुछ भी उसके अंतर्मन में चल रहा है
क्या वह ठीक है! यह प्रेम-प्यार का
चक्कर..! क्या है यह? वह भी इस
उम्र में, जब बच्चों के भविष्य के
बारे में सोचना चाहिए उसे! अब
इसमें राघव की क्या गलती है,
जो वह इस तरह दूसरे पुरुष की
ओर आकर्षित हो रही है! वह तो
बहुत खयाल रखता है उसका, किसी
चीज की कमी नहीं होने देता। हां, अपने
काम में इतना व्यस्त जरूर है कि उसे समय
कम ही दे पाता है। लेकिन इसका अर्थ यह तो
नहीं कि वेदिका कहीं दिल लगा बैठे!

               कहां गए उसके मूल्य?
इतनी व्यस्त जिंदगी में जहां हवा भी
सोच कर प्रवेश करती हो, प्रभाकर को
आने की इजाजत कैसे मिल गई? दिल में
सेंधमारी आखिर हुई कैसे?

                   अगले ही पल उसके
विचारों ने झटका खाया। सहसा बिजली
की तरह एक खयाल दौड पडा। सेंधमारी
तो हो सकती है क्योंकि वह जितनी रोमैंटिक
है-राघव उतना नहीं। उसे याद है, शादी के बाद
जब पहली बार राघव के साथ बाइक पर बाजार गई
थी। उसने पीछे से राघव की कमर को हाथ से पकडा
ही था कि वह उखड कर बोल पडा, क्या कर रही हो
वेदिका? यहां सब जान-पहचान के लोग हैं, कोई
देख लेगा तो! सभ्य घर की बहू हो, थोडा तो
सोचो..। उसने सहम कर हाथ पीछे कर
लिए। उस वक्त जैसे दिल का कोई
कोना चटक गया और वेदिका
उसी रास्ते रिसने लगी, थोडा-
  थोडा रोज..।

              बाद में राघव ने उसे
मनाया भी, मगर इस टूटे हिस्से को
जोडने वाला सॉल्यूशन तो बना ही नहीं।
वह उस प्यार को नहीं मानती, जो देह को
तो छुए मगर मन तक न पहुंचे। जी भर आया
वेदिका का.।

                      तभी मन के दूसरे कोने से
आवाज आई, वेदिका तू बहुत भावुक है। मगर
प्यारी यह जीवन भावुकता से नहीं चलता..! यह
सब प्रेम-प्यार किताबों में ही अच्छा लगता है, हकीकत
में नहीं। हकीकत की पथरीली जमीन पर आकर यह टूट
जाता है। और फिर इतने सालों में राघव बदल भी तो गया
है। तू जैसा उसे बनाना चाहती थी, काफी हद तक वैसा ही
हो गया न!

                    तो क्या हुआ..! रिसते
मन पर कितनी भी फुहार डालो, वह जीवित
कहां हो पाता है। वेदिका ने अपने दूसरे हिस्से
को जवाब दिया। वह कुछ पल यूं ही राघव को निहारने
लगी। धीरे से उसके हाथों को छूना चाहा, मगर नहीं छू सकी।
बस अपना हाथ सरका कर राघव के हाथ के पास रख दिया।
अचानक उसका हाथ राघव के हाथ को छू गया और उसने
झट से वेदिका का हाथ पकड लिया। वेदिका ने जल्दी से
अपना हाथ खींच लिया तो राघव चौंक कर जाग उठा,
क्या हुआ..!

       कुछ नहीं, आप सो जाइए..,
वेदिका ने धीरे से कहा और करवट
बदल कर लेट गई। सोचने लगी, अब
कितना बदल गया है राघव..! पहले जैसा
तो बिलकुल नहीं रहा। याद करते हुए उसकी
आंखें भर आई। एक रात उसने सोए हुए राघव
के गले में बांहें डाल दी थीं तो वह जाग गया और
वेदिका पर भडक उठा था। उसे नींद में डिस्टर्ब करना
बिलकुल पसंद नहीं है। उस रात दिल का वह कोना कुछ
और चटक गया।

             तो क्या हुआ वेदिका!
हर इंसान की अपनी सोच होती है।
तुम्हारे पति की भी एक अलग शख्सीयत
है। इसके बावजूद उसने खुद को तुम्हारे हिसाब
से ढाला है, वह तुम्हारा खयाल रखता है। हो सकता
है उसे भी तुमसे कुछ शिकायतें हों और वह तुम्हें न
बता पाता हो। अरेंज्ड मैरिज में तो ऐसा ही होता है।
पहले तन और फिर धीरे-धीरे मन भी मिल ही
जाते हैं। व्यावहारिक बनो, भावुक नहीं..!
उसके भीतर की मेच्योर वेदिका को
गुस्सा आ गया।

               हां, रखता है खयाल..!
लेकिन मैंने ही तो बार-बार हथौडा मार
कर यह मूरत गढी है। यह भी अभी सिर्फ
मूरत है, इसमें अभी प्राण कहां हैं, मुस्कराना
चाहा वेदिका ने।

                      वेदिका को बहुत हैरानी होती है
कभी-कभी। जो इंसान दिन के उजाले में इतना गंभीर
रहता हो, वही रात में इतना प्यार करने वाला और इतना
खयाल रखने वाला कैसे हो सकता है!

