गॉड पार्टिकल के रहस्य से पर्दा उठा-25


1-गॉड पार्टिकल के रहस्य से पर्दा उठा-

         जी हॉ वैज्ञानिकों को एक बहुत बडी सफलता प्राप्त हुई है।
जेनेवा में बुद्धवार 4 जौलाय 2012 को वैज्ञानिकों ने एक पार्टिकल
की खोज का ऐलान किया है। अगर देखें तो यह उपलब्धि गुरुत्वाकर्षण
की खोज के बाद की बडी उपलब्धि है। फिर दूसरा जो महत्वपूर्ण बिन्दु है
कि बैज्ञानिकों ने इसे गॉड पार्टिकल कहा,जबकि विज्ञान अपने मूल चरित्र में
ईश्वर विरोधी है।आखिर विज्ञान को भी ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करना ही पडा।

2-जैसा कि आपको ज्ञात होगा कि 1970 के दशक में फिजिक्सो
के स्टैंडर्ड मॉडल के अनुसार हमारा यह ब्रह्मॉड 12 मूल  कणों से
मिलकर बना है,वैज्ञानिकों ने 11 कणों की खोज तो कर ली थी मगर
12वें कण की उन्हैं तलाश थी।इसके लिए उतनी ही ऊर्जा की जरूरत थी,
जो बिगबैग -अर्थात 14 अरब साल पहले ब्रह्मॉड के जन्म के समय रही होगी।
और इसकी खोज के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला का निर्मांण करना पडा। जिनेवा
के पास 27 कि.मी. लम्बी गोलाकार सुरंग एलएचसी बनाई गई। इस प्रयोग में 15 हजार
से अधिक वैज्ञानिक जुटे थे,जिसमें एक सौ से आधिक भारतीय थे। प्रयोग में महॉ विस्फोट की
स्थिति पैदा की गई,एलएचसी में अयनों की टक्कर से 10 लाख सैल्सियस का तापमान पैदा किया
गया,जोकि सूरज के केन्द्र में मौजूद तापमान से लाखों गुना अधिक था, इसके लिए प्रोटोनों को प्रकाश
की रफ्तार से विपरीत दिशाओं में छोडकर आपस में टकराया गया। इस प्रयोग से जिन कणों का पता चला
उन्हैं ही गॉड पार्टिकल कहा जा रहा है।

3-अब प्रश्न है कि गॉड पार्टिकल क्या है? –

       गॉड पार्टिकल या हिक्स बोसोन -परमाणु से भी
छोटा कण है, जो कि हर जगह होता है। जिसकी वजह
से कणों में भार होता है,इसी कण के द्वारा किसी वस्तु का
आकार बना होता है,अगर यह कण न होता तो अन्य सभी कण
अलग-अलग विखरे होते।फिर न पृथ्वी होती न चॉद न तारे व ब्रह्मॉण्ड
ही होता । इस कण को गॉड इसलिए कहा गया कि यह ईश्वर की तरह हर
तत्व में विद्यमान है, इसे देख पाना मुश्किल है। अगर यह कण न होता तो
यह ब्रह्मॉण्ड ही न होता ।इस कण से ही पृथ्वी की संरचना हुई है। हिक्स बोसोन
नाम में-हिक्स वृटिश वैज्ञानिक पीटर हिक्स के नाम से आया,और बोसोन-भारतीय
वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोष के नाम पर पडा-इन्होंने कणों के खास गुणों का फर्मूला
बताया था।

4-ब्रिटिश बैज्ञानिक हिक्स ने बताया कि वजन बोसोन कण के
कारण होता है।और बोसोन कण एक ऐसा मूल कण है,जिसका
अपना एक मूल क्षेत्र है,जो ब्रह्मॉड में हर कही मौजूद है,जब कोई
दूसरा कण इस क्षेत्र से गुजरता है तो उसे रुकावट का सामना करना होता
है,यह रुकावट जितनी ज्यादा होगी, द्रव्यमान उतना ही अधिक होगा।उस समय
इसका विरोध करने वालों की संख्या अधिक थी,क्योंकि इसे सबूतों के साथ सिद्ध करना
आसान नहीं था,इसलिए इसे गॉड पार्टिकल नाम दिया गया।

