राजा और रानी की नईं कहानी


             कहानियां बहुत पढी और
सुनी हैं। कुछ सच्ची होती हैं तो कुछ
काल्पनिक। कुछ बन जाती हैं तो कुछ
बुनी हुई होती हैं। कहानियां राजा और रानी
की हों तो बहुत पसंद की जाती हैं। बचपन में
सुना करते थे, एक राजा था-एक रानी, दोनों मिल
गए खत्म कहानी।

            एक कहानी जो बनी
नहीं, बल्कि बुनी हुई है शब्दों के
ताने-बाने से। हमारी इस कहानी में
राजा भी है और रानी भी। यहां राजा-रानी
पहले तो मिल गए मगर अंत में मिलेंगे नहीं।
इसका कारण यह है कि हमारी कहानी का राजा
किसी और रानी का है। हमारी रानी भी किसी और
राजा की रानी है..!
..

         अरे यहां तो कहानी
शुरू होने से पहले ही खत्म हो
गई? लेकिन नहीं, जब इसे बुनना
शुरू किया है तो अभी से खत्म कैसे
कर सकते हैं। कुछ तो सोचना होगा राजा-
रानी की इस कहानी को आगे बढाने के बारे में..।
..तो चलिए शुरू करते हैं। हमारी कहानी की नायिका
है वेदिका..! आज उसकी चूडियां कुछ ज्यादा खनक
रही हैं और पायल भी ज्यादा छनक रही है। मगर ये
अपने पिया के लिए नहीं खनक रहीं, बस यूं ही आज
बहुत खुश है वेदिका ..! दौड कर सीढियां चढ रही है।
छत पर पूनम का चांद खिला है। मगर उसे तो अपनी
खिडकी से चांद देखना अच्छा लगता है। खिडकी वाला चां
द ही उसका है, छत वाला चांद तो पूरी दुनिया का है। कमरे में
जाकर देखा, राघव सो गया है। थोडी मायूस हो गई वेदिका। उसे
बुरा लगता था कि वह रात में कमरे में आए तो पति सोता मिले।
यही तो समय होता है, जब वह बात करने की फुर्सत पाती है,
लेकिन अकसर ऐसा होता है कि जब वह काम निपटा कर
कमरे में आती है, राघव सो जाता है। वह कुछ देर कुर्सी
पर बैठ कर खिडकी से झांकता चांद निहारती रही।
फिर उसकी नजर कमरे में सो रहे राघव पर पडी।
वेदिका का मन किया, झुक कर राघव का माथा
चूम ले, हाथ भी बढाया, लेकिन रुक गई।
संयुक्त परिवार में वेदिका सबसे बडी बहू है।
राघव के दो छोटे भाई हैं। सभी अपने-अपने
परिवारों सहित साथ ही रहते हैं। मां-बाबा भी
अभी ज्यादा बुजुर्ग नहीं हैं। बहुत बडा घर है यह,
तीसरी मंजिल पर वेदिका का कमरा है। साथ में एक
छोटी सी रसोई है। रात को या सुबह जल्दी चाय-कॉफी
बनानी हो तो नीचे नहीं जाना पडता। बडी बहू होने के
नाते उसे घरेलू कार्य तो कम ही करने पडते हैं, लेकिन
उसकी जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा हैं। पिछले बाईस बरसों से
उसकी आदत है कि बच्चों को एक नजर देख कर, हर
कमरे में झांकती, सबसे बात करती, किसी बच्चे की
समस्या सुलझाती हुई.. अंत में अपने कमरे में जाती
है। उसे अपने बच्चों के साथ ही दूसरे बच्चों का भी
खयाल है। राघव की आदत है बिस्तर में जाते ही
नींद के आगोश में गुम हो जाता है। वेदिका ऐसा
नहीं कर पाती, वह बिस्तर पर लेट कर सारे
दिन का लेखा-जोखा करके सोती है।
लेकिन आज वेदिका का मन उडान
भर रहा था। वह धीरे से उठ कर
खिडकी के पास आ गई। अभी
शहर जाग ही रहा था। लाइटें कुछ
ज्यादा चमक रही थीं। शादियों का
मौसम था, लिहाजा तेज संगीत के
स्वर हवा के साथ कमरे तक पहुंच
जा रहे हैं।

           उसकी नजर फिर
से चांद पर टिक गई। उसे चांद
में प्रभाकर का चेहरा नजर आने
लगा। अचानक एक गाने के बोल
उसके कानों पर आकर टकराए। एक
बार खिडकी बंद करने को हुई, मगर यह
गाना उसे बहुत पसंद है। यूं भी आजकल न
जाने क्यों ऐसा होता है कि हर गाना ही उसे
भा जाता है। उसे लगता है मानो हर गीत उसी
पर बना है। ..बस यहीं से हमारी कहानी की
नायिका यानी वेदिका का अंतद्र्वद्व शुरू
होता है। भजन सुनने की इस उम्र में नए
जमाने के गानों पर शर्माती, उन्हें गुनगु-
नाती वेदिका तो जैसे उम्र को ही भूल बैठी
है। सच कहें तो उसका मन आजकल एक
ही नाम गुनगुनाता है, वह है प्रभाकर का..।

         अब आप पूछेंगे राजा-
रानी के बीच यह प्रभाकर कहां
से आ गया! यही तो ट्विस्ट है। वेदिका
इतनी व्यस्त रहती है घर के काम-काज
में, संयुक्त परिवार में उसे भला फुर्सत कैसे
मिलती होगी जो वह किसी दूसरे राजा से
दिल लगा बैठी? फिर वह मिली कैसे होगी
प्रभाकर से? क्या प्रभाकर उसका कोई
पुराना..? जरूर ये सारे सवाल आपके
दिल में उठ रहे होंगे।

             जी नहीं..! अब कहीं
जाने की क्या जरूरत है, जब एक
चोर दरवाजा घर में ही घुस आया है।
हम बात कर रहे हैं इस हाइटेक जमाने
के कंप्यूटर-इंटरनेट की!

                नई-नई टेक्नोलॉजी
सीखने का बहुत शौक है वेदिका को।
बच्चों से ही कंप्यूटर चलाना सीख लिया।
एक दिन बच्चों ने ही फेसबुक पर अकाउंट
बना दिया। वेदिका तो चकित ही रह गई। क्या
दुनिया है यह भी! परी-लोक इसी को तो कहते हैं।
बस यहीं मिला प्रभाकर उसे। न जाने कब प्रभाकर
को मित्र से मीत समझने लगी वह। आज खुश भी
इसलिए है कि पहली बार प्रभाकर से बात की है..।

                    ड्रेसिंग टेबल पर
रखे मोबाइल से मेसेज टोन सुनते
ही वह लपकी। प्रभाकर का ही संदेश
था। एक गालिबाना शेर लिखा था और
अंत में कई स्माइलीज के साथ गुडनाइट।
तो यही था वेदिका की खुशी का राज? पिछले
एक साल से प्रभाकर से चैटिंग हो रही है। आज
फोन पर बात भी हो गई और लीजिए अब तो मेसेज
भी आ गया। नाइट-सूट पहन कर बिस्तर पर आ
गई वेदिका। लेकिन नींद भला कहां आनी थी।
राघव को निहारने लगी और सोचने लगी कि
जो कुछ भी उसके अंतर्मन में चल रहा है
क्या वह ठीक है! यह प्रेम-प्यार का
चक्कर..! क्या है यह? वह भी इस
उम्र में, जब बच्चों के भविष्य के
बारे में सोचना चाहिए उसे! अब
इसमें राघव की क्या गलती है,
जो वह इस तरह दूसरे पुरुष की
ओर आकर्षित हो रही है! वह तो
बहुत खयाल रखता है उसका, किसी
चीज की कमी नहीं होने देता। हां, अपने
काम में इतना व्यस्त जरूर है कि उसे समय
कम ही दे पाता है। लेकिन इसका अर्थ यह तो
नहीं कि वेदिका कहीं दिल लगा बैठे!

               कहां गए उसके मूल्य?
इतनी व्यस्त जिंदगी में जहां हवा भी
सोच कर प्रवेश करती हो, प्रभाकर को
आने की इजाजत कैसे मिल गई? दिल में
सेंधमारी आखिर हुई कैसे?

                   अगले ही पल उसके
विचारों ने झटका खाया। सहसा बिजली
की तरह एक खयाल दौड पडा। सेंधमारी
तो हो सकती है क्योंकि वह जितनी रोमैंटिक
है-राघव उतना नहीं। उसे याद है, शादी के बाद
जब पहली बार राघव के साथ बाइक पर बाजार गई
थी। उसने पीछे से राघव की कमर को हाथ से पकडा
ही था कि वह उखड कर बोल पडा, क्या कर रही हो
वेदिका? यहां सब जान-पहचान के लोग हैं, कोई
देख लेगा तो! सभ्य घर की बहू हो, थोडा तो
सोचो..। उसने सहम कर हाथ पीछे कर
लिए। उस वक्त जैसे दिल का कोई
कोना चटक गया और वेदिका
उसी रास्ते रिसने लगी, थोडा-
  थोडा रोज..।

              बाद में राघव ने उसे
मनाया भी, मगर इस टूटे हिस्से को
जोडने वाला सॉल्यूशन तो बना ही नहीं।
वह उस प्यार को नहीं मानती, जो देह को
तो छुए मगर मन तक न पहुंचे। जी भर आया
वेदिका का.।

                      तभी मन के दूसरे कोने से
आवाज आई, वेदिका तू बहुत भावुक है। मगर
प्यारी यह जीवन भावुकता से नहीं चलता..! यह
सब प्रेम-प्यार किताबों में ही अच्छा लगता है, हकीकत
में नहीं। हकीकत की पथरीली जमीन पर आकर यह टूट
जाता है। और फिर इतने सालों में राघव बदल भी तो गया
है। तू जैसा उसे बनाना चाहती थी, काफी हद तक वैसा ही
हो गया न!

                    तो क्या हुआ..! रिसते
मन पर कितनी भी फुहार डालो, वह जीवित
कहां हो पाता है। वेदिका ने अपने दूसरे हिस्से
को जवाब दिया। वह कुछ पल यूं ही राघव को निहारने
लगी। धीरे से उसके हाथों को छूना चाहा, मगर नहीं छू सकी।
बस अपना हाथ सरका कर राघव के हाथ के पास रख दिया।
अचानक उसका हाथ राघव के हाथ को छू गया और उसने
झट से वेदिका का हाथ पकड लिया। वेदिका ने जल्दी से
अपना हाथ खींच लिया तो राघव चौंक कर जाग उठा,
क्या हुआ..!

       कुछ नहीं, आप सो जाइए..,
वेदिका ने धीरे से कहा और करवट
बदल कर लेट गई। सोचने लगी, अब
कितना बदल गया है राघव..! पहले जैसा
तो बिलकुल नहीं रहा। याद करते हुए उसकी
आंखें भर आई। एक रात उसने सोए हुए राघव
के गले में बांहें डाल दी थीं तो वह जाग गया और
वेदिका पर भडक उठा था। उसे नींद में डिस्टर्ब करना
बिलकुल पसंद नहीं है। उस रात दिल का वह कोना कुछ
और चटक गया।

             तो क्या हुआ वेदिका!
हर इंसान की अपनी सोच होती है।
तुम्हारे पति की भी एक अलग शख्सीयत
है। इसके बावजूद उसने खुद को तुम्हारे हिसाब
से ढाला है, वह तुम्हारा खयाल रखता है। हो सकता
है उसे भी तुमसे कुछ शिकायतें हों और वह तुम्हें न
बता पाता हो। अरेंज्ड मैरिज में तो ऐसा ही होता है।
पहले तन और फिर धीरे-धीरे मन भी मिल ही
जाते हैं। व्यावहारिक बनो, भावुक नहीं..!
उसके भीतर की मेच्योर वेदिका को
गुस्सा आ गया।

               हां, रखता है खयाल..!
लेकिन मैंने ही तो बार-बार हथौडा मार
कर यह मूरत गढी है। यह भी अभी सिर्फ
मूरत है, इसमें अभी प्राण कहां हैं, मुस्कराना
चाहा वेदिका ने।

                      वेदिका को बहुत हैरानी होती है
कभी-कभी। जो इंसान दिन के उजाले में इतना गंभीर
रहता हो, वही रात में इतना प्यार करने वाला और इतना
खयाल रखने वाला कैसे हो सकता है!

                  उसके भीतर की पत्नी
फिर बोल पडी, चाहे जो हो वेदिका, अब
तुम उम्र के ऐसे पडाव पर हो, जहां तुम कोई
रिस्क नहीं ले सकतीं। तुम यह नहीं सोच सकती
कि जो होगा देखा जाएगा और न सामाजिक परिस्थि
तियां तुम्हारे पक्ष में हो सकती हैं, यह परपुरुष का खयाल
भी दिल से निकाल दो।

                परपुरुष..! क्या
प्रभाकर परपुरुष है? लेकिन मैंने
तो सिर्फ प्रेम किया है। स्त्री जब प्रेम
करती है तो वह बस प्रेम करती है, इसकी
कोई वजह नहीं होती। उम्र, सुंदरता, पद-प्रतिष्ठा..
वह कुछ नहीं देखती, एक एहसास होता है प्यार।
प्रभाकर ने भी कहीं मेरे मन को छुआ है।

                      प्रभाकर का खयाल
आते ही दिल को जैसे फिर सुकून आ गया।
होठों पर मुस्कान आ गई, हां! मुझे प्यार है प्रभाकर
से, इसके बाद मैं कुछ जानना-समझना नहीं चाहती।

                    बेवकूफ मत बनो वेदिका..!
जो व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं,
वह तुम्हारे प्रति कैसे वफादार हो सकता है? जो
अपने जीवनसाथी के साथ इतने बरस रह कर उसके
प्रेम को झुठला सकता है और कहता है कि उसे अपनी
पत्नी से प्रेम नहीं है वह तुम्हें कैसे प्रेम करेगा! कभी उसका
प्रेम आजमा कर देख लेना, फिर देखना वह कैसे अजनबी बन
जाएगा, कैसे उसे अपने परिवार की याद आ जाएगी..! वेदिका के
भीतर जैसे जोर से बिजली चमक पडी और वह झटके से उठ कर बैठ गई।
हां, यह बात सच है मगर यही बात तो मुझ पर भी लागू होती है। मैं भी कहां
वफादार हूं राघव के प्रति..! यह सोचना कहां शोभा देता है कि प्रभाकर..,
वेदिका बेचैन हो उठी।

                  बिस्तर से उठ कर खिडकी
के पास आ खडी हुई। बाहर का कोलाहल कम
हो गया था, लेकिन मन के भीतर का कोलाहल
अभी नहीं थमा था। नींद कोसों दूर थी। क्या यह
पहली बार प्रभाकर से बात करने की खुशी है या
उसके भीतर का अपराध-बोध, जो धीरे-धीरे उसे कचोट
रहा था? क्या यह सब किस्मत का खेल है जिसे होना ही
था! अगर होना था तो पहले क्यों नहीं मिले वे? राघव के साथ
रहते-रहते भी तो उसे प्रेम हो ही गया एक दिन। अब यह समझौता
हो, लगाव हो या फिर नियति, एक डोर से तो बंधे ही हैं वे..। वेदिका
अजीब सी सोच में घिरी रसोई की तरफ बढ गई। अनजाने में चाय की
जगह कॉफी बना ली। बाहर छत पर पडी कुर्सी पर बैठ कर सिप लिया
तो चौंक पडी वेदिका। अरे यह क्या..! उसे तो कॉफी की महक से भी
परहेज था और आज वह आधी रात को कॉफी पी रही है! तो क्या
वह सचमुच बदल गई है? अपने उसूलों से डिग गई है वह? जो
कभी नहीं किया वह आज कैसे हो रहा है..!

                  राघव की निश्छलता
वेदिका को कचोट रही थी कि वह गलत
दिशा में बढ रही है। जब राघव को पता चलेगा
तो क्या वह इसे सहन कर सकेगा? क्या लोग उसे
माफ कर पाएंगे?

                           अचानक उसे लगा मानो
वह कटघरे में खडी है और लोग उसे घूरे जा रहे हैं
नफरत से, सवालिया नजरों से..। खडी हो गई वेदिका।
जितना सोचती, उतना ही और घिर जाती। लग रहा था मानो
रात बीत जाएगी, मगर उसकी उलझनें नहीं सुलझेंगी।
रात भी बीत चली।

    तीन बज गए, लेकिन वेदिका को एक
पल को भी चैन नहीं था। यह मन भी कितना
बडा छलिया है। एक बार फिर डोल गया और प्रभाकर
का खयाल आ गया। क्या वह सो गया होगा..?

                       फिर से फोन में मेसेज
टोन सुन कर उसने मोबाइल टटोला। प्रभाकर
का ही संदेश था। किसी ने सच ही कहा है कि मन
से मन को राह होती है। शायद तभी रानी जाग रही
है तो राजा भी जागेगा ही..। अब इस कहानी का क्या
किया जाए क्योंकि वेदिका का अंतर्दद्व खत्म तो हुआ नहीं।

                   प्रभाकर के प्रति उसका
शारीरिक आकर्षण तो है नहीं, सिर्फ उससे
बात करके कुछ सुकून सा मिलता है। वह उसकी
बात ध्यान से सुनता है और सलाह देता है। उसकी
बातों में लाग-लपेट भी नहीं दिखती, फिर क्या करे वह?
वह एक तरह से सच्चा मित्र ही हुआ न! सच्चे मित्र से प्रेम
तो हो सकता है। लेकिन इस तरह समय-असमय संदेशों
का आदान-प्रदान तो ठीक नहीं है.., सोचते हुए वेदिका
मुस्करा पडी। शायद उसे कोई हल मिल गया हो।

                  सोच रही है कि फेसबुक
के रिश्ते यहीं तक सीमित रहें तो बेहतर
है। अब वह प्रभाकर से सिर्फ फेसबुक पर बात
करेगी, वह भी सीमित शब्दों में। माना कि नए
जमाने में पुरुषों को मित्र बनाने में कोई बुराई भी
नहीं है, लेकिन यह मीत-वीत बनाने का चक्कर
ठीक नहीं है। प्रभाकर को वह खोना भी नहीं चाहती।
उसने तय कर लिया कि अब वह फोन पर बात नहीं करेगी।
अंतत: अंतद्र्वद्व खत्म हुआ तो सुबह तडके वेदिका को नींद
भी आ गई। रानी को समझ आ गई है तो अब राजा को भी
समझना होगा कि असल और आभासी दुनिया में एक
लंबा फासला होता है..।

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विदाई की वेला का अर्थ नई जिंदगी का संकेत


             कोई पुरुष कभी समझ
पाएगा कि विदाई की बेला में वधू के
मन पर क्या गुजर रही होती है! अपना
सुरक्षित माहौल और खून के रिश्ते पीछे छोड
अनजाने, अपरिचित लोगों के बीच जाकर रहना..
दो-एक दिन के लिए नहीं, सदैव के लिए। परायेपन
के भय के बीच हलकी सी जो आस की किरण होती है,
वह होती है पति से। अजनबी वह भी होता है, मगर प्यार
की डोर उन्हें करीब लाती है। वह मान लेती है कि जिस
तरह वह पति के प्रति समर्पित होगी, उसी तरह वह भी
अनजाने परिवेश में उसका सहारा बनेगा। मेरे लिए तो
यह परिवर्तन और बडा था। साधारण मध्यवर्गीय परिवार
की थी मैं और तीन बहनों में सबसे बडी। पिता का अपना
कारोबार इतना ही अच्छा था कि हम सबकी जरूरतें पूरी हो
सकें। देखने में मैं साधारण से कुछ ज्यादा सुंदर थी और किशो-
रावस्था पार करते-करते रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे। बारहवीं
की परीक्षा भी नहीं दे पाई थी कि एक संपन्न परिवार में रिश्ता
तय हो गया। मोटर पा‌र्ट्स का फैला हुआ कारोबार था उनका।
परिचित हैरान थे मेरे सौभाग्य पर। मां ईश्वर को धन्यवाद
देती न थकतीं। छोटी बहनें आने वाले दिनों की तैयारी से
ही उत्साहित थीं। ..और पापा? पापा तो यही सोच कर
संतुष्ट थे कि बडी का रिश्ता अच्छे घर में हो जाने से
दोनों छोटी बेटियों के लिए वर मिलना सरल हो जाएगा।
मेरे मन में डर तो था, लेकिन मैं पूरे मन से नए माहौल में
ढलने को दृढसंकल्प थी। यही संस्कार मिले थे मुझे अपने
परिवार से। सुख-सुविधाओं से भरपूर था मेरा नया घर। कमी
थी तो बस हमसफर की। पति बाहर वालों के सामने तो बहुत
सहज और विनम्र दिखते थे, लेकिन सारे कर्तव्य बाहर वालों के
सामने निभाए जाते। बाकी समय वे हमेशा मेरी अवहेलना करते।
हालांकि शुरू के कुछ दिन अच्छी तरह बीते। मिलन का खुमार,
हनीमून का साथ, घूमना-फिरना, संबंधियों व दोस्तों के घर
निमंत्रण पर जाना..। गुडिया सी सजी मैं छोटी-छोटी बातों
पर खुश हो जाती। उस उम्र में सोच ही उतनी होती थी।
लेकिन जल्द ही आबोहवा बदलने लगी। दुलहन का
जोडा उतरा, घर-गृहस्थी में रमने लगी और उधर
पति को एक नई गुडिया की तलाश होने लगी।
उनके लिए पत्नी का कोई महत्व नहीं था। मैं
सिर्फ उनकी जरूरत थी। इसके अलावा भी
मेरा वजूद हो सकता है, यह उनकी समझ
से बाहर था। व्यावसायिक मामलों में पिता
से मशविरा होता तो घरेलू मामलों में मां से।
मैं पराये घर से आई थी और परायी ही रही।
परिवार के हर संस्कार, तौर-तरीके, तहजीब
और रीति-रिवाज मैंने अपनाए। सारे कर्तव्य पूरे
करने के बावजूद मेरे अधिकार सीमित और वहीं
तक थे, जहां तक घर के सदस्य चाहें। यूं तो मेरे
नाम के आगे भी परिवार का नाम जुडा था, लेकिन
इसका हिस्सा मैं कभी नहीं बन पाई। जैसे किसी भरे
हुए पन्ने पर हाशिया छोड दिया जाता है, जरूरत पडने
पर उपयोग किया जाता है। मेरी स्थिति उसी हाशिये सी थी।
परिवार को वारिस चाहिए था। दो साल बाद यह उम्मीद पूरी
हो गई। एक साथ एक नहीं, दो-दो वारिस मिल गए। मुझे भी
थोडा संतोष इसलिए हुआ कि इस बहाने मुझे अपने वजूद को
साबित करने का एक मौका मिला। मगर मेरी यह संतुष्टि अल्प-
कालीन ही साबित हुई। पति को अब पूरी आजादी मिल गई। काम
के बाद क्लब जाते, यार-दोस्तों की महफिलों में डिनर और अकसर
पीना-पिलाना भी होता। इतना तक तो मैं स्वीकार कर लेती। मगर धीरे
-धीरे महिला दोस्तों की संख्या बढने लगी। मित्रता की आड में क्या चल
रहा है, यह खबर भी उडती-उडती मुझ तक पहुंचने लगी। हर व्यक्ति
की अपनी स्वतंत्रता है और एक सीमा के बाद किसी भी वयस्क
व्यक्ति को इसके लिए बहुत नहीं समझाया जा सकता। पहले
हर काम आड में होता था, सामाजिक-पारिवारिक मर्यादाओं
का पालन किया जाता, मगर मेरी चुप्पी ने धीरे-धीरे साहस
बढा दिया पति का। उनकी हिम्मत खुल गई। पैसे के बल
पर वह किसी के भी शरीर को पा लेते और उपभोग के
बाद उसे दूध में पडी मक्खी की तरह अपनी जिंदगी
से निकाल भी फेंकते। पुरुष होने के नाते कुछ
विशेषाधिकार सुरक्षित थे उनके पास। इसके
लिए उनके मन में कोई ग्लानि या अपराध
-बोध भी कभी नहीं पनपा। अब तक मैंने
जो कहानियां पढी थीं, उनमें दुख-
तकलीफ, विपत्ति के बाद अंत में
राजा-रानी सुख-चैन से जीवन
बिताते थे, मगर मेरी जिंदगी की
कहानी उलटी कलम से लिखी जा
रही थी। मैं सोचती, कहानियों में यह
क्यों नहीं बताया जाता कि विवाह के बाद
का जीवन कैसा होता है? अब तो पानी सिर
के ऊपर बहने लगा था। घर में ही खुला खेल
खेला जाने लगा। और एक दिन..अति हो गई।
आया के भरोसे दोनों बच्चों को छोड मैं बाथरूम
में नहाने घुसी। थोडी ही देर में उनकी रोने की
आवाज सुन कर अचानक बाहर आई तो आया
को नदारद पाया। उसे देखने घर में घुसी तो
आया को साहब के कमरे में आलिंगनबद्ध
पाया। संदेह तो कई दिनों से था, अब प्रमाण
भी मिल गया था। जिस बात को अब तक
अपना वहम समझ कर झटक देती थी,
वही साक्षात सामने थी। यह ऐसा सच था,
जिसे कहना भी मुश्किल था और निभाना भी
मुश्किल। यह मेरे स्त्रीत्व पर सबसे बडी चोट थी।
मैंने खुद को अपमानित-तिरस्कृत महसूस किया।
ऐसा लगा मानो किसी ने मुंह पर जोरदार थप्पड
रसीद कर दिया हो। वैसा ही झन्नाटा मैं पूरे
वजूद पर महसूस करने लगी थी। बात घर
के बाहर न फैले, परिवार की बदनामी न
हो, यह सोच कर सास के सामने मन
की उलझन रखी तो उलटे सारा दोष
मेरे ही सर मढ दिया गया। कहने लगीं,
तुम बेवजह शक करती हो। देखो, शादी
भरोसे पर ही टिकती है और फिर मर्द तो
होता ही भंवरे के समान है, उसे बांध कर
रखना तो तुम्हारा फर्ज है। इसमें भी तो तु-
म्हारा ही कसूर है न? तुम उसे खुश कर पातीं
तो वह ऐसी अनपढ गंवार लडकी के पीछे क्यों
भागता? मेरी चुप्पी देख सास ने आगे कुछ और
पंक्तियां जोड दीं, मैंने यह सोच कर तुमसे अपने बेटे
की शादी की थी कि तुम्हारी सुंदरता उसे बांधे रखेगी
और वह इधर-उधर जाना बंद कर देगा। वरना हमारे
पास तो एक से एक अच्छे रिश्ते आ रहे थे। मैं समझ
चुकी थी कि घर के बिगडे हुए सपूत को सुधारने के
लिए मुझ जैसी मिडिल क्लास कम पढी-लिखी लडकी
को बलि का बकरा बनाया गया है। सास-ससुर का तरीका
नाकाम रहा तो इसके लिए दंड भी मुझे ही भुगतना होगा। मैं
जानती थी कि शादी में भरोसा बडी चीज है। लेकिन अपनी आंखों
से पति को किसी दूसरी स्त्री के साथ देख कर कोई पत्नी कैसे उस
पर भरोसा कर सकती है, यह बात मेरी समझ से परे थी। मैं ससुराल
के ताने झेल सकती थी, पति की बेरुख्ाी से भी समझौता कर
सकती थी, लेकिन बच्चों के सामने अपने ही घर में पति को किसी
और के साथ कैसे बांटती! सास को कुछ और न सूझा तो बाबाओं-
साधुओं के पास जा-जाकर तावीज और भभूत लाकर मुझे देने
लगीं, जो दावा करते थे कि उनके यहां पति को वश में करने
के शर्तिया नुसखे हैं। मैं जानती थी, बेकाबू व्यक्ति को किसी
नुसखे से काबू नहीं किया जा सकता। दिन-प्रतिदिन पति
की रासलीला यूं ही चलती रही। निराश होकर एक दिन
बचपन की सहेली से मन की बात बांटी तो उसने भी
पलट कर कहा, मस्त रहो यार! कहां जाएगा?
लौट कर तुम्हारे पास ही आएगा न! शुक्र करो
कि उसने कभी तुम्हारे साथ मारपीट नहीं की। दिल
के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है..। जिंदा
रहने के लिए कोई न कोई तो बहाना चाहिए। इसे मजबूरी
कह सकते हैं, लेकिन जो घाव किसी को दिखाए भी न जा
सकें, वे ज्यादा ही कसकते हैं। कैसा समाज है यह, जहां
पुरुष की भटकन का दोष भी पत्नी के सर मढ दिया
जाता है। स्त्री की निष्ठा चौबीस कैरेट शुद्ध हो। अग्नि
परीक्षा देकर भी उसका चरित्र संदिग्ध रहता है और
उसे कभी भी त्यागा जा सकता है। हमारे पूर्वज
स्त्रियों के लिए सीता और सावित्री जैसे आदर्श
निर्धारित करते समय पुरुषों के आगे कोई
आदर्श रखना क्यों भूल गए? ..धीरे-धीरे
पति ने बेडरूम भी अलग कर लिया, यह
कहते हुए कि तुम्हारे बच्चे सोने नहीं देते..।
बच्चों को अलग कमरा मिला तो पति का
नया बहाना था, तुम रात को देर तक जागती
हो, नींद खराब होती है..। अकसर रात की नीरवता
में मोबाइल पर पति का स्वर सुनाई देता। हंस-हंस कर
की जाती बातें मेरे कानों में पडतीं। गुस्सा उन स्त्रियों पर
आता, जो इतनी आसानी से शिकार बन जाती थीं और जिन्हें
इनकी मंशा के बारे में कुछ पता नहीं होता था। हमारे बीच संवाद
अब नगण्य हो चुका था। हां, फोन पर हर हफ्ते किसी नई गर्लफ्रेंड
की तारीफ में कसीदे पढते पति का स्वर मुझे सुनाई देता रहा। ..इतना
होने के बावजूद कभी-कभी पति अपना हक मांगने मेरे पास भी आ जाते।
मुझसे उम्मीद की जाती कि जिंदगी भर मिले तिरस्कार का बदला मैं समर्पित
पत्नी बन कर चुकाऊं। यह उनका कानूनी हक था। बिजनेस पार्टीज, पारिवारिक
आयोजनों में हम खुशहाल दंपती की तरह साथ जाते। मेरे परिचित मेरे भाग्य की
सराहना करते न अघाते और मैं मुसकराते हुए इस जहर को पीती। कुछ आंसू
आंखों से नहीं टपकते। वे मन के भीतर ही बहते रहते हैं। ..शादी की पच्चीसवीं
सालगिरह नजदीक थी। घर में निर्णय लिया गया कि इसे धूमधाम से मनाया
जाएगा। यह भी एक तरीका है सामाजिक दायरे में वैभव दिखाने का। तैयारियां
शुरू हो गई। पांच सितारा होटल बुक कराया गया। हर काम परफेक्ट..! इवेंट
मैनेजर ने सारी व्यवस्थाएं नफासत से कीं। मुझे कुंदन का जडाऊ सेट
पहनाया गया, डिजाइनर साडी पहन कर मैं पार्लर में तैयार हो रही थी।
एक-एक कर अतिथि पहुंचने लगे..। रात के नौ बजे तक पार्टी पूरे शबाब
पर पहुंच गई। शहर के तमाम गणमान्य लोग वहां उपस्थित थे। हाथों में
गिलास पकडे अकारण ही ठहाके लगा रहे थे लोग। देश-दुनिया की
राजनीति पर बहस हो रही थी, व्यवस्था का विश्लेषण हो रहा था।
पति मेरा हाथ थामे मेहमानों से मिल रहे थे। ख्ाूबसूरत
साडियों में लिपटी मेहमान स्त्रियां मुझे बधाई दे रही थीं।
कुछेक के स्वर में तो ईष्र्या का पुट साफ नजर आ
रहा था। रात के बारह बजे तक पार्टी चलती रही।
अतिथि लौटने लगे तो हम मेहमानों का धन्यवाद
करने द्वार पर खडे हुए। मेरी बुआ ने जाते हुए मुझे
आलिंगनबद्ध किया और बोलीं, कितनी खुशकिस्मत हो
तुम! स्मार्ट और बडे दिल वाला पति मिला है तुम्हें। पता भी
नहीं चला बेटी और आज तुम्हारी शादी को 25 साल भी हो
गए। धन-दौलत, ऐशो-आराम, दो हैंडसम बेटे..। और क्या
चाहिए जिंदगी में खुश रहने को? मुझे ऐश्वर्य, वैभव और
चकाचौंध के बदले अपना पति चाहिए। चंद ऐसे पल
चाहिए उसके साथ, जो सिर्फ मेरे हों, जिन्हें औरों
से बांटना न पडे। पति के साथ बेफिक्र दिन-
रात चाहिए.., कहना चाहा मैंने, मगर
शब्द होठों पर ही ठिठक गए। मैंने
अपने आंसू छिपा लिए। मुस्करा
कर बुआ की ओर देखा और
थैंक्स कहते हुए अगले मेहमान
को विदा करने की तैयारी करने लगी।

समय के साथ नयें-नयें पुरांण


A-           पुराण साहित्य का वह वर्ग है,
जिसे मिथक के नाम से भी जाना जाता है।
जिन्होंने यह साहित्य नहीं पढा है, या थोडा
सा पढा है, उनके मन में इस संबंध में बहुत
सी गलत धारणाएं रही हैं। कुछ लोगों के
अनुसार पुराण काल्पनिक कथाएं हैं।
जब हम उन्हें पढते हैं तो मन में हमेशा
यह प्रश्न उठता है कि ये कथाएं काल्पनिक
हैं या सच्ची हैं?