                  उसके भीतर की पत्नी
फिर बोल पडी, चाहे जो हो वेदिका, अब
तुम उम्र के ऐसे पडाव पर हो, जहां तुम कोई
रिस्क नहीं ले सकतीं। तुम यह नहीं सोच सकती
कि जो होगा देखा जाएगा और न सामाजिक परिस्थि
तियां तुम्हारे पक्ष में हो सकती हैं, यह परपुरुष का खयाल
भी दिल से निकाल दो।

                परपुरुष..! क्या
प्रभाकर परपुरुष है? लेकिन मैंने
तो सिर्फ प्रेम किया है। स्त्री जब प्रेम
करती है तो वह बस प्रेम करती है, इसकी
कोई वजह नहीं होती। उम्र, सुंदरता, पद-प्रतिष्ठा..
वह कुछ नहीं देखती, एक एहसास होता है प्यार।
प्रभाकर ने भी कहीं मेरे मन को छुआ है।

                      प्रभाकर का खयाल
आते ही दिल को जैसे फिर सुकून आ गया।
होठों पर मुस्कान आ गई, हां! मुझे प्यार है प्रभाकर
से, इसके बाद मैं कुछ जानना-समझना नहीं चाहती।

                    बेवकूफ मत बनो वेदिका..!
जो व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं,
वह तुम्हारे प्रति कैसे वफादार हो सकता है? जो
अपने जीवनसाथी के साथ इतने बरस रह कर उसके
प्रेम को झुठला सकता है और कहता है कि उसे अपनी
पत्नी से प्रेम नहीं है वह तुम्हें कैसे प्रेम करेगा! कभी उसका
प्रेम आजमा कर देख लेना, फिर देखना वह कैसे अजनबी बन
जाएगा, कैसे उसे अपने परिवार की याद आ जाएगी..! वेदिका के
भीतर जैसे जोर से बिजली चमक पडी और वह झटके से उठ कर बैठ गई।
हां, यह बात सच है मगर यही बात तो मुझ पर भी लागू होती है। मैं भी कहां
वफादार हूं राघव के प्रति..! यह सोचना कहां शोभा देता है कि प्रभाकर..,
वेदिका बेचैन हो उठी।

                  बिस्तर से उठ कर खिडकी
के पास आ खडी हुई। बाहर का कोलाहल कम
हो गया था, लेकिन मन के भीतर का कोलाहल
अभी नहीं थमा था। नींद कोसों दूर थी। क्या यह
पहली बार प्रभाकर से बात करने की खुशी है या
उसके भीतर का अपराध-बोध, जो धीरे-धीरे उसे कचोट
रहा था? क्या यह सब किस्मत का खेल है जिसे होना ही
था! अगर होना था तो पहले क्यों नहीं मिले वे? राघव के साथ
रहते-रहते भी तो उसे प्रेम हो ही गया एक दिन। अब यह समझौता
हो, लगाव हो या फिर नियति, एक डोर से तो बंधे ही हैं वे..। वेदिका
अजीब सी सोच में घिरी रसोई की तरफ बढ गई। अनजाने में चाय की
जगह कॉफी बना ली। बाहर छत पर पडी कुर्सी पर बैठ कर सिप लिया
तो चौंक पडी वेदिका। अरे यह क्या..! उसे तो कॉफी की महक से भी
परहेज था और आज वह आधी रात को कॉफी पी रही है! तो क्या
वह सचमुच बदल गई है? अपने उसूलों से डिग गई है वह? जो
कभी नहीं किया वह आज कैसे हो रहा है..!

                  राघव की निश्छलता
वेदिका को कचोट रही थी कि वह गलत
दिशा में बढ रही है। जब राघव को पता चलेगा
तो क्या वह इसे सहन कर सकेगा? क्या लोग उसे
माफ कर पाएंगे?

                           अचानक उसे लगा मानो
वह कटघरे में खडी है और लोग उसे घूरे जा रहे हैं
नफरत से, सवालिया नजरों से..। खडी हो गई वेदिका।
जितना सोचती, उतना ही और घिर जाती। लग रहा था मानो
रात बीत जाएगी, मगर उसकी उलझनें नहीं सुलझेंगी।
रात भी बीत चली।

    तीन बज गए, लेकिन वेदिका को एक
पल को भी चैन नहीं था। यह मन भी कितना
बडा छलिया है। एक बार फिर डोल गया और प्रभाकर
का खयाल आ गया। क्या वह सो गया होगा..?

                       फिर से फोन में मेसेज
टोन सुन कर उसने मोबाइल टटोला। प्रभाकर
का ही संदेश था। किसी ने सच ही कहा है कि मन
से मन को राह होती है। शायद तभी रानी जाग रही
है तो राजा भी जागेगा ही..। अब इस कहानी का क्या
किया जाए क्योंकि वेदिका का अंतर्दद्व खत्म तो हुआ नहीं।

                   प्रभाकर के प्रति उसका
शारीरिक आकर्षण तो है नहीं, सिर्फ उससे
बात करके कुछ सुकून सा मिलता है। वह उसकी
बात ध्यान से सुनता है और सलाह देता है। उसकी
बातों में लाग-लपेट भी नहीं दिखती, फिर क्या करे वह?
वह एक तरह से सच्चा मित्र ही हुआ न! सच्चे मित्र से प्रेम
तो हो सकता है। लेकिन इस तरह समय-असमय संदेशों
का आदान-प्रदान तो ठीक नहीं है.., सोचते हुए वेदिका
मुस्करा पडी। शायद उसे कोई हल मिल गया हो।

                  सोच रही है कि फेसबुक
के रिश्ते यहीं तक सीमित रहें तो बेहतर
है। अब वह प्रभाकर से सिर्फ फेसबुक पर बात
करेगी, वह भी सीमित शब्दों में। माना कि नए
जमाने में पुरुषों को मित्र बनाने में कोई बुराई भी
नहीं है, लेकिन यह मीत-वीत बनाने का चक्कर
ठीक नहीं है। प्रभाकर को वह खोना भी नहीं चाहती।
उसने तय कर लिया कि अब वह फोन पर बात नहीं करेगी।
अंतत: अंतद्र्वद्व खत्म हुआ तो सुबह तडके वेदिका को नींद
भी आ गई। रानी को समझ आ गई है तो अब राजा को भी
समझना होगा कि असल और आभासी दुनिया में एक
लंबा फासला होता है..।