5-पिछले 50 वर्षों से वैज्ञानिक हिक्स बोसोन की तलाश में थे।
हिक्स बोसोन उन कणों को भार देने के लिए उपयोगी है जिन्होंने
अरबों वर्ष पहले ब्रह्मॉड की उत्पति की थी।

6-लेकिन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि जो कण हिक्स बोसोन
जैसा दिख रहा है,जरूरी नहीं कि यह कण हिक्स बोसोन ही हो,
आगे इस कण के गुणों के भी कई परीक्षण होने बाकी हैं। इस खोज
के लिए यही कहना उपयुक्त होगा कि- बस यह अभी बुनियाद है जिसपर
भविष्य में इमारत खडी की जा सकती है।

7-भारतीयों को गर्व की बात-

सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए कि यह खोज भारतीय
वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोष के नाम से जुडा है।इनके नाम से बोसोन
शव्द निकला है।सेकडों भारतीय वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग में काम किया है।
इसके अतिरिक्त दस भारतीय संस्थान सर्न से जुडे हैं।इस महॉ प्रयोग में प्रयुक्त
लाखों इलेक्टांनिक्स चिप भारत से भेजे गये हैं। इसलिए भारत को इस ऐतिहासिक घटना
का जनक कहा जाना अतिशयोक्ति न होगी।क्योंकि यह परियोजना हमारे धर्म ग्रन्थों से सम्बन्धित
है,जिसमें ब्रह्मॉण्ड की उत्पत्ति की झलक मिलती है। शिव नृत्य वाली प्रतिमा नटराज इसका उदाहरण
है। इसलिए जिस समय यह प्रयोग चल रहा था, भारत सरकार ने एक नटराज की प्रतिमॉ सर्न को भेंट
की थी ,जिसे वहॉ स्थापित की गई।

8-हिक्स बोसोन की सम्भावित कुछ उपयोगिताएं-

1-ब्रह्मॉड के अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठेगा।
2-कवीमारियों के इलाज में सहाक होने की सम्भावना।
3-अन्तरिक्ष के विमान तकनीक को उन्नत बनाने में सहायक।
4-इंटरनेट की गति में बृद्धि की सम्भावना।
5-क्षणिक स्तित्व वाले कणों का ज्ञाना।
6-ज्योतिष और आध्यात्म के नये आयामों की खोज।

9-हिक्स की यह खोज निसंदेह उन्हैं भौतिकी के नोबल
पुरुस्कार से सम्मानित होना चाहिए, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक
सत्येन्द्रनाथ बोष की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिनकी कोशिशों
से ही परमाणु से भी छोटे कणों को खोजने रास्ता खुला।जिनका नाम खुद
आईस्टीन ने बोसोन रखा था ।

इस कार्य के लिए वैज्ञानिकों को एवं हमारे समस्त मित्रों को शुभकामनाओं सहित धन्यवाद ।

10-विश्व भर के वैज्ञानिक जहां गॉड पार्टिकल मिलने की खुशियां मना रहे हैं।
वहीं आम आदमी के लिए गॉड पार्टिकल अब भी एक पहेली बना हुआ है। अगर
किसी राह चलते व्यक्ति से पूछा जाए कि क्या है गॉड पार्टिकल तो वह शायद ही
कुछ बता पाए।

11-जिनेवा.वैज्ञानिकों ने आज दावा किया कि उन्हें महाप्रयोग के दौरान
नए कण मिले हैं जिनकी कई खूबियां ‘हिग्स बोसॉन’ या ‘गॉड पार्टिकल’
से मिलती हैं। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक नए कणों के विश्लेषण में जुटे हैं।

12-हमारे वेद और शास्त्रों में कण-कण में भगवान की थ्योरी पहल
से ही मौजूद है। ऋग्वेद में तो पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति का लेखा-जोखा
ही मौजूद है। ऋग्वेद में कहा गया है- सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत
भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था। छिपा था कहां क्या, किसने
देखा था। उस पल तो अगम, अटल जल भी कहां था। बस एक बिंदु था। ब्रह्म
स्वयं प्रकाश है। उसी से ब्रह्मांड प्रकाशित है। उस एक परम तत्व ब्रह्म में से ही आत्मा
और ब्रह्मांड का प्रस्फुटन हुआ है। ब्रह्म और आत्मा में सिर्फ इतना फर्क है कि ब्रह्म महाआकाश
है तो आत्मा घट का आकाश।