B- लललपहले हम मान कर
चलें कि ये काल्पनिक नहीं है।
वेदों को ठीक से समझने के लिए
इतिहास और पुराणों का अध्ययन
और उन्हें समझना बहुत जरूरी है।
इसलिए कि उनमें जो विषयवस्तु है
और उनका जो उद्देश्य है वह केवल
परमात्मा है, जो सर्वोपरि सत्य है। उसे
प्रकाशित करना ही इनका प्रयोजन है।
पुराण का शाब्दिक अर्थ है-पुराना, और
आत्मा को भी सबसे अधिक पुरातन कहा
गया है। लेकिन पुराने के सामान्य अर्थ के
अनुसार वह प्राचीन नहीं है। पुराने और नए
के प्रति धारणा सदैव कालसापेक्ष होती है,
लेकिन जब हम आत्मा को पुरातन कहते हैं,
तब वहां काल का संदर्भ नहीं होता। वह ऐसा
तत्व है जहां से काल की अवधारणा का उदय
होता है। अत: यह पुरातन, परम आत्मतत्व, काल
निरपेक्ष है। श्री शंकराचार्य पुराण शब्द को समझाते
हुए कहते हैं कि पुराण है तो पुरातन, पर पुरातन होते
हुए भी वह सर्वदा नवीन है। कोई चीज पुरानी और नई
एक साथ कैसे हो सकती है? ऐसा होना उसी वस्तु के
साथ संभव है जो समय के प्रभाव से मुक्त हो। काल से
परे जो होगा उसका क्षय नहीं होगा। वह हमेशा ताजा,
नया रहेगा। अत: पुराण का तात्विक अर्थ है-वह-जो
सदैव नवीन है।

C-आध्यात्मिक शिक्षा 
        पुराणों में जिस सत्य
का प्रकाशन है वही वेदों और
उपनिषदों में भी वर्णित है, लेकिन
पुराणों में इसी बात को कहने की
शैली बहुत अनोखी है। अनेक कहा-
नियां पुराणों में मिलती हैं। इनमें से
कुछ ऐतिहासिक हैं, कुछ रूपक शैली
में। लेकिन सभी में शिक्षा है। पुराणों में ही
यह संकेत भी है कि कौन सी कथाएं प्रतीक हैं।
इतिहास और पुराण या मिथक में अंतर है, जो हमें
स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। इतिहास घटना
प्रधान होता है, वह ऐसा साहित्य है जो वस्तुस्थिति
को ज्यों का त्यों सामने रखता है, क्योंकि उसमें ऐति-
हासिक तथ्यों और घटनाओं का, जिस प्रकार वे घटित
हुई, वैसा ही लेखा-जोखा होता है। पुराण शिक्षाप्रधान होते
हैं, शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखे गए होते हैं। इतिहास के
ग्रंथ में कोई काल्पनिक कहानी नहीं जोड सकता, लेकिन
पुराणों में ऐसा सप्रयोजन किया जाता है। इसलिए जब हम
उन्हें पढते हैं तब बस यही नहीं सोचते रहना चाहिए कि यह
घटना सच्ची है या झूठी। वह कुछ भी हो सकती है। शेर, बाघ,
बंदर या लोमडी की कहानी में यह पूछना निरर्थक है कि बंदर
कैसे बोल सकते हैं? यह बात वहां विचारणीय है ही नहीं। प्रश्न
तो बस यह है कि हम उस कहानी से क्या शिक्षा ग्रहण करते हैं।
पांच विषय : पुराणों में परम सत्य का उद्घाटन पांच मुख्य विषयों
के विश्लेषण के माध्यम से किया गया है – सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वंतर,
वंश और वंशानुचरित।

सर्ग : —
            सर्ग के अंतर्गत मूलभूतों
की सृष्टि का वर्णन है। मूलभूत अणु
कच्चे माल जैसे कहे जा सकते हैं। इन्हीं
मूलभूत अणुओं या पांच महाभूतों से समस्त
व्यक्ति और वस्तु-जगत की अपने पूरे वैविध्य
के साथ रचना हुई। यह दूसरी रचना प्रतिसर्ग या
विसर्ग कहलाई।

प्रतिसर्ग :–
             पूरा विश्व अनेक प्रकार
के वैविध्य से संपन्न है। वस्तुजगत
में वैविध्य है, प्राणियों में वैविध्य है। प्रत्येक
प्राणी या वस्तु अन्य प्राणी या वस्तु से भिन्न है।
प्रश्न यह है कि यह विभिन्नता आती कहां से है?
यदि हम उनके आधारभूत उपकरणों को देखें तो वे
एक से ही हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।
हम सबके पास समान रूप से शरीर है, इंद्रियां हैं, मन
है और बुद्धि है। लेकिन हम सब में कितना वैभिन्न्य है।
कहा जाता है कि सृष्टि में जो अनेकता है वह तत्व और
कर्म के अनुसार है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति और उसके
कर्म इसका कारण है। इस प्रकार सर्ग और विसर्ग की इस
व्याख्या से सर्वप्रथम सृष्टि की विविधता को समझना आव-
श्यक है। फिर इस वैविध्य के भीतर पंच महाभूत के रूप में
जो समानता है, उसे जान लेना चाहिए। अब यह समान रूप
से जो तत्व सबमें है वे कहां से आए। कहा गया है कि वे पर-
मात्मा से, पुराण से निकले। इस प्रकार परम सत्य की ओर
संकेत किया गया।

मन्वंतर :–
               तीसरा विषय है मन्वंतर।
जब हम संपूर्ण मानवता पर दृष्टि डालते
हैं तो जो एक विशिष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है
वह है प्रकृति के नियमों और अन्य सभी नियमों
का तिरस्कार, उनका पालन न करने की प्रवृत्ति।
अन्य प्राणी स्वभाव से प्रकृति के नियमों का पालन
करते हैं, लेकिन मनुष्य को बताना पडता है कि उसे
क्या करना चाहिए। मनुष्य को अपने धर्म को जानना
चाहिए और उसके अनुसार अपना जीवन बनाना चाहिए।
विश्वविद्यालय में धर्म के विभाग का कोई अध्यक्ष होता है,
जिसके पास उस विभाग का अधिकार होता है। उसी प्रकार
मनु विश्व के स्तर पर धर्म विभाग के अधिकारी हैं। युगों का
वह चक्र, जिसमें एक मनु का शासन रहता है, मन्वंतर कह-
लाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार, काल का विभाजन चार युगों
में किया गया है-सत्य युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। चारों से
मिलकर एक महायुग बनता है, जो कई लाख वर्षो का होता है।
एक हजार महायुग जब बीतते हैं तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी
का एक दिन पूरा होता है। इस एक दिन में चौदह मनु अपना का-
र्यकाल पूरा करते हैं। नए मनु शासन संभालते हैं तब पूरा दिव्य मं-
त्रिमंडल, विश्व संचालन के अधिकारी देवता, बदल जाते हैं। इसलिए
प्रत्येक इंद्र, वरुण और अग्नि का कार्यकाल एक मन्वंतर के लिए
होता है।

              ने निर्धारित समय
में मनु देखते हैं कि संसार में सब
लोग धर्म का पालन कर रहे हैं या नहीं
और कभी-कभी धर्म की नए प्रकार से व्याख्या
भी करते हैं। यह सब करने के लिए वे संत, साधु,
भक्त और धर्म के अन्य व्याख्याकारों को संसार में
भेजते हैं, जो हम सबको जीवन जीने की सही दीक्षा
दे सके।

             पुराणों में वर्णित, काल
के इस  विशाल प्रवाह के विषय में जब
हम सोचते हैं, तो हमारी बुद्धि जड होने
लगती है। हम इस अनंत काल प्रवाह के
आरंभ, मध्य व अंत को, आकाश और भूत
प्राणियों की इस असीम सृष्टि को समझने में
असमर्थ सिद्ध होते हैं। शास्त्र यह भी कहते हैं कि
पूरी सृष्टि ब्रह्म के एक सूक्ष्म अणु में है। इस प्रकार,
सर्ग अर्थात् मूलभूत सृष्टि से और प्रतिसर्ग अर्थात् विशेष
प्रकार की सृष्टि के वर्णन से परमात्मा की ओर ही संकेत
किया जाता है। मन्वंतर के वर्णन में दिखाया गया है कि धर्म
के अनुकरण से ही हमारा चित्त शुद्ध हो सकेगा और तभी हम
आत्मा के अनुभव की साम‌र्थ्य पा सकेंगे।

वंश और वंशानुचरित : —
               पुराणों का चौथा विषय है
वंश। जिसका अर्थ है राजवंश। संसार पर
शासन करने वाले दो राजवंश थे-सूर्यवंश और
चंद्रवंश। इन वंशों में उत्पन्न राजाओं, संत ऋषियों
और सामान्य लोगों के जीवन चरितों का वंशानुचरित
में वर्णन है। इसका उद्देश्य यह था कि अच्छे लोगों से हम
यह सीख सकें कि अपना जीवन कैसे जिएं और दुष्टों से,
जिन्होंने अपना ही सर्वनाश कर लिया, हम सीखें कि कैसे
अपना जीवन नहीं जिएं। कुछ ऐसे भी चरित्र हुए जो शुरू में
दुष्ट प्रकृति के थे और विषयेंद्रिय भोग में समय बिताते थे,
लेकिन बाद में साधु पुरुषों के सान्निध्य से वे महान बन
गए। इसलिए हमें स्वयं के विषय में उदास नहीं होना चाहिए।
यदि कोई दुष्ट और विषयभोगलिप्त व्यक्ति महान् बन सकता है
तो हम भी महान बन सकते हैं, ऐसा विश्वास हममें विकसित होना
चाहिए।


 

         पूरी दुनिया में विद्वान
लोग ईश्वर के प्रति एक खास
नजरिया रखते हैं। उनका सोचना
है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे
नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने
में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है।
जो उस बोध से गुजर जाता है, वही बुद्ध हो जाता है।
सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-
गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते।
उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और
वहीं से हमारे ऊपर नजर रख रहा होगा। यही बात दर्शन और
पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है। ठीक वैसे
ही जैसे हम लोग सगुण हैं। ये सरल लोग यह मानते हैं कि ईश्वर
बिलकुल मनुष्य के रूप में ही होगा-वैसे ही आंख, नाक, कान, दिल
और दिमाग, वही चलने का तरीका और प्यार का नजरिया। यह सगुण
ईश्वर है। विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-निरगुनिया।

         ये नजरिया सिर्फ भारतीय
धर्मो में शामिल नहीं है। सन 1953 में
टेक्सास के अपने मशहूर सत्संग में सुविख्यात
अमेरिकी इवेंजलिस्ट रेवरेंड बिली ग्राहम ने साफ तौर
पर यह घोषणा की कि ईश्वर स्वर्ग में रहता है। उनकी
कल्पना यह थी कि स्वर्ग न्यूयॉर्क या लंदन की तरह कोई
जगह है, जहां सडकें सोने की बनी हैं और कारें हीरे-जवाहरात
से तैयार होती हैं। वहां किसी को किसी तरह की मेहनत करने की
कोई आवश्यकता नहीं है। यह स्वर्ग व ईश्वर की दुर्लभ सगुण संक-
ल्पना थी। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि यदि स्वर्ग ऐसा ही है तो कितनी
बोरिंग जगह होगा।

                अब यह दर्शनशास्त्र का
बडा महत्वपूर्ण द्वंद्व है। इस पर बडी
बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिपादन
किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और
साकार भी है। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण
भी है। भारतीय धर्मो ने इसे बडे आराम से निप-
टाया है। अगर भगवान निराकार है, निर्गुण है तो
वह सुपर ईश्वर है, उसके लिए हमने ब्रह्म शब्द चुना
है-द ऐब्सलूट। अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो
उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है। ब्रह्म का केवल बोध
किया जा सकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की परा-
काष्ठा होगा, जिसे हम परम तत्व या अंतिम सत्य के
रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन सगुण ईश्वर के साथ
हम रिश्ता जोड सकते हैं। यही रिश्ता भक्ति के द्वारा
ईश्वर को एप्रोच करने का तरीका है। यहां ईश्वर हमारे
बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोडा और नीचे
ले आते हैं। जब ईश्वर थोडा और नीचे आता है तो अ-
वतार के रूप में आ जाता है-कभी राम बनके कभी
श्याम बनके। यहां से एक आम आदमी के लिए
ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो
जाता है। पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से
ईश्वर की निकटता आम आदमी के लिए
बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली
बात हो जाती है।

              अवतार की थ्योरी ईश्वर
का सरलीकरण है। ऐसा नहीं है कि
केवल हम ही सरलीकरण के उस्ताद हैं,
लेकिन दूसरे धर्मो के मुकाबले आध्यात्मिकता
के मामले में हम कुछ ज्यादा ही उस्ताद हैं। अन्य
धर्मो में भी ईश्वर का सरलीकरण किया गया है। ईश्वर
और आध्यात्मिकता से संबंधित जितने सिंबल हैं, भारत
में उनका बडा बेहतरीन प्रगटीकरण हुआ है। ईश्वर को अगर
वाणी में व्यक्त करें तो वह ॐ होगा। अगर आंखों से देखने वाली
किसी ऑब्जेक्टिव चीज के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा।
यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो-जिसका कोई
आकार ही नहीं है-जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे?
लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के
कुछ तरीके सोचे होंगे।

                     हमारे पुराणों में एक
कथा है।एक बार भगवान शंकर
की ओर उनका एक शिष्य आ रहा
था। पार्वती माता ने शंकर जी की
तरफ इशारा करके कहा लो तुम्हारा
चेला आ गया.. उससे मिलो..। शंकर
भगवान ने अपने चेले की ओर देखा और
कहा, यह मेरा तीसरे दर्जे का शिष्य है।
तीसरा दर्जा अर्थात थर्ड क्लास। बहुत वर्ष
पहले भारत में एक समाजवादी रेलमंत्री ने
तीसरा दर्जा हमेशा के लिए खत्म कर दिया
था। पूरी दुनिया में बचे केवल पहले और दूसरे
दर्जे में पास किए जाते हैं।केवल भारत ऐसा देश
है जहां लोग थर्ड क्लास में भी पास होते हैं। लेकिन
शंकर भगवान के मामले में कोई थर्ड क्लास शिष्य
कैसे हो सकता है? क्या भगवान के शिष्यों की भी
अलग-अलग कोटि निर्धारित की जा सकती है? अब
शिवजी की बात सुनकर पार्वती जी को बडा कौतूहल
हुआ। तब भगवान ने कहा कि हमारा सबसे अछा
शिष्य वह है जो मुझे ध्यान में स्मरण करता है।
यह मेरा निराकार रूप है। इसका केवल बोध ही
हो सकता है। यह पूरी तरह भावनाओं का
मामला है। लेकिन यह भावना सांसारिक
भावना नहीं होगी, बल्कि इसमें आध्यात्मिक

अनुभव का बोध होगा।

               भगवान शंकर ने आगे कहा
कि मेरा दूसरा सबसे प्रिय शिष्य वह होगा
जो मेरे लिंग की पूजा करता हो और मेरा सबसे
निकृष्ट शिष्य वह होगा जो मेरी मूर्ति की पूजा करता
हो। शिवलिंग पूजक सेकंड क्लास शिष्य होंगे और मूर्ति
पूजक थर्ड क्लास शिष्य। यही कारण है कि भारत में भगवान
शंकर के लिंग के पूजन की परंपरा चल निकली है। जो परंपराओं
से अपरिचित हैं, वही भगवान शंकर की मूर्ति की पूजा करते हैं। भारत
के सभी प्रमुख शैव स्थल मूलत: ज्योतिर्लिग ही हैं।

               अब पार्वती जी के लिए कौतूहल
था कि लिंग की पूजा करने वाला दूसरा सबसे
प्रिय शिष्य कैसे है? जैसे हमारी आध्यात्मिक परंपरा
में ध्यान या मेडिटेशन निराकार को प्रगट करता है, उसी
तरह यहां धर्म में लिंग निराकार का प्रगट करता है। लिंग मूल
रूप से एक समतल सिलेंड्रिकल आकार में पत्थर होता है। समतल
सिलेंड्रिकल पत्थर में अगर कोई छेनी-हथौडा उठा ले तो किसी भी तरह
के रूप को आकार दिया जा सकता है। अगर मूर्तिकला का अभ्यास किसी
को हो तो वह भगवान शंकर के लिंग में छेनी-हथौडे से दुनिया के किसी भी
रूप को आकार दे सकता है। इसलिए एक तरह से देखें तो लिंग जो निराकार
होता है, उस पर कई आकार छिपे होते हैं।

                 लेकिन शंकर इस निराकार
को भी प्रथम श्रेणी में मानने के लिए तैयार
नहीं थे, जबकि लिंग शंकर के निराकार रूप को
प्रगट कर रहा था। क्यों? क्योंकि निराकार होते हुए
उसमें एक आकार था। जब भी हम उसको किसी देवता
का आकार देंगे तो हमें उसमें से पत्थरों को छीलना पडेगा।
उसमें कुछ कमी आ जाएगी। इसीलिए निराकार रूप साकार
रूप के मुकाबले हमेशा श्रेष्ठ होता है। निराकार को एप्रोच करने
के तरीके भारतीय आध्यात्मिकता की विशिष्टता हैं। इस तरीके को
ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं। अगर आप भगवान
के पहले दर्जे के शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार
स्वरूप का बोध करना पडेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

ध्यान का अभ्यास

                           हममें से कोई भी एक सरल
ध्यान के अभ्यास से ही अपने आपको निराकार
से जोड सकता है। ध्यान करने का सबसे सरल तरीका
है किसी एकांत स्थान पर चुपचाप बैठ जाइए। फिर अपनी
सांसों का बोध करना शुरू करें, जैसे ही सांसों का बोध हो, सांसों
को धीमी करना शुरू करें। इसी बीच अपने निचले जबडे को हल्का
सा ढीला छोडें। अपने गालों के तनाव को रिलैक्स करें। विचारों को
शिथिल करने की कोशिश करें। थोडी देर में आप गहरे ध्यान में होंगे।
पंद्रह मिनट रोजाना ध्यान करने से हममें से कोई भी स्वयं को निराकार
से जोड सकता है।

 

आपके हाथ में हैअपने बच्चे की सेहत


                         नन्हें-मुन्नों के आहार
के संबंध में लोगों में अनेक भ्रांतियां
व्याप्त हैं। पुरानी पीढ़ी जो सोचती है, नई
पीढ़ी की सोच उससे बिल्कुल अलग होती है।
इस कारण बच्चों के लालन-पालन व खानपान
को लेकर अक्सर घर में कहा-सुनी हो जाती है।
कभी-कभी तो बात यहां तक बढ़ जाती है कि सास
और बहू में मनमुटाव तक हो जाता है। जैसा कि
श्रीमती रीना और उनकी सासू मां श्रीमती
सरला देवी के बीच अक्सर होता रहता
है। उदाहरणस्वरूप सरला देवी कहती
हैं कि बहू छोटू की आंखों में रोज काजल
लगाया करो, इससे इसकी आंखों की रोशनी
तेज होगी, जबकि रीना का कहना होता है कि
मां मैंने डॉक्टर से पूछा था, उनका कहना था कि
यह बात सच नहीं है, काजल लगाने से रोशनी
का कोई संबंध नहीं है। इसी प्रकार की ढेर सारी
भ्रांतियां कुछ महिलाओं में बनी हुई हैं। आज हम ऐसी
ही कुछ भ्रांतियों की हकीकत बताने जा रहे हैं।

A–भ्रम

   नवजात को शहद
चटाने और पानी में
ग्लूकोज मिलाकर देना
अच्छा रहता है।

B-          हकीकत
ऐसा बिल्कुल नहीं है।
प्रसव के उपरांत मां का दूध ठीक
से उतरने में दो से तीन दिन लग
जाते हैं। शुरू के दो दिन तक निकलने
वाले गाढ़े हल्के पीले रंग के दूध में प्रतिरोधक
एंटीबॉडी व पौष्टिक तत्व अधिक होते हैं, अत:
बच्चो को यह दूध जरूर पिलाएं। बच्चो को पानी
में ग्लूकोज व शहद आदि देने से संक्रमण की
संभावना अधिक रहती है।

C-भ्रम

    एक-दो महीने के
बाद बच्चे को ऊपर के
दूध की आदत डाल देनी चाहिए।

D-हकीकत

        ऐसा कभी नहीं
करना चाहिए। शिशु के
शरीर की संरचना व जरूरत
के हिसाब से ही मां के शरीर में
दूध बनता है। छह माह की उम्र तक
शिशु को न तो ऊपरी आहार की आव-
श्यकता होती है और न ही उसे पचाने की
क्षमता। स्तनपान कराने के बजाय ऐसा करने
से बच्चा मां के दूध द्वारा मिलने वाले पौष्टिक
तत्वों से वंचित रह सकता है, जो उसके
शारीरिक विकास के लिए अत्यंत जरूरी
होते हैं। हां, सिर्फ विशेष परिस्थितियों में
आप ऊपर का दूध कटोरी चम्मच से दे
सकती हैं न कि बोतल से।

D-भ्रम

   बोतल से दूध पिलाने
से भी बच्चो का पेट भर
जाता है और उसे कोई नुक-
सान नहीं होता है।

E-हकीकत

                यह सोच बिल्कुल
गलत है। बोतल से दूध पिलाने
से बच्चो को संक्रमण, श्वांस रोग
व एलर्जी आदि का खतरा रहता है।
साथ ही ऐसे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक
क्षमता भी बहुत कम हो जाती है और वे
जल्दी-जल्दी बीमार भी पड़ सकते हैं।

F-भ्रम

      लेटकर दूध पिलाने से
बच्चो को आराम मिलता है।

G-हकीकत

           ऐसा कतई नहीं है,
बल्कि लेटकर दूध पिलाने
से दूध बच्चो की श्वांस नली
को अवरुद्ध कर सकता है। यही
नहीं कई बार लेटकर दूध पिलाने पर
दूध कान में चला जाता है, इससे कान
में संक्रमण हो सकता है और बच्चे को कान
दर्द की समस्या भी हो सकती है।

H-भ्रम

            थोड़ा बड़े बच्चे को
शुद्ध दूध देने की बजाय आधा
दूध और आधा पानी देना चाहिए।
ऐसा न करने पर उसका लिवर खराब
हो सकता है।

I-हकीकत

,,,,,,,,वैज्ञानिक तथ्यों से
यह पता चला है कि दूध में
पानी मिलाकर देने से बच्चा कु-
पोषण का शिकार हो सकता है और
उसका शारीरिक विकास बाधित हो जाता
है। दूध में पानी बिल्कुल न मिलाएं। यदि बच्चा
प्रीमै ‘योर है तो भैंस के दूध में पानी मिलाकर दिया
जा सकता है।

j-भ्रम

                 बच्चे को खांसी-
जुकाम हो तो उसे केला और
संतरे का जूस नहीं देना चाहिए।
कारण, ये फल ठंडे होते हैं। साथ ही
उसे नहलाना नहीं चाहिए।

k-हकीकत
       

                इस बात में बिल्कुल
सच्चाई नहीं है कि ये फल ठंडे
होते हैं। अगर बच्चे को अन्य कोई
समस्या नहीं है तो उसे केला और संतरे
का जूस दे सकती हैं। बीमारी में नहलाने
से भी कोई परेशानी नहीं होगी, बल्कि सफाई
रखना लाभदायक सिद्ध होगा।

L-भ्रम

            बच्चो को अनार का जूस
देना चाहिए। इससे उसके शरीर
में खून की कमी नहीं होने पाती।

M-हकीकत

          यह बात सही नहीं है।
लाल रंग का होने के बावजूद
केला व सेब की तुलना में अनार
में खून बनाने वाले तत्व कम होते
हैं। लाल रंग इसमें पाए जाने वाले कुछ
खास तत्वों के कारण होता है। इसके
स्थान पर बच्चे को चना, गुड़, पालक,
चुकंदर आदि देना बेहतर विकल्प होगा।

N-भ्रम

       जो बच्चे अंडा, मछली
व मांस खाते हैं, उनका विकास
सही तरह से होता है।

O-हकीकत

,             यह एक गलत मान्यता है,
क्योंकि फलों, हरी सब्जियों, दाल, दूध,
दही व दूध से बनी अन्य चीजों जैसे पनीर,
दही, छाछ में काफी सारे पौष्टिक तत्व पाए
जाते हैं, जो शिशु के विकास के लिए जरूरी होते
हैं। इन सभी को सही मात्रा में ‘बैलेंस्ड डाइट’ के
अंतर्गत लेने से ब’चे को संपूर्ण पोषण मिलेगा।
(बालरोग विशेषज्ञ डॉ. सी. एस. गांधी से बातचीत पर आधारित)

हमेशा फिट रहने के लिए अपनाएं ये पांच तरकीव


            मोटापा एक ऐसी
समस्या है, जो अपने साथ
कई बीमारियों को लेकर आता
है। आप चाहें तो पांच बातों पर अमलकर
कुछ ही दिनों में अपना साइज सही कर सकती हैं-

a-                 प्रोसेस्ड फूड्स से
बिल्कुल दूर रहें। चाहे इनकी पैकिंग
कितनी भी आकर्षक और लुभावनी क्यों न
हो। पैकिंग के बहकावे में न आएं। प्रोसेस्ड फूड्स
में न केवल फैट होता है, बल्कि इनमें नमक भी
काफी मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा
मोटापा बढ़ाने वाले बहुत से तत्व इनमें
मौजूद रहते हैं। साथ ही कैफीनयुक्त
पदार्थो का सेवन कम से कम करें।
कोल्ड ड्रिंक्स की बजाय नींबू पानी,
छाछ, लस्सी, शिकंजी आदि पिएं।

b-           खानपान में प्रोटीनयुक्त
आहार जैसे दाल, हरी सब्जियां और
डेयरी उत्पादों को प्रमुखता से स्थान
दें। अपने आहार में आलू और चावल के
स्थान पर सलाद और फलों को प्राथमिकता दें।

c-               हर हाल में रात का
खाना सोने से करीब ढाई-तीन
घंटे पहले कर लें। खाना खाने के
बाद कुछ देर अवश्य टहलें। इससे भोजन
आसानी से पच जाता है और शरीर को भोजन
पचाने के लिए अतिरिक्त मेहनत की आवश्यकता
नहीं पड़ती। इस संदर्भ में ढिलाई न बरतें।

d-                    मौसम कोई भी हो,
प्रतिदिन सात-आठ गिलास पानी
अवश्य पिएं। वैसे तो प्यास शारीरिक
श्रम और मौसम के अनुसार लगती है,
लेकिन शरीर में पर्याप्त मात्रा में पानी रहना
बहुत जरूरी है। एक बात और याद रखें कि खाना
खाते समय कम पानी पिएं।

e-                  नियमित व्यायाम करें।
जहां तक संभव हो, शारीरिक श्रम करें।
जहां तक संभव हो लिफ्ट के स्थान पर सीढि़यों
का प्रयोग करें। सुबह-शाम अवश्य टहलें।

बीमारियों के घरेलू नुस्खे


            बारिश को बीमारियों
का मौसम भी माना जाता है।
पानी और गंदगी के कारण कई
तरह के जीवाणु इस मौसम में पैदा
होते हैं। इनके कारण कई तरह की
बीमारियां होती हैं। इन बीमारियों के
इलाज के लिए भार भरकम रकम
चुकानी होती है। कुछ सावधानियों
और घरेलू नुस्खों को अपना कर
इन बीमारियों और उनके इलाज में
होने वाले खर्च से बचा जा सकता है।
यह नुस्खे पुराने समय से हमारे देश
में अपनाए जाते रहे हैं।

              लेकिन हाल के दिनों
में जीवन के तौर तरीकों में आए
बदलाव ने लोगों को इनसे दूर कर
दिया है विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में।
पीलिया से बचाए हर्रा और गुड़ बारिश
के दिनों में जो बीमारियां सबसे ज्यादा होती
हैं उनमें पीलिया प्रमुख है। बरसात में अपने
दैनिक जीवन में कुछ चीजों के सेवन की आदत
डालकर इस बीमारी से बचा जा सकता है।

             सूरजपुर कस्बे में स्थित
आयुर्वेदिक अस्पताल के डॉक्टर
सुरेंद्र चौधरी ने बताया कि पीलिया
से बचाव का सबसे कारगर उपाय हर्रा
(हरण) और गुड़ का सेवन है। उन्होंने
बताया कि हर्रा को देशी घी में भूनकर हर
दिन इसके एक बीज का सेवन गुण के साथ
करके पीलिया से बचा जा सकता है। हर्रा और
गुड़ आसानी से किसी भी परचून के दुकान पर
मिल सकता है। तुलसी और काली मिर्च रखे
जुकाम पर नियंत्रण बारिश में भींगने के
कारण जुकाम होना बहुत आम बात है।

                    खासकर बच्चों को
जिन्हें बारिश में खेलने से रोकना
मुश्किल होता है। डॉक्टर चौधरी ने
बताया कि भींगने से होने वाले जुकाम
से बचने के लिए काली मिर्च, तुलसी के
पले और इलायची का काढ़ा बनाकर पीना
चाहिए। यह जुकाम तो रोकता ही है साथ अन्य
बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता
है। खुजली से बचाए गंधक और नारियल तेल बारिश
में खुजली की भी शिकायत होती है।

              पहली बारिश के बाद
तो कई लोगों को फोड़े फुंसी तक
निकलते हैं। यदि हर दिन पानी में
गंधक मिलाकर नहाया जाए तो इससे
बचा जा सकता है। इसके साथ ही यदि
फोड़े फुंसी हो जाए तो उसपर गंधक को
नारियल का तेल मिलाकर लगाना चाहिए।
धूप से होता है हर तरह के विषाणुओं का
नाश डॉक्टर सुरेंद्र चौधरी ने बताया कि पहले
घरों में सुबह-सुबह धूपन की परंपरा थी।

