जीवन के आधार-10


1-स्वयं को पहचानने में विवाद न करें

           जो लोग धर्म के बारे में विवाद
करते हैं,वे तो स्वयं को पहचानने में विवाद
करते हैं। वे स्वयं ईश्वर रूप होते हुये भी अपने
ईश्वर पद को अस्वीकार करते हैं। वे पागलों की भॉति
अपने को ही नहीं पहचानते हैं। वे लोग अपनी गंदगी और
अनुत्तरदायित्वपूर्ण कार्य से जगत को कुरूप बना देते हैं। इनका
उपचार करना, इन्हैं समझा- बुझाकर इनके रोग को मिटाना
आवश्यक हैं। नईं शिक्षा के द्वारा इन्हैं शिक्षित किया जाना चाहिए ।

2-शुभ कार्य स्वयं में शुभ मुहूर्त है

             कोई भी शुभ कार्य करने में उसे
कल पर नहीं छोडना चाहिए, और न हीं शुभ
कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता होती है,इसलिए
कि शुभ कार्य स्वयं में शुभ मुहूर्त है। अशुभ को करने में
जल्दवाजी नहीं करनी चाहिए। शुभ,पुण्य कार्य को आज ही
कर लो,अभी कर डालो,इसीवक्त कर डालो पता नहीं अगले क्षण
तुम रहो या न रहो ।

3-श्रद्धा और विश्वास

                  विश्वास तो कई जगह किया जा
सकता है, जैसे मित्र,नौकर,अपना सम्बन्धी, और
यहॉ तक कि ताले पर भी ।लेकिन श्रद्धा तो केवल एक
ही स्थान पर होती है और वह है इष्ट या सद्गुरु।श्रद्धा के
आने से अभय का भाव आता है । लेकिन अभय का तात्पर्य यह
नहीं कि तुम किसी से डरते नहीं, बल्कि इस भाव का अर्थ तब पूर्ण
होगा जब तुमसे भी कोई न डरे ।

4- दुखों से मुक्ति पाने का साधन श्रेष्ठ बुद्धि है

                 ईश्वर ने जिस महान उद्देश्य के लिए
हमें यह शरीर प्रदान किया है,इसके लिए श्रेष्ठ बुद्धि
की आवश्यकता है। इस संसार के समस्त दुखों से मुक्ति
पाने के लिए महत्वपूर्ण साधन यह श्रेष्ठ बुद्धि ही है,जिसकी
सहायता से संसार का प्रत्येक प्राणी भव सागर के भंवर में उलझी
हुई अपने इस तन रूपी नौका को भी पार उतार सकता है लेकिन यह
तभी संभव है जब बुद्धि श्रेष्ठ हो ।

5- जब बुद्धि मलिन हो तो समझो विपत्ति आनी वाली है

                जैसा कि कहा गया है कि विनाश काले
विपरीत बुद्धि। जब बुद्धि मलिन होने लगे और विचार
अपवित्र हों तो समझ लेना चाहिए कि कोई विपत्ति आनी
वाली है। उस समय योग द्वारा अपने विचारों और संकल्प को
शुद्ध और पवित्र बना लेना चाहिए, तो फिर दुर्भाग्य भयभीत नहीं
कर सकेगा। जिससे संकट हल्का हो जाता है । सत्य संकल्प के द्वारा
कठिन आपत्ति को भी टाला जा सकता है । दृढ संकल्प और शुद्ध विचार
वाले व्यक्ति पर यदि अचानक विपत्ति आ भी जाय तो प्रकृति और आस-पास
के लोग एवं वहॉ का वातावरण उसके बोझ को बॉट लेंगे । इसलिए संकल्प
शक्ति इस संसार में सर्वोपरि शक्ति है ।

6- मन हंसता है तो होंठ कभी नहीं रोते

                    जिसका मन रोगी नहीं, विकारों युक्त
नहीं ,उसका शरीर कभी रोगी नहीं हो सकता है। जिसका
मन हंसता है उसके होंठ कभी नहीं रोते ।अस्वस्थ तन में स्वस्थ
मन तो रह सकता है,परन्तु अस्वस्थ मन कभी तन को स्वस्थ रहने
नहीं देता ।

7- स्वस्थ चिंतन से समाज को गति मिलती है

                         स्वस्थ शरीर में स्वस्थ विचार होते हैं
स्वस्थ चिन्तन से एकाग्रता-सजगता-अन्तर्दृष्टि जागृत
होती है। तब आत्मध्यान की गहराई से प्राप्त अमृत ही जीवन
को शक्ति व शॉन्ति देता है। इस प्रकार के स्वस्थ चिन्तन व शॉत
मानव द्वारा ही विश्व सुन्दर वनता है,उस समाज को उत्थान की ओर
बढने की गति मिलती है। बीमार व्यक्ति काचिन्तन एवं आचरण भी रुग्ण
होगा। मूढ व्यक्ति तो अपना ही उपकार नहीं कर सकता ।अशॉत व्यक्ति तो
दुनियॉ को कुरूप बना देता है ।

8- ईश्वर अनुभूति का विषय है

              जिसे पाने का कोई उपाय नहीं उसका
नाम है संसार, और जिसे खोने का कोई उपाय नहीं
है उसका नाम है परमात्मा। लेकिन इस संसार को पाने के
लिए और परमात्मा को खोनो के लिए इंसान सारा जोखिम दॉव
पर लगा देता है। ईश्वर तो मान्यता का नहीं अनुभूति का विषय है ।

9- सबसे बडा वशीकरण मंत्र स्वयं को वश में करना है

              सच्चा संत कभी वशीकरण मंत्र का प्रयोग
नहीं करता बल्कि संत तो स्वयं अपने आपको वश में
कर देता है । और फिर पूरी दुनियॉ संत के वश में हो जाती
है। स्वयं अपने को वस में करना दुनियॉ का सबसे बडा वशीकरण
मंत्र है ।

10- सत्य को गंवाकर कुबेर की सम्पदा पाना घाटे का सौदा होगा

                   सत्य और न्याय के पीछे चलने में हमें
सबकुछ छोडना पडता है तो इसके लिए हमें स्वयं को
तैयार करना चाहिए ।क्योंकि सत्य ही परमेश्वर है, इससे
बढकर इस संसार में कुछ भी नहीं है। यदि सत्य अपने हाथ
रहा और उसके बदले सबकुछ चला गया तो कोई हर्ज नहीं ।लेकिन
यदि सत्य को गंवाकर कुवेर की सम्पदा और इन्द्र का सिंहासन भी
मिल जाता तो समझना चाहिए कि यह बहुत महंगा और बहुत घाटे का
शौदा रहा है ।

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