13-संस्कृत के विद्धान और गोविंद देव पंचांग के संपादक आचार्य कामेश्वर
नाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि उपनिषद में एक जगह उल्लेख है कि ब्रह्म, ब्रह्मांड
और आत्मा, यह तीन तत्व ही हैं। ब्रह्म शब्द ‘ब्रह्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ
बढ़ना या फूट पड़ना होता है। ब्रह्म वह है, जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की
उत्पत्तिहुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का
कारण ब्रह्म है।

14-पदार्थ का विघटित रूप ही परम अणु है। जेनेवा प्रयोग में वैज्ञानिकों ने द्रव्य
और द्रव्यमान के लिए इसी ‘गॉड पार्टिकल’ को जिम्मेदार माना। उपनिषद में इसी
द्रव्य के बारे में समझाया गया है- परमेश्वर से आकाश अर्थात जो कारण रूप द्रव्य सर्वत्र
फैल रहा था, उसको इकट्ठा करने से अवकाश उत्पन्न होता है। वास्तव में आकाश की उत्पत्ति
नहीं होती, क्योंकि बिना अवकाश के प्रकृति और परमाणु कहां ठहर सके और बिना अवकाश के
आकाश कहां हो। अवकाश अर्थात जहां कुछ भी नहीं है और आकाश जहां सब कुछ है।

14-उनके अनुसार उपनिषद कहता है कि पदार्थ का संगठित रूप जड़ है और
विघटित रूप परम अणु है। इस अणु को ही वेद परम तत्व कहते हैं और इसी
उपनिषद में आगे कहा गया है कि आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्नि,
अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औषधियों से अन्न,
अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात शरीर उत्पन्न होता है।

15-वैज्ञानिकों का मानना है कि इस खोज के बाद किसी भी वस्तु का द्रव्यमान हटा
लेने पर उसे प्रकाश की गति से कहीं भी भेजा जा सकेगा। इससे अंतरिक्ष में भेजे जाने
वाले सेटेलाइट के प्रक्षेपण में बहुत कम ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकेगा। साथ ही ऊर्जा
का कम से कम इस्तेमाल होने के कारण खर्च भी बहुत कम आएगा। यह नियम केवल सेटेलाइट
पर ही लागू नहीं होगा। इसे परिवहन के साधनों पर भी लागू कर ईधन की ज्यादा से ज्यादा बचत
की जा सकेगी।

16-यूरोपीयन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च [सर्न] के वैज्ञानिक अल्बर्ट डी रोइक का कहना है
कि वर्ष 2013 की शुरुआत से ही खोजे गए कण [गॉड पार्टिकल] के रहस्यों से पर्दा उठना शुरू
हो जाएगा। साथ ही लार्ज हैड्रन कोलाइडर की क्षमता बढ़ाने के बाद ज्यादा डाटा उपलब्ध होने पर
वर्ष 2015 तक अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। उन्हें भरोसा है कि यह नए भौतिक विज्ञान का
प्रवेश द्वार होगा। साथ ही प्रकृति को चलाने वाले वास्तविक नए सिद्धांतों की खोज की जा सकेगी। उन्होंने
कहा कि अगर खोजा गया कण स्टैंडर्ड मॉडल हिग्स बोसोन नहीं निकला, तो यह निराशाजनक होगा।

17-औपचारिक घोषणा से कुछ घंटे पहले सर्न की कामयाबी का वीडियो लीक हो गया है,
जो कि गलती से वेबसाइट पर पोस्ट हो गया। इस वीडियो में हिग्स बोसोन पार्टिकल की खोज
के बारे में जिक्र किया गया है। वीडियो में गॉड पार्टिकल ढूंढने का दावा किया गया है। लीक वीडियो
में सर्न के प्रवक्ता कह रहे हैं कि हमने एक नए पार्टिकल को देखा है और उसे महसूस किया है। हमें
पक्का भरोसा है कि वहां कुछ है जो दो अणुओं की टक्कर का नतीजा है।

