प्रकृति द्वारा विपत्ति की क्षति पूर्ति -3


1-प्रकृति द्वारा विपत्ति की क्षति पूर्ति

        प्रकृति के नियमों में एक विचित्र
अद्भुत रहस्य है कि हर विपत्ति के बाद
उसकी विरोधी सुविधा उपलब्ध हो जाती है,
मृत्यु के बाद जन्म होता है रोग,घाटा,शोक
आदि विपत्तियॉ स्थाई नहीं हैं वे तो आंधी की
तरह आती हैं और तूफान की तरह चली जाती
हैं।उनके जाने के बाद एक दैवीय प्रतिक्रिया होती
है जिसके द्वारा उस क्षति पूर्ति के लिए कोई इस
प्रकार का विचित्र मार्ग निकल आता है,जिससे बडी
तेजी से उस क्षति पूर्ति की किसी न किसी प्रकार
पूर्ति हो जाती है, जो आपत्ति के कारण हुई थी ।

2-व्रत की परम्परा मनुष्य ही नहीं पशुओं में भी है

                सभी धर्मों में व्रत का महत्व है,इससे
जीवन अनुशासित होता है।जीवन में आये अनेक
संघर्ष स्वतःनष्ट हो जाते हैं।सहिष्णुता में वृद्धि होती
है।हमारा जीवन शॉतिप्रिय तथा प्रशन्नचित्त रहता है।
व्रत का पालन करने में चित्त की एकाग्रता एवं संकल्प
आवश्यक है। व्रत से आत्मा गलत कार्यों के लिए नहीं
उकसाती । पशु-पक्षियॉ भी व्रत केनियमों का पालन
करते हैं ।जानवर भूखे पेट शिकार करते हैं भरे पेट
नहीं करते हैं ।रात्रि के समय भी पशु-पक्षी भोजन
नहीं करते तथा सूर्यास्त के बाद अपने गुफाओं व
घोंसलों में चलेजाते हैं ।जबकि मनुष्य जीवन में
रात-दिन लिप्त सॉसारिक मायामोह से व्रत के
नियमों की अवहेलना करता है।जिससे समाज,
परिवार,पास-पडोस में कलह व अशॉति बढती
जा रही है। धर्म के शाश्वत मूल्य तो व्रत में
निहित हैं जिससे जीवन में मानव को सुख-
शॉति मिलती है ।

3-सात्विकता आती हैनेक  कमाई के उपभोग से

         व्यक्ति को अर्थ सुचिता का
ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि इससे
अनेक संयम स्वतः आ जाते हैं ।नेक
कमाई से खरीदे अन्न में पवित्रता और
सात्विकता होती है ,क्योंकि पवित्र आहार
से पवित्र विचार और पवित्र विचार से आचार
व्यवहार पवित्र होता है ।जिन विचारों से आपका
अन्तःकरण शुद्ध ,बुद्धि और आपका ह्रदय पूर्ण
समर्थन देता हुआ आनन्दित होता है उन
विचारों से आपका मन जुड जाता है ।

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