              लेकिन आज की
भागमभाग की जिंदगी में यह
लगभग खत्म ही हो गई है। लेकिन
इसके कई वैज्ञानिक प्रभाव होते हैं। यह
बारिश के मौसम पैदा होने वाले कई तरह
के वाइरस, बैक्टेरिया और फंगस को खत्म
कर देता है। हर दिन नहीं तो सप्ताह में एक बार
लोगों को कपूर, लोबान, गोंद, गंधक और लकड़ी
का धूपन करना चाहिए। इससे कई तरह की संक्रामक
बीमारियों से बचाव होता है।

कोरोनरी आर्टरी डिजीज दिल की खामोश दुश्मन


               56वार्षीय चंद्र प्रकाश सिंह
हाई ब्लडप्रेशर की शिकायत से पिछले
कई सालों से ग्रस्त थे। इस कारण वह
एक स्थानीय डॉक्टर के परामर्श से नि-
यमित रूप से दवा ले रहे थे। पिछले एक
साल से वह बेटे की नौकरी और विवाह
योग्य बेटी की शादी को लेकर कुछ ज्यादा
ही तनावग्रस्त रहने लगे थे। इसी बीच लिपिड
प्रोफाइल नामक जांच से पता चला कि उनका को-
लेस्ट्रॉल भी बढ़ा हुआ है।

                    एक महत्वपूर्ण कार्य
के सिलसिले में उन्हें दिल्ली आना
पड़ा। उसी दौरान उन्हें सीने में भारीपन,
तेज दर्द और बेचैनी महसूस हुई। उनके
साथ चल रहे शख्स ने समझदारी का
परिचय दिया और वह शीघ्र ही समय
रहते रोगी को लेकर मेरे पास आया।
चेक अॅप करने और जांचों के बाद
पता चला कि रोगी को दिल का दौरा
पड़ चुका है। बहरहाल समय पर समुचित
चिकित्सा मिलने के कारण मिस्टर सिंह की
जान बच गयी और वह फिर से सामान्य जीवन
जी रहे हैं। लेकिन हर शख्स मिस्टर सिंह की तरह
भाग्यशाली नहीं होता, जिसे हार्ट अटैक होने के बाद
शीघ्र ही समुचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध होती हो।”

             यह कहना है फोर्टिस-
एस्का‌र्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई
दिल्ली के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ
का। उनके अनुसार हृदय में तीन प्रमुख
हृदय-धमनियां (कोरोनेरी आर्टरीज) होती
हैं। दिल के बाएं भाग में दो प्रमुख धमनियां
और दाहिने में एक धमनी होती है। इन धमनि-
यों का कार्य हृदय की मांशपेशियों को ऑक्सीज-
नयुक्त रक्त पहुंचाना है। उम्र बढ़ने पर इन धमनियों
में अवरोध (ब्लॉकेज) उत्पन्न होने लगता है।

              यह अवरोध धमनियों
में कोलेस्ट्रॉल के संचित होने से
होता है। इस कारण कोरोनरी आर्टरीज
में रुकावट पैदा होती है। जब यह रुकावट
70 फीसदी से ज्यादा हो जाती है, तब पीड़ित
व्यक्ति के लिए समस्या पैदा हो जाती है। इस
स्थिति को मेडिकल भाषा में कोरोनरी आर्टरी
डिजीज (सीएडी) कहते हैं। सीएडी के कारण दिल
का दौरा(हार्ट अटैक) पड़ सकता है।

                  कोरोनरी आर्टरी में
अवरोध (ब्लॉकेज) होने पर रक्त
के थक्के (ब्लड क्लॉट्स) जमने से
रक्त का प्रवाह पूरी तरह अवरुद्ध हो
जाए, तब हार्ट अटैक की स्थिति उत्पन्न
हो सकती है। मुंबई में जुहू स्थित क्रिटीकेयर
हॉस्पिटल के हदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जी.पी.रत्ना
पारखी के अनुसार कुछ जांचों के बाद ही सीएडी
का पता चलता है। ये जांचें हैं

a-           इलेक्ट्रो कार्डियो ग्राफी
(ईसीजी)। -ट्रेड मिल टेस्ट(टीएमटी)।

b-इको कार्डियोग्राफी (हार्ट का अल्ट्रासाउंड)।

c-                कभी-कभी थेलियम टेस्ट
या रेडियो न्यूक्लॉइड टेस्ट कराया जाता है।

d-        उपर्युक्त परीक्षणों के
बाद एंजियोग्राफी तब करते हैं,
जब डॉक्टर को यह शक हो कि
अमुक शख्स सीएडी से ग्रस्त हो
सकता है। परीक्षणों के सामान्य रहने
पर रोगी की एंजियोग्राफी नहींकी जाती।
गुड़गांव स्थित मेदांत दि मेडिसिटी के वरिष्ठ
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आर.कासनीवाल के
अनुसार इलाज शुरू करने से पहले परीक्षणों
के आधार पर यह जाना जाता है कि तीन प्रमुख
धमनियों में कितने प्रतिशत तक अवरोध(ब्लॉकेज)
है।

               अगर तीनों धमनियों में
70 प्रतिशत से कम ब्लॉकेज है, तब
दवाओं (मेडिकेशन)से ही सीएडी पीड़ित
को राहत मिल जाती है। इसी तरह अगर
किसी एक धमनी में 70 फीसदी से ज्यादा
ब्लॉकेज है, तो रोगी का इलाज एंजियोप्लास्टी
तकनीक से किया जाता है। अगर इन तीनों ही
धमनियों में 70 प्रतिशत से ज्यादा ब्लॉकेज हो, तब
रोगमुक्त होने के लिए बाइपास सर्जरी ही बेहतर विकल्प
है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है नीम


                                  कई औषधीय
गुणों के लिए सदियों से प्रचलित नीम
वर्तमान युग की बड़ी जानलेवा बीमारी
कैंसर के निदान में महत्वपूर्ण स्थान रखता
है, इस तथ्य का खुलासा सेहत वैज्ञानिकों ने
किया है। शोध में नीम की पलियों में एक विशेष
कंपाउंड पाया, जो कैंसर सेल्स के साथ शरीर प्रति-
रोधक क्षमता की लड़ाई को सपोर्ट देने में खासा सक्षम है।

                   वैसे भी कई मायनों में
नीम का सेवन शरीर के लिए लाभ-
कारी है। एक जर्नल में प्रकाशित शोध
में वैज्ञानिकों ने उन्नत चरण के सर्वाइकल
कैंसर से पीड़ित 17 मरीजों की कैंसर सेल्स
लेकर उस पर किए प्रयोग के नतीजे का खुलासा
किया है। इस अध्ययन से उन्हें नीम की पली द्वारा
कैंसर के विकास को रोकने के तरीके का पता चल
गया। पहले कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में कहा गया था
कि नीम प्रजनन तंत्र पर बुरा असर डाल सकता है,
लेकिन हमारे अध्ययन में इसे सिरे से नकार दिया
गया। त्वचा रोगों के लिए जैविक दवा बेंगलूर जैव
प्रौद्योगिकी कंपनी बायोकॉन ने पुराने त्वचा रोग
के इलाज के लिए जैविक दवा पेश की है।

                  इस दवा का शोध,
विकास और विनिर्माण देश में
किया गया है। कंपनी ने कहा है
कि वह इस दवा को वैश्रि्वक स्तर पर
पहुंचाने के लिये वैश्रि्वक सहयोगी को
अंतिम रूप देने के लिये बातचीत कर
रही है। बेंगलूर स्थित कंपनी की चेयर-
पर्सन तथा प्रबंध निदेशक किरण मजुमदार
शॉ ने यहा संवाददाता सम्मेलन में कहा कि
अलजुमाब नाम की दवा लंबे समय से चली आ
रही त्वचा रोगों के इलाज के लिये है। यह अब देश
में वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध है।

                      इसकी कीमत बाजार में
उपलब्ध ऐसी ही दवाओं के मुकाबले
कम से कम 50 प्रतिशत कम है। उन्होंने
कहा कि हम इस दवा को दुनिया के अन्य
देशों में पहुंचाना चाहते हैं और इस दिशा में
प्रयास कर रहे हैं। इस संबंध में कई कंपनियों
के साथ बातचीत जारी है। किरण ने कहा, यह
बड़ी सफलता है और इसका व्यापक वैश्रि्वक
प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इसके
लिये वैश्रि्वक सहयोगी के साथ समझौता बस
कुछ समय की बात है। बायोकॉन के अनुमान
के अनुसार त्वचा रोग से संबद्ध दवाओं का बाजार
2016 तक 8 अरब डॉलर पहुंच जाने का अनुमान
है। कंपनी ने 2006 में अलजुमाब पर काम करना भी
शुरू किया था।

जानिए ड्राई फ्रूट्स का महत्व


         यदि आप कमजोरी
महसूस कर रही हैं तो ड्राई
फ्रूट्स का सेवन करें। डाइटीशि-
यन्स का कहना है कि यदि ड्राई
फ्रूट्स को सुपर फूड्स कहा जाए
तो गलत न होगा। ड्राई फ्रूट्स
महत्वपूर्ण पोषक तत्व ओमेगा-3
फैटी एसिड के प्रमुख स्रोत हैं और
ये रक्त में कोलेस्ट्राल के स्तर को
नियंत्रित करते हैं। जब भी आपको
स्नैक्स खाने की इच्छा हो तो उसमें
थोड़े से ड्राई फ्रूट्स या नट्स मिला दें।
आपको एक अलग जायका मिलेगा। साथ
ही सेहत भी सही रहेगी।

             कई अध्ययनों से
यह पता चला है कि कि अन-
प्रोसेस्ड नट्स का सप्ताह में तीन-
चार बार सेवन करने से हृदय रोग
होने का खतरा 25 फीसदी कम हो
जाता है। यही नहीं यदि आप लंबे अर्से
से कमजोरी व थकान की शिकायत से
ग्रस्त हैं तो आपके लिए नट्स का सेवन
लाभप्रद रहेगा।

            डाइटीशियन्स के
अनुसार नट्स में ऐसे पोषक
तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को
ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क को भी
तरोताजगी प्रदान करते हैं। इनके
सेवन से आपका मूड खुशनुमा बनता
है। इनमें एंटी ऑक्सीडेंट व कई विटामिन्स
पाए जाते हैं, जो बढ़ती उम्र में भी आपको चुस्त-
दुरुस्त रखते हैं। नट्स में प्रोटीन भी पर्याप्त मात्रा
में पाया जाता है। प्रोटीन विभिन्न अंगों, मांसपेशियों,
एंटीबॉडीज, हार्मोस और विभिन्न एंजाइमों के निर्माण
में सहायक होता है। नट्स में पर्याप्त मात्रा में जिंक भी पाया
जाता है।

बीमारी के लक्षण और इलाज


A-          चार वर्षीय पुत्र
को पेशाब करते वक्त जलन
होती है और उसे पिछले एक हफ्ते
से बुखार भी आ रहा है। बच्चे का ब्लड
काउंट नॉर्मल है। क्या करूं? इस संदर्भ में
परामर्श देने का कष्ट करें।
(संजना सिंह, नई दिल्ली)

                  ऐसी संभावना है
कि आपका बच्चा यूरिन ट्रैक्ट
इंफेक्शन (यूटीआई) से ग्रस्त है।
सबसे पहले आप बच्चे का कल्चर
सेंसिटिविटी टेस्ट और किडनी का
अल्ट्रासाउंड कराएं। यूरिन कल्चर रिपोर्ट
आने के बाद बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श
लेकर आपको बच्चे को सात दिनों तक
एंटी बॉयटिक दवा देनी पड़ेगी। ऐसे मामलों
में बाद में कभी-कभी मिक्ट्योरेटिंग यूरेथ्रो ग्राम
नामक एक रेडियोलॉजी टेस्ट की जरूरत पड़ सकती
है।

B-        सात वर्षीय पुत्री
को पिछले चार महीनों से
मौसम बदलने के कारण
सांस लेने में तकलीफ है।
उसके लिए कभी-कभी ‘साल-
ब्यूटामोल’ का इस्तेमाल करना
पड़ता है। क्या इस रोग का दीर्घकालिक
और स्थायी इलाज संभव है?
(एडवर्ड सैम्युएल, आगरा)

                   आपकी बेटी
‘एलर्जिक व्हीजिंग’ नामक
रोग से ग्रस्त है। उसे 8 सप्ताह
तक एक इनहेलर के जरिये रोकथाम
से संबंधित ‘मोंटील्यूकॉस्ट’ नामक उपचार
की जरूरत है। ध्यान दें कि बच्ची अपने खान-
पान में नट्स और चॉकलेट से परहेज करे।

C-      एक महीने के
बच्चे को कई दिनों से
लगातार कब्ज बरकरार है।
परामर्श दें कि उसकी यह तकलीफ
कैसे दूर हो?
(अयाना, अलीगढ़)

               बच्चे का आप
थायरायड प्रोफाइल टेस्ट
कराएं। अक्सर इस उम्र में
हाइपोथायराड्स नामक रोग
के चलते बच्चों को कब्ज की
शिकायत हो जाती है।

स्पाइनल कॉर्ड इंजरी अब उपलब्ध है कारगर इलाज


          रीढ़ की हड्डी
(स्पाइनल कॉर्ड) नसों
(न‌र्व्स) का वह समूह होती
है, जो दिमाग का संदेश शरीर
के अन्य अंगों खासकर हाथों और
पैरों तक पहुंचाती है। जाहिर है अगर
स्पाइनल कॉर्ड में किसी भी प्रकार की
चोट (इंजरी) लग जाए, तो यह स्थिति
पूरे शरीर के लिए घातक हो सकती है।
चोट को तीन प्रकारों में विभाजित किया
गया है। जैसे नसों में हल्की चोट या
नस का थोड़ा सा फटना। नस के पूरा
फट जाने को स्पाइनल कॉर्ड में ट्रान्से-
क्शन के नाम से भी जाना जाता है।

A-चोट की गंभीरता

          किसी भी दुर्घटना
के बाद चोट की गंभीरता
इस बात पर निर्भर करती
है कि स्पाइनल कॉर्ड का कौन
सा भाग चोटग्रस्त हुआ है? उदाहरण
के तौर पर स्पाइनल कॉर्ड के निचले
भाग में चोट लगने से रोगी को लकवा
लग सकता है। कई मामलों में शरीर का
निचला भाग बेकार हो जाता है।

              इस अवस्था को
पैराप्लेजिया कहा जाता है।
इसी तरह जब चोट गर्दन पर
लगती है, तो इसके कारण पीड़ित
व्यक्ति के दोनों हाथों व पैरों में लकवा
लग जाता है, जिसे क्वाड्रीप्लेजिया कहते
हैं। रोगी की स्थिति की जटिलता इस बात
पर भी निर्भर करती है कि उसको कंप्लीट
इंजरी (चोटग्रस्त भाग की पूरी नसों या न‌र्व्स
का फट जाना) है या इनकंप्लीट। कंप्लीट इंजरी
के मामले में रोगी के चोटिल भाग में और आसपास
किसी हरकत का अहसास नहीं होता है।

               सब कुछ जैसे सुन्न
हो जाता है, लेकिन इनकंप्लीट
इंजरी में रोगी के चोटिल भाग में
दर्द, हरकत या किसी प्रकार का
अहसास अवश्य होता है। जितनी बड़ी
चोट (इंजरी) होती है, मामला उतना ही
गंभीर होता है और इंजरी जितनी कम या
छोटी होती है, केस में जटिलता कम होती है।

B-डायग्नोसिस

      रक्त की जांच,
एक्स रे, सीटी स्कैन
या कैट स्कैन और एमआरआई जांचें।

C-उपचार

                 स्पाइनल कॉर्ड
इंजरी का उपचार जटिलता
को देखकर किया जाता है और
कुछ अन्य कारणों पर भी ध्यान
दिया जाता है। जैसे किस प्रकार
की इंजरी है। रोगी का शरीर कौन
से उपचार की पद्धति को बर्दाश्त कर
सकता है। चोट लगने के बाद तुरंत ही
कुछ उपचार करने होते हैं। जैसे गर्दन आदि
में प्लास्टर, कभी-कभी सर्जरी करने की भी
जरूरत पड़ जाती है ताकि रोगी की चोट से
उसके शरीर को अधिक नुकसान न पहुंचे।

                     स्पाइनल कॉर्ड इंजरी
के अधिकतर मामलों में चोट लगने
के बाद रोगी को आईसीयू में वेंटिलेटर
पर रखा जाता है। पेय पदार्थ देने के
लिए रोगी के गले में नली लगाई
जाती है। मल-मूत्र के लिए भी
एक ट्यूब लगायी जाती है।
डॉक्टरों की टीम लगातार रोगी
के दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर
आदि पर निगरानी रखती है और
पीड़ित व्यक्ति को दवाइयां दी जाती हैं।

D-आधुनिक उपचार
           

              अनेक मामलों में
मिनिमली इनवेसिव सर्जरी
(एमआईएस) से भी रोगी की
कुछ समस्याओं को कम करने
का प्रयास किया जाता है। एक छोटा
चीरा लगाकर यह सर्जरी की जाती
है। सर्जरी की इस प्रक्रिया में रक्तस्राव
व चीर-फाड़ कम से कम होती है। इसीलिए
बड़ी सर्जरी के स्थान पर संभव हो सके, तो
एमआईएस को वरीयता दी जाती है। ऐसे मामलों
में रोगियों को लंबे समय तक हॉस्पिटल में रुकना
नहीं पड़ता है।

             पीड़ित व्यक्ति को
पुनर्वास (रीहैबिलिटेशन) की
आवश्यकता पड़ती है। पुनर्वास
के अंतर्गत फिजियोथेरेपी, रोगी व
उसके परिजनों की काउंसलिंग को
शामिल किया जाता है।

मोटे लोग भोजन करने के बाद भी भूखे रहते हैं


                बर्लिन- आपको यह
जानकर हैरानी होगी कि मोटे
होने के बावजूद लोग हमेशा कुछ
न कुछ खाते क्यों रहते हैं। ऐसा
नहीं है कि वे लालची होते हैं, बल्कि
खाना खाने के बाद भी वे खुद को भूखा
समझते हैं। ऐसा उनके शरीर में भूख का
अहसास कराने वाले हार्मोन में असंतुलन
के कारण होता है। वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन
के दौरान पाया कि मोटे व्यक्ति पेट भरा महसूस
करने की क्षमता खो देते हैं। ग्लूकागोन टाइप वन
मधुमेह पीड़ित लोगों में भी भूख को हमेशा दबाता
रहता है।

           ग्लूकागोन हार्मोन
का मुख्य काम, ब्लड शुगर
बेहद कम होने पर शरीर को
एकत्र ग्लूकोज को जारी करने
का संकेत देना है, लेकिन साक्ष्य
बताते हैं कि यह हार्मोन खाना ग्रहण
करने और पेट भरा होने की भावना को
नियंत्रण करने में भी प्रभावी भूमिका निभाता
है।

                   जर्मनी के बर्लिन स्थित
चैरिटी यूनिवर्सिटी के अयमान एम.
अराफात के अनुसार जब कोई व्यक्ति
मोटा हो जाता है, तब ग्लूकागोन ज्यादा
समय तक पेट भरा होने की इच्छा महसूस
नहीं करता है।’ हालाकि वह कहते हैं, ‘अभी
इस शोध की जरूरत है कि ग्लूकागोन आखिर
क्यों लंबे समय तक इच्छा को दबा नहीं पाता है।’

बस दस मिनट में कैसे चुस्त दुरस्त रह सकते हैं हम


           कुछ लोगों की यह धारणा
है कि चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए
हर दिन घंटों पसीना बहाना पड़ता है,
लेकिन हाल ही में जर्मनी में हुए शोधों
से पता चला है कि यह धारणा सही
नहीं है। इस शोध के मुताबिक 10
मिनट का व्यायाम भी आपको
तरोताजा बनाये रखने के लिए
काफी है। हो सकता है कि 10
मिनट के व्यायाम से आपके शरीर
की अतिरिक्त चर्बी कम न हो, लेकिन
10 मिनट की एक्सरसाइज आपमें जोश
भर देगी और आप सारा दिन खुद को तरोताजा
महसूस करेंगी। इसका असर आपके काम पर भी
पड़ेगा यानी 10 मिनट की एक्सरसाइज आपके काम
करने की क्षमता को बढ़ायेगी।

a-                 हर दिन 10 मिनट
का व्यायाम बीमारियों से लड़ने की
शक्ति को 40 फीसदी तक बढ़ाता है।

b-                   दफ्तर की सीढि़यां
चढ़ना, उतरना तथा पार्किग स्थल
से दफ्तर तक पैदल चलना भी तरोताजा
रखने वाला व्यायाम है। –

c-                    सुबह-सुबह 10 मिनट
की जॉगिंग कई घंटों तक आपमें चुस्ती
बरकरार रख सकती है। यह ध्यान रखें कि
व्यायाम को मौजमस्ती में करें यानी उसे बोझ
समझकर न करें।

d-                       अगर बाहर जाकर
व्यायाम करना संभव न हो तो संगीत
की धुन पर 10 मिनट डांस करिए। -बुखार,
थकान, कमजोरी महसूस करने की स्थिति में
व्यायाम से बचें।

e-                     ध्यान रखें, जहां
व्यायाम करें वहां शांति हो, जगह
साफ-सुथरी हो, प्राकृतिक हवा हो और
पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी हो।

f-            व्यायाम का समय
बढ़ाना हो तो धीरे-धीरे बढ़ाएं,
एकदम से समय बढ़ाने से थकान,
कमजोरी की शिकार हो सकती हैं।

g-                   व्यायाम के समय
बातचीत न करें, व्यायाम के समय
चुप रहने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।

h-                तनावमुक्त होकर तथा
मन व शरीर शांत रखकर व्यायाम करें।

I-                 इस हकीकत को
स्वीकारें कि हमेशा युवा नहीं रह
सकतीं। चाहे दिन रात व्यायाम करें।
बढ़ती उम्र को गर्व से स्वीकार करें।

डिप्रेशन का मुकाबला करें


                     26वर्षीया अति
महत्वाकांक्षी आकांक्षा देशमुख
नई दिल्ली स्थित एक स्थापित कंपनी
में कार्यरत थीं। उनका कॅरियर ‘उड़ान’ पर
था। एग्जीटिव के पद पर उनका प्रमोशनहोने
ही वाला था कि इसी बीच उनके पिता की एक
सड़क हादसे में मौत हो गयी। उनकी मां अक्सर
बीमार रहा करती थी। परिवार में एक छोटा भाई था,
जो हाईस्कूल परीक्षा की तैयारी कर था।

                ऐसे प्रतिकूल हालात
ने आकांक्षा को दिल-ओ-दिमाग
से तोड़ दिया। वह उदास रहने लगीं,
मानो खुशी ने उनसे नाता तोड़ लिया
हो। लगातार नकारात्मक विचारों से घिरे
रहना और छोटी-छोटी बातों को लेकर
चिड़चिड़ा जाना उनकी आदर में शुमार हो
गया था। इस प्रकार वह जॉब करने की
स्थिति में नहीं रहीं। एक लंबी छुंट्टी लेकर
वह घर बैठ गयींऔर अपनी बदकिस्मतीऔर
कॅरियर की बर्बादी पर पछताया करतीं। आकांक्षा
की गिरती हुई मानसिक व शारीरिक स्थिति को
देखकर उनकी सहेली नेहा उन्हें मेरे पास लायी। मैंने
उनकी समस्या सुनीं।

            उनकी बातों को सुनने
के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच
गया कि वह अवसाद (डिप्रेशन) से
ग्रस्त है। उन्हें एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दी
गयीं और काउंसलिंग भी की गयी। आज
वह स्वस्थ हैं और हालात से तालमेल बिठाते
हुए उनकी जिंदगी एक बार फिर पटरी पर आ
चुकी है।”

                यह कहना है, अपोलो
हॉस्पिटल, नई दिल्ली के वरिष्ठ
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अचल भगत
का। उनके अनुसार डिप्रेशन को समझने
के लिए हमें इस रोग के बुनियादी स्वरूप
को समझना जरूरी है। जैसे कुछ समय के लिए
होने वाली तनावपूर्ण स्थिति को हम डिप्रेशन नहीं
कह सकते।

               विशेष विपरीत

परिस्थितियों में सभी लोगों
को दुख या तनाव महसूस होता
है, लेकिन डिप्रेशन ऐसा मनोरोग
है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति लगातार
काफी समय तक अत्यधिक उदासी
और नकारात्मक विचारों से घिरा रहता
है। वह शारीरिक रूप से भी शिथिल महसूस
करता है।

 

                   इस रोग के कई
कारण हैं। विपरीत स्थितियों
के साथ तालमेल स्थापित करने
में लगातार कई दिनों तक विफल
रहना तो एक कारण है। इसके अलावा
अन्य कारणों में आनुवांशिक कारण से
भी व्यक्ति में सेरोटोनिन की कमी हो
सकती है। इसी तरह महिलाओं में
गर्भावस्था के दौरान प्रोजेस्ट्रॉन
नामक हार्मोन की मात्रा बढ़
जाती है, लेकिन गर्भावस्था
के बाद प्रोजेस्ट्रान नामक
हार्मोन कम होने लगता है।
इस स्थिति में 100 में से 20
महिलाएं अवसाद (डिप्रेशन)से
ग्रस्त हो सकती हैं। गर्भावस्था के
दौरान इस स्थिति को ‘मैटरनल ब्लूज’
कहते हैं।

 

            नई दिल्ली स्थित
तुलसी हेल्थ केयर के वरिष्ठ
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. गौरव गुप्ता
के अनुसार डिप्रेशन के लक्षणों को
तीन भागों में विभाजित कर सकते है..

1. जैविक (बॉयोलॉजिकल)

               जैसे नींद का न आना या
अत्यधिक आना, भूख न लगना,
शरीर में थकान व दर्द महसूस होना।
इसके अलावा कामेच्छा में कमी महसूस
करना और बात-बात पर गुस्सा आना।

2. कॉग्निटिव सिम्पटम:
विचारों में नकारात्मक सोच
की बदली छा जाना, स्वयं को
हालात के सामने असमर्थ महसूस
करना।

3. समाज से अलग-
थलग: व्यक्ति सामाजिक
गतिविधियों में भाग लेने से
कतराता है। वह अपने व्यवसाय
संबंधी दायित्वों का निर्वाह करने में
असमर्थ महसूस करता है।

               इन दिनों उम्रदराज और
वयस्क व्यक्तियों के अलावा युवा
वर्ग भी डिप्रेशन की गिरफ्त में तेजी
से आ रहा है। डॉ. अचल भगत के
अनुसार इसका कारण यह है
कि युवकों को अपने कॅरियर
में स्थापित होने के लिए कड़ी
प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़
रहा है। इसके अलावा वह कम वक्त
में कामयाबियों की सीढि़यां तेजी से
चढ़ना चाहते हैं। उनमें धैर्य नहीं होता
और जब वे अपने जीवन व कॅरियर से
संबंधित पहले से ही तयशुदा लक्ष्यों (टार्गेट्स)
को पूरा नहीं कर पाते, तब उनके दिलोदिमाग
में हताशा व कुंठा घर कर जाती है। यही कारण
है कि युवावर्ग में डिप्रेशन की शिकायतें बढ़ती
जा रही हैं। सकारात्मक सोच व अपनी कार्यक्ष-
मता के अनुसार व्यावहारिक लक्ष्यों को निर्धारित
करने से इस समस्या का समाधान संभव है।

नाश्ता अवश्य करें वरना होगा दिल का रोग


         जागरण संवाददाता,
नई दिल्ली। भागती-दौड़ती
दिल्ली में ऐसे लोगों की कमी
नहीं है, जो सोचते हैं कि सुबह
का नाश्ता जरूरी नहीं अगर लंच
तक काम चल सके। यही कारण है
कि दिल्ली की वयस्क आबादी महीने
में लगभग सोलह दिन नाश्ता नहीं
करती है। ‘इंडिया ब्रेकफास्ट हैबिट
स्टडी’ के तहत हाल ही में दिल्ली,
मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में हुए
शोध के अनुसार दिल्ली के लोग नाश्ते
को सबसे कम तरजीह देते हैं। आहार विशेषज्ञों
के अनुसार इसके कारण दिल की बीमारियों से लेकर
मोटापे का भी प्रतिशत बढ़ रहा है।

             हाल में मुंबई के
कॉलेज ऑफ होम साइंस
की रिसर्च डायरेक्टर डॉ
मालती शिवरामकृष्णा एवं
सहयोगियों ने चार महानगरों
के लोगों की नाश्ता करने की
आदत पर शोध किया। इसके नतीजे
चौंकाने वाले रहे, जिसमें खाने में पोषण
को बहुत तरजीह देने वाली दिल्ली नाश्ते
में पोषण के मामले में फिसड्डी साबित हुई।
मुंबई, कोलकाता और चेन्नई की तुलना में
यहा सबसे अधिक लोग नाश्ता नहीं करते हैं,
जबकि लगभग 80 प्रतिशत दिल्लीवाले खाना
कभी नहीं छोड़ते। वक्त न होना यहा नाश्ता न
करने का सबसे बड़ा कारण है, वहीं मुंबई में भूख
न लगना इसका कारण है।

                नाश्ते के मामले में
ऐसी लापरवाही लोगों को भारी
भी पड़ सकती है क्योंकि इसका
संबंध संपूर्ण स्वास्थ्य से है। गत जुलाई
को अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के एक
जर्नल सर्कुलेशन में प्रकाशित शोध के अनुसार
जो लोग नियमित रूप से नाश्ता छोड़ते हैं, उन्हें
दिल के दौरे का अपेक्षाकृत ज्यादा खतरा होता है।
16 सालों तक लगभग 26 हजार लोगों पर यह शोध
किया गया। 1992 से 2008 तक चले शोध के नतीजे
कहते हैं कि नाश्ता न करने वाले लोगों को कोरोनरी हार्ट
डिसीज का खतरा 27 प्रतिशत ज्यादा होता है।

                नाश्ता न करने के
कारण कई तरह की समस्याओं
जैसे डायबिटीज, मोटापा, उच्च रक्तचाप
व हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा बढ़ जाता है,
जो दिल की बीमारियों का सीधा कारण है।
सर गंगाराम अस्पताल के चेयरमैन डॉ जेपीएस
साहनी कहते हैं कि नाश्ते का दिल के स्वास्थ्य
से सीधा संबंध है। यहा पर लोग व्यस्तता के चलते
नाश्ता नहीं करते और रात में सोने से पहले खाकर
सीधे सोने चले जाते हैं। इससे कैलोरी नहीं जल पाती है
और पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है जो रक्तचाप,
कोलेस्ट्रॉल और शुगर जैसी बीमारिया देने के बाद दिल पर
आक्रमण करती है।

          एम्स के कार्डियोलॉजिस्ट
डॉ राकेश यादव के अनुसार सुबह
पौष्टिक नाश्ता और व्यायाम कई तरह
के ह्रदयरोगों से बचाव करता है। वरिष्ठ
आहार-विशेषा डॉ चारु दुआ मानती हैं कि
नाश्ता करने में लापरवाही और व्यायाम न
करना जीवनशैलीजन्य बीमारियों की वजह है।
रात देर से खाने के कारण शरीर में जरूरी तत्वों
का आभाव हो जाता है, जो मोटापा, उच्च रक्तचाप
से होकर ह्रदय रोग और तनाव की भी वजह बनता
है। लोगों में मिथक है कि जो हल्का हो, वही नाश्ता
है, जबकि नाश्ता दिनभर में सबसे भारी और पौष्टिक
होना चाहिए।

पेट में गैस बनने से हो सकती हैं गैस्ट्रो इसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज


            विपुल देशमुख एक
रेस्त्रां के मालिक हैं। लजीज
और चिकनाईयुक्त स्पाइसी खाने
के वह शौकीन हैं। एक दिन उन्हें
खंट्टी डकारें आने के बाद पेट में
तेज दर्द उठा। उन्हें लगा कि उनके
पेट में गैस बन रही है। तभी उनके
पड़ोसी निर्मल राय अचानक घर चले
आए। विपुल का परेशानी वाला चेहरा
देखकर उन्होंने पूछा कि भाई समस्या
क्या है। विपुल ने अपनी तकलीफ बतायी।
राय ने कहा कि तुम गैस से परेशान हो,
अमुक चूर्ण लेने पर गैस रफूचक्कर हो
जाएगी। चूर्ण खाने के काफी देर बाद
भी जब उन्हें राहत नहीं मिली, तब
वह मेरे पास आए। चेकअॅप और जांच
कराने के बाद पता चला कि वह जीई
आरडी से ग्रस्त हैं और वह इस रोग की
दूसरी स्टेज में पहुंच चुके हैं। सौभाग्यशाली
थे कि इस स्थिति में उनकी बीमारी को दवाओं
से नियंत्रित कर लिया गया।
 

                   अगर वह रोग की
तीसरी व चौथी अवस्था में होते
तो उन्हें एक विशिष्ट प्रकार की
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से गुजरना
पड़ता।” यह कहना है, नई दिल्ली
स्थित गंगाराम हॉस्पिटल में गैस्ट्रोइंटे-
रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अनिल
अरोड़ा का। उनके अनुसार गैस बनने व
खंट्टी डकारें आदि समस्याओं की लोग अक्सर
अनदेखी कर देते हैं।

             गैस्ट्रो इसोफेजियल
रिफ्लक्स डिजीज (जीईआरडी)
के स्वरूप को समझाते हुए नोवा
हॉस्पिटल, नई दिल्ली के गैस्ट्रोइंटेरो-
लॉजिस्ट डॉ. एस.सागू बताते हैं कि मुंह
से लेकर आमाशय (स्टमक) तक जो नली
होती है, उसे इसोफेगस (भोजन नली) कहते
हैं। इसोफेगस के सबसे निचले भाग (जो
आमाशय को इसोफेगस से जोड़ता है)
को गैस्ट्रो इसोफेजियल जंक्शन कहते
हैं,जो एक वाल्व की तरह की संरचना
होती है। जब खाद्य पदार्थ गले से नीचे
उतरकर आमाशय में पहुंचते हैं, तब
यह वाल्व बंद हो जाता है।

               इस कारण आमाशय
में जो एसिड होते हैं, वे गले तक
नहीं जा पाते। जीईआरडी में यह वाल्व
खराब हो जाता है। इस कारण आमाशय
का एसिड इसोफेगस व गले में आना शुरू
हो जाता है। इस स्थिति को एसिड रिफ्लक्स
कहते हैं।

            कानपुर के गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट
डॉ. आलोक गुप्ता कहते हैं कि वाल्व की
मांसपेशियों का कमजोर होना इस रोग का
एक कारण है। यह कारण आगे चलकर
‘हाइटस हर्निया’ नामक रोग में तब्दील हो
जाता है। उनके अनुसार स्वास्थ्य पर जीई
आरडी के कुछ प्रमुख प्रभाव ये हैं..