18-ऐलान से पहले ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पहेली के वीडियो के लीक होने के पर
सर्न के प्रवक्ता का कहना है कि प्रयोग के दौरान इस तरह के निष्कर्ष हम निकालते
रहते हैं। जरूरी नहीं है कि ये नतीजे ही अंतिम नतीजे हों।

19-मालूम हो कि जेनेवा में मौजूद दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्न में वैज्ञानिकों
की टीम गॉड पार्टिकिल के रहस्य को सुलझाने से जुड़े दावों का खुलासे करेंगे। ब्रह्मांड की
उत्पत्ति को लेकर पिछले काफी समय से रहस्य गहराया हुआ था।

20-रिसर्च में पंजाब यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक शामिल-
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कारण माने जा रहे गॉड पार्टिकल
(हिग्स बोसोन) की खोज में पंजाब यूनिवर्सिटी के पांच प्रोफेसर
भी पिछले तीन सालों से जुड़े रहे हैं। इनमें से दो प्रोफेसर मंगलवार को
जेनेवा में इस महाप्रयोग के अंतिम निष्कर्ष निकालने तक अपना योगदान देते
रहे। यही वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल के रहस्य का खुलासा करेंगे।

21-छात्रों को मिलेगी जानकारी-

इस खोज के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी के
फिजिक्स विभाग ने विशेष व्यवस्था की है। यूनिवर्सिटी के जो पांच शिक्षक इस महाप्रयोग
से जुड़े हैं उनमें प्रोफेसर जेबी सिंह, प्रोफेसर सुमन बाला बैरी, प्रोफेसर मंजीत कौर, डॉक्टर विपिन
भटनागर और डॉक्टर जेएन कोहली शामिल हैं।

22-लंबी सुरंग में तीन साल से चल रहा था प्रयोग-

    गॉड पार्टिकल की खोज के लिए कई किलोमीटर लंबी सुरंगनुमा प्रयोगशाला तैयार की
गई थी और यहां वर्ष 2009 से प्रयोग चल रहा था। यहां बिग बैंग विस्फोट जैसा माहौल
तैयार किया गया था, ताकि इसके रहस्यों को समझा जा सके। पंजाब यूनिवर्सिटी के अलावा
भारत के पांच अन्य शिक्षण और शोध संस्थानों के शिक्षक इस खोज का हिस्सा रहे हैं। तीन साल
की खोज के बाद ही सर्न के वैज्ञानिकों ने गॉड पार्टिकल का पता लगने के प्रति 99.99995 फीसदी
परिणाम के सकारात्मक होने की उम्मीद जाहिर की है।

23-वैज्ञानिकों ने महाप्रयोग का जो ब्योरा दिया है, उससे हिग्स बोसान नाम के
उस कण की मौजूदगी का संकेत मिलता है, जिसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार
माना जा सकता है. इसका एक मतलब ये भी निकाला जा सकता है कि ब्रह्मांड को भगवान
ने नहीं बनाया।

24-सतेन्द्रनाथ बोस ने 1924 में महसूस किया कि 19वीं सदी के दौरान गैसों
के तापीय व्यवहार के विश्लेषण के लिए जो तरीका अपनाया जा रहा है वह तरीका
अपर्याप्त है। उन्होंने ढाका में तैयार किए गए अपने क्वांटम स्टैटिस्टिक्स के शोध पत्र
को ब्रिटिश जर्नल में प्रकाशित करने के लिए भेजा, लेकिन उसने इन्कार कर दिया।

उसके बाद उन्होंने उसे प्रख्यात भौतिकविद अलबर्ट आइंस्टीन को भेजा। उन्होंने इसकी
महत्ता को समझते हुए पेपर को अनुमोदित करके जर्मन जर्नल में प्रकाशित कराया।

    बोस की इस खोज को बोस-आइंस्टीन स्टैटिस्टिक्स के तौर पर जाना गया और यह
क्वांटम मैकेनिक्स का आधार बना। आइंस्टीन ने पाया कि इस खोज का भौतिकी के लिए
खासा महत्व है और इसने उप परमाणु कण (सब एटामिक पार्टिकल) की खोज का मार्ग प्रशस्त
कर दिया था। जिसका नाम उन्होंने अपने भारतीय सहयोगी के नाम पर बोसान दिया।