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विदाई की वेला का अर्थ नई जिंदगी का संकेत


             कोई पुरुष कभी समझ
पाएगा कि विदाई की बेला में वधू के
मन पर क्या गुजर रही होती है! अपना
सुरक्षित माहौल और खून के रिश्ते पीछे छोड
अनजाने, अपरिचित लोगों के बीच जाकर रहना..
दो-एक दिन के लिए नहीं, सदैव के लिए। परायेपन
के भय के बीच हलकी सी जो आस की किरण होती है,
वह होती है पति से। अजनबी वह भी होता है, मगर प्यार
की डोर उन्हें करीब लाती है। वह मान लेती है कि जिस
तरह वह पति के प्रति समर्पित होगी, उसी तरह वह भी
अनजाने परिवेश में उसका सहारा बनेगा। मेरे लिए तो
यह परिवर्तन और बडा था। साधारण मध्यवर्गीय परिवार
की थी मैं और तीन बहनों में सबसे बडी। पिता का अपना
कारोबार इतना ही अच्छा था कि हम सबकी जरूरतें पूरी हो
सकें। देखने में मैं साधारण से कुछ ज्यादा सुंदर थी और किशो-
रावस्था पार करते-करते रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे। बारहवीं
की परीक्षा भी नहीं दे पाई थी कि एक संपन्न परिवार में रिश्ता
तय हो गया। मोटर पा‌र्ट्स का फैला हुआ कारोबार था उनका।
परिचित हैरान थे मेरे सौभाग्य पर। मां ईश्वर को धन्यवाद
देती न थकतीं। छोटी बहनें आने वाले दिनों की तैयारी से
ही उत्साहित थीं। ..और पापा? पापा तो यही सोच कर
संतुष्ट थे कि बडी का रिश्ता अच्छे घर में हो जाने से
दोनों छोटी बेटियों के लिए वर मिलना सरल हो जाएगा।
मेरे मन में डर तो था, लेकिन मैं पूरे मन से नए माहौल में
ढलने को दृढसंकल्प थी। यही संस्कार मिले थे मुझे अपने
परिवार से। सुख-सुविधाओं से भरपूर था मेरा नया घर। कमी
थी तो बस हमसफर की। पति बाहर वालों के सामने तो बहुत
सहज और विनम्र दिखते थे, लेकिन सारे कर्तव्य बाहर वालों के
सामने निभाए जाते। बाकी समय वे हमेशा मेरी अवहेलना करते।
हालांकि शुरू के कुछ दिन अच्छी तरह बीते। मिलन का खुमार,
हनीमून का साथ, घूमना-फिरना, संबंधियों व दोस्तों के घर
निमंत्रण पर जाना..। गुडिया सी सजी मैं छोटी-छोटी बातों
पर खुश हो जाती। उस उम्र में सोच ही उतनी होती थी।
लेकिन जल्द ही आबोहवा बदलने लगी। दुलहन का
जोडा उतरा, घर-गृहस्थी में रमने लगी और उधर
पति को एक नई गुडिया की तलाश होने लगी।
उनके लिए पत्नी का कोई महत्व नहीं था। मैं
सिर्फ उनकी जरूरत थी। इसके अलावा भी
मेरा वजूद हो सकता है, यह उनकी समझ
से बाहर था। व्यावसायिक मामलों में पिता
से मशविरा होता तो घरेलू मामलों में मां से।
मैं पराये घर से आई थी और परायी ही रही।
परिवार के हर संस्कार, तौर-तरीके, तहजीब
और रीति-रिवाज मैंने अपनाए। सारे कर्तव्य पूरे
करने के बावजूद मेरे अधिकार सीमित और वहीं
तक थे, जहां तक घर के सदस्य चाहें। यूं तो मेरे
नाम के आगे भी परिवार का नाम जुडा था, लेकिन
इसका हिस्सा मैं कभी नहीं बन पाई। जैसे किसी भरे
हुए पन्ने पर हाशिया छोड दिया जाता है, जरूरत पडने
पर उपयोग किया जाता है। मेरी स्थिति उसी हाशिये सी थी।
परिवार को वारिस चाहिए था। दो साल बाद यह उम्मीद पूरी
हो गई। एक साथ एक नहीं, दो-दो वारिस मिल गए। मुझे भी
थोडा संतोष इसलिए हुआ कि इस बहाने मुझे अपने वजूद को
साबित करने का एक मौका मिला। मगर मेरी यह संतुष्टि अल्प-
कालीन ही साबित हुई। पति को अब पूरी आजादी मिल गई। काम
के बाद क्लब जाते, यार-दोस्तों की महफिलों में डिनर और अकसर
पीना-पिलाना भी होता। इतना तक तो मैं स्वीकार कर लेती। मगर धीरे
-धीरे महिला दोस्तों की संख्या बढने लगी। मित्रता की आड में क्या चल
रहा है, यह खबर भी उडती-उडती मुझ तक पहुंचने लगी। हर व्यक्ति
की अपनी स्वतंत्रता है और एक सीमा के बाद किसी भी वयस्क
व्यक्ति को इसके लिए बहुत नहीं समझाया जा सकता। पहले
हर काम आड में होता था, सामाजिक-पारिवारिक मर्यादाओं
का पालन किया जाता, मगर मेरी चुप्पी ने धीरे-धीरे साहस
बढा दिया पति का। उनकी हिम्मत खुल गई। पैसे के बल
पर वह किसी के भी शरीर को पा लेते और उपभोग के
बाद उसे दूध में पडी मक्खी की तरह अपनी जिंदगी
से निकाल भी फेंकते। पुरुष होने के नाते कुछ
विशेषाधिकार सुरक्षित थे उनके पास। इसके
लिए उनके मन में कोई ग्लानि या अपराध
-बोध भी कभी नहीं पनपा। अब तक मैंने
जो कहानियां पढी थीं, उनमें दुख-
तकलीफ, विपत्ति के बाद अंत में
राजा-रानी सुख-चैन से जीवन
बिताते थे, मगर मेरी जिंदगी की
कहानी उलटी कलम से लिखी जा
रही थी। मैं सोचती, कहानियों में यह
क्यों नहीं बताया जाता कि विवाह के बाद
का जीवन कैसा होता है? अब तो पानी सिर
के ऊपर बहने लगा था। घर में ही खुला खेल
खेला जाने लगा। और एक दिन..अति हो गई।
आया के भरोसे दोनों बच्चों को छोड मैं बाथरूम
में नहाने घुसी। थोडी ही देर में उनकी रोने की
आवाज सुन कर अचानक बाहर आई तो आया
को नदारद पाया। उसे देखने घर में घुसी तो
आया को साहब के कमरे में आलिंगनबद्ध
पाया। संदेह तो कई दिनों से था, अब प्रमाण
भी मिल गया था। जिस बात को अब तक
अपना वहम समझ कर झटक देती थी,
वही साक्षात सामने थी। यह ऐसा सच था,
जिसे कहना भी मुश्किल था और निभाना भी
मुश्किल। यह मेरे स्त्रीत्व पर सबसे बडी चोट थी।
मैंने खुद को अपमानित-तिरस्कृत महसूस किया।
ऐसा लगा मानो किसी ने मुंह पर जोरदार थप्पड
रसीद कर दिया हो। वैसा ही झन्नाटा मैं पूरे
वजूद पर महसूस करने लगी थी। बात घर
के बाहर न फैले, परिवार की बदनामी न