1. हार्ट बर्न का कारण
बनता है। इस शिकायत में
सीने और गले में जलन महसूस
होती है। हार्ट बर्न की समस्या एक
सप्ताह में कई बार पैदा हो सकती है।
खासकर खाने के बाद या फिर रात में।

2. जीईआरडी खांसी
की शिकायत का भी कारण
बन सकता है या फिर यह दमा
के लक्षण भी पैदा कर सकता है।

3. इससे आपकी आवाज भर्रा सकती है।

4. एसिड से आपके मुंह
का स्वाद कड़वा या खराब हो सकता है।
इस रोग की जांच
इंडोस्कोपी, बेरियम मील और

24 ऑवर्स एम्बुलेटरी नामक परीक्षणों
से की जाती है।गर्भावस्था के दौरान महिलाओं
द्वारा अत्यधिक चिकनाईयुक्त पदार्थ खाने से भी
यह रोग हो सकता है।

बांझपन का इलाज


                मेलबर्न- बाझपन के
इलाज की दिशा में ऑस्ट्रेलिया
में डॉक्टरों को बड़ी कामयाबी
हाथ लगी है। डॉक्टरों ने इससे
पीड़ित एक महिला के पेट में अंडाशय
ऊतक प्रत्यारोपित कर गर्भधारण कराने
में सफलता हासिल की है। चिकित्सा विज्ञानी
इसे बड़ा क्रातिकारी कदम बता रहे हैं। सिडनी
मॉर्निग हेराल्ड में प्रकाशित खबर के अनुसार,
वैली नाम की इस महिला को अंडाशय के कैंसर
के इलाज के बाद डॉक्टरों ने गर्भधारण में असमर्थ
घोषित कर दिया था। इसके बाद मेलबर्न स्थित
आइवीएफ और द रॉयल मेलबर्न हास्पिटल
के डॉक्टरों की एक टीम ने महिला के
पेट में अंडाशय ऊतक प्रत्यारोपण के
जरिये अंडाणु विकसित करने में
सफलता पाई।

               कुछ महीनों बाद ही
महिला जुड़वा बच्चों को जन्म
देगी। डॉक्टरों ने बताया कि अंडाशय
ऊतक प्रत्यारोपण के जरिये अब तक
ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक और दुनियाभर
में 30 बच्चों को जन्म दिया जा सका है।
लेकिन यह अपनी तरह का पहला मामला
है जिसमें अंडाशय ऊतक को शरीर के किसी
अन्य हिस्से में प्रत्यारोपित कर अंडाणु विकसित
करने में सफलता हासिल की गई हो। मोनाश आइ-
वीएफ के अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा निदेशक गैब कोवाक्स
ने इसे क्रातिकारी खोज करार दिया। वहीं, रॉयल मेलबर्न
हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने ऐसी 300 महिलाओं के शरीर
से नमूने लिए हैं और इसी प्रक्रिया के जरिये उन्हें
गर्भधारण में सफलता हासिल कराने के प्रयास में
जुट हुए हैं।

मोटापा मस्तिष्क के लिए घातक है


                  मोटापा अपने
आपमें एक ऐसी स्वास्थ्य
समस्या है, जिससे विश्व का
हर तीसरा व्यक्ति परेशान है।
ब्रिटिश स्वास्थ्य विभाग द्वारा
हाल ही में किए गए एक अध्य-
यन के मुताबिक अगर एक बार
वजन नियंत्रण से बाहर हो गया तो
उसे दोबारा सही मानक पर लाना बहुत
मुश्किल है। ब्रिटेन में हर साल लगभग
12 लाख लोग डाइटिंग करते हैं।

             इसकी मदद से वे
काफी हद तक वजन कम
करने में कामयाब भी होते हैं,
लेकिन साल भर के भीतर उनका
वजन दोबारा बढ़ जाता है। इस संबंध
में शोध कर रही वैज्ञानिक डॉ. रेबेका
हार्डी के अनुसार, ‘कुछ लोग डाइटिंग,
व्यायाम और दवाओं की मदद से मोटापे
पर नियंत्रण जरूर कर लेते हैं, लेकिन
उनकी खुशी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं
पाती।

            वजन बढ़ने की
समस्या केवल शारीरिक
स्वास्थ्य से संबंधित नहीं है,
बल्कि इसका असर हमारे मस्ति-
ष्क पर भी पड़ता है। यूनिवर्सिटी ऑफ
कैलिफोर्निया के अध्ययनकर्ताओं ने दावा
किया है कि बढ़ते वजन की वजह से अकसर
लोग डिमेंशिया जैसी बीमारी के शिकार हो जाते
हैं। डिमेंशिया में मनुष्य का दिमाग सिकुड़ने लगता
है, जिससे उसकी याद्दाश्त घटने लगती है।

            अमेरिका में शोधकर्ताओं
ने 1300 लोगों पर यह शोध किया,
जिसमें यह पाया गया कि स्वस्थ लोगों
की तुलना में ओवरवेट लोगों के मस्तिष्क
का हिप्पोकैंपस नामक हिस्सा काफी तेजी से
सिकुड़ता है, जो याद्दाश्त को सुरक्षित रखने
का काम करता है।

         अंत में, मोटापे से त्रस्त
लोगों के लिए एक अछी खबर
यह है कि आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों
ने पहली बार ब्राउन फैट तैयार किया
है। यह एकअद्भुत टिश्यू है, जो ऊर्जा से
गर्मी पैदा करता है। इस नवीनतम तकनीक
से मोटापा कम करने में मदद मिलेगी। सिडनी
के गारवान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च
की एक टीम ने पाया कि वयस्कों की टिश्यूज
से ब्राउन फैट का निर्माण किया जा सकता है।

            इससे यह उम्मीद जगी
है कि किसी भी व्यक्ति के लिए
उसके शरीर से बाहर ब्राउन फैट
तैयार करके बाद में उसका प्रत्यारो-
पण किया जा सकता है। डॉ. पॉल
ली के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने प्रयोग-
शाला में छह रोगियों के टिश्यूज से
सफलतापूर्वक ब्राउन फैट का विकास
किया, जो बाद में उनका वजन कम
करने में कारगर साबित हुआ।

               वैसे, अगर आप
अपना वजन घटाना चाहते
हैं तो अखरोट खाना शुरू कर
दें। कैनेडा के टोरंटो विश्वविद्यालय
के अनुसंधानकर्ताओं ने अध्ययन के
दौरान यह पाया कि अखरोट वजन
बढ़ाने के लिए जिम्मेदार बुरे कोलेस्ट्रॉल
एल.डी.एल.का स्तर घटाने में प्रभावी होता
है।

फ्रेश होना है तो पलकें झपकाएं


              पलकें झपकाना
सामान्य शारीरिक प्रक्रिया
है। आमतौर पर ऐसा माना
जाता है कि आंखों की तरलता
बनाए रखने के लिए पलकों का
झपकना बेहद जरूरी है, लेकिन
जापानी शोधकर्ताओं के मुताबिक
पलकें झपकाने से दिमाग को ताजगी
मिलती है क्योंकि पल भर के इसी लमहे
में हमारा दिमाग आराम कर लेता है।

             शोधकर्ताओं के मुताबिक
जाग्रत अवस्था की कुल अवधि में
से लगभग दस प्रतिशत हिस्से में ह-
मारी पलकें झपकती हैं। जापान की
ओसाका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने
एक अध्ययन में पाया कि किसी विशेष
मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने से पहले हमारा
दिमाग खुद को इसी तरह तरोताजा करता है।
इससे उसकी सक्रियता बढ़ जाती है।

              शोधकर्ताओं के मुताबिक
दिमाग की ऐसी अवस्था तब होती है
जब हम पढ़ने, बोलने या दिमागी मेहनत
का कोई अन्य कार्य नहीं कर रहे होते हैं।
प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमीज ऑफ
साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार
वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के मस्तिष्क की
स्कैनिंग की। जिसके अनुसार पलकें
झपकाने के दौरान दिमाग के विजुअल
कॉरटेक्स और सोमेटोसेंसरी कॉरटेक्स
पल भर के लिए सुस्त हो जाते हैं।

पहले स्वयं सुखी रहें दुनियांदारी बाद में


                   एक बार मां बन
गई तो समझ लीजिए आपकी
लाइफ आपकी नहीं रही। सारी
उम्र बच्चों और पति को समर्पित
करना पड़ता है। उनकी तरफ से
जिम्मेदारी पूरी होने के बाद ही अपने
लिए समय मिल पाता है, पर यह जिम्मे-
दारी पूरी ही कहां होती है? सच तो यह है
कि अपने लिए टाइम बिल्कुल नहीं है!’
कहती हैं होममेकर हेमा सिंह। बात केवल
हेमा की नहीं है। ज्यादातर महिलाएं ऐसा
सोचती हैं। वह कामकाजी हों या होममेकर
इस खास सोच में ज्यादा फर्क नहीं है।

          एक हालिया सर्वे से
भी यह बात साबित हो चुकी
है। क्या आप फिट हैं, खुद के
लिए समय निकाल पाती हैं? साल
में खास चेकअप कराना जरूरी मानती
हैं? महिलाओं से ऐसे सवाल किए जाएं तो
जवाब अक्सर ‘ना’ में ही मिलता है। एक
शिक्षिका डॉली इसे खास तरह का माइं-
डसेट मानती हैं, ‘दरअसल, खुद के
प्रति कैजुअल अप्रोच या यूं कहें
बेफिक्री एक आदत बन चुकी है।
यह एक माइंडसेट भी है, जिसे
महिलाएं खुशी-खुशी ढो रही हैं।’

A-निवेश सेहत के लिए

                   ‘अक्सर खर्च से
बचने के लिए महिलाएं अपना
रूटीन चेकअप नहीं करवाना चाहतीं।
वे यह भूल जाती हैं कि भविष्य में यदि
किसी बड़ी बीमारी का सामना करना
पड़ा तो उसके साथ बड़े खर्चे भी
जुड़ जाएंगे,’ कहती हैं लाइफ
स्टाइल एक्सपर्ट डॉ. रचना
सिंह। वह जोर देकर कहती
हैं कि महिलाओं को अपनी
सोच बदलती होगी। वह उन
महिलाओं को एक बढि़या सुझाव
देती हैं, जो जूइॅल्रि, कपड़े या घर के
जरूरी सामानों के लिए पैसे जोड़ती हैं।

             यदि वे इन्हीं पैसों
का इस्तेमाल अपनी हेल्थ
चेकअप के लिए करें तो सेहत
के लिए किया गया यह खर्चा एक
निवेश है जो उन्हें आने वाले समय
में तमाम बीमारियों से बचा सकता है।
सबसे बड़ी बात वह एक तरह से परिवार
का पैसा भी बचाती हैं और इससे परिवार के
सदस्यों को भी खुशी मिलती है।

B-आपकी थाली कितनी रिच है

            मीडिया प्रोफेशनल
रेणु के मुताबिक, ‘जो खुद
का ख्याल नहीं रख पाएगा,
वह दूसरों का ख्याल कैसे रख
पाएगा? पर महिलाएं यह जानते
हुए भी इस बात पर अमल नहीं
कर पातीं। इसका एक ही कारण है
वे खुद को परिवार का एकमात्र रखवाला
समझती हैं।’

                रेणु की बात उन
महिलाओं पर सही बैठती है,
जो घर के सदस्यों को खाना
खिलाने के बाद सबसे अंत में
भोजन करती हैं। डॉ. रचना के
मुताबिक, बचा-खुचा खाने वाली
महिलाएं अपने पेट को डस्टबिन की
तरह इस्तेमाल करती हैं।

                    यही वजह है कि
संतुलित आहार उनकी डिक्श-
नरी में तो है, लेकिन इससे वे
कोसों दूर हैं। जानी-मानी न्यूट्रि-
शनिस्ट ईशी खोसला कहती हैं,
‘ऐसी महिलाओं की थाली में अनाज
यानी चावल, रोटी की मात्रा अधिक
नजर आती है। उसकी तुलना में स-
ब्जियों की मात्रा आधी होती है। फल
खाना तो उनके लिए एक्स्ट्रा वर्क करने
जैसा है।’ वह उन्हें सलाह देती हैं, ‘आपकी
थाली रिच हो, पोषक तत्वों से भरपूर हो, इस
बात का ध्यान रखें। उसमें आधा से ‘यादा अनाज
यानी चावल, रोटी आदि नहीं होनी चाहिए। आधी
थाली में दाल, सब्जियां और फल भी रखें। खाने के
अतिरिक्त एक मुट्ठी मिक्स सूखे मेवे लें। इसमें काजू,
किशमिश, बादाम, अखरोट, पिस्ता आदि शामिल हों।
अगर आप नॉनवेज पसंद करती हैं तो मछली को
प्राथमिकता दें। इसमें ओमेगा-X फैटी एसिड,
सेलेनियम आदि होता है। मछली के बाद अंडा
और चिकेन को प्राथमिकता दें। मटन लेना चाहें
तो कभी-कभार ही लें।

C-एक्सरसाइज से कैसा डर

                 समय कम है और
काम ज्यादा। यदि ब’चों का
स्पेशल असाइनमेंट या एग्जाम
है और पति को कहीं बाहर जाना
है तो टाइट शिड्यूल हो जाता है आपका।
डॉ. रचना के अनुसार, ‘महिलाओं के साथ
ऐसी सिचुएशन तो रहेगी ही, पर उनके लिए
यह जानना जरूरी है कि एक्सरसाइज उनकी
कार्यक्षमता को बढ़ाने में अहम् योगदान देती
है।’ वह आगे कहती हैं, ‘यदि आप कुछ समय
निकालकर सुबह के समय टहलने की आदत
भी डाल लेती हैं तो काफी फर्क पड़ता है। हां,
यदि सुबह का समय मुश्किल लगता है तो दिन
के समय या शाम के वक्त कुछ टाइम निकाल सकती हैं।’

D-ये पल आपका है

         मनोवैज्ञानिक अनु गोयल
के मुताबिक, ‘उन चीजों से दूर रहें,
जो आप पर दबाव बनाते हैं या नका-
रात्मक सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
पॉजिटिव रहने से आप तरोताजा महसूस
करेंगी।

1-किताब, जो आपके
दिल को छूती हो, मन को
हल्का करती हो, जिंदगी के
प्रति प्रेरित करती हो, उसका चुनाव करें।

2-संगीत सुनें,
यदि कोई वाद्ययंत्र
बजाना आता है तो कुछ
पल उसकी धुन में खोने के
लिए जरूर निकालें।

3-कुकिंग का शौक
है तो यह भी बढि़या स्ट्रेस
बस्टर है। खाली वक्त में नई
रेसिपी बनाने का आनंद ही कुछ
और है, यह आप जरूर महसूस करेंगी।

4-ब्रीदिंग एक्सरसाइज
से काफी हल्का महसूस करेंगी।
एकाग्रता बनेगी, मन सुंदर विचारों
की तरफ जाएगा।

               घर के कामों और
अन्य जिम्मेदारियों से कितनी
भी थकान हो, थोड़े से फन और
एंटरटेनमेंट से कार्यक्षमता बढ़ेगी
और भर उठेंगी भरपूर ऊर्जा से।

E-चेकअप के लिए नो बहाना

            एक हालिया स्टडी के
मुताबिक, ज्यादातर महिलाओं
में मृत्यु का बड़ा कारण उनमें
देर से बीमारी का पता चलना
है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि
जरा-भी तकलीफ हो तो डॉक्टर
को जरूर दिखाएं। पेटदर्द और सिरदर्द
जैसी समस्याओं को आमतौर पर तूल नहीं
दिया जाता, जबकि ये मामूली सी तकलीफ
कभी बड़ी बीमारी का आगाज हो सकती है।
स्टडी के अनुसार, जिस घर की महिलाएं हेल्दी
होती हैं, उस घर के सभी सदस्य हेल्दी और फिट
होते हैं।

छोटा कद आज एक समस्या बन गई है


           प्रतियोगिता के इस
युग में शारीरिक विकास की
कमी एक महत्वपूर्ण समस्या
बन गयी है। छोटे कद का बच्चों
के सामाजिक एवं मानसिक विकास
पर दुष्प्रभाव पड़ता है। शोध में पाया
गया है कि छोटे बच्चे सामान्य लंबाई
के बच्चों की तुलना में जीवनस्तर,
शिक्षा एवं रोजगार में पीछे रह जाते
हैं। समय पर उपचार द्वारा इन बच्चों
की लंबाई को सामान्य स्तर पर लाया
जा सकता है। इसके अतिरिक्त छोटा कद
किसी गंभीर रोग का एक मात्र लक्षण हो
सकता है।

A-कैसे बढ़ाएं बच्चों की लंबाई

          बच्चों के शारीरिक
विकास में स्वस्थ आहार
एवं व्यायाम का महत्वपूर्ण
योगदान होता है। जन्म से
लेकर छह महीने की आयु तक
बच्चों को मां का दूध पिलाना चाहिए।
इसके पश्चात ठोस पदार्थ देना चाहिए।
एक वर्ष की आयु से बच्चों को सभी खाद्य
पदार्थ दिए जा सकते हैं, जो परिवार के सद-
स्य लेते हैं।

                      खाने में प्रोटीन एवं
विटामिन की मात्रा समुचित होनी
चाहिए। इसलिए बच्चों को नियमित
रूप से दाल, हरी सब्जियां एवं फलों
का सेवन करना चाहिये। कोल्ड ड्रिंक,
जंक फूड एवं तली-भुनी चीजों का शारीरिक
विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है, इनसे बचना
चाहिये। शारीरिक विकास में नियमित शारीरिक
गतिविधियों का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रतिदिन
बच्चों को 30 से 45 मिनट तक खेलना चाहिए।

B–कौन है छोटा

                  सभी बच्चों की लंबाई
वर्ष में दो बार नापी जानी चाहिये।
जन्म पर बच्चों की औसत लंबाई 75
सेंटीमीटर होती है व दो वर्ष में बढ़कर
87 सेंटीमीटर हो जाती है। उसके बाद
बच्चों की लंबाई वर्ष में औसतन छह
सेंटीमीटर बढ़ती है। किसी आयु में
बच्चे की औसत लंबाई को जानने
के लिए आयु को 6 से गुणा कर 77
सेंटीमीटर से जोड़ें। यदि किसी बच्चे की
लंबाई इससे कम हो या एक वर्ष में 6 सेंटी-
मीटर से कम बढ़ रही है तो यह चिंता का विषय है।

C-कब करे छोटे कद की चिंता

                छोटे कद से पीड़ित
25 प्रतिशत बच्चे उस समय
डॉक्टर के पास आते हैं, जब
कोई मदद संभव नहीं होती।
इसका कारण यह भ्रांति है कि
बच्चों की लंबाई 20 वर्ष तक
बढ़ती है। यथार्थ में लड़कियों
में 14 वर्ष एवं लड़कों में 16
वर्ष तक शारीरिक विकास लगभग
पूरा हो जाता है। उसके बाद लंबाई बढ़ने
की संभावना नही होती। लड़कियों में मासिक
धर्म आरंभ होने के बाद कम लंबाई बढ़ती है।
इस कारण उचित उपचार के लिए लड़कियों को
10 व लड़कों को 12 वर्ष के पहले डॉक्टर से
मिलना चाहिये।

D-क्या है छोटे कद का कारण

              छोटा कद एक आम
समस्या है एवं तीन प्रतिशत
बच्चे इससे ग्रसित होते हैं। छोटे
कद का सबसे महत्वपूर्ण कारण ?
फइॠनकषज् है। बच्चों की लंबाई
माता और पिता की लंबाई पर भी
निर्भर करती है। यह ध्यान रखना
महत्वपूर्ण है कि तीन में से एक
छोटे बच्चे को कोई गंभीर रोग होता
है। इनमें सीलिअक रोग (गेहूं से एलर्जी),
थाइराइड की गड़बड़ी, ग्रोथ हार्मोन की कमी
व लीवर एवं किडनी रोग प्रमुख हैं। प्राय: छोटा
कद इन रोगों का पहला लक्षण होता है।

E-क्या करें यदि बच्चा छोटा हो

         यदि उचित खानपान
के बाद भी बच्चों की लंबाई
न बढ़ रही हो तो डॉक्टर से
संपर्क करना चाहिए। डॉक्टर
बच्चों के विकास की ग्रोथ चार्ट
द्वारा अन्य बच्चों एवं उनके अभि-
भावकों से तुलना करते हैं। यदि
बच्चों की लंबाई बहुत पीछे है तो
जांच आवश्यक है।

F-कैसे होता है छोटे बच्चों का उपचार

         आधुनिक शोध के
आधार पर सभी रोगों का
सफल उपचार संभव है। गेहूं
की एलर्जी एवं थाइराइड की
कमी के उपचार से बच्चों के
विकास में आशातीत बढ़ोतरी
होती है। इसके अलावा ग्रोथ हा-
र्मोन द्वारा बच्चों की लंबाई 20-25
सेंटीमीटर तक बढ़ जाती है। ग्रोथ
हॉर्मोन अब ग्रोथ हॉर्मोन की कमी के
अतिरिक्त अन्य परिस्थितियों में भी
सफलता के साथ प्रयोग हो रहा है।

                   दुर्भाग्य से कई
अभिभावक बच्चों की लंबाई
बढ़ाने के लिए ओवर द काउंटर
दवाईयों का प्रयोग करते हैं। इन दवाओं
का कोई प्रमाणित लाभ नहींहै एवं दुष्प्रभाव
अधिक होता है।

सेल फोन कहीं हमारी नीद के लिए हानिकारक है


                  जैसे-जैसे मोबाइल
हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा
बनता जा रहा है, वैसे-वैसे उसे
लेकर स्वास्थ्य संबधी चिंताएं भी
बढ़ती जा रही हैं। इस पर आए दिन
नित नई रिसर्च भी हो रही हैं। पिछले
दिनों स्वीडन में हुई एक रिसर्च से पता
चला कि सोने के पहले मोबाइल फोन के
इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव
पड़ता है।

           मोबाइल हैंडसेट से
निकलने वाले रेडिएशन के
कारण व्यक्ति अनिद्रा व सिरदर्द
की शिकायत से तो त्रस्त रहता ही
है। साथ ही उसे मीठी नींद से भी
वंचित रहना पड़ता है। इससे
उसकी एकाग्रता में भी कमी
आती है व व्यक्ति डिप्रेशन का
शिकार भी हो सकता है। इस सबका
उसके व्यक्तित्व पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।

             व्यक्ति स्वस्थ रहे,
इसके लिए गहरी नींद बहुत
जरूरी है, क्योंकि इसी दौरान
हमारा शरीर दिनभर में क्षतिग्रस्त
हुई कोशिकाओं की मरमत करता
है और इसी दौरान कोशिकाएं पुनर्जीवित
भी होती हैं। मोबाइल नींद में बाधा पहुंचाकर
इन सारे रास्तों को बंद कर देता है, जो युवा
देर रात तक मोबाइल पर बात करते रहते हैं,
उनके लिए यह खबर खतरे की घंटी है।

आवाज का रखें ध्यान यही है आपके स्वास्थ्य की पहचान


 

           24 वर्षीया नेहा प्राइमरी
स्कूल में अध्यापक हैं। करीब 2
महीने पहले उनकी आवाज बैठ
गयी। शुरुआत में उन्होंने यह
सोचकर कि यह कोई खास बात
नहीं है किसी डॉक्टर की सलाह के
बगैर गरारे किये और एलर्जी की दवाएं
लीं, किंतु 2 महीने तक कोई भी आराम न
मिलने पर उन्होंने नाक, कान व गले के
विशेषज्ञ को दिखाया। दूरबीन द्वारा स्वर
यंत्र (लैरिंक्स) की जांच पर पता चला
कि उनकी दायीं वोकल कॉर्ड में एक
गांठ है।

            ई.एन.टी. विशेषज्ञ
ने उन्हें ऑपरेशन की सलाह
दी। शुरुआत में तो वह ऑपरेशन
की बात सुनकर कुछ डरीं, किंतु डॉक्टर
द्वारा आश्वस्त करने के बाद उन्होंने ऑपरेशन
कराया। ऑपरेशन के बाद उनकी आवाज पहले
की तरह सहज-स्वाभाविक हो गयी।

A–कारगर परिणाम

                ऑपरेशन की इस
विधि को फोनो माइक्रो सर्जरी
या माइक्रोलैरिन्जयल सर्जरी कहते
हैं। इस सर्जरी में किसी बाहरी चीरे के
बगैर माइक्रोस्कोप के द्वारा स्वरयंत्र की
दिक्कतों को दूर किया जाता है। आमतौर
पर इस ऑपरेशन के बाद पहले सप्ताह में
ही आवाज ठीक हो जाती है।

1–थायरोप्लास्टी: ऑपरेशन
की   इस  पद्धति  के  अंतर्गत  गले
में एक छोटी-सा चीरा लगाकर स्वरयंत्र
के आकार व कार्य में आयी विकृति को ठीक
किया जाता है।

                      इस पद्धति से
प्यूबोफोनिया (वयस्कावस्था
में बच्चों जैसी आवाज), डिस्फोनिया
(ध्वनि में विकृतियां) और वोकल कॉर्ड
पैरालिसिस (लकवा) आदि बीमारियां ठीक
हो जाती हैं।

B–आवाज बदलने के कारण

1-स्वर यंत्र में सूजन (लैरिन्जाइटिस)।

2-गले का कैंसर व स्वरयंत्र में गांठ।

3-वोकल कॉर्ड नोड्यूल,
वोकल पॉलिप की समस्या।

4-स्वरयंत्र में कमजोरी और
लकवा (वोकल कॉर्ड पैरालिसिस)।

5-अन्त:स्रावी ग्रन्थियों की बीमारियां।

6-स्वरयंत्र की बनावट में परिवर्तन।

7-बोलने के विकार (स्पीच डिफेक्ट्स)
आदि बीमारियां आवाज में बदलाव के प्रमुख कारण हैं।

 

रात की नींद दिमाग के लिए अधिक उपयोगी है


 

            वाशिगटन- अक्सर
ही कहा जाता है कि हमें अपनी
नींद जरूर पूरी करनी चाहिए। एक
अध्ययन से पता चला है कि रात में न
सोना हमारे दिमाग के लिए अधिक हानि-
कारक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने अनिद्रा
से पीड़ित लोगों और रात में भरपूर नींद
लेने वाले लोगों के मस्तिष्क के काम में
काफी अंतर पाया।सूत्रों के मुताबिक, यूनि-
वर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के
शोधकर्ताओं के मुताबिक स्मृति परीक्षण
के दौरान कम नींद लेने वाले लोगों को
ध्यान केंद्रित करने में समस्या हुई।

                  अन्य विशेषज्ञों का
कहना है कि असल में मस्तिष्क
के तारों पर नींद का प्रभाव हो सकता
है। स्लीप जर्नल में प्रकाशित अध्ययन
से पता चलता है कि अनिद्रा से पीड़ित लोगों
के न सिर्फ रात में सोने में परेशानी होती है बल्कि
देर से प्रतिक्रिया देने और स्मृति में कमी के रूप
में इसका प्रभाव दिन में भी दिखता है। शोध में
अनिद्रा से पीड़ित 25 लोगों की तुलना
इतने ही अच्छी नींद लेने वाले लोगों
के साथ की गई। स्मृति परीक्षण के
दौरान उनके मस्तिष्क के एमआरआई
स्कैन किए गए। परीक्षण के दौरान अनिद्रा
पीड़ित लोगों का दिमाग महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सही
तरह से काम नहीं कर रहा है।

 

फेफड़े का कैंसर की सबसे बड़ी वजह धूमपान


 

                   फेफड़े के कैंसर के
अस्सी फीसदी मामले धूमपान
की वजह से होते है। यह सिगरेट
या अन्य कोई भी धुंआ हो सकता है।
सिगरेट न पीने वाले भी सिगरेट पीने
वाले के संपर्क में आने से इसका शिकार
हो सकते हैं। फेफड़े के कैंसर को प्रारंभ में
लोग अस्थमा या टीबी समझते हैं। दोनों के
लक्षण एक जैसा होने के कारण ऐसा होता है।
तीन-चार माह तक इसी का इलाज कराते हैं।
इसके बाद लोग फेफड़े के कैंसर का इलाज
प्रारंभ करते हैं।

             अब यूनाइटेड स्टेट
फूड एंड ड्रग एसोसिएशन ने
ऐसे मामले में टीसू डायग्नोसिस
को जरूरी कर दिया है। इससे फेफड़े
के कैंसर को प्रारंभिक दौर में ही पकड़ा
जा सकेगा। इससे आसानी से इलाज संभव
होगा। यह कहना है फोर्टिस अस्पताल के फेफड़े
के वरिष्ठ डाक्टर मनीष सिंघल का। वह ‘हैलो
जागरण’ कार्यक्रम के तहत फेफड़े के कैंसर
पर लोगों के सवालों का जवाब देने सेक्टर
62 नोएडा स्थित दैनिक जागरण
कार्यालय आए। लोगों की ओर से
पूछे गए कुछ सवाल और डा.
मनीष के जवाब के प्रमुख अंश :–

1-              मैं फेफड़े के कैंसर
से पीड़ित हूं। ट्यूमर फट रहे हैं।
खून आता है। क्या उपचार है?