  हालांकि कम ही भौतिकविद इससे असहमत होंगे कि हिग्स बोसान से ज्यादा बोस-आइंस्टीन
स्टैटिस्टिक्स भौतिकी के लिए उपयोगी है। आखिरी भारतीय वैज्ञानिक खोज जिसे विश्व स्तर पर
मान्यता मिली वह शून्य है।

  बोस बोस को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला जबकि सीवी रमन को इस सम्मान से नवाजा
गया। बोस ने रेडियो तरंगों की खोज में योगदान दिया था, लेकिन वायरलेस द्वारा संदेश
भेजने की विधि का श्रेय मार्कोनी को मिला।

     सर्न के प्रयोग में गॉड पार्टिकल को हिग्स बोसान नाम जो दिया गया, हिग्स बोसान में
हिग्स ईडनबर्ग यूनिवर्सिटी के भौतिकविद पीटर हिग्स के नाम पर पड़ा है। जबकि बोसान की
खोज का श्रेय कोलकाता के भौतिकविद सत्येंद्र नाथ बोस को जाता है, इसलिए बोस के नाम पर
इसे बोसान नाम दिया गया।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में गॉड पार्टिकल की अभूतपूर्व खोज से एक बात तय मानी जा रही
है कि इस बार इस शोध से जुड़े किसी न किसी वैज्ञानिक को नोबेल अवश्य मिलेगा, लेकिन
काम का श्रेय किसे मिलेगा इसपर नोबेल समिति को काफी माथापच्ची करनी पड़ेगी।

25-पांच वैज्ञानिक प्रमुख दावेदार:-

        यूरोपियन आर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च [सर्न] के वैज्ञानिकों की
दो टीमों ने इस महाप्रयोग में सहयोग किया है जिसमें हजारों वैज्ञानिक शामिल हैं।
हिग्स बोसोन से मिलते जुलते कण की खोज के लिए इन सबको श्रेय दिया जाना चाहिए।
फ्रांस और स्विट्जरलैंड की सीमा के पास जमीन के 300 फीट नीचे ये वैज्ञानिक वर्षो से प्रयोग
कर रहे थे। यह पुरस्कार कणों के भार के सिद्धांतपर 50 साल पहले काम करने वाले वैज्ञानिक को
मिलने की प्रबल संभावना है। दरअसल छह वैज्ञानिकों ने चार महीनों के भीतर यह सिद्धांत 1964 में
प्रकाशित किया था। उस समय सबसे पहले अगस्त में फ्री यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रसेल्स के रॉबर्ट ब्राउट और
फ्रैंक्वाइस एंगलर्ट ने अपना शोध प्रकाशित किया था। ब्राउट की पिछले साल मृत्यु हो गई। इसलिए मृत्यु
पश्चात उन्हें पुरस्कार नहीं दिया जा सकता।पीटर हिग्स ने सितंबर और अक्टूबर में अपने दो शोध पत्र
प्रकाशित किए। दूसरे शोध पत्र में सबसे पहले उन्होंने इस बात को उठाया कि सिद्धांत के मुताबिक प्रकृति
में एक नया कण और होना चाहिए, जिसे खोजने की जरूरत है। इस संभावित कण को 1972 में हिग्स बोसोन
नाम दिया गया। नवंबर 1964 में तीसरा शोध पत्र प्रकाशित करने वालों में दो अमेरिकी शोधकर्ता डिक हेगन और
गेरी गुरालनिक तथा ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी टॉम किबले शामिल थे। तीनों ने अपना काम अलग-अलग किया।
इसलिए भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के पांच दावेदार हैं। अगर सर्न में खोजे गए कण की पहचान हिग्स बोसोन के
तौर पर हो जाती है तो निश्चित रूप से हिग्स को इस सम्मान से नवाजा जाएगा। बचे चार भौतिकविदों में एंगलर्ट
ने पहले शोध पत्र पेश किया था इसलिए दूसरा नाम उनका प्रस्तावित होगा। देखें तीसरा नाम किसका हो सकता है।

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