हो, यह सोच कर सास के सामने मन
की उलझन रखी तो उलटे सारा दोष
मेरे ही सर मढ दिया गया। कहने लगीं,
तुम बेवजह शक करती हो। देखो, शादी
भरोसे पर ही टिकती है और फिर मर्द तो
होता ही भंवरे के समान है, उसे बांध कर
रखना तो तुम्हारा फर्ज है। इसमें भी तो तु-
म्हारा ही कसूर है न? तुम उसे खुश कर पातीं
तो वह ऐसी अनपढ गंवार लडकी के पीछे क्यों
भागता? मेरी चुप्पी देख सास ने आगे कुछ और
पंक्तियां जोड दीं, मैंने यह सोच कर तुमसे अपने बेटे
की शादी की थी कि तुम्हारी सुंदरता उसे बांधे रखेगी
और वह इधर-उधर जाना बंद कर देगा। वरना हमारे
पास तो एक से एक अच्छे रिश्ते आ रहे थे। मैं समझ
चुकी थी कि घर के बिगडे हुए सपूत को सुधारने के
लिए मुझ जैसी मिडिल क्लास कम पढी-लिखी लडकी
को बलि का बकरा बनाया गया है। सास-ससुर का तरीका
नाकाम रहा तो इसके लिए दंड भी मुझे ही भुगतना होगा। मैं
जानती थी कि शादी में भरोसा बडी चीज है। लेकिन अपनी आंखों
से पति को किसी दूसरी स्त्री के साथ देख कर कोई पत्नी कैसे उस
पर भरोसा कर सकती है, यह बात मेरी समझ से परे थी। मैं ससुराल
के ताने झेल सकती थी, पति की बेरुख्ाी से भी समझौता कर
सकती थी, लेकिन बच्चों के सामने अपने ही घर में पति को किसी
और के साथ कैसे बांटती! सास को कुछ और न सूझा तो बाबाओं-
साधुओं के पास जा-जाकर तावीज और भभूत लाकर मुझे देने
लगीं, जो दावा करते थे कि उनके यहां पति को वश में करने
के शर्तिया नुसखे हैं। मैं जानती थी, बेकाबू व्यक्ति को किसी
नुसखे से काबू नहीं किया जा सकता। दिन-प्रतिदिन पति
की रासलीला यूं ही चलती रही। निराश होकर एक दिन
बचपन की सहेली से मन की बात बांटी तो उसने भी
पलट कर कहा, मस्त रहो यार! कहां जाएगा?
लौट कर तुम्हारे पास ही आएगा न! शुक्र करो
कि उसने कभी तुम्हारे साथ मारपीट नहीं की। दिल
के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है..। जिंदा
रहने के लिए कोई न कोई तो बहाना चाहिए। इसे मजबूरी
कह सकते हैं, लेकिन जो घाव किसी को दिखाए भी न जा
सकें, वे ज्यादा ही कसकते हैं। कैसा समाज है यह, जहां
पुरुष की भटकन का दोष भी पत्नी के सर मढ दिया
जाता है। स्त्री की निष्ठा चौबीस कैरेट शुद्ध हो। अग्नि
परीक्षा देकर भी उसका चरित्र संदिग्ध रहता है और
उसे कभी भी त्यागा जा सकता है। हमारे पूर्वज
स्त्रियों के लिए सीता और सावित्री जैसे आदर्श
निर्धारित करते समय पुरुषों के आगे कोई
आदर्श रखना क्यों भूल गए? ..धीरे-धीरे
पति ने बेडरूम भी अलग कर लिया, यह
कहते हुए कि तुम्हारे बच्चे सोने नहीं देते..।
बच्चों को अलग कमरा मिला तो पति का
नया बहाना था, तुम रात को देर तक जागती
हो, नींद खराब होती है..। अकसर रात की नीरवता
में मोबाइल पर पति का स्वर सुनाई देता। हंस-हंस कर
की जाती बातें मेरे कानों में पडतीं। गुस्सा उन स्त्रियों पर
आता, जो इतनी आसानी से शिकार बन जाती थीं और जिन्हें
इनकी मंशा के बारे में कुछ पता नहीं होता था। हमारे बीच संवाद
अब नगण्य हो चुका था। हां, फोन पर हर हफ्ते किसी नई गर्लफ्रेंड
की तारीफ में कसीदे पढते पति का स्वर मुझे सुनाई देता रहा। ..इतना
होने के बावजूद कभी-कभी पति अपना हक मांगने मेरे पास भी आ जाते।
मुझसे उम्मीद की जाती कि जिंदगी भर मिले तिरस्कार का बदला मैं समर्पित
पत्नी बन कर चुकाऊं। यह उनका कानूनी हक था। बिजनेस पार्टीज, पारिवारिक
आयोजनों में हम खुशहाल दंपती की तरह साथ जाते। मेरे परिचित मेरे भाग्य की
सराहना करते न अघाते और मैं मुसकराते हुए इस जहर को पीती। कुछ आंसू
आंखों से नहीं टपकते। वे मन के भीतर ही बहते रहते हैं। ..शादी की पच्चीसवीं
सालगिरह नजदीक थी। घर में निर्णय लिया गया कि इसे धूमधाम से मनाया
जाएगा। यह भी एक तरीका है सामाजिक दायरे में वैभव दिखाने का। तैयारियां
शुरू हो गई। पांच सितारा होटल बुक कराया गया। हर काम परफेक्ट..! इवेंट
मैनेजर ने सारी व्यवस्थाएं नफासत से कीं। मुझे कुंदन का जडाऊ सेट
पहनाया गया, डिजाइनर साडी पहन कर मैं पार्लर में तैयार हो रही थी।
एक-एक कर अतिथि पहुंचने लगे..। रात के नौ बजे तक पार्टी पूरे शबाब
पर पहुंच गई। शहर के तमाम गणमान्य लोग वहां उपस्थित थे। हाथों में
गिलास पकडे अकारण ही ठहाके लगा रहे थे लोग। देश-दुनिया की
राजनीति पर बहस हो रही थी, व्यवस्था का विश्लेषण हो रहा था।
पति मेरा हाथ थामे मेहमानों से मिल रहे थे। ख्ाूबसूरत
साडियों में लिपटी मेहमान स्त्रियां मुझे बधाई दे रही थीं।
कुछेक के स्वर में तो ईष्र्या का पुट साफ नजर आ
रहा था। रात के बारह बजे तक पार्टी चलती रही।
अतिथि लौटने लगे तो हम मेहमानों का धन्यवाद
करने द्वार पर खडे हुए। मेरी बुआ ने जाते हुए मुझे
आलिंगनबद्ध किया और बोलीं, कितनी खुशकिस्मत हो
तुम! स्मार्ट और बडे दिल वाला पति मिला है तुम्हें। पता भी
नहीं चला बेटी और आज तुम्हारी शादी को 25 साल भी हो
गए। धन-दौलत, ऐशो-आराम, दो हैंडसम बेटे..। और क्या
चाहिए जिंदगी में खुश रहने को? मुझे ऐश्वर्य, वैभव और
चकाचौंध के बदले अपना पति चाहिए। चंद ऐसे पल
चाहिए उसके साथ, जो सिर्फ मेरे हों, जिन्हें औरों
से बांटना न पडे। पति के साथ बेफिक्र दिन-
रात चाहिए.., कहना चाहा मैंने, मगर
शब्द होठों पर ही ठिठक गए। मैंने
अपने आंसू छिपा लिए। मुस्करा
कर बुआ की ओर देखा और
थैंक्स कहते हुए अगले मेहमान
को विदा करने की तैयारी करने लगी।