      श्रीचंद वर्मा, मुरादनगर
डा. मनीष – आपका इलाज
रेडिएसन और किमोथेरेपी से
संभव है। इससे खून आना बंद हो
जाएगा। तीस से चालीस हजार का इलाज
है। इससे एक साल आराम मिलेगा। एंटीबायटिक
का भी इस्तेमाल करें।

2- मैं पहले खूब सिगरेट पीता था।
दो साल से छोड़ दिया है। अब खांसी
रहती है। फेफड़े में बलगम है। क्या इलाज है?
रामवीर, लक्ष्मी नगर दिल्ली

                डा. मनीष- आपने जो बताया,
वह कैंसर के लक्षण नहीं है। आपको छाती
विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। सिगरेट पीने
का असर उसे छोड़ने के बीस साल तक होता है। बीस
साल तक फेफड़े के कैंसर की संभावना होती है।

3- मेरी बेटी के बाल झड़ रहे हैं। क्या यह कैंसर का लक्षण है?
शर्मिष्ठा गुप्ता, मोदीनगर

                डा. मनीष – बाल झड़ना
कैंसर का लक्षण नहीं है। यह हार्मोन
की गड़बड़ी से होता है। एमआरआई करा
सकते हैं। शुगर या थाइराइड के डाक्टर से संपर्क
करें। फिर भी ठीक न हो तो न्यूरो के डाक्टर से मिलें।

4- मेरे सीने में दो माह से
दर्द है। फेफड़े में इंफेक्शन है।
यह फेफड़े का कैंसर है?
सेक्टर 45 इंदू भूषण

              डा. मनीष – आपको मसल
या हड्डी से संबंधी समस्या है। इसे
मस्कुलर पेन कहते हैं। आपको कैंसर
नहीं है। ऐसे दर्द कुछ समय में ठीक हो जाते
हैं। गैस्टिक की भी समस्या हो सकती है।

5- मुझे चार साल से फेफड़े का कैंसर है। बहुत दर्द है?
चंद्रभान, विजय नगर गाजियाबाद

              डा. मनीष- मॉरफीन दवा से
दर्द रूक सकता है। अपने डाक्टर से
संपर्क कर इस दवा के लिए फार्म भरवा
लीजिए। यह दवा डाक्टर के फार्म भरकर देने
के बाद ही चुनिंदा दुकानों में मिल सकती है।

6-मुझे 20 दिन बुखार रहा। फेफड़े में इंफेक्शन है। यह कैंसर तो नहीं?
ओम प्रकाश सिंह, वसुंधरा गाजियाबाद

                 डा. मनीष – आपकी
परेशानी एंटीबायटिक से ठीक हो
जानी चाहिए। प्रति माह सिटी स्कैन कराए।
आपका लक्षण कैंसर का नहीं है।

7- मुझे खांसी नहीं है लेकिन
बलगम की शिकायत है। एक माह
के इलाज के बाद भी ठीक नहीं हुआ।
सेक्टर 142 रिंकू भाटी

           डा. मनीष- आपको कैंसर नहीं है।
आप सुबह सैर करें। व्यायाम और योगा करें।
चाहे तो सिटी स्कैन भी करा सकते हैं।

8-मुझे चार साल पहले
फेफड़े का कैंसर हुआ था।
इलाज से ठीक हो गया। अब इंफेक्शन
हो जाता है?
राम किशोर त्यागी साहिबाबाद, गाजियाबाद

       डा. मनीष- आप छाती विशेषज्ञ
से मिले। अभी कुछ नई दवाएं आई हैं।
वह फेफड़े के लिए सुरक्षा कवच का काम
करती हैं। म्यूसी नैक से भी आराम मिलेगा।
वैकसीन का इस्तेमाल भी फायदेमंद है।

फेफड़े के कैंसर के लक्षण–

1- खांसी में खून आना।

2- थोड़े काम में थकावट और सांस फुलना।

3- शरीर का वजन कम होना।

4- भूख कम लगना।

5- सीना फूलना।

A–बचाव के तरीके–

1-धूमपान से दूर रहे।

2- धूमपान करने वालों से बचें।

3- खाने का धुंआ भी खतरनाक
हो सकता है। इससे बचें।

 

एंड्रोपॉज(उम्र के साथ पुरुषों में होने वाले बदलाव) को भी जानें


 

                    बढ़ती उम्र के साथ-
साथ पुरुषों के शरीर में भी हॉर्मोन
संबंधी बदलाव होते हैं, जिनके कारण
उन्हें कई शारीरिक समस्याओं का सामना
करना पड़ता है। पुरुषों में होने वाले इस बदलाव
की स्थिति को मेडिकल भाषा में एंड्रोपॉज कहते हैं।

A–रोग का स्वरूप
         

             पुरुषों को लगभग
पचास साल की उम्र के बाद
इस तरह की दिक्कतों का सामना
करना पड़ता है। जैसे महिलाओं में रजोनिवृत्ति
(मैनोपॉज) के दौरान हार्मोन संबंधी बदलाव होते
हैं और उनके शरीर से कई हार्मोन खत्म होने
लगते हैं या फिर हार्मोन संबंधी असंतुलन
पैदा हो जाता है। लगभग उसी तरह
एंड्रोपॉज में भी पुरुषों के शरीर से
हॉर्मोन खत्म होने लगते हैं। इन
हॉर्मोन्स के खत्म होने या इनके
असंतुलन से कई तरह की शारीरिक
तकलीफें शुरू हो जाती हैं। जैसे पुरुषों में
शारीरिक संपर्क करने की इच्छा भी कम या
खत्म होने लगती है।

B–लक्षण

1-शरीर में बार-बार थकान होना।

2-किसी काम में मन नहीं लगना।

3-बार-बार आलस्य से ग्रस्त होना।

4-पेशाब करने में दिक्कत होना।

5-रुक-रुक कर पेशाब होना।

6-पेशाब में जलन होना।

C–इलाज

         पुरुषों के हॉर्मोन्स में
बदलाव व असंतुलन या फिर
उनके खत्म होने का कारण
टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन होता
है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर में होने
वाली इन दिक्कतों के लिए सीधे तौर
पर यही हॉर्मोन जिम्मेदार होता है। इसीलिए
एंड्रोपॉज के इलाज में दवा और इंजेक्शन के
जरिये टेस्टोस्टेरोन शरीर में पहुंचाया जाता है।
रोग का इलाज करने से पहले प्रोस्टेट स्पेशिफिक
एंटीजेन (पीएसए) नामक जांच की जाती है। अगर
किसी पुरुष की प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ी हुई है, तो लेजर
ट्रीटमेंट के जरिए इसे ठीक किया जा सकता है।

D–सार्थक सुझाव

                       पुरुषों के शरीर में
बढ़ती उम्र के कारण टेस्टोस्टेरोन
हार्मोन के खत्म होने को एक स्वाभाविक
शारीरिक घटना माना जाना चाहिए। इसे बीमा-
री नहीं मानें। दौड़-भाग वाली जीवन-शैली में
इस तरह की शारीरिक परेशानियां आना
स्वाभाविक है। इसलिए अपनी जीवन-शैली
को संतुलित करने के लिए खानपान और व्यायाम
पर ध्यान दें।

(डॉ. विनीत मल्होत्रा यूरोलॉजिस्ट,नई दिल्ली)

 

बादाम खाने के फायदे


 

            सेहत को लाभ पहुंचाने
के मामले में दूसरे सूखे मेवों की
तुलना में कहीं आगे है बादाम, क्योंकि
इसमें उच्च मात्रा में विटामिन ई, कैल्शियम
व फाइबर सहित अन्य जरूरी पोषण तत्व पाए
जाते हैं। इसमें पाया जाने वाला फैट मोनो सैचुरेटेड
होता है, जो हृदय को स्वस्थ रखता है। यह फैट
का वह प्रकार है जो ऑलिव ऑयल में पाया
जाता है, जो कि बैड कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित
रखने एवं गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद
करता है।

               डाइबिटीज के उपचार,
ग्लाइसेमिक नियंत्रण को बेहतर
करने और डाइबिटीज के फलस्वरूप
उत्पन्न परेशानियों को दूर करने में बदाम
का सेवन लाभदायक है। इसमें उच्च मात्रा में
मौजूद विटामिन ई और अन्य प्रभावशाली
एंटीऑक्सीडेंट्स (बीमारियों से लड़ने वाले
प्राकृतिक तत्व) हृदय की बीमारी, डाइबिटीज
और कैंसर से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

         उपरोक्त के अलावा बादाम
कई अन्य आवश्यक पोषक तत्वों
जैसे फाइबर, पोटेशियम और कैल्शियम
का अच्छा स्रोत है। यह कांबिनेशन ब्लडप्रेशर
सामान्य रखने में मदद करता है। यही नहीं फोलिक
एसिड से भरपूर होने के कारण यह तंत्रिका कोशिकाओं
(नर्व सेल्स) को सुरक्षित रखने, उम्र के असर की गति
धीमी करने और हृदय की बीमारियों से बचाव करता है।

            जब बादाम के हैं
इतने फायदे तो जरूर करें
इसे अपने आहार में शामिल,
ताकि आप रहें हरदम चुस्त-दुरुस्त।

 

चाहें तो आपका यौवन हमेशा बरकरार रह सकता है


 

          लंदन- एक छोटे से शुरुआती
अध्ययन से संकेत मिले हैं चिरआयु
यौवन संभव है। लेकिन इसके लिए ना
तो ये त्वचा की क्रीम से जुड़ा है, ना वैज्ञा-
निकों को ऐसा कोई फॉर्मूला मिला है और ना
ही ये हमेशा जवान रहने के बारे में है। बल्कि
इस शोध में जीवनशैली में बदलाव की सलाह दी
गई है- जैसे तनाव घटाना, खान-पान में सुधार और
हल्की-फुल्की कसरत – जिनसे टेलोमीयर की लंबाई
बढ़ती है।

       टेलोमीयर यानी क्रोमोसोम
या गुणसूत्रों के सिरे जो हमारे बूढ़े
होने को नियंत्रित करते हैं। सादगी
भरी जीवनशैली ही चिर यौवन के लिए
काफी है। हालाकि इसके लिए संन्यासी
बनने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल,
टेलोमीयर डीएनए का विस्तार है,जो हमारे
जेनेटिक कोड की रक्षा करते हैं। इनकी तुलना
अकसर जूते के फीतों के सिरे से होती है, क्योंकि
ये क्रोमोसोम को झड़ने और बिखरने से रोकते हैं
और जेनेटिक कोड को स्थिर रखते हैं। जब भी कोई
कोशिका विभाजित होती है तो टेलोमीयर छोटा हो जाता
है, उस बिंदु तक जब तक कि बूढ़ी हो रही कोशिका
और विभाजित न हो सके और निष्कि्त्रय हो जाए
या बूढ़ी होकर मर जाए। छोटे टेलोमीयर का संबंध
उम्र से जुड़ी कई बीमारियों से होता है जिनमें कैंसर,
दिल के रोग और डिमेंशिया शामिल हैं।

        कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय
के शोधकर्ताओं ने उन 10 पुरुषों पर
नजर रखी जो प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे
थे और उनसे कहा कि वो पौधों से मिली चीजों
पर आधारित खाना खाएं, कसरत करें और ध्यान
और योग की मदद से तनाव पर नियंत्रण रखें। इन
लोगों के टेलोमीयर की लंबाई शुरुआत में ली गई और
फिर पाच साल बाद ली गई। इसकी तुलना उन 25
लोगों से की गई, जिन्हें जीवनशैली बदलने को
नहीं कहा गया था। खास जीवनशैली का
पालन न करने वाले 25 लोगों के
टेलोमीयर तीन फीसद छोटे हो चुके
थे लेकिन जिन लोगों ने अच्छी जीवनशैली
का पालन किया उनके टेलोमीयर की लंबाई 10
प्रतिशत बढ़ गई।

              इस अध्ययन में जिन
पुरुषों ने जीवनशैली में बदलाव
किया, वो हफ्ते में छह दिन कम से
कम 30 मिनट पैदल चलते थे। शोधकर्ताओं
का कहना है कि ये जानने के लिए अभी और
शोध की जरूरत है कि ये नतीजे अहम हैं या नहीं।
इसके अलावा, टेलोमीयर की लंबाई में आए बदलाव
से सेहत पर सकारात्मक असर नहीं दिखा – कुछ
पुरुषों के टेलोमीयर लंबे हो सकते हैं लेकिन वो
ज्यादा वक्त तक जी पाएंगे या नहीं ये अलग
बात है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोके-
मिस्ट्री की प्रवक्ता डॉक्टर लैन कॉक्स
कहती हैं, यहा दो चीजें ध्यान में
रखनी होंगी, पहली तनाव की
वजह से टेलोमीयर के छोटे होने
का संबंध खराब सेहत से है।

                  दूसरी बात, इसके
विपरीत ऐसे चूहे जिनमें कैंसर
की संभावना हो उनमें टेलोमीयर की
लंबाई में बढ़ोतरी ज्यादा आक्रामक कैंसर
की ओर आगे ले जाती है। इस नए अध्ययन
में टेलोमीयर की लंबाई में कम बढ़ोतरी का
ज्यादा संबंध कैंसर के जोखिम की जगह
सेहत में सुधार से लगता है, हालाकि
ये तय होना अभी बाकी है। अब आप
आनुवाशिकी को भूल जाइए। युवावस्था
को लंबा करने के लिए जीवनशैली में ऐसे
बदलाव कीजिए जो सेहत के लिए अच्छे हो
सकते हैं। उन पर नज़र रखना आसान है।
इसमें भी किसी को शक नहीं होगा कि नियमित
व्यायाम से कई फायदे हैं।

            कैंसर का जोखिम कम
होने से डायबिटीज़ की आशका
कम होना, दिल की समस्याएं घटना।
तनाव की वजह से टेलोमीयर के छोटे होने
का संबंध खराब सेहत से है।

                  इसके विपरीत ऐसे चूहे
जिनमें कैंसर की संभावना हो उनमें
टेलोमीयर की लंबाई में बढ़ोतरी •यादा
आक्त्रामक कैंसर की ओर प्रवृल करती है।
इस नए अध्ययन में टेलोमीयर की लंबाई में
कम बढ़ोतरी का •यादा संबंध कैंसर के जोखिम
की जगह सेहत में सुधार से लगता है। ऑक्सफोर्ड
यूनिवर्सिटी के लेक्चरर डॉक्टर लैन कॉक्सने बताया
कि वो •यादातर शाकाहारी भोजन लेते थे, कम चिकनाई
वाला खाना खाते थे, योग करते थे और उन्हें •यादा सामाजिक
आसरा मिला।

 

बचाव का ध्यान रखें तो बीमारी के इलाज कीआवश्यकता ही नहीं होगी


 

            कहते हैं कि बीमारी
से बेहतर है बचाव। दिल को
स्वस्थ रखने के संदर्भ में कुछ सु
झावों पर अमल करें..

1-    नियमित रूप से अपने
शरीर की क्षमता के अनुसार
व्यायाम करें। व्यायाम भी दिल को
सेहतमंद रखने में कारगर हैं।

2-            डॉक्टर से परामर्श
लेकर आप कार्डियोवैस्कुलर
व्यायाम भी कर सकते हैं।

3-        टहलना भी अच्छा
व्यायाम है। शरीर की क्षमता
के मद्देनजर नियमित रूप से टहलें।

4-            जो लोग पहले से
ही डाइबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर
से ग्रस्त हैं, उनमें हृदय संबंधी सम-
स्याएं होने का खतरा कहीं ज्यादा होता
है। इसलिए डाइबिटीज से ग्रस्त लोगों को
नियमित रूप से अपने ब्लड शुगर की जांच
करनी चाहिए। इसी तरह हृदय रोगों से ग्रस्त लोगों
को भी ब्लडप्रेशर चेक करते या कराते रहना चाहिए।

5-             अगर ब्लडशुगर
और ब्लड प्रेशर अनियंत्रित
है, तो शीघ्र ही अपने डॉक्टर से
परामर्श लें।

6-         डॉक्टर से परामर्श
लेकर एक अंतराल पर रक्त
में कोलेस्ट्रॉल लेवल की जांच कराते
रहें।

7-तंबाकू का सेवन न करें।

8-     अत्यधिक नमकीन
खाद्य पदार्र्थो को खाने से
परहेज करें। नमक कम मात्रा में लें।

A–तेल का महत्व

9-      लोगों को खाने के
तेल पर भी विशेष ध्यान
देना चाहिए। अगर सही प्रकार
और सही मात्रा में तेल का इस्तेमाल
किया जाए, तो दिल संबंधी बीमारियों को
रोकने में मदद मिलती है। इस संदर्भ में राइस
ब्रैन तेल अत्यंत लाभप्रद है। इस तेल को चावल
के भूसे में से निकाला जाता है। इसके अलावा
सरसों का तेल, जैतून और सोयाबीन का तेल
भी दिल की सेहत के लिए लाभप्रद है।

 

अपने दिल की आवाज सुनें तो आप सदैव स्वस्थ रह सकते हो एक मुलाकात


 

                  जब तक दिल धड़क
रहा है, तब तक ‘आपकी दुनिया’
आपके साथ है। कुदरत द्वारा निर्मित
शरीर का यह महत्वपूर्ण अंग आपको
जिंदा रखने के लिए ताउम्र कोशिश करता
है, लेकिन हममें से तमाम लोग इसकी सेहत
की अनदेखी करते हैं, जिसका नतीजा हाई ब्ल-
डप्रेशर और विभिन्न हृदय रोगों के रूप में सामने
आता है। दिल की नैया को डुबोने की कोशिश
करने वाले इन रोगों को कैसे दी जाए शिक-
स्त? कैसेरहे दिल सेहतमंद..? व‌र्ल्ड हार्ट
डे (29 सितंबर) पर ऐसे ही विविध
पहलुओं के बारे में अंतरराष्ट्रीय
ख्याति प्राप्त हार्ट सर्जन व पद्मभूषण
से सम्मानित मेदांत दि मेडिसिटी, गुड़गांव
के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन के साथ विवेक
शुक्ला की बातचीत के प्रमुख अंश..

A–प्रश्न–हार्ट सर्जरी में नये ट्रेन्ड क्या हैं?

        सर्जरी में मिनिमली
इनवेसिव एप्रोच का ट्रेन्ड
तेजी से आगे बढ़ता जा रहा
है। इस एप्रोच में सर्जरी के लिए
छोटे से छोटा चीरा लगाया जाता है
और रोगी का स्वास्थ्य लाभ कहीं
ज्यादा तेजी से होता है। बाईपास
हार्ट सर्जरी या कोरोनरी आर्टरी
बाईपास ग्राफ्टिंग(सीएबीजी) के
दौरान अब रोगी को हार्ट लंग
मशीन पर रखने की जरूरत नहीं
है। कई नवीनतम उपकरणों के जरिये
सीएबीजी को अंजाम दिया जा रहा है।
इस कारण अब बाईपास हार्ट सर्जरी के
दौरान इंजरी होने या फिर अन्य जटिलताएं
कम हो रही हैं।

                दूसरा महत्वपूर्ण
विकास रोबोटिक सर्जरी है।
इसके जरिये अब पहले से कहीं
ज्यादा रोगी लाभान्वित हो सकते हैं।
इनमें हृदय के वाल्व संबंधी खराबी से
ग्रस्त व्यक्तियों और दिल में छेद होने के
विकारों (कॅन्जेनाइटल डिफेक्ट्स) से
पीड़ित रोगी भी शामिल हैं। बेहतर
सहायक उपकरणों (बेटर सपोर्ट
इक्विपमेंट) के प्रचलन में आने
के कारण अब हार्ट सर्जरी में
जोखिम कम रह गया है।

B–प्रश्न–हार्ट फेल्यर का
नवीनतम इलाज क्या है?
क्या हार्ट फेल्यर की रोकथाम
की जा सकती है?

           शुरुआती अवस्था
में पता चलने और हृदय
संबंधी रोगों का समय रहते
समुचित इलाज व प्रबंधन करने
से हार्ट फेल्यर (हृदय का सुचारु रूप
से कार्य न करना)की रोकथाम करने
में मदद मिलती है। लोगों में इस रोग के
प्रति जागरूकता पैदा करके और स्वास्थ्य
परीक्षण कार्यक्रमों के जरिये इस रोग का
शुरुआती दौर में ही पता लगाने में मदद
मिलती है। हार्ट फेल्यर के रोगियों के लिए
अब पूर्व की तुलना में अनेक नवीनतम
और बेहतर दवाएं उपलब्ध हैं।

                जोखिभरे कारकों-जैसे
हाई ब्लडप्रेशर, डाइबिटीज, और
हृदय धमनी रोग (कोरोनरी आर्टरी
डिजीज) का समुचित प्रबंधन करने से
हार्ट फेल्यर की रोकथाम संभव है। हार्ट
फेल्यर के नवीनतम इलाज में बेहतर और
नवीनतम दवाओं के अलावा इंटरवेंशन
(एंजियोप्लास्टी), ईईसीपी(एक विशेष
यंत्र) व कार्डिएक रीसिनक्रोनाइजेशन
थेरेपी (एक विशिष्ट आधुनिकतम
पेसमेकर) और स्टेम सेल
थेरेपी(अभी इसका परीक्षण
जारी है) का प्रयोग किया जाता
है। इसके अलावा मायोकार्डियल
एन्यूरिज्म (दिल का क्षतिग्रस्त
भाग जो गुब्बारे की तरह फूल जाता
है) की सर्जरी के जरिये रिपेयरिंग की
जाती है।

                    वेंट्रीक्युलर असिस्ट
डिवाइस का इस्तेमाल और हृदय
का प्रत्यारोपण(हार्ट ट्रांसप्लांट) आदि
विधियों से भी हार्ट फेल्यर के रोगियों
का इलाज किया जाता है। इलाज इस
बात पर निर्भर करता है कि पीड़ित
व्यक्ति रोग की किस अवस्था में है।

C-प्रश्न-हृदय संबंधी
रोगों के इलाज में क्या
स्टेम सेल थेरेपी कारगर है?

                स्टेम सेल थेरेपी
उन रोगियों के लिए उम्मीद
की किरण बन सकती है, जिनके
इलाज के लिए अभी तक कोई आधुनि-
क उपचार उपलब्ध नहींहै। हार्ट फेल्यर
में हृदय की मांसपेशियां काफी नष्ट
हो जाती हैं। स्टेम सेल के प्रयोग से
कुछ हद तक हृदय की मांसपेशियों
की रिपेयरिंग हो सकती है। इस प्रकार
स्टेम सेल थेरेपी हदय की कार्यप्रणाली को
सुधारने में मददगार हो सकती है।

                     अनेक लोगों के
हृदय की धमनियों में डिफ्यूज
ब्लॉकेज(धमनियों में कई जगह
अवरोध) होते हैं। ऐसे लोगों को नॉन
ऑपरेबल (इन लोगों का ऑपरेशन तो
क्या एंजियोप्लास्टी भी संभव नहीं है)की
श्रेणी में रखा जाता है। स्टेम सेल्स नये
कोलेटेरल्स (धमनियों की सूक्ष्म शाखाएं)
को विकसित करने में मदद करती है
और यह हृदय में रक्त का संचार
करने में सहायक है। स्टेम
सेल थेरेपी के संदर्भ में
अब तक का हमारा अनुभव
और इस क्रम में नतीजे काफी
उत्साहव‌र्द्धक रहे हैं। लेकिन
इस थेरेपी की कमी यह है कि
इसका इलाज अभी तक परीक्षणा-
त्मक (इन्वेस्टिगेशनल) स्थिति में है।

D-प्रश्न-हार्ट अटैक और
हृदय संबंधी अन्य रोगों की
रोकथाम के लिए क्या कदम उठाये
जाने चाहिए?

                  देश में हार्ट अटैक
के बढ़ते मामले एक समस्या
बन चुके हैं। शहरों में रहने वाली
लगभग 10 प्रतिशत वयस्क आबादी
हृदय धमनियों (कोरोनरी आर्टरीज) में
अवरोध (ब्लॉकेज) से ग्रस्त है। इस तरह के
अवरोध कालांतर में हार्ट अटैक के कारण बनते हैं।

             बेशक, हार्ट अटैक
को रोका जा सकता है। इस
संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण
बात हृदय रोगों के जोखिम भरे
कारणों को शुरुआती दौर में पता
कर उनकी रोकथाम से संबंधित है।
रोकथाम के उपायों में नियमित रूप से
व्यायाम करना, प्रतिदिन 10,000 कदम
या इससे अधिक चलना, कैलोरी इनटेक को
नियंत्रित करना, खान-पान में जंक फूड और
तले हुए खाद्य पदाथों को कम से कम ग्रहण
करना और किसी भी रूप में तंबाकू के सेवन
से परहेज करना आदि शामिल हैं।

             याद रखें, स्वस्थ
जीवन-शैली हार्ट अटैक की
आशंका को काफी हद तक कम
कर देती है। हाई ब्लडप्रेशर, डाइबिटीज
और कोलेस्ट्रॉल के बढ़े हुए स्तर का पता
लगाने के लिए नियमित रूप से चेक अॅप
कराएं। ये चेकअॅप उन लोगों को खासतौर
पर कराना चाहिए, जिनके परिवार के सदस्यों
को हृदय रोगों की समस्या रही हो। इसके अलावा
जो लोग पहले से ही हृदय रोगों से ग्रस्त हैं, वे हार्ट
अटैक के जोखिम को कम करने के लिए हृदय
रोग विशेषज्ञ से परामर्श कर एस्पिरीन, एसीई
इनहिबिटर्स, स्टैटिन्स या बीटा ब्लॉकर्स आदि
दवाएं ले सकते हैं।

E-प्रश्न-क्या ‘गोल्डन ऑवर’
के बाद हार्ट अटैक के रोगियों के
न बचने का खतरा कहीं ज्यादा बढ़ जाता है?

                 हार्ट अटैक पड़ने
पर गोल्डन ऑवर की अवधि
एक घंटे तक मानी जाती है। गोल्डन
ऑवर के अंदर समुचित इलाज मिलने पर
रोगी के हृदय की मांशपेशियों के नष्ट होने
की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से नियंत्रित
किया जा सकता है। वहीं गोल्डन
ऑवर के बाद दिल की मांसपेशियों
की रिकवरी होने की संभावनाएं बेहद
कम हो जाती हैं। इस स्थिति में हार्ट फेल्यर
होने और मौत होने का खतरा कहीं ज्यादा
बढ़ जाता है।

F-प्रश्न-हृदय धमनी रोग
(कोरोनरी आर्टरी डिजीज) से
ग्रस्त लोगों के इलाज के लिए कोई
नई तकनीक या नवीनतम दवाएं क्या हैं?

               जिन लोगों को एक
से अधिक बार हार्ट अटैक हो
चुका है, उनके लिए नए एंटीप्ले-
टलेट्स एजेंट्स(रक्त पतला करने
की दवाएं) विकसित किए जा चुके
हैं। ये प्लेटलेट्स एजेंट्स बार-बार
हार्ट अटैक होने की स्थिति को
कम करने में कहीं ज्यादा कारगर
हैं।

          एंजियोप्लास्टी से
संबंधित नए स्टेन्ट्स अब
उपलब्ध हैं,जो बार-बार हार्टअटैक
होने की आशंका को कम कर सकते
हैं। बॉयोडिग्रेडेबल स्टेन्ट्स भी विकसित
हो चुके हैं, जो कोरोनरी आर्टरी में ही
जज्ब (डिस्सॉल्व) हो जाते हैं। इसके
अलावा अब ‘हाइब्रिड प्रोसीजर्स’ भी
उपलब्ध है, जिसके जरिये जरूरत
पड़ने पर किसी रोगी में अलग-अलग
उपकरणों के द्वारा एंजियोप्लास्टी और मिनि-
मली इनवेसिव सर्जरी इन दोनों को ही अंजाम
दिया जा सकता है।

 

हेपेटाइटिस पर कैसे नियंत्रण रख सकते हैं


 

             हेपेटाइटिस ए. और ई
प्रदूषित खाद्य व पेय पदार्र्थो के
सेवन से होता है। वहींबी और सी
हेपेटाइटिस रक्त के जरिये होता है।
रक्त व रक्त के उत्पाद जैसे प्लाज्मा में
प्रदूषित सिरिंज के इस्तेमाल से दूसरे व्यक्ति
में संक्रमण होना। इसी तरह संक्रमित व्यक्ति
द्वारा रक्तदान करने से भी यह रोग संभव है।
डॉ.संजीव सहगल के अनुसार टैटू गुदवाना,
किसी संक्रमित व्यक्ति का टूथब्रश और रेजर
इस्तेमाल करना और असुरक्षित शारीरिक
संपर्क से हेपेटाइटिस बी व सी होने का
जोखिम बढ़ जाता है। लंबे समय तक
शराब पीने की लत भी हेपेटाइटिस का
कारण बन सकती है। डॉ.जैन के अनुसार
हेपेटाइटिस डी उन मरीजों को होता है, जो पहले
से ही हेपेटाइटिस बी से ग्रस्त हैं।

A–लक्षण

1-पीलिया होना।
2-भूख न लगना।
3-बुखार रहना।
4-पेट में दर्द रहना।
5-उल्टियां होना।

B–बचाव

1-सिर्फ हेपेटाइटिस
ए और बी से बचाव के लिए
टीके (वैक्सीन्स) उपलब्ध हैं।
2-पानी उबालकर या फिल्टर कर पिएं।
3-खाद्य व पेय पदार्र्थो की स्वच्छता का ध्यान रखें।

C–हेपेटाइटिस बी और सी का इलाज

              बी.एल.के. हॉस्पिटल,
नई दिल्ली के सीनियर सर्जिकल
गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट डॉ. दीप गोयल
कहते हैं कि इन दोनों हेपेटाइटिस की
तीन स्थितियां हो सकती हैं..