समय के साथ नयें-नयें पुरांण


A-           पुराण साहित्य का वह वर्ग है,
जिसे मिथक के नाम से भी जाना जाता है।
जिन्होंने यह साहित्य नहीं पढा है, या थोडा
सा पढा है, उनके मन में इस संबंध में बहुत
सी गलत धारणाएं रही हैं। कुछ लोगों के
अनुसार पुराण काल्पनिक कथाएं हैं।
जब हम उन्हें पढते हैं तो मन में हमेशा
यह प्रश्न उठता है कि ये कथाएं काल्पनिक
हैं या सच्ची हैं?

B- लललपहले हम मान कर
चलें कि ये काल्पनिक नहीं है।
वेदों को ठीक से समझने के लिए
इतिहास और पुराणों का अध्ययन
और उन्हें समझना बहुत जरूरी है।
इसलिए कि उनमें जो विषयवस्तु है
और उनका जो उद्देश्य है वह केवल
परमात्मा है, जो सर्वोपरि सत्य है। उसे
प्रकाशित करना ही इनका प्रयोजन है।
पुराण का शाब्दिक अर्थ है-पुराना, और
आत्मा को भी सबसे अधिक पुरातन कहा
गया है। लेकिन पुराने के सामान्य अर्थ के
अनुसार वह प्राचीन नहीं है। पुराने और नए
के प्रति धारणा सदैव कालसापेक्ष होती है,
लेकिन जब हम आत्मा को पुरातन कहते हैं,
तब वहां काल का संदर्भ नहीं होता। वह ऐसा
तत्व है जहां से काल की अवधारणा का उदय
होता है। अत: यह पुरातन, परम आत्मतत्व, काल
निरपेक्ष है। श्री शंकराचार्य पुराण शब्द को समझाते
हुए कहते हैं कि पुराण है तो पुरातन, पर पुरातन होते
हुए भी वह सर्वदा नवीन है। कोई चीज पुरानी और नई
एक साथ कैसे हो सकती है? ऐसा होना उसी वस्तु के
साथ संभव है जो समय के प्रभाव से मुक्त हो। काल से
परे जो होगा उसका क्षय नहीं होगा। वह हमेशा ताजा,
नया रहेगा। अत: पुराण का तात्विक अर्थ है-वह-जो
सदैव नवीन है।