1–पहली स्थिति: -इसमें
बीमारी तो होती है, लेकिन वह
स्वत: ठीक हो जाती है।

2–दूसरी स्थिति:- हेपेटाइटिस
बी और सी का वाइरस लिवर में
लगातार सूजन पैदा करता रहता
है। यह स्थिति अगर छह माह तक
चले, तो इसे मेडिकल भाषा में क्रॉनिक
हेपेटाइटिस कहते हैं। इस अवस्था में बीमारी
का दवाओं से इलाज संभव है।

3–तीसरी स्थिति: बीमारी तो होती है,
लेकिन तात्कालिक तौर पर मरीज उस बीमारी
को महसूस नहीं करता, लेकिन अगर वाइरस
लिवर में बरकरार रह गए, तो वे कालांतर में लिवर
सिरोसिस और लिवर कैंसर का कारण बनते हैं।

4–चौथी स्थिति: लिवर अचानक
काम करना बंद कर देता है। इस स्थिति
को मेडिकल भाषा में एक्यूट लिवर फेल्यर
कहते हैं। यह स्थिति जानलेवा होती है और इसका
इलाज लिवर ट्रांसप्लांट है।

 

D–हेपेटाइटिस बी कैरियर: शरीर में

हेपेटाइटिस बी का संक्रमण हुआ, लेकिन
वाइरस लिवर को नुकसान नहीं पहुंचा रहा
है, किंतु वह वाइरस लिवर से बाहर भी नहीं हुआ
है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में हेपेटाइटिस कैरियर
कहते हैं।

E–हेपेटाइटिस ए और ई का इलाज

          डॉ.जैन और गोयल दोनों
का ही मानना है कि हेपेटाइटिस ए
और ई के इलाज की कोई सुनिश्चित
दवा नहीं है। लक्षणों के आधार पर ही
इन दोनों हेपेटाइटिस का इलाज किया जाता
है। जैसे बुखार के लिए दवा अलग से दी जाती है
और पेट दर्द के लिए अलग से।

F–दूर करें गलत धारणा

             हेपेटाइटिस बी और सी
का वाइरस हाथ मिलाने, खाने के
बर्तनों और पानी पीने के गिलासों का
इस्तेमाल करने से नहीं फैलता। इसी तरह
यह वाइरस छींकने, चूमने और गले मिलने से
भी नहीं फैलता।

g–डाइट पर दें ध्यान
           हेपेटाइटिस के रोगियों की
समुचित डाइट उनकी बीमारी की स्थिति,
उम्र और उनके वजन पर निर्भर करती है।

H–इस संदर्भ में कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

1-वसा(फैट): वसायुक्त खाद्य
पदार्र्थो या चिकनाईयुक्त खाद्य
पदार्र्थो से परहेज करें या फिर इन्हें
कम मात्रा में लें।

2–कार्बोहाइड्रेट्स: रोगी की ऊर्जा
संबंधी बढ़ी हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए
उसे समुचित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स की जरूरत
होती है। इसके लिए उसे खाने के लिए रोटी दें। मरीज
जितना खा सके, उसे उतना ही खाने दें। धीरे-धीरे उसकी
भूख जब खुलेगी, तो वह इच्छा के अनुसार रोटियां खाने लगेगा।

3–मरीज को फल दें और घर

              में तैयार किए गए फलों का रस
पिलाएं। पीड़ित व्यक्ति आलू खा सकते हैं,
लेकिन तले-भुने रूप में नहीं। सब्जियों को
अच्छी तरह से धोएं। मरीज मूली भी ले सकते हैं।
छिली हुई सब्जियों को भी अच्छी तरह से धुलें ताकि
भविष्य में कोई संक्रमण न हो सके।
4–शराब से परहेज: किसी भी तरह
की शराब लिवर की शत्रु होती है। इसके
सेवन से मर्ज बढ़ता है।
पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स: एक
निश्चित अंतराल पर रोगी को पर्याप्त
मात्रा में पानी, तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स
(जैसे सोडियम और पौटेशियम) देना चाहिए।

I–हेपेटाइटिस के संदर्भ में कुछेक भ्रांतियां
व्याप्त हैं, जिनका निराकरण जरूरी है..

a–मिथ: कुछ लोगों का मानना
है कि लिवर से संबंधित रोगों में किसी
भी रूप में हल्दी के सेवन से परहेज करना चाहिए..

b–तथ्य: ऐसी धारणा गलत है।
ऐसा इसलिए, क्योंकि हल्दी में एंटीवाइरल
(वाइरस प्रतिरोधी), एंटी इनफ्लैमैटरी(सूजन कम
करने वाले)और जीवाणुरोधी तत्व पाए जाते हैं। इसलिए
हल्दी का सेवन लाभप्रद है।

c–मिथ: गन्ने का रस पीना लिवर
के लिए लाभप्रद है।

d–तथ्य: गन्ने के रस का
सेवन लिवर के लिए लाभप्रद है,
लेकिन लाभ पहुंचाने के बजाय यह
नुकसान ज्यादा पहुंचाता है। ऐसा इसलिए,
क्योंकि अधिकतर मामलों में इसे अस्वच्छ व
अस्वास्थ्यकर स्थितियों में तैयार किया जाता है।

 

पेट की समस्याओं से न हों परेशान


 

             गर्मियों में पेट संबंधी
समस्याओं के मामले कुछ ज्यादा
ही बढ़ जाते हैं। मौजूदा मौसम में आम
तौर पर पेट से संबंधित ये बीमारिया होती हैं..

1.पेट में जलन होना या
अम्ल (एसिड) का ज्यादा बनना,
जिसे एसिडिटी कहते हैं।

2. पेट में दर्द।

3. दस्त व उल्टियां आना।

4. हेपेटाइटिस होना।

5. बदहजमी होना।

6. टाइफॉइड होना।

A–कारण

          गर्मियों में जीवाणुओं
(बैक्टेरिया)की संख्या बहुत तेजी
से बढ़ती है। 25 डिग्री से 40 डिग्री
सेल्सियस का तापमान जीवाणुओं के
पनपने के लिए सबसे अच्छा माना जाता
है। आप जानते हैं कि गर्मियों में बाहर रखा
खाना जल्दी ही दूषित हो जाता है। इस मौसम
में प्रदूषित पानी और दूषित खाद्य पदार्र्थो को खाने
के कारण पेट संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं।

B–लक्षण

          पेट से संबंधित विभिन्न
बीमारियों के लक्षण अलग-अलग हो
सकते हैं। मुख्य तौर पर पेट के रोगों के
लक्षण इस प्रकार हैं..

1-पेट में दर्द होना।
2-पेट में फुलाव होना।
3-भूख न लगना।
4-दस्त लगना।
5-मल में आंव का आना।
6-पेट में जलन होना।
7-कब्ज होना।
8-आंखों का पीला होना।

C–बचाव

          गर्मियों में थोड़ी सावधानी
बरतने से आप स्वस्थ रहकर मौसम
का आनंद ले सकते हैं। इस मौसम में सेहत
बरकरार रखने के लिए इन बातों पर अमल करें..

1-थोड़ा खाएं। दिन में चार-पांच
बार हल्का आहार लें। एक बार में
ज्यादा खा लेने से पेट में गैस और
एसिडिटी की समस्या होने की आशंका
बढ़ जाती है।

2-तरल पदार्थ जैसे पानी,
नींबू पानी, लस्सी, नारियल
पानी या घर में तैयार जूस या ओ
आरएस का घोल पिएं। ऐसा करने से
आप डीहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी)
से बचे रह सकते हैं।

3-रसदार फल लें। जैसे खीरा,
ककड़ी, खरबूजा व अन्य फल।

4-मसालों का ज्यादा इस्तेमाल न करें।
इनसे पेट में जलन और अन्य शिकायतें हो सकती हैं।

1-ताजा खाना खाएं। ज्यादा
देर तक रेफ्रिजरेटर के बाहर रखा
खाना बैक्टेरिया और फंगस के सक्रिय
हो जाने के कारण खराब हो जाता है।

2-बिजली के बार-बार
आने और जाने से फ्रिज में
रखा खाना यदि ज्यादा समय
से रखा गया है, तो वह भी खराब
हो सकता है।

3-बाहर खुले में रखे कटे
फल और सब्जियां न खाएं। स्ट्रीट
फूड्स से परहेज करें।

4-ढीले व हल्के रंग के सूती कपड़े पहनें।

5-स्वच्छ व फिल्टर किया हुआ पानी पिएं।

D–उपचार

        पेट से संबंधित रोगों के
उपचार के लिए ओआरएस का
घोल दें। शरीर में पानी की कमी
न होने दें। पेट में जलन दूर करने
के लिए ‘एंटाएसिड’ युक्त तरल पदार्थ
पी सकते हैं। समय रहते डॉक्टर की सलाह
लें। टाइफाइड, हेपेटाइटिस और हैजे के टीके के
बारे में अपने डॉक्टर से सलाह लें।

E–यह है दस्त का आयुर्वेदिक इलाज

          दूषित खाद्य पदार्र्थो और
प्रदूषित जल ग्रहण करने से पतले
दस्त आने लगते हैं। दस्त से बचाव के
लिए ताजा सुपाच्य गर्म खाना और स्वच्छ
जल का प्रयोग करना चाहिए। कुछ सामान्य
घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खों को अपनाकर आप इस
समस्या से राहत पा सकते हैं..

1-आधी कच्ची और आधी
भुनी सौंफ पीस लें और इसका
1/4 भाग चीनी मिला लें। 1 से 2
चम्मच पानी के साथ दिन में दो से
तीन बार लें।

2-सौंफ, जीरा, धनिया और
ईसबगोल की भूसी समान मात्रा
में पीसकर ठीक से मिला लें। इसमें
थोड़ा सेंधा नमक मिला लें। आधा से एक
चम्मच दिन में 3 से 4 बार मट्ठे के साथ सेवन करें।

3-यदि दस्त के साथ खून
आता हो, तो सौंफ, धनिया, अनारदाना
और मिश्री मिलाकर रखें। आधा से एक चम्मच
दिन में 3-4 बार लें।

4-कच्चे बेल का चूर्ण 1-1
चम्मच सुबह- शाम लेने से लाभ होता है।

5-बेल का गूदा और गुड़ मिलाकर लेने से लाभ होता है।

6-सूखे आंवले का चूर्ण और
काला नमक समान मात्रा में मिलाएं।
आधा चम्मच दिन में 3-4 बार पानी से लें।

7-आंव और खूनी दस्त होने पर
प्याज और दही खाने से लाभ होता है।

8-दस्त में अनार, सेब और केला का प्रयोग लाभप्रद है।

9-सोंठ, सौंफ और चीनी समान
मात्रा में पीसकर एक -एक चम्मच
दिन में तीन बार पानी के साथ लें।

10-शतपुष्पादि चूर्ण,
विल्वादि चूर्ण और कुटजारिष्ट
आदि औषधियों का प्रयोग चिकित्सक
ोके परामर्श से करना चाहिए।

 

जामुन के फल की उपयोगिता


 

          आजकल के मौसम में
मिलने वाले जामुन का रंग न
सिर्फ देखने में बढि़या होता है,
बल्कि यह स्वाद और सेहत से भी
भरपूर होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स
भरपूर मात्रा में होते हैं। जामुन के सेवन
से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत
होती है। यह पाचन तंत्र के लिए भी लाभकारी है।
खास बात यह है कि डायबिटीज वाले लोग भी
इसका सेवन कर सकते हैं।

1-जामुन में फ्लेवोनॉइड्स,
फेनॉल्स, प्रोटीन और कैल्शियम
भी पाया जाता है, जो सेहत के लिए
लाभकारी होता है।

2-इसमें कैरोटीन, आयरन,
फोलिक एसिड, पोटैशियम,
मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और
सोडियम भी पाया जाता है। इस
वजह से यह शुगर का लेवल मेंटेन
रखता है।

3-बहुत कम लोगों को
यह मालूम होगा कि जामुन
में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में
पाया जाता है।

4-ग्लूकोज और फ्रक्टोज
के रूप में मिलने वाली शुगर
शरीर को हाईड्रेट करने के साथ
ही कूल और रिफ्रेश करती है।

5-जामुन में फाइटोकेमिकल्स
भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो
शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

6-अगर आपको कमजोरी
महसूस होती है या आप एनीमिया
से पीड़ित हैं तो जामुन का सेवन आपके
लिए फायदेमंद रहेगा।

7-जामुन का सिरका
बनाकर बराबर मात्रा में
पानी मिलाकर सेवन करने
से यह न केवल भूख बढ़ाता है,
बल्कि कब्ज की शिकायत को भी
दूर करता है।

8-यदि आप अपने चेहरे
पर रौनक लाना चाहती हैं तो
जामुन के गूदे का पेस्ट बनाकर
इसे गाय के दूध में मिलाकर लगाने
से निखार आता है।

9-यदि आपको एसिडिटी
की समस्या रहती है तो काले
नमक में भुना जीरा मिलाकर पीस
लें। फिर इसके साथ जामुन का सेवन
करें। एसिडिटी की समस्या दूर हो जाएगी।

10-यदि आपका बच्चा बिस्तर
गीला करता है तो जामुन के बीजों
को पीसकर आधा-आधा चम्मच दिन
में दो बार पानी के साथ पिलाएं।

                बस एक बात का
ध्यान रखें कि कभी भी खाली
पेट जामुन का सेवन न करें। न
ही कभी जामुन खाने के बाद दूध का
सेवन करें। साथ ही अधिक मात्रा में भी
जामुन खाने से बचें। अधिक खाने पर यह
नुकसान भी करता है।

 

डेंगू के वार से कैसे बचें


 

          मानसून शुरू
हो चुका है, लेकिन यह
मौसम कुछ बीमारियों को भी
अपने साथ लेकर आता है। इनमें
से एक है-डेंगू।
A–कारण

1-एडीज इजिप्टी नामक
मच्छर के काटने से डेंगू फैलता
है। डेंगू का मच्छर अधिकतर सुबह
काटता है।
2-यह मच्छर साफ रुके
हुए पानी जैसे कूलर व पानी की
टंकी आदि में पनपता है।
3-डेंगू एक तरह
का वाइरल इंफेक्शन
है। यह वाइरस चार तरह-
डेनवी1,डेनवी 2, डेनवी 3 और
डेनवी 4 का होता है। मच्छर के काटने
से यह वाइरस खून में आ जाता है।

B–लक्षण
1-सर्दी लगकर तेज बुखार आना।
2-सिरदर्द होना।
3-आंखों में दर्द होना।
4-उल्टी आना।
5-सांस लेने में तकलीफ होना।
6-शरीर, जोड़ों व पेट में दर्द होना।
7-शरीर में सूजन होना।
8-त्वचा पर लाल निशान पड़ना।
9-कुछ लोगों को इस
बीमारी में रक्तस्राव (ब्लीडिंग)
भी हो जाता है। जैसे मुंह व नाक से
और मसूढ़ों से। इस स्थिति को डेंगू हेमोरेजिक
फीवर कहा जाता है।
10-पेशाब लाल
रंग का आना, काले
दस्त आना, इस बीमारी के
कुछ अन्य लक्षण हैं।

C–इलाज
1-गंभीर स्थिति में
मरीज को अस्पताल में
दाखिल करने की जरूरत
पड़ती है। हालांकि डेंगू की गंभीरता
न होने की स्थिति में घर पर रह कर ही
उपचार किया जा सकता है और पीड़ित व्यक्ति
को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं होती।
2-इस रोग में रोगी
को तरल पदार्थ का सेवन
कराते रहें। जैसे सूप, नींबू पानी
और जूस आदि।
3-डेंगू वाइरल इंफेक्शन
है। इस रोग में रोगी को कोई
भी एंटीबॉयटिक देने की आवश्यकता
नहीं है।
4-बुखार के आने पर
रोगी को पैरासीटामॉल की
टैब्लेट दें। ठंडे पानी की पट्टी माथे
पर रखें।
5-रोगी को यदि
कहीं से रक्तस्राव हो
रहा हो, तब उसे प्लेटलेट्स
चढ़ाने की आवश्यकता होती है।
6-डेंगू का बुखार
2 से 7 दिनों तक रहता
है। इस दौरान रोगी के रक्त
में प्लेटलेट्स की मात्रा घटती है।
सात दिनों के बाद स्वत: ही प्लेटलेट्स
की मात्रा बढ़ने लगती है। लक्षणों के प्रकट
होने पर शीघ्र ही डॉक्टर से संपर्क करें।

 

वाइरल फीवर पर कैसे नियंत्रण करें


 

          मौजूदा मौसम
में वाइरल फीवर सबसे
मुख्य बीमारी है, जो एक
साथ कई लोगों को प्रभावित
करती है। आप अपने चारों तरफ
अनेक लोगों को खांसता या छींकता
देख रहे हैं। स्कूलों में और ऑफिस में
अनुपस्थित होने वाले लोगों की संख्या
अचानक बढ़ गई है। वाइरल फीवर या फ्लू
इंफ्लूएन्जा वायरस से होने वाली एक बीमारी
है। यह आमतौर पर हमारे श्वास तंत्र को प्रभावित
करती है।
                  अनेक लोगों को बार-वार
वाइरल या फ्लू इसलिए होता है, क्योंकि
वाइरस समय-समय पर ‘म्यूटेशन’ करता
रहता है। सहज शब्दों में कहें, तो वाइरस अपना
स्वभाव व शक्ल बदला करता है।
A–कारण
             वाइरस दूषित हवा
या दूषित     वस्तुओं के कारण
फैलता है। जब कोई बीमार व्यक्ति
छींकता या     खांसता है, तो वाइरस
ड्रापलेट हवा में फैल जाते हैं और आस-
पास के व्यक्ति जब सांस लेते हैं, तो उनको
भी बीमारी फैलाने वाले वाइरस प्रभावित कर
देते हैं। इसके अलावा जब बीमार व्यक्ति
अपनी नाक या मुंह साफ करके अगर अ
पने हाथ नहींधोता और मेज, कुर्सी,
फोन, कंप्यूटर, दरवाजा आदि को
छू लेता है, तो वे चीजें भी वाइरस के
कैरियर (वाहक) बन जाती हैं और इन्हें
छूने से भी बीमारी फैल जाती है।
         B–लक्षण
1-खांसी, जुकाम और नाक बहना।
2-बुखार, जो कभी-कभी 102 डिग्री फॉरेनहाइट
से ज्यादा भी हो सकता है।
3-सिर दर्द।
4-बदन दर्द।
5-गले में दर्द।
6-खाने में तकलीफ।
7-ठंड लगना और थकान महसूस होना।
C–जटिलताएं
वाइरल फीवर या फ्लू
में निम्न लोगों को सावधान
रहना चाहिए, क्योंकि इन लोगों
में रोग से संबंधित जटिलाएं उत्पन्न
होने का खतरा ज्यादा होता है..
(अ) 65 वर्ष से ज्यादा उम्र या 1 साल के
छोटे बच्चे।
(ब) गर्भवती महिलाएं।
क्रॉनिक या पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोग जैसे
a-डाइबिटीज।
b-हार्ट फेल्यर।
c-सीओपीडी या दमा।
d-लिवर संबंधित परेशानी।
e-जिन लोगों का रोग-
प्रतिरोधक तंत्र कमजोर है।
जैसे एड्स या एचआईवी से प्रभावित
लोग।

D–वाइरल फीवर या फ्लू के
मरीजों में निम्न जटिलताएं उत्पन्न
हो सकती हैं..
1-न्यूमोनिया।
2-साइनस इंफेक्शन।
3-दमा या सांस के
मरीजों की समस्या और
गंभीर होना या फिर ब्रांकाइटिस होना।
4-कान में संक्रमण होना।
5-कभी-कभी मेनिन
जाइटिस या दिमागी बुखार होना।

E–बचाव
1-बीमार व्यक्ति घर पर आराम करें।
2-भीड़ भरी जगहों पर न जाएं।
3-खांसते व छींकते वक्त मुंह को ढक कर रखें।
4-हाथों को साफ रखें।
समय-समय पर धोएं या
फिर हैंड सैनीटाइजर का इस्तेमाल करें।
5-वैक्सीन का प्रयोग
फ्लू से बचने या उसकी तीव्रता
घटाने का एक कारगर उपाय है।
खासकर वृद्ध व्यक्तियों, बच्चों, गर्भवती
महिलाओं और दिल व फेफड़ों के रोगों से
ग्रस्त व्यक्तियों को डॉक्टर की सलाह पर यह
 टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

 

खुद पैदा करें अपनी हंसी-खुशी


 

                          शी के बारे में आपका
कोई विचार नहीं होना चाहिए। आपको
बस खुश रहना चाहिए। चार्ल्स डार्विन ने
बताया था कि आप बंदर थे। धीरे-धीरे आपकी
पूंछ गायब हो गई और आप इंसान बन गए। पूंछ
तो गायब हो गई, लेकिन क्या आपकी बंदर वाली
आदतें भी खत्म हुई हैं? आपके और चिम्पैंजी के डीएनए
में बस 1.23% का ही फर्क है। जाहिर है, बंदरों के गुण अब
भी इंसानों में मौजूद हैं।

                 बहुत पुरानी बात है।
एक आदमी था, जिसका नाम था
टोपीवाला। वह टोपी बेचता था। गर्मियों
की दोपहर थी। काम करते-करते वह थक
गया, और एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसने
अपना खाना खोला और खाने लगा। खाना खाकर
उसकी आंख लग गई। आंख खुली तो उसने देखा कि
उसकी सारी टोपियां गायब हैं। जब आपको कुछ समझ
नही आता कि क्या किया जाए – तो आप क्या करते हैं?
ऊपर देखते हैं, ऊपरवाले की याद आती है आपको। खैर, इस
टोपीवाले ने भी ऊपर देखा। वह क्या देखता है – कुछ बंदर उसकी
टोपियां पहने बैठे हैं। वह उन बंदरों पर चिल्लाया। बंदर भी उस पर
चिल्लाए। उसने ईंट के टुकड़े बंदरों पर मारे। बंदरों ने भी इन टुकड़ों
को उसकी तरफ वापस फेंका। परेशान होकर टोपीवाले ने अपने टोपी
उतारी और जमीन पर फेंक दी। बस फिर क्या था, बंदरों ने भी अपनी-
अपनी टोपियां उतारकर जमीन पर फेंक दीं।

                    उस घटना के कई सालों
बाद ऐसी ही दूसरी घटना घटी। ऐसे ही
एक और टोपीवाला टोपियां बेचने जा रहा
था। गर्मी से परेशान होकर वह भी पेड़ के
नीचे बैठ गया। इस टोपीवाले के साथ भी कुछ
वैसा ही हुआ जैसा सालों पहले उस टोपीवाले के
साथ हुआ था। इसकी भी टोपियां बंदर आ कर ले
गए। उसने अपने पूर्वजों से वह कहानी सुन रखी थी,
इसलिए वह उठा और उसने बंदरों को मुंह चिढ़ाना शुरू
कर दिया। बंदरों ने भी उसे बदले में मुंह चिढ़ा दिया। टोपीवाले
ने उन बंदरों के साथ खूब मजाक किया। अंत में उसने अपनी टोपी
उतारी और जमीन पर फेंकदी। इतने में एक बड़ा बंदर नीचे उतरकर
आया, टोपी उठाई और टोपीवाले के पास पहुंचा। टोपीवाले के गाल पर
एक जोरदार तमाचा जड़कर बंदर बोला, ‘मूर्ख, तुझे क्या लगता है, कि
बस तेरे ही दादा थे।’

                     दरअसल, हम दूसरों को
देखकर अपनी खुशी तय करने लगते हैं।
यूं ही किसी राह चलते शख्स को देखकर हमें
लगता है, कि यह वाकई खुश है। बस हम उसी
की तरह हो जाना चाहते हैं, और फिर नतीजा होता
है – निराशा। कुछ समय बाद हमें लगता है, कि साइकल
पर चलने वाला शख्स खुश है। हम साइकल पर चलना शुरू
कर देते हैं और कुछ दिन बाद ही निराश होने लगते हैं। फिर
हमें लगता है कि जो लोग कार में चल रहे हैं, असल में वे खुश
हैं और कार में चलना ही असल मायनों में खुशी है। हो क्या रहा है?
दूसरों को देखकर हमें लगता है, कि उनके जैसे काम करके हम खुश
हो सकते हैं।

                            इसमें कोई दो राय नहीं कि
खुशी के लिए कुछ बाहरी तत्व प्रेरक का काम
करते हैं। लेकिन सच यही है कि खुशी हमेशा हमारे
अंदर से ही आती है। ऐसा नहीं होता कि बाहर कहीं
से किसी ने आप पर खुशी की बारिश कर दी। कल्पना
कीजिए, 1950 में आपने अपने लिए एक कार खरीदी।
कार के साथ आपको दो नौकर भी रखने पड़े, क्योंकि कार
धक्का लगाने से स्टार्ट होती थी। आज सब कुछ सेल्फ स्टार्ट
होता है। अब आप ही बताइए कि आप अपनी खुशी, अपनी सेहत,
शांति और सुख संपन्नता को सेल्फ स्टार्ट करना चाहते हैं, या पुश
स्टार्ट?

                     अगर यह सेल्फ स्टार्ट है
तो आप यह नहीं पूछेंगे कि खुशी क्या है,
क्योंकि आप जानते हैं कि आपके भीतर खुश
रहने की क्षमता है। वैसे मेरे काम का एक महत्वपूर्ण
हिस्सा यही है – हर किसी को सेल्फ स्टार्ट पर रखना।
इसका अर्थ है लोगों के लिए खुश होने की तकनीक को
बेहतर बनाते जाना। क्या आपको कोई ऐसा शख्स मिला
है जिसके बारे में आप कह सकें कि वह बिल्कुल वैसा ही
है जैसा आप चाहते हैं? आपमें से कई छात्र इतने रोमांटिक
होंगे कि सोचते होंगे, कि किसी न किसी दिन उन्हें कोई न
कोई ऐसा अवश्य मिलेगा, जो सौ फीसदी बिल्कुल ऐसा होगा
जैसा कि वे चाहते हैं। अगर वह 51 फीसदी भी आपके मुताबिक
है, तो यह बहुत बढ़िया है। लेकिन कई लोग महज 10 फीसदी ही
होंगे। ऐसे में संघर्ष करना होगा। दरअसल, दुनिया में ऐसा कोई भी
शख्स नहीं है, जो बिल्कुल आपके मुताबिक चले। तो अगर आपकी खुशी
अपने इर्द-गिर्द मौजूद लोगों के हाथों में है तो इस बात की संभावना बेहद
कम है कि आप खुश रह सकें।

                           एक बार मैं प्रिंसटन
यूनिवर्सिटी में बोल रहा था। यूनिवर्सिटी
एक ऐसी जगह होती है जहां लोगों के चेहरे
बेहद गंभीर होते हैं। हो सकता है, यह उनके
ज्ञान का बोझ हो, जो उनके चेहरों को बोझिल
बना देता है। वहां हर कोई बड़ी गंभीरता के साथ
बैठा था। इन लोगों के बीच दो युवा चेहरे ऐसे भी
थे, जिनके चेहरे पर मुस्कराहट थी। मैंने कहा, ’30
साल से ज्यादा उम्र के इन लोगों को क्या हुआ।’ एक
महिला खड़ी हुई और बोली, ‘ये सभी शादी शुदा हैं।’

                  ज्यादातर लोगों के साथ
ऐसा ही होता है। जैसे-जैसे उनकी उम्र
बढ़ती जाती है, उनके चेहरे से रौनक गायब
होने लगती है। किसी सड़क के किनारे खड़े हो
जाइए, और वहां से निकलने वाले लोगों को गौर
से देखिए और ढूंढिए कि आपको कितने चेहरों पर
आनंद दिखाई देता है। अगर आपको कोई आनंदित
चेहरा दिखेगा भी तो आमतौर पर वह युवा होगा। वैसे
आजकल युवा भी गंभीर और तनाव से भरे दिखाई देते हैं।
जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है, वे और गंभीर होते जाते
हैं। ऐसा लगता है जैसे कब्र की तैयारी करने की उन्हें बड़ी जल्दी
है। कब्र की तैयारी किसी और को करनी चाहिए, आपको नहीं। अभी
मुझसे किसी ने पूछा, ‘सद्‌गुरु आप कैसे हैं?’ मैंने कहा, ‘मैंने तय
किया है कि – या तो मैं बिल्कुल ठीक ठाक रहूंगा या फिर नहीं रहूंगा।’

                          हर इंसान ऐसा कर
पाने में सक्षम है, बशर्ते उसने अपने
अंदर सेल्फ स्टार्ट बटन का पता लगा
लिया हो।खुशी कोई ऐसी चीज नहीं है, जो
किसी खास काम को करने से पैदा होती हो।
इसे देखने के तमाम तरीके हैं। सबसे आसान
तरीका है रासायनिक प्रक्रिया यानी केमिस्ट्री को
समझना। इंसान के हर अनुभव के पीछे एक रासा-
यनिक आधार होता है। अगर आप शांति चाहते हैं तो
एक निश्चित रासायनिक प्रक्रिया होती है। अगर आप
आनंदित रहना चाहते हैं तो एक अलग तरह की रासाय-
निक प्रक्रिया होगी। यह पूरा मामला विज्ञान और तकनीक
का है, जिसे आप अंदरूनी तकनीक भी कह सकते हैं। इसी
तकनीक की मदद से आप अपने भीतर सही रासायनिक प्रक्रिया
पैदा कर सकते हैं। परम आनंद की रासायनिक प्रक्रिया आपके जीवन
के हर पल को परम आनंद से भर देगी। अच्छी बात यह है कि हर
इंसान ऐसा कर पाने में सक्षम है, बशर्ते उसने अपने अंदर सेल्फ
स्टार्ट बटन का पता लगा लिया हो। अगर ऐसा नहीं है तो हर
वक्त किसी न किसी को आपको धक्का मार कर स्टार्ट करते
रहना पड़ेगा। जीवन में चीजें इस तरह नहीं चलतीं कि, वे
हमेशा आपके लिए लाभकारी ही हों। अगर आप चाहते हैं
कि जीवन हमेशा आपके अनुसार चलता रहे तो यह तभी
हो सकता है जब आप दुनिया में कुछ भी न करें।

                  अगर आप चुनौतीपूर्ण
स्थितियों का सामना कर रहे हैं, तो
ऐसी तमाम चीजें होंगी जो आप नहीं
चाहते। और अगर ये परिस्थितियां आप-
को कष्टों में डाल रही हैं, तो जाहिर है –
धीरे धीरे आप अपने जीवन के दिन कम कर
रहे हैं। कष्टों के डर ने पूरी मानवता को जकड़
लिया है। अब वक्त आ गया है कि इंसान अपने
भीतर एक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया पैदा करे या एक
ऐसा सॉफ्टवेयर प्रोग्राम तैयार करे कि कष्टों के प्रति
उसका डर खत्म हो जाए। कष्टों का डर ख़त्म होने से
आनंद में जीना ही उसका स्वभाव बन जाएगा और तभी
इंसान अपनी पूर्ण क्षमता को जानने के लिए स्वयं को दांव
पर लगा सकेगा।

 

जीवन एक प्रवाह के साथ-साथ तीव्रता भी है


 

          जीवन तीव्रता है।
कभी आपने महसूस किया
है कि आपके भीतर जो जीवन
है, वह एक पल के लिए भी धीमा
नहीं पड़ता। अगर कुछ धीमा पड़ता
है, तो वह है आपका दिमाग और आ-
पकी भावनाएं, जो कभी अच्छी हो जाती
हैं तो कभी बिमार। अपनी श्वास को देखिए।
क्या यह कभी धीमी पड़ती है? अगर कभी
यह धीमी पड़ जाती है तो उसका मतलब
मौत होता है। जब मैं आपको जीवंत बनने
और अपने अंदर तीव्रता पैदा करने के
तमाम तरीके बताता हूं, तो मैं बस
यह कह रहा होता हूं कि आप
जीवन की तरह बन जाएं।
अभी आपने अपने उन
विचार और भावों को
बहुत ज्यादा महत्व दिया
हुआ है, जो आपके भीतर
चल रहे हैं। आपने अपने भीतर
के जीवन को महत्व नहीं दिया है।
जरा सोचिए, क्या जीवित रहने से
ज्यादा महत्व आपके विचारों का है?
महान दर्शनशास्त्री देस्कार्ते ने कहा,
‘मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं।’

             बहुत सारे लोगों
का मानना है कि उनका
अस्तित्व केवल इसलिए है
क्योंकि वे सोच रहे हैं। नहीं, ऐसा
नहीं है। चूंकि आपका अस्तित्व है,
इसलिए आप सोच पा रहे हैं, नहीं तो
आप सोच ही नहीं सकते। आपकी
जीवंतता आपके विचारों और भावों
से कहीं ज्यादा मौलिक और महत्व-
पूर्ण हैं। लेकिन होता यह है कि
आप केवल वही सुनते हैं जो
आपके विचार और भाव
कह रहे हैं। अगर आप
जीवन की प्रक्रिया के
हिसाब से चलें, तो
यह एक निरंतर प्रवाह
है, चाहे आप सो रहे हों
या जाग रहे हों। जब आप
सो रहे होते हैं तो क्या जीवन
आपके भीतर सुस्त पड़ जाता है?
नहीं, यह आपका मन है जो कहता
है, ‘मुझे यह पसंद है इसलिए मैं इसे
पूरे जुनून के साथ करूंगा, मुझे वह
पसंद नहीं है इसलिए उसे दिल से नहीं
करूंगा।’ लेकिन आपकी जिंदगी इस
तरह की नहीं है। यह हमेशा एक प्रवाह
और तीव्रता में है।

          अगर आप लगातार
इस तथ्य के प्रति जागरूक
या सजग रहेंगे कि बाकी सभी
चीजें गुजर जाने वाली चीजें हैं
और मैं मूल रूप से जीवन हूं, तो
आपके अंदर एक प्रवाह और तीव्रता
बनी रहेगी। आपके अस्तित्व में होने
का कोई और तरीका ही नहीं है, क्योंकि
जीवन को कोई दूसरा तरीका मालूम ही
नहीं है। जीवन हमेशा प्रवाह में है, यह तो
बस भाव और विचार ही हैं जो भ्रम पैदा करते हैं।

               अब जरा अपनी
भावनाओं और विचारों की
प्रकृति को देखिए। जीवन में
ऐसे तमाम मौके आए होंगे, जब
इन विचारों और भावनाओं की वजह
से आपने कई चीजों में भरोसा किया
होगा। कुछ समय बाद आपको ऐसा
लगने लगता है कि उस चीज पर भरोसा
करना आपकी बेवकूफी थी। आज आपकी
भावना आपसे कहती है कि यह शख्स बहुत
अच्छा है। फिर कल आपकी भावना आपको
बताती है कि यह सबसे खतरनाक व्यक्ति
है – और दोनों ही बातें शत प्रतिशत सच
मालूम पड़ती हैं। इस तरह आपकी भावना
और विचार आपको धोखा देने के शानदार
जरिए हैं। वे आपको किसी भी चीज के बारे में
भरोसा दिला सकते हैं।

                 अपनी खुद की
मान्यताओं की ओर देखिए।
उनमें से कोई भी किसी भी तरह
की जांच का सामना नहीं कर पाएगी।
अगर मैं आपसे तीन सवाल पूछूं, तो
आपकी मान्यताएं पूरी तरह लडख़ड़ा
जाएंगी। लेकिन जीवन में अलग-अलग
मौकों पर आपका मन आपको अलग-अलग
बातों पर भरोसा कराएगा और वह तब आपको
बिल्कुल सच लगेगा।

कैसे बनाए रखें तीव्रता?