C-आध्यात्मिक शिक्षा 
        पुराणों में जिस सत्य
का प्रकाशन है वही वेदों और
उपनिषदों में भी वर्णित है, लेकिन
पुराणों में इसी बात को कहने की
शैली बहुत अनोखी है। अनेक कहा-
नियां पुराणों में मिलती हैं। इनमें से
कुछ ऐतिहासिक हैं, कुछ रूपक शैली
में। लेकिन सभी में शिक्षा है। पुराणों में ही
यह संकेत भी है कि कौन सी कथाएं प्रतीक हैं।
इतिहास और पुराण या मिथक में अंतर है, जो हमें
स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। इतिहास घटना
प्रधान होता है, वह ऐसा साहित्य है जो वस्तुस्थिति
को ज्यों का त्यों सामने रखता है, क्योंकि उसमें ऐति-
हासिक तथ्यों और घटनाओं का, जिस प्रकार वे घटित
हुई, वैसा ही लेखा-जोखा होता है। पुराण शिक्षाप्रधान होते
हैं, शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखे गए होते हैं। इतिहास के
ग्रंथ में कोई काल्पनिक कहानी नहीं जोड सकता, लेकिन
पुराणों में ऐसा सप्रयोजन किया जाता है। इसलिए जब हम
उन्हें पढते हैं तब बस यही नहीं सोचते रहना चाहिए कि यह
घटना सच्ची है या झूठी। वह कुछ भी हो सकती है। शेर, बाघ,
बंदर या लोमडी की कहानी में यह पूछना निरर्थक है कि बंदर
कैसे बोल सकते हैं? यह बात वहां विचारणीय है ही नहीं। प्रश्न
तो बस यह है कि हम उस कहानी से क्या शिक्षा ग्रहण करते हैं।
पांच विषय : पुराणों में परम सत्य का उद्घाटन पांच मुख्य विषयों
के विश्लेषण के माध्यम से किया गया है – सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वंतर,
वंश और वंशानुचरित।

सर्ग : —
            सर्ग के अंतर्गत मूलभूतों
की सृष्टि का वर्णन है। मूलभूत अणु
कच्चे माल जैसे कहे जा सकते हैं। इन्हीं
मूलभूत अणुओं या पांच महाभूतों से समस्त
व्यक्ति और वस्तु-जगत की अपने पूरे वैविध्य
के साथ रचना हुई। यह दूसरी रचना प्रतिसर्ग या
विसर्ग कहलाई।

प्रतिसर्ग :–
             पूरा विश्व अनेक प्रकार
के वैविध्य से संपन्न है। वस्तुजगत
में वैविध्य है, प्राणियों में वैविध्य है। प्रत्येक
प्राणी या वस्तु अन्य प्राणी या वस्तु से भिन्न है।
प्रश्न यह है कि यह विभिन्नता आती कहां से है?
यदि हम उनके आधारभूत उपकरणों को देखें तो वे
एक से ही हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।
हम सबके पास समान रूप से शरीर है, इंद्रियां हैं, मन
है और बुद्धि है। लेकिन हम सब में कितना वैभिन्न्य है।
कहा जाता है कि सृष्टि में जो अनेकता है वह तत्व और
कर्म के अनुसार है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति और उसके
कर्म इसका कारण है। इस प्रकार सर्ग और विसर्ग की इस
व्याख्या से सर्वप्रथम सृष्टि की विविधता को समझना आव-
श्यक है। फिर इस वैविध्य के भीतर पंच महाभूत के रूप में
जो समानता है, उसे जान लेना चाहिए। अब यह समान रूप
से जो तत्व सबमें है वे कहां से आए। कहा गया है कि वे पर-
मात्मा से, पुराण से निकले। इस प्रकार परम सत्य की ओर
संकेत किया गया।

मन्वंतर :–
               तीसरा विषय है मन्वंतर।
जब हम संपूर्ण मानवता पर दृष्टि डालते
हैं तो जो एक विशिष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है
वह है प्रकृति के नियमों और अन्य सभी नियमों
का तिरस्कार, उनका पालन न करने की प्रवृत्ति।
अन्य प्राणी स्वभाव से प्रकृति के नियमों का पालन
करते हैं, लेकिन मनुष्य को बताना पडता है कि उसे
क्या करना चाहिए। मनुष्य को अपने धर्म को जानना
चाहिए और उसके अनुसार अपना जीवन बनाना चाहिए।
विश्वविद्यालय में धर्म के विभाग का कोई अध्यक्ष होता है,
जिसके पास उस विभाग का अधिकार होता है। उसी प्रकार
मनु विश्व के स्तर पर धर्म विभाग के अधिकारी हैं। युगों का
वह चक्र, जिसमें एक मनु का शासन रहता है, मन्वंतर कह-
लाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार, काल का विभाजन चार युगों
में किया गया है-सत्य युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। चारों से
मिलकर एक महायुग बनता है, जो कई लाख वर्षो का होता है।
एक हजार महायुग जब बीतते हैं तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी
का एक दिन पूरा होता है। इस एक दिन में चौदह मनु अपना का-
र्यकाल पूरा करते हैं। नए मनु शासन संभालते हैं तब पूरा दिव्य मं-
त्रिमंडल, विश्व संचालन के अधिकारी देवता, बदल जाते हैं। इसलिए
प्रत्येक इंद्र, वरुण और अग्नि का कार्यकाल एक मन्वंतर के लिए
होता है।

              ने निर्धारित समय
में मनु देखते हैं कि संसार में सब
लोग धर्म का पालन कर रहे हैं या नहीं
और कभी-कभी धर्म की नए प्रकार से व्याख्या
भी करते हैं। यह सब करने के लिए वे संत, साधु,
भक्त और धर्म के अन्य व्याख्याकारों को संसार में
भेजते हैं, जो हम सबको जीवन जीने की सही दीक्षा
दे सके।

             पुराणों में वर्णित, काल
के इस  विशाल प्रवाह के विषय में जब
हम सोचते हैं, तो हमारी बुद्धि जड होने
लगती है। हम इस अनंत काल प्रवाह के
आरंभ, मध्य व अंत को, आकाश और भूत
प्राणियों की इस असीम सृष्टि को समझने में
असमर्थ सिद्ध होते हैं। शास्त्र यह भी कहते हैं कि
पूरी सृष्टि ब्रह्म के एक सूक्ष्म अणु में है। इस प्रकार,
सर्ग अर्थात् मूलभूत सृष्टि से और प्रतिसर्ग अर्थात् विशेष
प्रकार की सृष्टि के वर्णन से परमात्मा की ओर ही संकेत
किया जाता है। मन्वंतर के वर्णन में दिखाया गया है कि धर्म
के अनुकरण से ही हमारा चित्त शुद्ध हो सकेगा और तभी हम
आत्मा के अनुभव की साम‌र्थ्य पा सकेंगे।

वंश और वंशानुचरित : —
               पुराणों का चौथा विषय है
वंश। जिसका अर्थ है राजवंश। संसार पर
शासन करने वाले दो राजवंश थे-सूर्यवंश और
चंद्रवंश। इन वंशों में उत्पन्न राजाओं, संत ऋषियों
और सामान्य लोगों के जीवन चरितों का वंशानुचरित
में वर्णन है। इसका उद्देश्य यह था कि अच्छे लोगों से हम
यह सीख सकें कि अपना जीवन कैसे जिएं और दुष्टों से,
जिन्होंने अपना ही सर्वनाश कर लिया, हम सीखें कि कैसे
अपना जीवन नहीं जिएं। कुछ ऐसे भी चरित्र हुए जो शुरू में
दुष्ट प्रकृति के थे और विषयेंद्रिय भोग में समय बिताते थे,
लेकिन बाद में साधु पुरुषों के सान्निध्य से वे महान बन
गए। इसलिए हमें स्वयं के विषय में उदास नहीं होना चाहिए।
यदि कोई दुष्ट और विषयभोगलिप्त व्यक्ति महान् बन सकता है
तो हम भी महान बन सकते हैं, ऐसा विश्वास हममें विकसित होना
चाहिए।


 

         पूरी दुनिया में विद्वान
लोग ईश्वर के प्रति एक खास
नजरिया रखते हैं। उनका सोचना
है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे
नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने
में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है।
जो उस बोध से गुजर जाता है, वही बुद्ध हो जाता है।
सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-
गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते।
उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और
वहीं से हमारे ऊपर नजर रख रहा होगा। यही बात दर्शन और
पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है। ठीक वैसे
ही जैसे हम लोग सगुण हैं। ये सरल लोग यह मानते हैं कि ईश्वर
बिलकुल मनुष्य के रूप में ही होगा-वैसे ही आंख, नाक, कान, दिल
और दिमाग, वही चलने का तरीका और प्यार का नजरिया। यह सगुण
ईश्वर है। विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-निरगुनिया।

         ये नजरिया सिर्फ भारतीय
धर्मो में शामिल नहीं है। सन 1953 में
टेक्सास के अपने मशहूर सत्संग में सुविख्यात
अमेरिकी इवेंजलिस्ट रेवरेंड बिली ग्राहम ने साफ तौर
पर यह घोषणा की कि ईश्वर स्वर्ग में रहता है। उनकी
कल्पना यह थी कि स्वर्ग न्यूयॉर्क या लंदन की तरह कोई
जगह है, जहां सडकें सोने की बनी हैं और कारें हीरे-जवाहरात
से तैयार होती हैं। वहां किसी को किसी तरह की मेहनत करने की
कोई आवश्यकता नहीं है। यह स्वर्ग व ईश्वर की दुर्लभ सगुण संक-
ल्पना थी। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि यदि स्वर्ग ऐसा ही है तो कितनी
बोरिंग जगह होगा।

                अब यह दर्शनशास्त्र का
बडा महत्वपूर्ण द्वंद्व है। इस पर बडी
बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिपादन
किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और
साकार भी है। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण
भी है। भारतीय धर्मो ने इसे बडे आराम से निप-
टाया है। अगर भगवान निराकार है, निर्गुण है तो
वह सुपर ईश्वर है, उसके लिए हमने ब्रह्म शब्द चुना
है-द ऐब्सलूट। अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो
उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है। ब्रह्म का केवल बोध
किया जा सकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की परा-
काष्ठा होगा, जिसे हम परम तत्व या अंतिम सत्य के
रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन सगुण ईश्वर के साथ
हम रिश्ता जोड सकते हैं। यही रिश्ता भक्ति के द्वारा
ईश्वर को एप्रोच करने का तरीका है। यहां ईश्वर हमारे
बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोडा और नीचे
ले आते हैं। जब ईश्वर थोडा और नीचे आता है तो अ-
वतार के रूप में आ जाता है-कभी राम बनके कभी
श्याम बनके। यहां से एक आम आदमी के लिए
ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो
जाता है। पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से
ईश्वर की निकटता आम आदमी के लिए
बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली
बात हो जाती है।