     तीव्रता का अर्थ है
     जीवन के प्रवाह के
साथ चलना। अगर आप
यहां सिर्फ जीवन के रूप में,
एक शुद्ध जीवन के रूप में मौजूद
हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से अपनी
परम प्रकृति की ओर जाएगा। जीवन
की प्रक्रिया अपने स्वाभाविक लक्ष्य
की ओर बढ़ रही है। लेकिन आप
एक विचार, भाव, पूर्वाग्रह, क्रोध,
नफरत और ऐसी ही तमाम
दूसरी चीजें बनकर एक
बड़ी रुकावट पैदा कर
रहे हैं। अगर आप बस
जीवन के एक अंश के
रूप में मौजूद हैं, तो स्वा-
भाविक रूप से आप अपनी
परम प्रकृति तक पहुंच जाएंगे।

              यह कोई ऐसी चीज
नहीं है जिसके लिए आपको
जूझना या संघर्ष करना पड़े। मैं
हमेशा कहता हूं – बस अपनी तीव्रता
को बनाए रखें, बाकी चीजें अपने आप
होंगी। आपको स्वर्ग का रास्ता ढूंढने की
जरूरत नहीं है। बस अपनी तीव्रता को बनाए
रखिए। ऐसा कोई नहीं है जो इस जीवन को
इसकी परम प्रकृति की ओर ले जाए या
जाने से रोक दे। हम इसमें देरी कर
सकते हैं या हम बिना किसी बाधा
के इसे तेजी से जाने दे सकते हैं।
बस यही है जो हम कर सकते हैं।

              यह जितनी तेजी
से हो सकती है, उतनी तेजी
से इसे होने देने के लिए ही आ-
ध्यात्मिक प्रक्रियाएं होती हैं। मदद
के लिए आपको देवताओं को बुलाने
की जरूरत नहीं है, आपको जीवन
होना होगा, विशुद्ध जीवन। अगर
आप यहां एक विशुद्ध जीवन के
रूप में जी सकते हैं, तो आप
परम लक्ष्य तक स्वाभाविक रूप
से पहुंच जाएंगे।

 

हमें हीनता से बाहर कैसे निकलना है


 

        एक बड़े मनोविज्ञानी
अल्फ्रेड एडलर ने पाया कि
मनुष्य के जीवन की सारी
उलझनों का मूल श्रोत हीनता
की ग्रंथि में होता है। हीनता की
ग्रंथि का अर्थ है कि जीवन में आप
कहीं भी रहें, कैसे भी रहें, सदा मन
में यह पीड़ा बनी रहती है कि कोई आपसे
आगे है, कोई आपसे ज्यादा है, कोई आपसे
ऊपर है। इसकी चोट भीतर के प्राणों में घाव बना
देती है। फिर आप जीवन के आनंद को भोग नहीं
सकते।

                   हीनता की ग्रंथि
(इनफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स)
अगर एक ही होती, तब भी ठीक
था। तब शायद कोई उपाय किया जा
सकता था। अल्फ्रेड एडलर ने तो हीनता
की ग्रंथि शब्द का प्रयोग किया है, पर मैं
तो ‘हीनताओं की ग्रंथियां’ कहना पसंद
करूंगा। क्योंकि कोई हमसे ज्यादा सुंदर
है। किसी का स्वर कोयल जैसा है और
हमारा नहीं। कोई हमसे ज्यादा लंबा है,
कोई हमसे ज्यादा स्वस्थ है। किसी के
पास ज्यादा धन है, किसी के पास ज्यादा
ज्ञान है, किसी के पास ज्यादा त्याग है। कोई
संगीतज्ञ है, कोई चित्रकार है, कोई मूर्तिकार है।

                करोड़ों लोग हैं हमारे
चारों तरफ और हर आदमी में
कुछ न कुछ खूबी है। जिसके
भीतर हीनता की ग्रंथि है, उसकी
नजर सीधे दूसरों की खूबी पर जाती
है, क्योंकि जाने-अनजाने वह हमेशा
तौल रहा है कि मैं कहीं किसी से पीछे
तो नहीं हूं। उसकी नजर झट से पकड़
लेती है कि कौन-सी बात है, जिसमें मैं
पीछे हूं। जितने लोग हैं, उतनी ही हीन-
ताओं का बोझ हमारे ऊपर पड़ जाता है।
हीनताओं की एक भीड़ हमें चारों तरफ से
दबा लेती है, हम उसी के भीतर तड़पते रहते
हैं और बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझता।

             एक बार एक आदमी
ने मुझसे कहा, ‘बड़ी मुश्किल
में पड़ा हूं। दो साल पहले अपनी
प्रेयसी के साथ समुद्र तट पर बैठा
था। एक आदमी आया, उसने पैर से
रेत मेरे चेहरे पर उछाल दी और मेरी
प्रेयसी से हंसी-मजाक करने लगा।’ मैंने
पूछा, ‘तुमने कुछ किया?’ उसने कहा, ‘क्या
कर सकता था? मेरा वजन सौ पौंड का, उसका
डेढ़ सौ पौंड।”फिर भी, तुमने कुछ तो किया होगा?’

                 उसने कहा, ‘मैंने
स्त्रियों के बारे में सोचना ही
छोड़ दिया, हनुमान अखाड़े में
भर्ती हो गया। दंड-बैठक लगाने
से दो साल में मेरा भी वजन डेढ़
सौ पौंड हो गया। फिर मैंने एक स्त्री
खोजी। समुद्र तट पर गया। वहां बैठा
भी नहीं था कि एक आदमी आया, उसने
फिर लात मारी रेत में, मेरी आंखों में धूल
भर दी और मेरी प्रेयसी से हंसी-मजाक करने
लगा।’ मैंने कहा, ‘अब तो तुम कुछ कर सकते
थे।’उसने कहा, ‘क्या कर सकते थे? मैं डेढ़ सौ
पौंड का, वह दो सौ पौंड का।’

              ‘तो अब क्या करते हो?’
उसने कहा, ‘अब फिर हनुमान
अखाड़े में व्यायाम करता हूं। लेकिन
अब आशा छूट गई। क्योंकि दो सौ पौंड का
हो जाऊंगा तो क्या भरोसा कि ढाई सौ पौंड का
आदमी नहीं आएगा।’

            इस सोच से हम कभी भी
हीनता के बराबर नहीं हो सकते।
कितने लोग हैं, कितने विभिन्न रूप
हैं, कितनी विभिन्न कुशलताएं हैं, योग्य-
ताएं हैं, आप उनमें दब मरेंगे। यही वजह है
कि अल्फ्रेड एडलर ने मनुष्य की सारी पीड़ाओं
और चिंताओं का आधार दूसरे के साथ अपने को
तौलने में पाया है। एडलर जैसे-जैसे गहराई में गया,
उसे समझ में आया कि आदमी क्यों खुद को दूसरे
से तौलता है? क्या जरूरत है? तुम तुम जैसे हो,
दूसरा दूसरे जैसा है। यह अड़चन तुम उठाते
क्यों हो? पौधे तो तुलना नहींकरते। छोटी-
सी झाड़ी बड़े से बड़े वृक्ष के नीचे निश्चित
बनी रहती है, कभी यह नहीं सोचती कि
यह वृक्ष इतना बड़ा है। छोटा-सा पक्षी
गीत गाता रहता है। बड़े से बड़ा पक्षी बैठा
रहे, इससे गीत में बाधा नहीं आती। प्रकृति में
तुलना है ही नहीं, सिर्फ मनुष्य के मन में तुलना है।

                  तुलना क्यों है?
एडलर ने कहा कि तुलना
इसलिए है कि हम सभी यानी
पूरी मनुष्यता एक गहन दौड़ से
भरी है। उस दौड़ को एडलर कहता है:
द विल टु पावर (शक्ति की आकांक्षा)। कैसे
मैं ज्यादा शक्तिवान हो जाऊं, फिर चाहे वह धन
हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, यश हो, कुशलता हो, कुछ
भी हो, हर मामले में मैं शक्तिशाली हो जाऊं। यही
मनुष्य की सारी दौड़ का आधार है। लेकिन
जब हम शक्तिशाली होना चाहते हैं, तो
पाते हैं कि हम शक्तिहीन हैं। क्योंकि
हम तुलना करते हैं। जगह-जगह
हमारी शक्ति की सीमा आ जाएगी।
सिकंदर और नेपोलियन और हिटलर
भी चुक जाते हैं। उनकी भी शक्ति की सीमा
आ जाती है।

               एडलर ने प्रश्न तो
खड़ा कर दिया, उलझन भी
साफ कर दी, लेकिन मार्ग एडलर
को भी नहीं सूझता कि इसके बाहर
कैसे हुआ जाए। अभी पश्चिम का मनोवि-
ज्ञान समस्या को समझने में ही उलझा है,
उसके बाहर जाने की तो बात ही बहुत दूर है।
कैसे कोई बाहर जाए? एडलर का तो सुझाव
इतना ही है कि तुम्हे अतिशय की आकांक्षा
नहीं करनी चाहिए। जो उपलब्ध हो सकता है,
उसका प्रयास करना चाहिए। लेकिन इससे
कुछ हल न होगा। क्योंकि कहां अतिशय
की सीमा है? कौन सी चीज सामान्य है?
जो तुम्हारे लिए सामान्य है वह मेरे लिए
सामान्य नहीं। जो मेरे लिए सामान्य है,
तुम्हारे लिए अतिशय हो सकती है। एक
आदमी एक घंटे में पंद्रह मील दौड़ सकता है;
वह उसके लिए सामान्य है। तुम एक घंटे में पांच
मील भी दौड़ गए तो मुसीबतमें पड़ोगे। कहां तय होगी
यह बात कि क्या सामान्य है? औसत क्या है?

           लाओत्से के अनुसार,
इसका एक ही रास्ता है। और
वह रास्ता है घाटी के राज को जान
लेना। जब वर्षा होती है पहाड़ खाली रह
जाते हैं, लेकिन घाटियां लबालब भर जाती
हैं। राज यह है कि घाटी पहले से ही खाली
है। जो खाली है वह भर जाता है। पहाड़
पहले से ही भरे हैं, इसलिए वे खाली
रह जाते हैं। तुम जब तक दूसरे से
अपने को तौलोगे और दूसरे से
आगे होना चाहोगे, तब तक तुम
पाओगे कि तुम सदा पीछे हो। लाओत्से
कहता है, जो जीवन की इस व्यर्थ दौड़ को
देखकर समझ गया और जिसने कहा कि हम
आगे होने के लिए दौड़ते नहीं, तो एक अनूठा
चमत्कार घटित होता है। तब जो आगे होने की
दौड़ में होते हैं, तुम्हारे बजाय वे हीन हो जाते हैं।
जैसे ही तुम्हारी हीनता मिट जाती है, तुम श्रेष्ठ हो
जाते हो। किसी से तौलोगे तो पीछे हो सकते हो।
तौलते ही नहीं, तो हीनता का कैसे बोध होगा?
हीनता का घाव भर जाएगा और श्रेष्ठता के फूल
उस घाव की जगह प्रकट होना शुरू हो जाएंगे।

                    यह कैसे हुआ कि
महान नदी और समुद्र खड्डों
के, घाटियों के स्वामी बन गए?
झुकने और नीचे रहने में कुशल होने
के कारण। वे झुकना जानते हैं। वस्तुत:
जहां जितनी झुकने की क्षमता होगी, उतना
ही वहां जीवन होगा। लाओत्से को बहुत प्रिय
है झुकने की कला। वह कहता है, जब तुम झुके
होगे तो कोई तुम्हें कैसे झुका सकता है।

 

बद्रीनाथ विष्णु की निवास भूमि है


 

              क्या आप बद्रीनाथ
की कहानी जानते हैं? यह वो
जगह है, जहां शिव और पार्वती
रहते थे। यह उनका घर था। एक
दिन नारायण यानी विष्णु के पास
नारद गए और बोले, ‘आप मानवता
के लिए एक खराब मिसाल हैं। आप हर
समय शेषनाग के ऊपर लेटे रहते हैं।
आपकी पत्नी लक्ष्मी हमेशा आपकी
सेवा में लगी रहती हैं, और आपको
लाड़ करती रहती हैं। इस ग्रह के
अन्य प्राणियों के लिए आप
अच्छी मिसाल नहीं बन पा
रहे हैं। आपको सृष्टि के सभी
जीवों के लिए कुछ अर्थपूर्ण कार्य
करना चाहिए।’

              इस आलोचना से बचने
और साथ ही अपने उत्थान के लिए
(भगवान को भी ऐसा करना पड़ता है)
विष्णु तप और साधना करने के लिए सही
स्थान की तलाश में नीचे हिमालय तक आए।
वहां उन्हें मिला बद्रीनाथ, एक अच्छा-सा, छोटा-
सा घर, जहां सब कुछ वैसा ही था जैसा उन्होंने
सोचा था। साधना के लिए सबसे आदर्श जगह
लगी उन्हें यह। वह उस घर के अंदर गए।
घुसते ही उन्हें पता चल गया कि यह तो
शिव का निवास है और वह तो बड़े
खतरनाक व्यक्ति हैं। अगर उन्हें
गुस्सा आ गया तो वह आपका
ही नहीं, खुद का भी गला
काट सकते हैं। ऐसे में
नारायण ने खुद को
एक छोटे-से बच्चे के रूप
में बदल लिया और घर के सामने
बैठ गए। उस वक्त शिव और पार्वती
बाहर कहीं टहलने गए थे। जब वे घर
वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि एक छोटा
सा बच्चा जोर-जोर से रो रहा है। पार्वती को
दया आ गई। उन्होंने बच्चे को उठाने की कोशिश
की। शिव ने पार्वती को रोकते हुए कहा, ‘इस
बच्चे को मत छूना।’ पार्वती ने कहा, ‘कितने
क्रूर हैं आप ! कैसी नासमझी की बात कर
रहे हैं? मैं तो इस बच्चे को उठाने जा
रही हूं। देखिए तो कैसे रो रहा है।’
शिव बोले, ‘जो तुम देख रही हो,
उस पर भरोसा मत करो। मैं
कह रहा हूं न, इस बच्चे को
मत उठाओ।’

               बच्चे के लिए पार्वती
की स्त्रीसुलभ मनोभावना ने
उन्हें शिव की बातों को नहीं मानने
दिया। उन्होंने कहा, ‘आप कुछ भी कहें,
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे अंदर की
मां बच्चे को इस तरह रोते नहीं देख सकती।
मैं तो इस बच्चे को जरूर उठाऊंगी।’ और यह
कहकर उन्होंने बच्चे को उठाकर अपनी गोद में
ले लिया। बच्चा पार्वती की गोद में आराम से था और
शिव की तरफ बहुत ही खुश होकर देख रहा था।

शिव इसका नतीजा जानते थे, लेकिन करें
तो क्या करें? इसलिए उन्होंने कहा, ‘ठीक है,
चलो देखते हैं क्या होता है।’ पार्वती ने बच्चे
को खिला-पिला कर चुप किया और वहीं
घर पर छोडक़र खुद शिव के साथ गर्म
पानी से स्नान के लिए बाहर चली गईं।
वहां पर गर्म पानी के कुंड हैं, उसी कुंड
पर स्नान के लिए शिव-पार्वती चले गए।
लौटकर आए तो देखा कि घर अंदर से बंद
था। शिव तो जानते ही थे कि अब खेल शुरू
हो गया है। पार्वती हैरान थीं कि आखिर दरवाजा
किसने बंद किया? शिव बोले, ‘मैंने कहा था न, इस
बच्चे को मत उठाना। तुम बच्चे को घर के अंदर लाईं
और अब उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है।’
पार्वती ने कहा, ‘अब हम क्या करें?’

             शिव के पास दो विकल्प
थे। एक, जो भी उनके सामने है,
उसे जलाकर भस्म कर दें और दूसरा,
वे वहां से चले जाएं और कोई और रास्ता
ढूंढ लें। उन्होंने कहा, ‘चलो, कहीं और चलते
हैं क्योंकि यह तो तुम्हारा प्यारा बच्चा है इसलिए
मैं इसे छू भी नहीं सकता। मैं अब कुछ नहीं कर
सकता। चलो, कहीं और चलते हैं।’

               इस तरह शिव और
पार्वती को अवैध तरीके से वहां
से निष्कासित कर दिया गया। वे
दूसरी जगह तलाश करने के लिए
पैदल ही निकल पड़े। दरअसल, बद्रीनाथ
और केदारनाथ के बीच, एक चोटी से दूसरी
चोटी के बीच, सिर्फ दस किलोमीटर की दूरी है।
आखिर में वह केदार में बस गए और इस तरह
शिव ने अपना खुद का घर खो दिया। आप पूछ
सकते हैं कि क्या वह इस बात को जानते थे।
आप कई बातों को जानते हैं, लेकिन फिर भी
आप उन बातों को अनदेखा कर उन्हें होने
देते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से भी बद्रीनाथ
का खास महत्व है क्योंकि यहां के
मंदिर को आदि शंकराचार्य ने
प्रतिष्ठित किया था। यह अद्भुत
जगह सचमुच दर्शनीय है।

 

ध्यान का प्रयोग कर्म के लिए शक्ति संचय करना है


 

         हमारे एक मित्र ने
अपने जीवन की घटना
सुनाते हुये बताया कि हिमालय
जाने के नाम पर मैंने घर छोड़ा,
किंतु सौभाग्य से गांधीजी के पास पहुंच
गया। ध्यान आदि के लिए मेरी हिमालय
जाने की इच्छा थी, किंतु गांधीजी के पास
मुझे ध्यान का पर्याप्त लाभ मिला। जब हम
सेवा करते हैं, तब हमें ध्यान का मौका
मिलता है। जो सेवा की, वह परमेश्वर
की सेवा हुई, ऐसा मानेंगे तो वह
ध्यान-योग होगा। अगर हम
यह मानेंगे कि मनुष्य की
सेवा हुई, तो वह सिर्फ
सेवा कार्य होगा। उस
सेवा कार्य द्वारा
परमेश्वर के साथ
संपर्क हो रहा है, ऐसी
भावना रही तो वह ध्यान होगा।

‘          साधना कर्मयोगमय
होनी चाहिए’ का उपसिद्धांत
बिल्कुल यूक्लिड (प्राचीन यूनान
का एक प्रसिद्ध गणितज्ञ) की पद्धति
से निष्पादित होता है। कर्म कहते ही
दो दोष चिपकने को तत्पर हो जाते हैं-
एक कर्मठता और दूसरा कर्म के पीछे
भाग-दौड़। उल्टे ‘योग’ का नाम लेते ही
कर्मशून्य ध्यान-साधना की ओर झुकाव
होता है, जो काल्पनिक होती है। कर्माग्रही
आत्मा की मूल निष्कर्म भूमिका खो बैठता
है। कर्म छोड़कर काल्पनिक ध्यान के पीछे
लगना पैर को तोड़कर रास्ता तय करने की
कोशिश करने के बराबर है।

           कर्मयोगी इन दोनों
दोषों से दूर रहता है। एक
भाई ने कहा कि हम आध्यात्मिक
मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं, इसलिए
ध्यान कर रहे हैं। हमने कहा कि ध्यान
का अध्यात्म के साथ कोई खास संबंध नहीं
है, ऐसा हम मानते हैं। कर्म एक शक्ति है,
जो अच्छे, बुरे, स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ
के काम में आ सकता है। उसी तरह ध्यान
भी एक शक्ति है, जो उन पांचों कामों में
आ सकती है।

                कर्म स्वयं में ही
कोई आध्यात्मिक शक्ति
नहीं है, वैसे ही ध्यान भी
स्वयमेव कोई आध्यात्मिक
शक्ति नहीं है। कर्म करने के
लिए मनुष्य को दस-पांच चीजों
की तरफ खूब ध्यान देना पड़ता है।
वह भी एक तरह का विविध ध्यान-योग
ही है। चर्खा कातना हो तो इधर पहिए की
तरफ ध्यान देना पड़ता है, तो उधर पूनी
खींचने की तरफ। इस दोहरी प्रक्रिया के
साथ-साथ सूत लपेटने की तरफ भी
ध्यान देना पड़ता है। तभी सूत
कतता है। बहनों को रसोई
का काम करते समय कई
बातों की तरफ ध्यान देना
पड़ता है। इधर चावल पक
रहा है तो उसे देखना, उधर
आटा गूंथना, रोटी बेलना, सेंकना,
तरकारी काटना, लकड़ी ठीक से जल
रही है या नहीं, यह देखना। इसमें भी विविध
ध्यान-योग है।

             ध्यान करते समय
हम अनेक चीजों की तरफ
से ध्यान हटाकर एक ही चीज
की तरफ ध्यान देते हैं। जैसे अनेक
चीजों की तरफ एक साथ ध्यान देना
एक शक्ति है, वैसे ही एक ही चीज की
तरफ ध्यान देना, यह भी एक शक्ति है।
लोगों के मन में अक्सर एक गलतफहमी
रही है कि कर्म करना सांसारिकों का
काम है और ध्यान करना अध्यात्म
की चीज है। इस गलत खयाल को
मिटाना बहुत जरूरी है।

              अगर ध्यान का अध्यात्म
से संबंध जोड़ा जाए, तो वह आध्या-
त्मिक है। हमने खेत में कुदाल चलाई,
कुआं खोदने का काम किया, कताई,
बुनाई, रसोई, सफाई आदि तरह-तरह
के काम भी किए। बचपन में हमारे पिताजी
ने हमसे रंगने का काम, चित्रकला, होजरी
वगैरह के काम भी करवाए थे। वह सब करते
समय हमारी यही भावना थी कि हम इस रूप में
एक उपासना कर रहे हैं। इसमें हम अपने को
मानवमात्र के साथ, कुदरत के साथ जोड़ते
थे और इन सबका केंद्र स्थान, जो परमात्मा
कहलाता है, उसके साथ भी जोड़ते थे। यह
हमारा अनुभव है।

                ध्यान और कर्म परस्पर
पूरक शक्तियां हैं। कर्म के लिए दस-
बीस क्रियाएं करनी होती है, यानी उन
सबका ध्यान करना पड़ता है। ध्यान में
सब वस्तुओं को छोड़कर एक ही चीज का
ध्यान किया जाता है। पचासों चीजों का ध्यान
किया जाए, तो कर्म-शक्ति विकसित होती है और
एक ही चीज पर एकाग्र होने से ध्यान-शक्ति विकसित
होती है। जैसे कर्म के लिए अनेक वस्तुओं का खयाल
करना पड़ता है, वैसे ही ध्यान के लिए एक ही वस्तु
का करना पड़ता है। दोनों पूरक शक्तियां हैं। घड़ी
में अनेक पुर्जे होते हैं, उनको अलग-अलग कर
दिया जाए, तो आपकी कर्म-शक्ति सध गई।
पुर्र्जो को तो बच्चे भी अलग-अलग कर देते
हैं, लेकिन एकत्र कर सही जगह लगाना कठिन
है। पुर्र्जो को अलग करना और एक करना, इन दो
प्रक्रियाओं में से एक कर्म की और दूसरी ध्यान की
प्रक्रिया है। जब दोनों प्रक्रियाएं सधती हैं, तब प्रज्ञा
बनती है, जो निर्णयकारी होती है।

                व्यक्तिगत ध्यान की
आवश्यकता है, लेकिन उससे
भी अधिक महत्व की चीज है,
हमारा सब काम ध्यानस्वरूप होना
चाहिए। मिसाल के तौर पर बाबा (स्वयं
के लिए) रोज घंटा, डेढ़ घंटा कभी-कभी
ढाई घंटे तक सफाई करता है। सफाई में
एक-एक तिनका, पत्ती, कचरा उठाता है
और टोकरी में डालता है। परंतु बाबा को जो
अनुभव आता है, वह सुंदर ध्यान का अनुभव
आता है। माला लेकर जप करेगा तो जो अनुभव
आएगा, उससे किसी प्रकार से कम या अलग
अनुभव नहीं, बल्कि ऊंचा ही है। एक-एक
तिनका उठाना और उसके साथ नाम-
स्मरण करना। मैं कभी-कभी गिनता
हूं। आज 1225 तिनके उठाए। उसमें
मन काम नहीं करता। वह एक
ध्यान-योग ही है। यह मानकर
चलिए कि जो आदमी बाहर
जरा भी कचरा सहन नहीं
करता, वह अंदर का कचरा
भी सहन नहीं करेगा। उसे अंदर
का कचरा निकालने की जोरदार
प्रेरणा मिलेगी। यह आध्यात्मिक परिणाम
है। हर एक को ऐसी प्रेरणा मिलेगी ही, ऐसा
नहीं कह सकते। लेकिन तन्मय होकर कोई
यह काम करेगा, तो उसे ध्यान-योग सध सकता है।

                  काम करते समय
ध्यान होना ही चाहिए। तस्मात
य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवंति,
ध्यानापादांशा इवैव ते भवंति। जो लोग
दुनिया में कोई भी महत्ता प्राप्त करते हैं,
वह उनको ध्यान के कारण प्राप्त होती है।
कबीर ने वर्णन किया है- माला तो कर में
फिरे यानी हाथ में माला घूम रही है, मुख
में जबान घूम रही है और चित्त दुनिया में
घूम रहा है। ध्यान के लिए आलंबन चाहिए।
हमारा काम ही ध्यान के लिए आलंबन है।

 

जीवन प्रवाह के साथ तीव्रता भी है


 

             जीवन तीव्रता है।
कभी आपने महसूस किया
है कि आपके भीतर जो जीवन
है, वह एक पल के लिए भी धीमा
नहीं पड़ता। अगर कुछ धीमा पड़ता
है, तो वह है आपका दिमाग और आ-
पकी भावनाएं, जो कभी अच्छी हो जाती
हैं तो कभी बिमार। अपनी श्वास को देखिए।
क्या यह कभी धीमी पड़ती है? अगर कभी
यह धीमी पड़ जाती है तो उसका मतलब
मौत होता है। जब मैं आपको जीवंत बनने
और अपने अंदर तीव्रता पैदा करने के
तमाम तरीके बताता हूं, तो मैं बस
यह कह रहा होता हूं कि आप
जीवन की तरह बन जाएं।
अभी आपने अपने उन
विचार और भावों को
बहुत ज्यादा महत्व दिया
हुआ है, जो आपके भीतर
चल रहे हैं। आपने अपने भीतर
के जीवन को महत्व नहीं दिया है।
जरा सोचिए, क्या जीवित रहने से
ज्यादा महत्व आपके विचारों का है?
महान दर्शनशास्त्री देस्कार्ते ने कहा,
‘मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं।’

         बहुत सारे लोगों
का मानना है कि उनका
अस्तित्व केवल इसलिए है
क्योंकि वे सोच रहे हैं। नहीं, ऐसा
नहीं है। चूंकि आपका अस्तित्व है,
इसलिए आप सोच पा रहे हैं, नहीं तो
आप सोच ही नहीं सकते। आपकी
जीवंतता आपके विचारों और भावों
से कहीं ज्यादा मौलिक और महत्व-
पूर्ण हैं। लेकिन होता यह है कि
आप केवल वही सुनते हैं जो
आपके विचार और भाव
कह रहे हैं। अगर आप
जीवन की प्रक्रिया के
हिसाब से चलें, तो
यह एक निरंतर प्रवाह
है, चाहे आप सो रहे हों
या जाग रहे हों। जब आप
सो रहे होते हैं तो क्या जीवन
आपके भीतर सुस्त पड़ जाता है?
नहीं, यह आपका मन है जो कहता
है, ‘मुझे यह पसंद है इसलिए मैं इसे
पूरे जुनून के साथ करूंगा, मुझे वह
पसंद नहीं है इसलिए उसे दिल से नहीं
करूंगा।’ लेकिन आपकी जिंदगी इस
तरह की नहीं है। यह हमेशा एक प्रवाह
और तीव्रता में है।

            अगर आप लगातार
इस तथ्य के प्रति जागरूक
या सजग रहेंगे कि बाकी सभी
चीजें गुजर जाने वाली चीजें हैं
और मैं मूल रूप से जीवन हूं, तो
आपके अंदर एक प्रवाह और तीव्रता
बनी रहेगी। आपके अस्तित्व में होने
का कोई और तरीका ही नहीं है, क्योंकि
जीवन को कोई दूसरा तरीका मालूम ही
नहीं है। जीवन हमेशा प्रवाह में है, यह तो
बस भाव और विचार ही हैं जो भ्रम पैदा करते हैं।

               अब जरा अपनी
भावनाओं और विचारों की
प्रकृति को देखिए। जीवन में
ऐसे तमाम मौके आए होंगे, जब
इन विचारों और भावनाओं की वजह
से आपने कई चीजों में भरोसा किया
होगा। कुछ समय बाद आपको ऐसा
लगने लगता है कि उस चीज पर भरोसा
करना आपकी बेवकूफी थी। आज आपकी
भावना आपसे कहती है कि यह शख्स बहुत
अच्छा है। फिर कल आपकी भावना आपको
बताती है कि यह सबसे खतरनाक व्यक्ति
है – और दोनों ही बातें शत प्रतिशत सच
मालूम पड़ती हैं। इस तरह आपकी भावना
और विचार आपको धोखा देने के शानदार
जरिए हैं। वे आपको किसी भी चीज के बारे में
भरोसा दिला सकते हैं।

               अपनी खुद की
मान्यताओं की ओर देखिए।
उनमें से कोई भी किसी भी तरह
की जांच का सामना नहीं कर पाएगी।
अगर मैं आपसे तीन सवाल पूछूं, तो
आपकी मान्यताएं पूरी तरह लडख़ड़ा
जाएंगी। लेकिन जीवन में अलग-अलग
मौकों पर आपका मन आपको अलग-अलग
बातों पर भरोसा कराएगा और वह तब आपको
बिल्कुल सच लगेगा।

कैसे बनाए रखें तीव्रता?