              अवतार की थ्योरी ईश्वर
का सरलीकरण है। ऐसा नहीं है कि
केवल हम ही सरलीकरण के उस्ताद हैं,
लेकिन दूसरे धर्मो के मुकाबले आध्यात्मिकता
के मामले में हम कुछ ज्यादा ही उस्ताद हैं। अन्य
धर्मो में भी ईश्वर का सरलीकरण किया गया है। ईश्वर
और आध्यात्मिकता से संबंधित जितने सिंबल हैं, भारत
में उनका बडा बेहतरीन प्रगटीकरण हुआ है। ईश्वर को अगर
वाणी में व्यक्त करें तो वह ॐ होगा। अगर आंखों से देखने वाली
किसी ऑब्जेक्टिव चीज के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा।
यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो-जिसका कोई
आकार ही नहीं है-जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे?
लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के
कुछ तरीके सोचे होंगे।

                     हमारे पुराणों में एक
कथा है।एक बार भगवान शंकर
की ओर उनका एक शिष्य आ रहा
था। पार्वती माता ने शंकर जी की
तरफ इशारा करके कहा लो तुम्हारा
चेला आ गया.. उससे मिलो..। शंकर
भगवान ने अपने चेले की ओर देखा और
कहा, यह मेरा तीसरे दर्जे का शिष्य है।
तीसरा दर्जा अर्थात थर्ड क्लास। बहुत वर्ष
पहले भारत में एक समाजवादी रेलमंत्री ने
तीसरा दर्जा हमेशा के लिए खत्म कर दिया
था। पूरी दुनिया में बचे केवल पहले और दूसरे
दर्जे में पास किए जाते हैं।केवल भारत ऐसा देश
है जहां लोग थर्ड क्लास में भी पास होते हैं। लेकिन
शंकर भगवान के मामले में कोई थर्ड क्लास शिष्य
कैसे हो सकता है? क्या भगवान के शिष्यों की भी
अलग-अलग कोटि निर्धारित की जा सकती है? अब
शिवजी की बात सुनकर पार्वती जी को बडा कौतूहल
हुआ। तब भगवान ने कहा कि हमारा सबसे अछा
शिष्य वह है जो मुझे ध्यान में स्मरण करता है।
यह मेरा निराकार रूप है। इसका केवल बोध ही
हो सकता है। यह पूरी तरह भावनाओं का
मामला है। लेकिन यह भावना सांसारिक
भावना नहीं होगी, बल्कि इसमें आध्यात्मिक

अनुभव का बोध होगा।

               भगवान शंकर ने आगे कहा
कि मेरा दूसरा सबसे प्रिय शिष्य वह होगा
जो मेरे लिंग की पूजा करता हो और मेरा सबसे
निकृष्ट शिष्य वह होगा जो मेरी मूर्ति की पूजा करता
हो। शिवलिंग पूजक सेकंड क्लास शिष्य होंगे और मूर्ति
पूजक थर्ड क्लास शिष्य। यही कारण है कि भारत में भगवान
शंकर के लिंग के पूजन की परंपरा चल निकली है। जो परंपराओं
से अपरिचित हैं, वही भगवान शंकर की मूर्ति की पूजा करते हैं। भारत
के सभी प्रमुख शैव स्थल मूलत: ज्योतिर्लिग ही हैं।

               अब पार्वती जी के लिए कौतूहल
था कि लिंग की पूजा करने वाला दूसरा सबसे
प्रिय शिष्य कैसे है? जैसे हमारी आध्यात्मिक परंपरा
में ध्यान या मेडिटेशन निराकार को प्रगट करता है, उसी
तरह यहां धर्म में लिंग निराकार का प्रगट करता है। लिंग मूल
रूप से एक समतल सिलेंड्रिकल आकार में पत्थर होता है। समतल
सिलेंड्रिकल पत्थर में अगर कोई छेनी-हथौडा उठा ले तो किसी भी तरह
के रूप को आकार दिया जा सकता है। अगर मूर्तिकला का अभ्यास किसी
को हो तो वह भगवान शंकर के लिंग में छेनी-हथौडे से दुनिया के किसी भी
रूप को आकार दे सकता है। इसलिए एक तरह से देखें तो लिंग जो निराकार
होता है, उस पर कई आकार छिपे होते हैं।

                 लेकिन शंकर इस निराकार
को भी प्रथम श्रेणी में मानने के लिए तैयार
नहीं थे, जबकि लिंग शंकर के निराकार रूप को
प्रगट कर रहा था। क्यों? क्योंकि निराकार होते हुए
उसमें एक आकार था। जब भी हम उसको किसी देवता
का आकार देंगे तो हमें उसमें से पत्थरों को छीलना पडेगा।
उसमें कुछ कमी आ जाएगी। इसीलिए निराकार रूप साकार
रूप के मुकाबले हमेशा श्रेष्ठ होता है। निराकार को एप्रोच करने
के तरीके भारतीय आध्यात्मिकता की विशिष्टता हैं। इस तरीके को
ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं। अगर आप भगवान
के पहले दर्जे के शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार
स्वरूप का बोध करना पडेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

ध्यान का अभ्यास

                           हममें से कोई भी एक सरल
ध्यान के अभ्यास से ही अपने आपको निराकार
से जोड सकता है। ध्यान करने का सबसे सरल तरीका
है किसी एकांत स्थान पर चुपचाप बैठ जाइए। फिर अपनी
सांसों का बोध करना शुरू करें, जैसे ही सांसों का बोध हो, सांसों
को धीमी करना शुरू करें। इसी बीच अपने निचले जबडे को हल्का
सा ढीला छोडें। अपने गालों के तनाव को रिलैक्स करें। विचारों को
शिथिल करने की कोशिश करें। थोडी देर में आप गहरे ध्यान में होंगे।
पंद्रह मिनट रोजाना ध्यान करने से हममें से कोई भी स्वयं को निराकार
से जोड सकता है।