   तीव्रता का अर्थ है
जीवन के प्रवाह के
साथ चलना। अगर आप
यहां सिर्फ जीवन के रूप में,
एक शुद्ध जीवन के रूप में मौजूद
हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से अपनी
परम प्रकृति की ओर जाएगा। जीवन
की प्रक्रिया अपने स्वाभाविक लक्ष्य
की ओर बढ़ रही है। लेकिन आप
एक विचार, भाव, पूर्वाग्रह, क्रोध,
नफरत और ऐसी ही तमाम
दूसरी चीजें बनकर एक
बड़ी रुकावट पैदा कर
रहे हैं। अगर आप बस
जीवन के एक अंश के
रूप में मौजूद हैं, तो स्वा-
भाविक रूप से आप अपनी
परम प्रकृति तक पहुंच जाएंगे।

            यह कोई ऐसी चीज
नहीं है जिसके लिए आपको
जूझना या संघर्ष करना पड़े। मैं
हमेशा कहता हूं – बस अपनी तीव्रता
को बनाए रखें, बाकी चीजें अपने आप
होंगी। आपको स्वर्ग का रास्ता ढूंढने की
जरूरत नहीं है। बस अपनी तीव्रता को बनाए
रखिए। ऐसा कोई नहीं है जो इस जीवन को
इसकी परम प्रकृति की ओर ले जाए या
जाने से रोक दे। हम इसमें देरी कर
सकते हैं या हम बिना किसी बाधा
के इसे तेजी से जाने दे सकते हैं।
बस यही है जो हम कर सकते हैं।

             यह जितनी तेजी
से हो सकती है, उतनी तेजी
से इसे होने देने के लिए ही आ-
ध्यात्मिक प्रक्रियाएं होती हैं। मदद
के लिए आपको देवताओं को बुलाने
की जरूरत नहीं है, आपको जीवन
होना होगा, विशुद्ध जीवन। अगर
आप यहां एक विशुद्ध जीवन के
रूप में जी सकते हैं, तो आप
परम लक्ष्य तक स्वाभाविक रूप
से पहुंच जाएंगे।

 

हमारी सांस ही बंधन है और यही सांस मुक्ति है


 

          सांस सिर्फ ऑक्सीजन
और कार्बन डाइऑक्साइड का
आदान-प्रदान नहीं है। आप जिस
तरह के विचारों और भावनाओं से
गुजरते हैं, आपकी सांस उसके अनु-
सार अलग-अलग स्वरूप ले लेती है।
जब आप क्रोधित, शांत, खुश या उदास
होते हैं, तो आपकी सांस में भी उसके अनु-
सार सूक्ष्म बदलाव होते हैं। आप जिस तरीके
से सांस लेते हैं, वैसा ही आप सोचते हैं और
जैसा आप सोचते हैं, उसी तरीके से आप
सांस लेते हैं।

          अपने तन और मन
पर कई तरह के काम करने
के लिए सांस को साधन के रूप
में इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्राणायाम एक विज्ञान है, जिसमें
आप जागरूक होकर एक खास
तरीके से सांस लेते हुए अपने
सोचने, महसूस करने, समझने
और जीवन को अनुभव करने का
तरीका बदल सकते हैं। अगर मैं आपसे
आपकी सांस पर ध्यान देने के लिए कहूं,
जो आजकल लोगों के बीच सबसे आम
चलन है, तो आपको लगेगा कि आप
अपनी सांस पर ध्यान दे रहे हैं।
लेकिन आप बस हवा की गति
से पैदा होने वाली हलचल को
ही महसूस कर पाते हैं। यह
कुछ ऐसा ही है कि जब कोई
आपके हाथ को छूता है तो
आपको लगता है कि आप
दूसरे व्यक्ति के स्पर्श को
जानते हैं, लेकिन असल में
आप सिर्फ अपने शरीर में पैदा
हुए अनुभव को ही जान पाते हैं,
आप यह नहीं जानते कि दूसरा व्यक्ति
कैसा महसूस करता है।

            सांस ईश्वर के हाथ
की तरह है। आप उसे महसूस
नहीं करते। यह हवा से पैदा हुई
हलचल नहीं है। जिस सांस का
आप अनुभव नहीं कर सकते, उसे
कूर्म नाड़ी कहा जाता है। यह वह
डोर है जो आपको इस शरीर के
साथ बांधती है, एक अखंडित डोर,
जो आगे खिंचती जाती है। अगर मैं
आपकी सांस बाहर निकाल लूं, तो
आप और आपका शरीर अलग-अलग
हो जाएंगे क्योंकि जीव और शरीर कूर्म
नाड़ी से बंधे हुए होते हैं। यह एक बड़ा
धोखा है। ये दोनों अलग-अलग चीजें हैं,
लेकिन एक होने का दिखावा करते हैं।
यह शादी की तरह है, पति-पत्नी दो इन-
सान होते हैं, लेकिन जब वे बाहर आते हैं,
तो एक होने का दिखावा करते हैं। यहां पर
दो लोग हैं, शरीर और जीव, दोनों एक-दूसरे के
बिल्कुल विपरित, लेकिन वे एक होने का दिखावा
करते हैं।

              अगर आप सांस से
होकर गहराई में अपने अंदर
तक, सांस के सबसे गहरे केंद्र
तक जाते हैं, तो वह आपको उस
बिंदु तक ले जाएगा, जहां आप वास्तव
में शरीर से बंधे हुए हैं। एक बार आपको
पता चल जाए कि आप कहां और कैसे बंधे
हुए हैं, तो आप अपनी इच्छा से उसे खोल
सकते हैं। आप चेतन होकर शरीर को उसी
सहजता से त्याग सकते हैं, जैसे अपने कपड़ों
को। जब आपको पता होता है कि आपके कपड़े
कहां पर बंधे हुए हैं, तो उन्हें उतारना आसान होता
है।

               जब आपको नहीं
पता होता, कि वह कहां बंधा
हुआ है, तो चाहे आप उसे जैसे
भी खींचे, वह नहीं उतरता। आपको
उसे फाड़ना होगा। इसी तरह अगर
आपको नहीं पता कि आपका शरीर
किस जगह आपसे बंधा हुआ है, और
आप उसे छोड़ना चाहते हैं, तो आपको
किसी न किसी रूप में उसे नुकसान
पहुंचाना होगा। लेकिन अगर आपको
पता हो कि वह कहां बंधा हुआ है, तो
आप बड़ी सफाई से एक दूरी से उसे
पकड़ सकते हैं। जब आप उसे त्यागना
चाहें, तो पूरे होशोहवाश में उसे त्याग सकते
हैं। जीवन बहुत अलग हो जाता है। जब कोई
अपनी इच्छा से शरीर को पूरी तरह त्याग देता है,
तो इसे हम महासमाधि कहते हैं। आम तौर पर
इसी को मुक्ति या मोक्ष कहा जाता है। सब कुछ
बराबर हो जाता है, शरीर के अंदर और शरीर
के बाहर में कोई अंतर नहीं रह जाता। खेल
समाप्त हो जाता है।

                 हर योगी को इसकी
चाह होती है। चाहे जान-बूझकर
या अनजाने में हर इनसान भी इसी
दिशा में प्रयास कर रहा है। वह विस्तार
करना चाहता है, और यह चरम विस्तार
है। बात सिर्फ इतनी है कि वे किस्तों में
अनंत की ओर बढ़ रहे हैं, जो एक
बहुत लंबी और असंभव प्रक्रिया है।
अगर आप 1,2,3,4 गिनते जाएंगे,
तो आप एक अंतहीन गणना बन
कर रह जाएंगे। आप कभी अनंत
तक नहीं पहुंच पाएंगे। जब इंसान
इस बात की व्यर्थता समझ जाता है,
तो वह स्वाभाविक रूप से अपने अंदर
की ओर मुड़ जाता है ताकि जीवन की
प्रक्रिया को शरीर से अलग कर सके।

 

जिन्दगी की उलझन – शादी या सन्यास


 

        अगर आप एक
गृहस्थ हैं और साधना
करना चाहते हैं तो आपको
कई लोगों से अनुमति लेनी
पड़ती है। वे अनुमति दे भी स-
कते हैं और नहीं भी दे सकते।
उसमें कई समस्याएँ होती हैं,
लेकिन अगर आप एक
ब्रह्मचारी हैं तो आप
अपने लिए निर्णय ले
सकते हैं। जब आप एक
गृहस्थ होते हैं तो कुछ खास
तरह की साधनाओं को करना
थोड़ा कठिन होता है। वहां आवश्यक
वातावरण बनाना संभव नहीं होता। तो
क्या सत्य को जानने के लिए हर एक
व्यक्ति को ब्रह्मचारी बन जाना चाहिए?
नहीं। इसकी ज़रूरत नहीं है।

           अगर आपको अपने
भीतर के सत्य को जानना है
तो यह मायने नहीं रखता कि
बाहरी स्थितियां कैसी हैं। आप इस
पर गौर करें कि आपके जीवन में क्या
महत्वपूर्ण है, आपके जीवन की क्या –
क्या जरूरतें हैं, उसी हिसाब से आप
चुनाव कर सकते हैं।

              किसी ने शादी कर
ली और किसी ने ब्रह्मचर्य ले
लिया। कौन सही है और कौन
गलत? या कौन बेहतर है? ऐसी
कोई चीज़ नहीं है। हर व्यक्ति को
अपनी प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत
ज़रूरतों के आधार पर यह चुनाव करना
चाहिए। कुछ लोगों के लिए शादी जरूरी
है और उनकी शादी हो जाती है। कुछ
लोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं है,
और वे ब्रह्मचर्य ले लेते हैं। हर
व्यक्ति पर एक ही नियम
लागू नहीं होता। जिसको
शादी की ज़रूरत है अगर
उस व्यक्ति को ब्रह्मचर्य दे दिया
जाए तो उसका जीवन नरक बन
जाएगा। जो शादी नहीं करना चाहता,
अगर उसकी बलपूर्वक शादी कर दी
जाए, तो वह दूसरी तरह के नरक
से गुजऱेगा।

               ऐसा नहीं है कि
शादी गलत है। यह दो लोगों
के लिए जीवन साझा करने का
और एकसाथ रहने का एक अवसर
होता है। यह जीने का एक अच्छा तरीका
है, और इसे जीने के एक खूबसूरत तरीके
में परिवर्तित किया जा सकता है। चूंकि
लोग पूरी तरह परिपक्व नहीं होते, वे
एक दूसरे के ऊपर बहुत ज्यादा
अधिकार जताने लगते हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है
कि वे एक दूसरे का इस्तेमाल
करके अपना जीवन बनाने की
कोशिश करते हैं।

        आप अपना जीवन
एक दूसरे से बाँट सकते हैं
और एकसाथ रह सकते हैं,
लेकिन लोग एक दूसरे का
इस्तेमाल करके अपना जीवन
बनाने की कोशिश करने लगते
हैं। तब शादी का असफल होना निश्चित
है, कोर्ट-कचहरी में भले ही न जाना पड़े,
लेकिन जीवन में ऐसा होना ही है। यह रिश्ता
अच्छे से निभता है जब आप या तो निरे मूर्ख
हैं कि आपको कुछ भी पता नहीं है, आप
बस सहज रहते हैं, या आप ऐसे
व्यक्ति हैं जो पूरी तरह से
समर्पित है। अगर आप में
दूसरे व्यक्ति के प्रति पूरा
समर्पण है, तो यह अच्छी
तरह से चलता है।

      या आप वाकई में
एक दूसरे से इतना प्रेम
करते है कि आप दोनों के
बीच में सब कुछ बढ़िया है,
दूसरा चाहे किसी भी तरह से
रहे, फिर भी कोई समस्या नहीं
है, सब ठीक है। अन्यथा इसका
निभना संभव नहीं है। मात्र सामाजिक
बाध्यताओं को लेकर दो लोग वर्षों तक
चिपके रहते हैं, यह पागलपन है। इस
तरह से लोग बस एक दूसरे को बर्बाद
कर रहे हैं।

        मैंने स्त्रियों और
पुरुषों दोनों को देखा है,
यह स्त्री और पुरुष दोनों के
लिए सत्य है। जब वे जवान होते
हैं तब उनमें ज़्यादा उमंग और जीवंत-
ता होती है। फिर वे शादी कर लेते हैं –
मैंने ऐसे प्रेमियों को कॉलेज में देखा है।
उन्होंने सोचा कि वे तो एक दूसरे के
लिए ही बनाए गए हैं। वे आगे बढ़े
और भारी विरोध के बीच शादी कर
ली। वे माता पिता के खिलाफ,
समाज के खिलाफ चले गए
और शादी कर ली। वे बहुत
जोशीले और जीवंत लोग थे।
शादी के बाद, चार-पाँच साल
के अंदर ही दोनों बहुत दुखी
इंसान बन गये। आप उनके चेहरों
पर दु:ख देख सकते हैं, सारी जीवंतता
चली गई। लोगों को इस तरह से देखना
दुर्भाग्यपूर्ण है।

              अगर आप प्रेम से
कुछ हासिल करने की कोशिश
करते हैं, तो प्रेम चला जाएगा; केवल
हासिल की गई चीज़ बच जाएगी। दुर्भाग्य-
वश, सभी लोग यही करने की कोशिश
करते हैं। उन्हें बहुत बड़ी कीमत
चुकानी पड़ती है, लेकिन लोग
सीखते नहीं हैं। लोग वास्तव
में एक बड़ी कीमत चुकाते हैं।

           आपका दु:ख ही
सबसे बड़ी कीमत है जिसे
आप चुका सकते हैं, और क्या
शेष रह जाता है? इस प्रक्रिया में
आप अपना प्रेम और आनंद खो
देते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है
कि आप अपना प्यार खो देते हैं।
इससे बड़ी कीमत और क्या हो
सकती है? आपको नरक में जाने
की ज़रूरत नहीं है। यह काफी है, है
कि नहीं? कम से कम, अगर आप कॉ-
लेज के उस प्रेम संबंध को याद करते तो
वह आपके जीवन में आनंद का एक स्त्रोत
होता। हां, लेकिन जब आपके सपने साकार
हो गए तो आपने इससे एक व्यापार बना
लिया। वह खूबसूरत व्यक्ति, जो एक
समय आपके लिए सब कुछ होता
था, वह आपके लिए एक कुरूप
व्यक्ति में बदल गया। यह कितना
दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन लोग पीढ़ी दर
पीढ़ी यही काम कर रहे हैं। यह समय
बदलाव का है। वास्तव में यह वक्त बदल-
ने का है और यह निर्णय लेने का है कि
आपके लिए क्या महत्व रखता है और
क्या नहीं।

          आप जो भी काम करते
हैं, उसके बाद परिणामों का एक
पूरा सिलसिला शुरु होता है। अगर
आप एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं, तो आ-
पको यह देखना चाहिए कि आप जो
काम करने जा रहे हैं, उसके पीछे आने
वाले परिणामों के सिलसिले के लिए आप
तैयार हैं या नहीं। और फिर निर्णय लीजिए
कि वह काम आपके लिए आवश्यक है या
नहीं। सोचिए और निर्णय लीजिए कि उन परि-
णामों का सामना करने के लिए और उन्हें खुशी-
खुशी स्वीकार करने के लिए आप तैयार हैं या
नहीं। आपको इसे परखना चाहिए और फिर
निर्णय लेना चाहिए। हर व्यक्ति के लिए
एक ही बात तय नहीं की जा सकती।

 

यह जीवन प्रवाह के साथ तीव्रता भी है


            जीवन तीव्रता है।
कभी आपने महसूस किया
है कि आपके भीतर जो जीवन
है, वह एक पल के लिए भी धीमा
नहीं पड़ता। अगर कुछ धीमा पड़ता है,
तो वह है आपका दिमाग और आपकी
भावनाएं, जो कभी अच्छी हो जाती हैं तो
कभी बिमार। अपनी श्वास को देखिए। क्या
यह कभी धीमी पड़ती है? अगर कभी यह
धीमी पड़ जाती है तो उसका मतलब मौत होता
है। जब मैं आपको जीवंत बनने और अपने अंदर
तीव्रता पैदा करने के तमाम तरीके बताता हूं, तो
मैं बस यह कह रहा होता हूं कि आप जीवन की
तरह बन जाएं। अभी आपने अपने उन विचार और
भावों को बहुत ज्यादा महत्व दिया हुआ है, जो आपके
भीतर चल रहे हैं। आपने अपने भीतर के जीवन को
महत्व नहीं दिया है। जरा सोचिए, क्या जीवित रहने
से ज्यादा महत्व आपके विचारों का है? महान दर्शन-
शास्त्री देस्कार्ते ने कहा, ‘मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं।’
               बहुत सारे लोगों का
मानना है कि उनका अस्तित्व
केवल इसलिए है क्योंकि वे सोच
रहे हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। चूंकि आपका
अस्तित्व है, इसलिए आप सोच पा रहे हैं,
नहीं तो आप सोच ही नहीं सकते। आपकी
जीवंतता आपके विचारों और भावों से कहीं
ज्यादा मौलिक और महत्वपूर्ण हैं। लेकिन
होता यह है कि आप केवल वही सुनते हैं
जो आपके विचार और भाव कह रहे हैं।
           अगर आप जीवन की
प्रक्रिया के हिसाब से चलें, तो
यह एक निरंतर प्रवाह है, चाहे
आप सो रहे हों या जाग रहे हों।
जब आप सो रहे होते हैं तो क्या
जीवन आपके भीतर सुस्त पड़
जाता है? नहीं, यह आपका मन है
जो कहता है, ‘मुझे यह पसंद है इसलिए
मैं इसे पूरे जुनून के साथ करूंगा, मुझे वह
पसंद नहीं है इसलिए उसे दिल से नहीं करूंगा।’
लेकिन आपकी जिंदगी इस तरह की नहीं है। यह
हमेशा एक प्रवाह और तीव्रता में है।
         अगर आप लगातार
इस तथ्य के प्रति जागरूक
या सजग रहेंगे कि बाकी सभी
चीजें गुजर जाने वाली चीजें हैं और
मैं मूल रूप से जीवन हूं, तो आपके अंदर
एक प्रवाह और तीव्रता बनी रहेगी। आपके
अस्तित्व में होने का कोई और तरीका ही नहीं
है, क्योंकि जीवन को कोई दूसरा तरीका मालूम
ही नहीं है। जीवन हमेशा प्रवाह में है, यह तो बस
भाव और विचार ही हैं जो भ्रम पैदा करते हैं।
              अब जरा अपनी
भावनाओं और विचारों की
प्रकृति को देखिए। जीवन में
ऐसे तमाम मौके आए होंगे, जब
इन विचारों और भावनाओं की वजह
से आपने कई चीजों में भरोसा किया
होगा। कुछ समय बाद आपको ऐसा
लगने लगता है कि उस चीज पर भरोसा
करना आपकी बेवकूफी थी। आज आपकी
भावना आपसे कहती है कि यह शख्स बहुत
अच्छा है। फिर कल आपकी भावना आपको
बताती है कि यह सबसे खतरनाक व्यक्ति
है – और दोनों ही बातें शत प्रतिशत सच
मालूम पड़ती हैं। इस तरह आपकी भावना
और विचार आपको धोखा देने के शानदार
जरिए हैं। वे आपको किसी भी चीज के बारे में
भरोसा दिला सकते हैं।
             अपनी खुद की मान्यताओं
की ओर देखिए। उनमें से कोई भी किसी
भी तरह की जांच का सामना नहीं कर पाएगी।
अगर मैं आपसे तीन सवाल पूछूं, तो आपकी
मान्यताएं पूरी तरह लडख़ड़ा जाएंगी। लेकिन
जीवन में अलग-अलग मौकों पर आपका
मन आपको अलग-अलग बातों पर भरोसा
कराएगा और वह तब आपको बिल्कुल सच
लगेगा।कैसे बनाए रखें तीव्रता?
         तीव्रता का अर्थ है
जीवन के प्रवाह के साथ
चलना। अगर आप यहां सिर्फ
जीवन के रूप में, एक शुद्ध जीवन
के रूप में मौजूद हैं, तो यह स्वाभाविक
रूप से अपनी परम प्रकृति की ओर जाएगा।
जीवन की प्रक्रिया अपने स्वाभाविक लक्ष्य
की ओर बढ़ रही है। लेकिन आप एक विचार,
भाव, पूर्वाग्रह, क्रोध, नफरत और ऐसी ही तमाम
दूसरी चीजें बनकर एक बड़ी रुकावट पैदा कर रहे
हैं। अगर आप बस जीवन के एक अंश के रूप में
मौजूद हैं, तो स्वाभाविक रूप से आप अपनी परम
प्रकृति तक पहुंच जाएंगे।
           यह कोई ऐसी चीज
नहीं है जिसके लिए आपको
जूझना या संघर्ष करना पड़े। मैं
हमेशा कहता हूं – बस अपनी तीव्रता
को बनाए रखें, बाकी चीजें अपने आप
होंगी। आपको स्वर्ग का रास्ता ढूंढने की
जरूरत नहीं है। बस अपनी तीव्रता को बनाए
रखिए। ऐसा कोई नहीं है जो इस जीवन को
इसकी परम प्रकृति की ओर ले जाए या जाने
से रोक दे। हम इसमें देरी कर सकते हैं या
हम बिना किसी बाधा के इसे तेजी से जाने दे
सकते हैं। बस यही है जो हम कर सकते हैं।
          यह जितनी तेजी
से हो सकती है, उतनी तेजी
से इसे होने देने के लिए ही आ-
ध्यात्मिक प्रक्रियाएं होती हैं। मदद
के लिए आपको देवताओं को बुलाने
की जरूरत नहीं है, आपको जीवन
होना होगा, विशुद्ध जीवन। अगर आप
यहां एक विशुद्ध जीवन के रूप में जी सकते
हैं, तो आप परम लक्ष्य तक स्वाभाविक रूप से
पहुंच जाएंगे।

बस आपको अपनी दिशा बदलनी है


 

          ऐसा नहीं है कि
आपके पास समय नहीं
है। बात बस इतनी है कि
ज्यादातर लोग समय का
उपयोग नहीं करना चाहते।
खाना मुश्किल से मिलता है,
कपड़े भी मुश्किल से मिलते हैं,
घर भी कठिनाई से बनता है। ऐसे
में लोगों के दिमाग में कमी का एक
मनोविज्ञान विकसित हो गया है। उन्हें
लगता है कि खुशी भी दुर्लभ है, आनंद
भी दुर्लभ है और प्रेम भी, जबकि ऐसा नहीं
है। इन चीजों की कोई कमी नहीं हैं।
       आप इन्हें जितना
ज्यादा इस्तेमाल करेंगे,
आपको ये उतनी ही मिलेंगी।
ये चीजें ऐसी नहीं हैं जिनकी
कभी कमी हो जाएगी। दिन में
दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर
लेना जीवित रहने के लिए काफी है,
लेकिन दिल्ली में जीवित रहने के लिए
लोगों की आवश्यकता मर्सिडीज हो गई है।
              जीवित रहने के लिए
जो चीजें असल में आवश्यक हैं,
उन्हें हासिल कर जीवन की खोज
करने की बजाय हम जीवित रहने
के लिए जरूरी चीजों की सूची को ही
बढ़ाते जा रहे हैं। नतीजा यह होता है कि
आप हमेशा चाहत और इच्छाओं के दलदल
में फंसे रहते हैं। दरअसल, यही सामाजिक
तरीका बन गया है। गौर से देखिए एक छोटा
सा कीट जिसके पास इंसान की तुलना में महज
दस लाखवां हिस्सा दिमाग है, जीवित रहने के काम
को इंसानों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली तरीके से कर
रहा है।
         हर जगह बस एक
ही सवाल है। तुम्हारी रोजी
रोटी कैसे चलेगी? मैं कहता
हूं तुम्हारी रोजी रोटी चलेगी। अब
देखो मेरी जेब में एक भी पैसा नहीं
है और मैं हर जगह यात्रा करता हूं
और गुजारा कर रहा हूं। कोई न कोई
हमेशा मेरा ध्यान रखता है। अगर आप
सभी के लिए उपयोगी और कुछ काम के
आदमी बन जाते हैं तो कोई न कोई हमेशा
होगा, जो आपका हर तरह से ध्यान रखेगा।
मेरा मानना है कि अगर आप अपने दिमाग
का सौवां हिस्सा भी उपयोग कर लेते हैं
तो आप शानदार तरीके से गुजारा
कर सकेंगे। सिर्फ गुजारे की
खातिर जीवन भर सोचते
रहने की आवश्यकता
नहीं है। अपने जीवन की
दिशा को निर्धारित करने का
यह एक बेहद गलत तरीका
होगा। मानवता के खिलाफ यह
एक तरह का अपराध है। जरा
बताइए, आप कैसे जानते हैं कि मैं
यहां हूं?एक छात्र: हम एक दूसरे को
देख सकते हैं।
             आप देख सकते हैं,
आप सुन सकते हैं। कल्पना
कीजिए, आपको हल्की सी नींद
आ जाए तो सबसे पहली चीज क्या
होगी। मैं आपकी नजरों से गायब होने
लगूंगा। फिर आपके आसपास के सभी
लोग और खुद आप भी अपनी नजरों से
गायब हो जाएंगे। लेकिन मैं तब भी यहीं हूं,
दुनिया तब भी यहीं होगी, खुद आप भी यहीं
हैं, आपका शरीर काम कर रहा है, आपका
दिमाग भी क्रियाशील है, लेकिन आपके अनुभव
में कुछ भी नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि
आपकी पांचों ज्ञानेंद्रियां बंद हो गई हैं। दरअसल,
इन ज्ञानेंद्रियों की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि ये उन
चीजों को ही समझ सकती हैं, जो भौतिक हैं।
                 आपका शरीर स्थूल है
जिसे आपने बाहरी चीजों से इकट्ठा
किया है। लेकिन इस स्थूल से परे भी
कुछ है जो आपके अनुभव में नहीं है।
यह आपके अस्तित्व का 99 फीसदी है।
इसीलिए मैं कहता हूं कि आपके अनुभव में
एक फीसदी से भी कम है।

                स्थूल से परे जो पहलू है,
आपको उसमें प्रवेश करना चाहिए।
अगर आप ऐसा करते हैं तो आपके
अंदर एक ऐसी सोच विकसित होने
लगेगी, जो पांचों ज्ञानेंद्रियों की सीमा से
परे है। जिस पल आप मां के गर्भ से बाहर
दुनिया में आते हैं, पांचों ज्ञानेंद्रियां काम
करना शुरू कर देती हैं क्योंकि जीवित
रहने के लिए इनकी आवश्यकता होती
है। कल्पना कीजिए, एक नवजात बच्चा
एक जंगल में खो गया है। अगर खाने
योग्य कोई चीज उसके सामने आएगी
तो क्या वह इसे अपने कानों में या
नाक में डाल लेगा? नहीं, उसे पता
होगा कि इसे कहां रखना है।
                     कहने का अर्थ
यह है कि जो चीजें जीवित
रहने के लिए आवश्यक हैं,
उनके लिए हमें किसी ट्रेनिंग
की आवश्यकता नहीं होती। ये
अपने आप काम करती हैं। लेकिन
क्या कोई नवजात बच्चा लिख या पढ़
सकता है? क्या वह वे सब काम कर
सकता है, जो बड़े होने पर हम करते हैं?
नहीं, क्योंकि इन सभी चीजों के लिए प्रयास
करने की आवश्यकता होती है।
           आपको वह अंग्रेजी
का ए याद है। जब आप साढ़े
तीन साल के थे तो आपके बड़े
आपको इसे लिखना सिखाते थे।
उस वक्त यह कितना मुश्किल लगता
था। आज भी अगर किसी अनपढ़ व्यक्ति
को आप पढ़ना-लिखना सिखाने की कोशिश
करते हैं तो उसे संघर्ष करना पड़ता है। कहने
का मतलब यह है कि हर उस चीज को सीखने के
लिए आपको प्रयास करना पड़ता है, जो आपके जीवित
रहने के लिए आवश्यक नहीं है।
                जाहिर है, अगर स्थूल
से परे किसी पहलू को आप अपने
जीवन में लाना चाहते हैं तो आपको
कुछ श्रम, कुछ प्रयास करने ही होंगे,
लेकिन बिल्कुल अलग दिशा में। जो कुछ
भी आपके इर्द-गिर्द है, आप उसे तो देख
सकते हैं, लेकिन आप अपनी आंखों को
भीतर की तरफ मोड़कर अपने अंतर की
पड़ताल नहीं कर सकते। आप बाहरी आवाजों
को सुन पाते हैं, लेकिन आपके शरीर में इतना
कुछ हो रहा है।
         क्या आप उसकी
आवाज सुन पाते हैं? नहीं।
आपके हाथ पर अगर एक चींटी
भी चढ़ जाए तो आपको महसूस हो
जाता है, लेकिन आपके इसी शरीर के
भीतर इतना सारा रक्त दौड़ रहा है। क्या
आपको उसकी गति महसूस होती है? नहीं
न। दरअसल, हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियों की प्रकृति
ही ऐसी होती है कि वे बाहर की दुनिया को ही देख
और महसूस पाती हैं, लेकिन जो कुछ भी आपको
अनुभव होता है, वह आपके भीतर होता है।
             अभी मुझे आप सभी
देख पा रहे हैं। मुझ पर प्रकाश
की किरणें पड़ रही हैं और मेरे शरीर
से परावर्तित होकर आपकी आंखों के
लेंसों से गुजर रही हैं और रेटिना पर उलटा
प्रतिबिंब बना रही हैं। इसीलिए आप अपने अंदर
मुझे देख पा रहे हैं। आप अपने अंदर मुझे सुनते
भी हैं। आप अपने अंदर पूरी दुनिया को देख पा रहे
हैं। अभी आप अपने दोस्त का स्पर्श करो और देखो,
आप उसके हाथ को महसूस नहीं करते। असल में
आप चीजों को उसी तरह से महसूस करते हैं,
जैसा आपका इंद्रियबोध होता है। इसके परे
आपने कभी कुछ अनुभव ही नहीं किया है।

                  आपके साथ जो भी
हुआ है, आपकी खुशियां, आपकी
परेशानियां आपके अंदर ही हुई हैं।
प्रकाश हो या अंधकार सब कुछ आपके
अंदर हुआ है लेकिन क्या आपके पास
कोई साधन है जिससे आप अपने भीतर
देख सकें। याद रखिए, ऐसा माध्यम आपको
तब तक हासिल नहीं होगा, जब तक आप प्रयास
नहीं करेंगे।

                एक दिन की बात है।
पास के एक गांव में एक शख्स
ईशा योग सेंटर को ढूंढता हुआ आया।
उसने वहीं के रहने वाले एक बच्चे से पूछा,
‘ईशा योग सेंटर कितनी दूर है।’ लड़के ने कहा,
’24998 मील।’ वह शख्स चौंका, ‘क्या, इतनी ज्यादा
दूर !’
            लड़का बोला, ‘जी हां,
जिस दिशा में आप जा रहे हैं, उ
स दिशा से तो सेंटर इतनी ही दूर
है, लेकिन अगर आप अपनी दिशा
बदल दें तो यह महज 4 मील दूर ही है।’
कहने का मतलब है कि अभी आपके पास
जो भी है, उसका रुझान बाहर की ओर है,
लेकिन जो कुछ भी हो रहा है, वह भीतर हो
रहा है। यही वजह है कि आपको पूरी तरह
गलत बोध हो रहा है। खुद को अंदर की
ओर मोड़ने के लिए आपको प्रयास करने
होंगे। अगर आप एकाग्रचित होकर 28 घंटे
दे दें तो हम आपकी दिशा बदल सकते हैं।